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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 163

कुबेर का युधिष्ठिर को उपदेश

कुबेर युधिष्ठिर को समझाते हैं कि धैर्य, दक्षता, देश, काल और पराक्रम — यही कर्म की पाँच प्रकार की विधि है; वे दुस्साहस से सावधान करते हैं और भीम को संयम में रखने को कहते हैं। वे पाण्डवों को रक्षा और भोजन-सामग्री का वचन देते हैं, बताते हैं कि अर्जुन इन्द्रलोक में सकुशल हैं और उनके पूर्वज शान्तनु उनका कुशल पूछते हैं, और विनत भीम को आशीर्वाद देते हैं। फिर कुबेर अपने भवन लौट जाते हैं, अगस्त्य के शाप का अन्त होने पर मृत राक्षसों के शरीर हटा दिए जाते हैं, और पाण्डव उनके भवनों में सुख से रात बिताते हैं।

अध्याय 162अध्याय-सूचीअध्याय 164

धनद उवाच

श्लोक 1 (3.163.1)

युधिष्ठिर धृतिर्दाक्ष्यं देशकालपराक्रमाः । लोकतन्त्रविधानानामेष पञ्चविधो विधिः ॥

yudhiṣṭhira dhṛtirdākṣyaṃ deśakālaparākramāḥ | lokatantravidhānānāmeṣa pañcavidho vidhiḥ

"युधिष्ठिर, धैर्य, दक्षता, देश, काल और पराक्रम — लोक-व्यवहार के कार्यों को सिद्ध करने की यही पाँच प्रकार की विधि है।

श्लोक 2 (3.163.2)

धृतिमन्तश्च दक्षाश्च स्वे स्वे कर्मणि भारत । पराक्रमविधानज्ञा नराः कृतयुगेऽभवन् ॥

dhṛtimantaśca dakṣāśca sve sve karmaṇi bhārata | parākramavidhānajñā narāḥ kṛtayuge'bhavan

भारत, सत्ययुग में मनुष्य अपने-अपने कर्म में धैर्यवान् और दक्ष होते थे और पराक्रम के प्रयोग की विधि जानते थे।

श्लोक 3 (3.163.3)

धृतिमान्देशकालज्ञः सर्वधर्मविधानवित् । क्षत्रियः क्षत्रियश्रेष्ठ शास्ति वै पृथिवीमनु ॥

dhṛtimāndeśakālajñaḥ sarvadharmavidhānavit | kṣatriyaḥ kṣatriyaśreṣṭha śāsti vai pṛthivīmanu

क्षत्रियश्रेष्ठ, जो क्षत्रिय धैर्यवान्, देश-काल का ज्ञाता और सब धर्मों के विधान को जानने वाला होता है, वही पृथ्वी का यथोचित शासन करता है।

श्लोक 4 (3.163.4)

य एवं वर्तते पार्थ पुरुषः सर्वकर्मसु । स लोके लभते वीर यशः प्रेत्य च सद्गतिम् ॥

ya evaṃ vartate pārtha puruṣaḥ sarvakarmasu | sa loke labhate vīra yaśaḥ pretya ca sadgatim

पार्थ, जो पुरुष अपने सब कर्मों में इस प्रकार आचरण करता है, वीर, वह इस लोक में यश और मरने के बाद सद्गति पाता है।

श्लोक 5 (3.163.5)

देशकालान्तरप्रेप्सुः कृत्वा शक्रः पराक्रमम् । संप्राप्तस्त्रिदिवे राज्यं वृत्रहा वसुभिः सह ॥

deśakālāntaraprepsuḥ kṛtvā śakraḥ parākramam | saṃprāptastridive rājyaṃ vṛtrahā vasubhiḥ saha

उचित देश और काल की प्रतीक्षा करके वृत्रहन्ता इन्द्र ने पराक्रम दिखाया और वसुओं के साथ स्वर्ग का राज्य प्राप्त किया।

श्लोक 6 (3.163.6)

