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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 160

आर्ष्टिषेण द्वारा पाण्डवों का स्वागत

युधिष्ठिर, उनके भाई, द्रौपदी और धौम्य राजर्षि आर्ष्टिषेण को प्रणाम करते हैं। वे दिव्य दृष्टि से उन्हें पहचान लेते हैं और युधिष्ठिर से उनके आचरण के विषय में पूछते हैं — सत्य, माता-पिता और गुरुजनों की सेवा, और पिता, माता, अग्नि, गुरु तथा आत्मा — इन पाँचों का सम्मान। फिर वे पर्वसंधियों पर पर्वत के अद्भुत दृश्यों का वर्णन करते हैं, जब ऋषि, गन्धर्व और स्वयं कुबेर वहाँ दिखाई देते हैं, पाण्डवों को चेताते हैं कि इससे आगे कोई मनुष्य नहीं जा सकता और यहाँ चंचलता नहीं करनी चाहिए, और उन्हें अर्जुन के लौटने तक अपने आश्रम में रहने को कहते हैं।

अध्याय 159अध्याय-सूचीअध्याय 161

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.160.1)

युधिष्ठिरस्तमासाद्य तपसा दग्धकिल्बिषम् । अभ्यवादयत प्रीतः शिरसा नाम कीर्तयन् ॥

yudhiṣṭhirastamāsādya tapasā dagdhakilbiṣam | abhyavādayata prītaḥ śirasā nāma kīrtayan

युधिष्ठिर ने तप से जिनके पाप भस्म हो चुके थे, उन ऋषि के पास जाकर प्रसन्नता से सिर झुकाकर अपना नाम बताते हुए उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 2 (3.160.2)

ततः कृष्णा च भीमश्च यमौ च सुतपस्विनौ । शिरोभिः प्राप्य राजर्षिं परिवार्योपतस्थिरे ॥

tataḥ kṛṣṇā ca bhīmaśca yamau ca sutapasvinau | śirobhiḥ prāpya rājarṣiṃ parivāryopatasthire

फिर कृष्णा, भीम और तपस्वी जुड़वाँ भाइयों ने भी सिर झुकाकर राजर्षि को प्रणाम किया और उन्हें घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 3 (3.160.3)

तथैव धौम्यो धर्मज्ञः पाण्डवानां पुरोहितः । यथान्यायमुपाक्रान्तस्तमृषिं संशितव्रतम् ॥

tathaiva dhaumyo dharmajñaḥ pāṇḍavānāṃ purohitaḥ | yathānyāyamupākrāntastamṛṣiṃ saṃśitavratam

इसी प्रकार पाण्डवों के पुरोहित धर्मज्ञ धौम्य भी विधिपूर्वक उन कठोर व्रत वाले ऋषि के पास गए।

श्लोक 4 (3.160.4)

अन्वजानात्स धर्मज्ञो मुनिर्दिव्येन चक्षुषा । पाण्डोः पुत्रान्कुरुश्रेष्ठानास्यतामिति चाब्रवीत् ॥

anvajānātsa dharmajño munirdivyena cakṣuṣā | pāṇḍoḥ putrānkuruśreṣṭhānāsyatāmiti cābravīt

उन धर्मज्ञ मुनि ने अपनी दिव्य दृष्टि से कुरुश्रेष्ठ पाण्डुपुत्रों को पहचान लिया और कहा — "बैठिए।"

श्लोक 5 (3.160.5)

कुरूणामृषभं प्राज्ञं पूजयित्वा महातपाः । सह भ्रातृभिरासीनं पर्यपृच्छदनामयम् ॥

kurūṇāmṛṣabhaṃ prājñaṃ pūjayitvā mahātapāḥ | saha bhrātṛbhirāsīnaṃ paryapṛcchadanāmayam

उन महातपस्वी ने भाइयों के साथ बैठे बुद्धिमान कुरुश्रेष्ठ का सत्कार किया और उनका कुशल-क्षेम पूछा —