यस्तु केवलसंरम्भात्प्रपातं न निरीक्षते । पापात्मा पापबुद्धिर्यः पापमेवानुवर्तते । कर्मणामविभागज्ञः प्रेत्य चेह विनश्यति ॥

yastu kevalasaṃrambhātprapātaṃ na nirīkṣate | pāpātmā pāpabuddhiryaḥ pāpamevānuvartate | karmaṇāmavibhāgajñaḥ pretya ceha vinaśyati

किन्तु जो केवल आवेश में आकर आगे के पतन को नहीं देखता, जो पापात्मा और पापबुद्धि होकर पाप का ही अनुसरण करता है और कर्मों का भेद नहीं जानता, वह परलोक में भी और यहाँ भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 7 (3.163.7)

अकालज्ञः सुदुर्मेधाः कार्याणामविशेषवित् । वृथाचारसमारम्भः प्रेत्य चेह विनश्यति ॥

akālajñaḥ sudurmedhāḥ kāryāṇāmaviśeṣavit | vṛthācārasamārambhaḥ pretya ceha vinaśyati

जो समय को नहीं पहचानता, जो अत्यन्त मन्दबुद्धि है, जो कार्यों का अन्तर नहीं समझता और जिसके आचरण और उद्योग व्यर्थ होते हैं, वह परलोक में भी और यहाँ भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 8 (3.163.8)

साहसे वर्तमानानां निकृतीनां दुरात्मनाम् । सर्वेषामर्थलिप्सूनां पापो भवति निश्चयः ॥

sāhase vartamānānāṃ nikṛtīnāṃ durātmanām | sarveṣāmarthalipsūnāṃ pāpo bhavati niścayaḥ

दुस्साहस में लगे हुए, छल-कपट करने वाले दुरात्माओं का और धन के लोभी सब लोगों का निश्चय पापमय होता है।

श्लोक 9 (3.163.9)

अधर्मज्ञोऽवलिप्तश्च बालबुद्धिरमर्षणः । निर्भयो भीमसेनोऽयं तं शाधि पुरुषर्षभ ॥

adharmajño'valiptaśca bālabuddhiramarṣaṇaḥ | nirbhayo bhīmaseno'yaṃ taṃ śādhi puruṣarṣabha

यह भीमसेन धर्म को नहीं जानता; यह घमंडी, बालबुद्धि, असहिष्णु और निडर है। पुरुषश्रेष्ठ, तुम इसे अनुशासन में रखो।

श्लोक 10 (3.163.10)

आर्ष्टिषेणस्य राजर्षेः प्राप्य भूयस्त्वमाश्रमम् । तमिस्रां प्रथमां तत्र वीतशोकभयो वस ॥

ārṣṭiṣeṇasya rājarṣeḥ prāpya bhūyastvamāśramam | tamisrāṃ prathamāṃ tatra vītaśokabhayo vasa

तुम फिर से राजर्षि आर्ष्टिषेण के आश्रम में जाओ और शोक तथा भय से मुक्त होकर पहले कृष्ण पक्ष तक वहीं निवास करो।

श्लोक 11 (3.163.11)

अलकां सह गन्धर्वैर्यक्षैश्च सह किन्नरैः । गमिष्यामि महाबाहो त्वं चापि बदरीं व्रज ॥

alakāṃ saha gandharvairyakṣaiśca saha kinnaraiḥ | gamiṣyāmi mahābāho tvaṃ cāpi badarīṃ vraja

महाबाहो, मैं गन्धर्वों, यक्षों और किन्नरों के साथ अलका जाऊँगा; तुम भी बदरी चले जाओ।

श्लोक 12 (3.163.12)

मन्नियुक्ता मनुष्येन्द्र सर्वे च गिरिवासिनः । रक्षन्तु त्वां महाबाहो सहितं द्विजसत्तमैः ॥

manniyuktā manuṣyendra sarve ca girivāsinaḥ | rakṣantu tvāṃ mahābāho sahitaṃ dvijasattamaiḥ

नरेन्द्र, मेरी आज्ञा से पर्वत पर रहने वाले सब प्राणी, महाबाहो, श्रेष्ठ ब्राह्मणों सहित तुम्हारी रक्षा करें।

श्लोक 13 (3.163.13)

साहसेषु च संतिष्ठंस्त्वया शैले वृकोदरः । वार्यतां साध्वयं राजंस्त्वया धर्मभृतां वर ॥

sāhaseṣu ca saṃtiṣṭhaṃstvayā śaile vṛkodaraḥ | vāryatāṃ sādhvayaṃ rājaṃstvayā dharmabhṛtāṃ vara

राजन्, धर्मधारियों में श्रेष्ठ, यदि वृकोदर इस पर्वत पर दुस्साहस करने लगे, तो तुम्हें उसे भली-भाँति रोकना चाहिए।

श्लोक 14 (3.163.14)

इतः परं च वो राजन्द्रक्ष्यन्ति वनगोचराः । उपस्थास्यन्ति वो राजन्रक्षिष्यन्ते च वः सदा ॥

itaḥ paraṃ ca vo rājandrakṣyanti vanagocarāḥ | upasthāsyanti vo rājanrakṣiṣyante ca vaḥ sadā

राजन्, अब से वनवासी तुम्हारी देखभाल करेंगे; राजन्, वे तुम्हारी सेवा में उपस्थित रहेंगे और सदा तुम्हारी रक्षा करेंगे।

श्लोक 15 (3.163.15)

तथैव चान्नपानानि स्वादूनि च बहूनि च । आहरिष्यन्ति मत्प्रेष्याः सदा वः पुरुषर्षभाः ॥

tathaiva cānnapānāni svādūni ca bahūni ca | āhariṣyanti matpreṣyāḥ sadā vaḥ puruṣarṣabhāḥ

इसी प्रकार, पुरुषश्रेष्ठो, मेरे सेवक सदा तुम्हारे लिए भाँति-भाँति के बहुत-से स्वादिष्ट अन्न और पेय लाते रहेंगे।

श्लोक 16 (3.163.16)

यथा जिष्णुर्महेन्द्रस्य यथा वायोर्वृकोदरः । धर्मस्य त्वं यथा तात योगोत्पन्नो निजः सुतः ॥

yathā jiṣṇurmahendrasya yathā vāyorvṛkodaraḥ | dharmasya tvaṃ yathā tāta yogotpanno nijaḥ sutaḥ

जैसे जिष्णु (अर्जुन) महेन्द्र के, जैसे वृकोदर वायु के, और तात, जैसे तुम योगबल से उत्पन्न धर्म के अपने पुत्र हो,

श्लोक 17 (3.163.17)

आत्मजावात्मसंपन्नौ यमौ चोभौ यथाश्विनोः । रक्ष्यास्तद्वन्ममापीह यूयं सर्वे युधिष्ठिर ॥

ātmajāvātmasaṃpannau yamau cobhau yathāśvinoḥ | rakṣyāstadvanmamāpīha yūyaṃ sarve yudhiṣṭhira

और जैसे अश्विनीकुमारों से उत्पन्न, आत्मसंयम से सम्पन्न दोनों जुड़वाँ भाई उनके पुत्र हैं — युधिष्ठिर, वैसे ही यहाँ तुम सब मेरे भी रक्षणीय हो।

श्लोक 18 (3.163.18)

अर्थतत्त्वविधानज्ञः सर्वधर्मविधानवित् । भीमसेनादवरजः फल्गुनः कुशली दिवि ॥

arthatattvavidhānajñaḥ sarvadharmavidhānavit | bhīmasenādavarajaḥ phalgunaḥ kuśalī divi

भीमसेन के छोटे भाई फल्गुन (अर्जुन), जो वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप और उन्हें पाने के उपाय जानते हैं और सब धर्मों के विधान के ज्ञाता हैं, स्वर्ग में सकुशल हैं।

श्लोक 19 (3.163.19)

याः काश्चन मता लोके स्वर्ग्याः परमसंपदः । जन्मप्रभृति ताः सर्वाः स्थितास्तात धनंजये ॥

yāḥ kāścana matā loke svargyāḥ paramasaṃpadaḥ | janmaprabhṛti tāḥ sarvāḥ sthitāstāta dhanaṃjaye