आर्ष्टिषेण उवाच

श्लोक 6 (3.160.6)

नानृते कुरुषे भावं कच्चिद्धर्मे प्रवर्तसे । मातापित्रोश्च ते वृत्तिः कच्चित्पार्थ न सीदति ॥

nānṛte kuruṣe bhāvaṃ kacciddharme pravartase | mātāpitrośca te vṛttiḥ kaccitpārtha na sīdati

"आशा है, तुम असत्य में मन नहीं लगाते और धर्म में प्रवृत्त रहते हो? हे पार्थ, माता-पिता के प्रति तुम्हारा कर्तव्य शिथिल तो नहीं होता?

श्लोक 7 (3.160.7)

कच्चित्ते गुरवः सर्वे वृद्धा वैद्याश्च पूजिताः । कच्चिन्न कुरुषे भावं पार्थ पापेषु कर्मसु ॥

kaccitte guravaḥ sarve vṛddhā vaidyāśca pūjitāḥ | kaccinna kuruṣe bhāvaṃ pārtha pāpeṣu karmasu

"क्या तुम्हारे सब गुरुजन, वृद्ध और विद्वान तुमसे सम्मानित हैं? हे पार्थ, तुम पाप-कर्मों में मन तो नहीं लगाते?

श्लोक 8 (3.160.8)

सुकृतं प्रतिकर्तुं च कच्चिद्धातुं च दुष्कृतम् । यथान्यायं कुरुश्रेष्ठ जानासि न विकत्थसे ॥

sukṛtaṃ pratikartuṃ ca kacciddhātuṃ ca duṣkṛtam | yathānyāyaṃ kuruśreṣṭha jānāsi na vikatthase

"हे कुरुश्रेष्ठ, क्या तुम उचित रीति से उपकार का बदला चुकाना और अपकार को भुला देना जानते हो, और फिर भी उसकी डींग नहीं मारते?

श्लोक 9 (3.160.9)

यथार्हं मानिताः कच्चित्त्वया नन्दन्ति साधवः । वनेष्वपि वसन्कच्चिद्धर्ममेवानुवर्तसे ॥

yathārhaṃ mānitāḥ kaccittvayā nandanti sādhavaḥ | vaneṣvapi vasankacciddharmamevānuvartase

"क्या सज्जन तुमसे यथायोग्य सम्मान पाकर प्रसन्न रहते हैं? वन में रहते हुए भी क्या तुम धर्म का ही अनुसरण करते हो?

श्लोक 10 (3.160.10)

कच्चिद्धौम्यस्त्वदाचारैर्न पार्थ परितप्यते । दानधर्मतपःशौचैरार्जवेन तितिक्षया ॥

kacciddhaumyastvadācārairna pārtha paritapyate | dānadharmatapaḥśaucairārjavena titikṣayā

"हे पार्थ, धौम्य तुम्हारे आचरण से — तुम्हारे दान, धर्म, तप, शौच, सरलता और सहनशीलता से — दुःखी तो नहीं होते?

श्लोक 11 (3.160.11)

पितृपैतामहं वृत्तं कच्चित्पार्थानुवर्तसे । कच्चिद्राजर्षियातेन पथा गच्छसि पाण्डव ॥

pitṛpaitāmahaṃ vṛttaṃ kaccitpārthānuvartase | kaccidrājarṣiyātena pathā gacchasi pāṇḍava

"हे पार्थ, क्या तुम पिता-पितामहों के आचरण का पालन करते हो? हे पाण्डव, क्या तुम राजर्षियों के चले हुए मार्ग पर चलते हो?