तात, संसार में जितनी भी स्वर्ग दिलाने वाली परम सम्पदाएँ मानी गई हैं, वे सब जन्म से ही धनंजय में विद्यमान हैं।

श्लोक 20 (3.163.20)

दमो दानं बलं बुद्धिर्ह्रीर्धृतिस्तेज उत्तमम् । एतान्यपि महासत्वे स्थितान्यमिततेजसि ॥

damo dānaṃ balaṃ buddhirhrīrdhṛtisteja uttamam | etānyapi mahāsatve sthitānyamitatejasi

इन्द्रिय-संयम, दान, बल, बुद्धि, लज्जा, धैर्य और उत्तम तेज — ये भी उस अपार तेजस्वी महात्मा में विद्यमान हैं।

श्लोक 21 (3.163.21)

न मोहात्कुरुते जिष्णुः कर्म पाण्डव गर्हितम् । न पार्थस्य मृषोक्तानि कथयन्ति नरा नृषु ॥

na mohātkurute jiṣṇuḥ karma pāṇḍava garhitam | na pārthasya mṛṣoktāni kathayanti narā nṛṣu

पाण्डुनन्दन, जिष्णु मोहवश कोई निन्दनीय कर्म नहीं करते; लोगों में कोई भी पार्थ के किसी झूठ की चर्चा नहीं करता।

श्लोक 22 (3.163.22)

स देवपितृगन्धर्वैः कुरूणां कीर्तिवर्धनः । आनीतः कुरुतेऽस्त्राणि शक्रसद्मनि भारत ॥

sa devapitṛgandharvaiḥ kurūṇāṃ kīrtivardhanaḥ | ānītaḥ kurute'strāṇi śakrasadmani bhārata

भारत, देवताओं, पितरों और गन्धर्वों द्वारा वहाँ ले जाए गए कुरुओं की कीर्ति बढ़ाने वाले अर्जुन इन्द्रभवन में अस्त्रों का अभ्यास कर रहे हैं।

श्लोक 23 (3.163.23)

योऽसौ सर्वान्महीपालान्धर्मेण वशमानयत् । स शन्तनुर्महातेजाः पितुस्तव पितामहः ॥

yo'sau sarvānmahīpālāndharmeṇa vaśamānayat | sa śantanurmahātejāḥ pitustava pitāmahaḥ

जिन्होंने धर्म के द्वारा सब राजाओं को अपने वश में किया था, वे महातेजस्वी शान्तनु, तुम्हारे पिता के पितामह,

श्लोक 24 (3.163.24)

प्रीयते पार्थ पार्थेन दिवि गाण्डीवधन्वना । सम्यक्चासौ महावीर्यः कुलधुर्य इव स्थितः ॥

prīyate pārtha pārthena divi gāṇḍīvadhanvanā | samyakcāsau mahāvīryaḥ kuladhurya iva sthitaḥ

पार्थ, स्वर्ग में गाण्डीवधारी पार्थ से प्रसन्न हैं। वे महापराक्रमी अपने कुल के धुरन्धर के समान भली-भाँति स्थित रहे,

श्लोक 25 (3.163.25)

पितॄन्देवानृषीन्विप्रान्पूजयित्वा महायशाः । सप्त मुख्यान्महामेधानाहरद्यमुनां प्रति ॥

pitṝndevānṛṣīnviprānpūjayitvā mahāyaśāḥ | sapta mukhyānmahāmedhānāharadyamunāṃ prati

और उस महायशस्वी राजा ने पितरों, देवताओं, ऋषियों और ब्राह्मणों का पूजन करके यमुना के तट पर सात प्रमुख महायज्ञ (अश्वमेध) किए।

श्लोक 26 (3.163.26)

अधिराजः स राजंस्त्वां शन्तनुः प्रपितामहः । स्वर्गजिच्छक्रलोकस्थः कुशलं परिपृच्छति ॥

adhirājaḥ sa rājaṃstvāṃ śantanuḥ prapitāmahaḥ | svargajicchakralokasthaḥ kuśalaṃ paripṛcchati

राजन्, वे अधिराज, तुम्हारे प्रपितामह शान्तनु, जो स्वर्ग को जीतकर इन्द्रलोक में रहते हैं, तुम्हारा कुशल पूछते हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (3.163.27)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं धनदेन प्रभाषितम् । पाण्डवाश्च ततस्तेन बभूवुः संप्रहर्षिताः ॥

etacchrutvā tu vacanaṃ dhanadena prabhāṣitam | pāṇḍavāśca tatastena babhūvuḥ saṃpraharṣitāḥ

धनद के कहे हुए ये वचन सुनकर पाण्डव उनके कारण अत्यन्त हर्षित हुए।

श्लोक 28 (3.163.28)

ततः शक्तिं गदां खड्गं धनुश्च भरतर्षभः । प्राध्वं कृत्वा नमश्चक्रे कुबेराय वृकोदरः ॥

tataḥ śaktiṃ gadāṃ khaḍgaṃ dhanuśca bharatarṣabhaḥ | prādhvaṃ kṛtvā namaścakre kuberāya vṛkodaraḥ

तब भरतश्रेष्ठ वृकोदर ने अपनी शक्ति, गदा, खड्ग और धनुष एक ओर रखकर कुबेर को प्रणाम किया।

श्लोक 29 (3.163.29)

ततोऽब्रवीद्धनाध्यक्षः शरण्यः शरणागतम् । मानहा भव शत्रूणां सुहृदां नन्दिवर्धनः ॥

tato'bravīddhanādhyakṣaḥ śaraṇyaḥ śaraṇāgatam | mānahā bhava śatrūṇāṃ suhṛdāṃ nandivardhanaḥ

तब शरणागतों को शरण देने वाले धनाध्यक्ष ने शरण में आए भीम से कहा — "तुम शत्रुओं का मान मर्दन करने वाले और मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाले बनो।

धनद उवाच

श्लोक 30 (3.163.30)

विभयस्तात शैलाग्रे वसानः सह बन्धुभिः । सुपर्णपितृदेवानां सततं मानकृद्भव ॥

vibhayastāta śailāgre vasānaḥ saha bandhubhiḥ | suparṇapitṛdevānāṃ satataṃ mānakṛdbhava

तात, अपने बन्धुओं के साथ पर्वत-शिखर पर निर्भय होकर रहो, और सुपर्णों, पितरों तथा देवताओं का सदा सम्मान करते रहो।

श्लोक 31 (3.163.31)

ऋजुं पश्यत मा वक्रं सत्यं वदत माऽनृतम् । दीर्घं पश्यत मा ह्रस्वं परं पश्यत माऽपरम् ॥

ṛjuṃ paśyata mā vakraṃ satyaṃ vadata mā'nṛtam | dīrghaṃ paśyata mā hrasvaṃ paraṃ paśyata mā'param

सीधे को देखो, टेढ़े को नहीं; सत्य बोलो, असत्य नहीं; दूर तक देखो, पास तक ही नहीं; जो परम है उसे देखो, जो उससे नीचे है उसे नहीं।

श्लोक 32 (3.163.32)

स्वेषु वेश्मसु रम्येषु वसतामित्रतापनाः । कामान्न परिहास्यन्ति यक्षा वो भरतर्षभाः ॥

sveṣu veśmasu ramyeṣu vasatāmitratāpanāḥ | kāmānna parihāsyanti yakṣā vo bharatarṣabhāḥ

शत्रुओं को सन्ताप देने वालो, मेरे रमणीय भवनों में निवास करो; भरतश्रेष्ठो, यक्ष तुम्हारी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहने देंगे।

श्लोक 33 (3.163.33)

शीघ्रमेव गुडाकेशः कृतास्त्रः पुरुषर्षभः । साक्षान्मघवतोत्सृष्टः संप्राप्स्यति धनंजयः ॥

śīghrameva guḍākeśaḥ kṛtāstraḥ puruṣarṣabhaḥ | sākṣānmaghavatotsṛṣṭaḥ saṃprāpsyati dhanaṃjayaḥ