श्लोक 12 (3.160.12)

स्वेस्वे किल कुले जाते पुत्रे नप्तरि वा पुनः । पितरः पितृलोकस्थाः शोचन्ति च रमन्ति च ॥

svesve kila kule jāte putre naptari vā punaḥ | pitaraḥ pitṛlokasthāḥ śocanti ca ramanti ca

"कहते हैं कि अपने-अपने कुल में पुत्र या पौत्र के जन्म लेने पर पितृलोक में रहने वाले पितर शोक भी करते हैं और आनन्दित भी होते हैं,

श्लोक 13 (3.160.13)

किं तस्य दुष्कृतेऽस्माभिः संप्राप्तव्यं भविष्यति । किं चास्य सुकृतेऽस्माभिः प्राप्तव्यमिति शोभनं ॥

kiṃ tasya duṣkṛte'smābhiḥ saṃprāptavyaṃ bhaviṣyati | kiṃ cāsya sukṛte'smābhiḥ prāptavyamiti śobhanaṃ

"यह सोचकर कि 'इसके दुष्कर्मों से हमें क्या भोगना पड़ेगा, और इसके सुकर्मों से हमें क्या शुभ फल मिलेगा?'

श्लोक 14 (3.160.14)

पिता माता तथैवाग्निर्गुरुरात्मा च पञ्चमः । यस्यैतेपूजिताः पार्थ तस्य लोकावुभौ जितौ ॥

pitā mātā tathaivāgnirgururātmā ca pañcamaḥ | yasyaitepūjitāḥ pārtha tasya lokāvubhau jitau

"पिता, माता, अग्नि, गुरु और पाँचवाँ आत्मा — हे पार्थ, जो इन पाँचों का सम्मान करता है, वह दोनों लोकों को जीत लेता है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 15 (3.160.15)

भगवन्नार्य माऽऽहैतद्यथावद्धर्मनिश्चयम् । यथाशक्ति यथान्यायं क्रियते विधिवन्मया ॥

bhagavannārya mā''haitadyathāvaddharmaniścayam | yathāśakti yathānyāyaṃ kriyate vidhivanmayā

"हे भगवन्, हे आर्य, आपने मुझे धर्म का निश्चित स्वरूप यथावत् बताया है। मैं अपनी शक्ति भर और न्याय के अनुसार विधिपूर्वक इसका पालन करता हूँ।"

आर्ष्टिषेण उवाच

श्लोक 16 (3.160.16)

अब्भक्षा वायुभक्षाश्च प्लवमाना विहायसा । जुषन्ते पर्वतश्रेष्ठमृषयः पर्वसन्धिषु ॥

abbhakṣā vāyubhakṣāśca plavamānā vihāyasā | juṣante parvataśreṣṭhamṛṣayaḥ parvasandhiṣu

"जल और वायु पर जीने वाले, आकाश-मार्ग से विचरने वाले ऋषि पर्वसंधियों के समय इस श्रेष्ठ पर्वत पर आते हैं।

श्लोक 17 (3.160.17)

कामिनः सह कान्ताभिः परस्परमनुव्रताः । दृश्यन्ते शैलशृङ्गस्था यथा किंपुरुषा नृप ॥

kāminaḥ saha kāntābhiḥ parasparamanuvratāḥ | dṛśyante śailaśṛṅgasthā yathā kiṃpuruṣā nṛpa

"हे राजन्, एक-दूसरे में अनुरक्त प्रेमी अपनी प्रियाओं के साथ किम्पुरुषों की तरह पर्वत-शिखरों पर खड़े दिखाई देते हैं।

श्लोक 18 (3.160.18)

अरजांसि च वासांसि वसानाः कौशिकानि च । दृश्यन्ते बहवः पार्थ गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥

arajāṃsi ca vāsāṃsi vasānāḥ kauśikāni ca | dṛśyante bahavaḥ pārtha gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ

"हे पार्थ, निर्मल वस्त्र और रेशमी परिधान पहने गन्धर्वों और अप्सराओं के अनेक समूह दिखाई देते हैं;

श्लोक 19 (3.160.19)

विद्याधरगणाश्चैव स्रग्विणः प्रियदर्शनाः । महोरगगणाश्चैव सुपर्णाश्चारणादयः ॥

vidyādharagaṇāścaiva sragviṇaḥ priyadarśanāḥ | mahoragagaṇāścaiva suparṇāścāraṇādayaḥ