बहुत शीघ्र ही पुरुषश्रेष्ठ गुडाकेश धनंजय अस्त्रविद्या में निपुण होकर, स्वयं इन्द्र के भेजे हुए, तुम्हारे पास आ पहुँचेंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (3.163.34)

एवमुत्तमकर्माणमनुशिष्य युधिष्ठिरम् । अस्तं गिरिमिवादित्यः प्रययौ गुह्यकाधिपः ॥

evamuttamakarmāṇamanuśiṣya yudhiṣṭhiram | astaṃ girimivādityaḥ prayayau guhyakādhipaḥ

उत्तम कर्म करने वाले युधिष्ठिर को इस प्रकार उपदेश देकर गुह्यकों के स्वामी कुबेर वैसे ही चले गए, जैसे सूर्य अस्ताचल को जाता है।

श्लोक 35 (3.163.35)

तं परिस्तोमसंकीर्णैर्नानारत्नविभूषितैः । यानैरनुययुर्यक्षा राक्षसाश्च सहस्रशः ॥

taṃ paristomasaṃkīrṇairnānāratnavibhūṣitaiḥ | yānairanuyayuryakṣā rākṣasāśca sahasraśaḥ

हज़ारों यक्ष और राक्षस रंग-बिरंगे कम्बलों से ढके और अनेक रत्नों से सजे वाहनों पर उनके पीछे-पीछे चले।

श्लोक 36 (3.163.36)

पक्षिणामिव निर्घोषः कुबेरसदनं प्रति । बभूव परमाश्वानामैरावतपथे यथा ॥

pakṣiṇāmiva nirghoṣaḥ kuberasadanaṃ prati | babhūva paramāśvānāmairāvatapathe yathā

कुबेर के भवन की ओर जाते हुए उन उत्तम घोड़ों से पक्षियों के समान शब्द उठा, जैसा ऐरावत के मार्ग (इन्द्रलोक) में उठता है।

श्लोक 37 (3.163.37)

ते जग्मुस्तूर्णमाकाशं धनाधिपतिवाजिनः । प्रकर्षन्त इवाभ्राणि पिबन्त इव मारुतम् ॥

te jagmustūrṇamākāśaṃ dhanādhipativājinaḥ | prakarṣanta ivābhrāṇi pibanta iva mārutam

धनपति के घोड़े तेज़ी से आकाश में चले गए, मानो बादलों को खींचते और वायु को पीते जा रहे हों।

श्लोक 38 (3.163.38)

ततस्तानि शरीराणि गतसत्वानि रक्षसाम् । अपाकृष्यन्त शैलाग्राद्धनाधिपतिशासनात् ॥

tatastāni śarīrāṇi gatasatvāni rakṣasām | apākṛṣyanta śailāgrāddhanādhipatiśāsanāt

तब धनपति की आज्ञा से राक्षसों के वे निष्प्राण शरीर पर्वत-शिखर से हटा दिए गए।

श्लोक 39 (3.163.39)

तेषां हि शापकालः स कृतोऽगस्त्येन धीमता । समरे निहतास्तस्माच्छापस्यान्तोऽभवत्तदा ॥

teṣāṃ hi śāpakālaḥ sa kṛto'gastyena dhīmatā | samare nihatāstasmācchāpasyānto'bhavattadā

क्योंकि बुद्धिमान अगस्त्य ने उनके शाप की यही अवधि निश्चित की थी; इसी से वे युद्ध में मारे गए और तब शाप का अन्त हुआ।

श्लोक 40 (3.163.40)

पाण्डवाश्च महात्मानस्तेषु वेश्मसु तां क्षपाम् । सुखमूषुर्गतोद्वेगाः पूजिताः सह राक्षसैः ॥

pāṇḍavāśca mahātmānasteṣu veśmasu tāṃ kṣapām | sukhamūṣurgatodvegāḥ pūjitāḥ saha rākṣasaiḥ

महात्मा पाण्डवों ने वह रात उन भवनों में राक्षसों से सम्मानित होकर, निश्चिन्त भाव से सुखपूर्वक बिताई।

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