"माला पहने, देखने में प्रिय विद्याधरों के समूह भी, बड़े-बड़े नागों के समूह, सुपर्ण, चारण आदि भी।

श्लोक 20 (3.160.20)

अस्य चोपरि शैलस्य श्रूयते पर्वसन्धिषु । भेरीपणवशङ्खानां मृदङ्गानां च निःस्वनः ॥

asya copari śailasya śrūyate parvasandhiṣu | bherīpaṇavaśaṅkhānāṃ mṛdaṅgānāṃ ca niḥsvanaḥ

"और इस पर्वत के ऊपर पर्वसंधियों पर भेरी, पणव, शंख और मृदंगों की ध्वनि सुनाई देती है।

श्लोक 21 (3.160.21)

इहस्थैरेव तत्सर्वं श्रोतव्यं भरतर्षभाः । न कार्या वः कथंचित्स्यात्तत्राभिगमने मतिः ॥

ihasthaireva tatsarvaṃ śrotavyaṃ bharatarṣabhāḥ | na kāryā vaḥ kathaṃcitsyāttatrābhigamane matiḥ

"हे भरतश्रेष्ठो, वह सब तुम्हें यहीं रहकर सुनना चाहिए; वहाँ जाने का विचार तुम किसी प्रकार भी न करना।

श्लोक 22 (3.160.22)

न चाप्यतः परं शक्यं गन्तुं भरतसत्तमाः । विहारस्तत्र देवानाममानुषगतिस्तु सा ॥

na cāpyataḥ paraṃ śakyaṃ gantuṃ bharatasattamāḥ | vihārastatra devānāmamānuṣagatistu sā

"हे भरतसत्तमो, इससे आगे जाना सम्भव भी नहीं है; वहाँ देवताओं का विहार-स्थल है, वह मनुष्यों की गति से परे है।

श्लोक 23 (3.160.23)

ईषच्चपलकर्माणं मनुष्यमिह भारत । द्विषन्ति सर्वभूतानि ताडयन्ति च राक्षसाः ॥

īṣaccapalakarmāṇaṃ manuṣyamiha bhārata | dviṣanti sarvabhūtāni tāḍayanti ca rākṣasāḥ

"हे भारत, यहाँ थोड़ा-सा भी चंचल आचरण करने वाले मनुष्य से सब प्राणी द्वेष करते हैं और राक्षस उस पर प्रहार करते हैं।

श्लोक 24 (3.160.24)

अस्यातिक्रम्य शिखरं कैलासस्य युधिष्ठिर । गतिः परमसिद्धानां देवर्षीणां प्रकाशते ॥

asyātikramya śikharaṃ kailāsasya yudhiṣṭhira | gatiḥ paramasiddhānāṃ devarṣīṇāṃ prakāśate

"हे युधिष्ठिर, कैलास के इस शिखर के पार परम सिद्धों और देवर्षियों का मार्ग प्रकाशित होता है।

श्लोक 25 (3.160.25)

चापलाद्धि न गन्तव्यं पार्थ यानैस्ततः परम् । अयःशूलादिभिर्घ्नन्ति राक्षसाः शत्रुसूदन ॥

cāpalāddhi na gantavyaṃ pārtha yānaistataḥ param | ayaḥśūlādibhirghnanti rākṣasāḥ śatrusūdana

"हे पार्थ, चंचलतावश उससे आगे किसी वाहन से नहीं जाना चाहिए; हे शत्रुसूदन, राक्षस लोहे के शूल आदि से मार डालते हैं।

श्लोक 26 (3.160.26)

अप्सरोभिः परिवृतः समृद्ध्या नरवाहनः । इह वैश्रवणस्तात पर्वसन्धिषु दृश्यते ॥

apsarobhiḥ parivṛtaḥ samṛddhyā naravāhanaḥ | iha vaiśravaṇastāta parvasandhiṣu dṛśyate

"हे तात, यहाँ पर्वसंधियों पर नरवाहन वैश्रवण (कुबेर) अपने पूरे वैभव के साथ अप्सराओं से घिरे दिखाई देते हैं।

श्लोक 27 (3.160.27)

शिखरे तं समासीनमधिपं यक्षरक्षसाम् । प्रेक्षन्ते सर्वभूतानि भानुमन्तमिवोदितम् ॥

śikhare taṃ samāsīnamadhipaṃ yakṣarakṣasām | prekṣante sarvabhūtāni bhānumantamivoditam

"शिखर पर बैठे यक्षों और राक्षसों के उस स्वामी को सब प्राणी उदित सूर्य की भाँति निहारते हैं।

श्लोक 28 (3.160.28)

देवदानवसिद्धानां तथा वैश्रवणस्य च । गिरेः शिखरमुद्यानमिदं भरतसत्तम ॥

devadānavasiddhānāṃ tathā vaiśravaṇasya ca | gireḥ śikharamudyānamidaṃ bharatasattama

"हे भरतसत्तम, पर्वत का यह शिखर देवताओं, दानवों, सिद्धों और वैश्रवण का क्रीड़ा-उद्यान है।

श्लोक 29 (3.160.29)

उपासीनस्य धनदं तुम्बुरोः पर्वसन्धिषु । गीतसामस्वनस्तात श्रूयते गन्धमादने ॥

upāsīnasya dhanadaṃ tumburoḥ parvasandhiṣu | gītasāmasvanastāta śrūyate gandhamādane

"हे तात, पर्वसंधियों पर धनपति (कुबेर) की उपासना करते तुम्बुरु के गीतों और सामगान का स्वर गन्धमादन पर सुनाई देता है।

श्लोक 30 (3.160.30)

एतदेवंविधं चित्रमिह तात युधिष्ठिर । प्रेक्षन्ते सर्वभूतानि बहुशः पर्वसन्धिषु ॥

etadevaṃvidhaṃ citramiha tāta yudhiṣṭhira | prekṣante sarvabhūtāni bahuśaḥ parvasandhiṣu

"हे तात युधिष्ठिर, ऐसे अद्भुत दृश्य सब प्राणी यहाँ पर्वसंधियों पर प्रायः देखते हैं।

श्लोक 31 (3.160.31)

भुञ्जाना मुनिभोज्यानि रसवन्ति फलानि च । वसध्वं पाण्डवश्रेष्ठा यावदर्जुनदर्शनात् ॥

bhuñjānā munibhojyāni rasavanti phalāni ca | vasadhvaṃ pāṇḍavaśreṣṭhā yāvadarjunadarśanāt

"हे पाण्डवश्रेष्ठो, मुनियों का आहार और रसीले फल खाते हुए अर्जुन के दर्शन होने तक यहीं निवास करो।

श्लोक 32 (3.160.32)

न तात चपलैर्भाव्यमिह प्राप्तैः कथंचन । चपलः सर्वभूतानां द्वेष्यो भवति मानवः ॥

na tāta capalairbhāvyamiha prāptaiḥ kathaṃcana | capalaḥ sarvabhūtānāṃ dveṣyo bhavati mānavaḥ

"हे तात, यहाँ आए हुए लोगों को किसी प्रकार भी चंचल नहीं होना चाहिए; चंचल मनुष्य सब प्राणियों के द्वेष का पात्र बन जाता है।

श्लोक 33 (3.160.33)

उषित्वेह यथाकामं यथाश्रद्धं विहृत्य च । ततः शस्त्रजितां श्रेष्ठ पृथिवीं पालयिष्यसि ॥

uṣitveha yathākāmaṃ yathāśraddhaṃ vihṛtya ca | tataḥ śastrajitāṃ śreṣṭha pṛthivīṃ pālayiṣyasi

"यहाँ इच्छानुसार रहकर और मन के अनुसार विहार करके, हे शस्त्रों से विजय पाने वालों में श्रेष्ठ, तुम फिर पृथ्वी का पालन करोगे।"

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