आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 164
धौम्य द्वारा मेरु और सूर्य-चन्द्र की गति का वर्णन
सूर्योदय होने पर धौम्य राजर्षि आर्ष्टिषेण के साथ पाण्डवों के पास आते हैं और पूर्व की ओर मुख करके युधिष्ठिर को चारों दिशाओं के पर्वत दिखाते हैं — पूर्व में मन्दर, दक्षिण में यम का लोक, पश्चिम में वरुण का निवास अस्ताचल और उत्तर में महामेरु। वे मेरु पर ब्रह्मा की सभा और उससे भी परे नारायण के तेजोमय धाम का वर्णन करते हैं, जहाँ सिद्ध यति पहुँचकर फिर नहीं लौटते। फिर वे बताते हैं कि सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र किस प्रकार मेरु की परिक्रमा करते हैं, और सूर्य के उत्तर और दक्षिण की ओर जाने से कैसे शीत, ताप और वर्षा आती है तथा दिन, ऋतुएँ और प्राणियों की आयु का विभाजन होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.164.1)
ततः सूर्योदये धौम्यः पाञ्चालीसहितांश्च तान् । आर्ष्टिषेणेन सहितः पाण्डवानभ्यवर्तत ॥
tataḥ sūryodaye dhaumyaḥ pāñcālīsahitāṃśca tān | ārṣṭiṣeṇena sahitaḥ pāṇḍavānabhyavartata
तब सूर्योदय होने पर धौम्य आर्ष्टिषेण के साथ द्रौपदी सहित पाण्डवों के पास आए।
श्लोक 2 (3.164.2)
तेऽभिवाद्यार्ष्टिषेणस्य पादौ धौम्यस्य चैव ह । ततः प्राञ्जलयः सर्वे ब्राह्मणांस्तानपूजयन् ॥
te'bhivādyārṣṭiṣeṇasya pādau dhaumyasya caiva ha | tataḥ prāñjalayaḥ sarve brāhmaṇāṃstānapūjayan
पाण्डवों ने आर्ष्टिषेण और धौम्य के चरणों में प्रणाम किया, फिर सबने हाथ जोड़कर उन ब्राह्मणों का पूजन किया।
श्लोक 3 (3.164.3)
आर्ष्टिषेणं परिष्वज्य पुत्रवद्भरतर्षभ । धर्मराजं स्पृशन्पाणौ पाणिना स महातपाः । प्राचीं दिशमभिप्रेक्ष्य महर्षिरिदमब्रवीत् ॥
ārṣṭiṣeṇaṃ pariṣvajya putravadbharatarṣabha | dharmarājaṃ spṛśanpāṇau pāṇinā sa mahātapāḥ | prācīṃ diśamabhiprekṣya maharṣiridamabravīt
हे भरतश्रेष्ठ, तब उन महातपस्वी ने पुत्र की भाँति आर्ष्टिषेण का आलिंगन किया और अपने हाथ से धर्मराज का हाथ छूते हुए, पूर्व दिशा की ओर देखकर वे महर्षि यह बोले —
धौम्य उवाच
श्लोक 4 (3.164.4)
असौ सागरपर्यन्तां भूमिमावृत्य तिष्ठति । शैलराजो महाराज मन्दरोऽभिविराजयन् । इन्द्रवैश्रवणोपेतां दिशं पाण्डव रक्षति ॥
asau sāgaraparyantāṃ bhūmimāvṛtya tiṣṭhati | śailarājo mahārāja mandaro'bhivirājayan | indravaiśravaṇopetāṃ diśaṃ pāṇḍava rakṣati
"महाराज, वह पर्वतराज मन्दर समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी को घेरकर खड़ा है और जगमगा रहा है। हे पाण्डुनन्दन, इन्द्र और कुबेर से युक्त इस पूर्व दिशा की वह रक्षा करता है।
श्लोक 5 (3.164.5)
पर्वतैश्च वनान्तैश्च काननैश्चैव शोभितम् । एतमाहुर्महेन्द्रस्य राज्ञो वैश्रवणस्य च । ऋषयः सर्वधर्मज्ञाः सर्वे तात मनीषिणः ॥
parvataiśca vanāntaiśca kānanaiścaiva śobhitam | etamāhurmahendrasya rājño vaiśravaṇasya ca | ṛṣayaḥ sarvadharmajñāḥ sarve tāta manīṣiṇaḥ
"यह पर्वतों, वन-प्रान्तों और काननों से सुशोभित है। हे तात, सब धर्मों को जानने वाले सभी मनीषी ऋषि इसे महेन्द्र और राजा कुबेर का बताते हैं।
श्लोक 6 (3.164.6)
अतश्चोद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठन्ति वै प्रजाः । ऋषयश्चापि धर्मज्ञाः सिद्धाः साध्याश्च देवताः ॥
ataścodyantamādityamupatiṣṭhanti vai prajāḥ | ṛṣayaścāpi dharmajñāḥ siddhāḥ sādhyāśca devatāḥ
"यहीं से प्रजाएँ उदय होते सूर्य की उपासना करती हैं; धर्मज्ञ ऋषि, सिद्ध, साध्य और देवता भी उसकी उपासना करते हैं।
श्लोक 7 (3.164.7)
यमस्तु राजा धर्मज्ञः सर्वप्राणभृतां प्रभुः । प्रेतसत्त्वगतीमेतां दक्षिणामाश्रितो दिशम् ॥
yamastu rājā dharmajñaḥ sarvaprāṇabhṛtāṃ prabhuḥ | pretasattvagatīmetāṃ dakṣiṇāmāśrito diśam
"धर्म को जानने वाले, सब प्राणियों के स्वामी राजा यम इस दक्षिण दिशा में रहते हैं, जो मृत प्राणियों के जाने की दिशा है।
श्लोक 8 (3.164.8)
एतत्संयमनं पुण्यमतीवाद्भुतदर्शनम् । प्रेतराजस्य भवनमृद्ध्या परमया युतम् ॥
etatsaṃyamanaṃ puṇyamatīvādbhutadarśanam | pretarājasya bhavanamṛddhyā paramayā yutam
"यह संयमन है — प्रेतराज यम का पवित्र भवन, जो देखने में अत्यन्त अद्भुत है और परम समृद्धि से युक्त है।
श्लोक 9 (3.164.9)
यं प्राप्य सविता राजन्सत्येन प्रतितिष्ठति । अस्तं पर्वतराजानमेतमाहुर्मनीषिणः ॥
yaṃ prāpya savitā rājansatyena pratitiṣṭhati | astaṃ parvatarājānametamāhurmanīṣiṇaḥ
"हे राजन्, जिस पर्वतराज पर पहुँचकर सूर्य सत्य के द्वारा स्थित होता है, उसे मनीषी अस्ताचल कहते हैं।
श्लोक 10 (3.164.10)
एवं पर्वतराजानं समुद्रं च महोदधिम् । आवसन्वरुणो राजा भूतानि परिरक्षति ॥
evaṃ parvatarājānaṃ samudraṃ ca mahodadhim | āvasanvaruṇo rājā bhūtāni parirakṣati
"इसी प्रकार इस पर्वतराज और महासागर में निवास करते हुए राजा वरुण प्राणियों की रक्षा करते हैं।
श्लोक 11 (3.164.11)
उदीचीं दीपयन्नेष दिशं तिष्ठति कीर्तिमान् । महामेरुर्महाभाग शिवो ब्रह्मविदां गतिः ॥
udīcīṃ dīpayanneṣa diśaṃ tiṣṭhati kīrtimān | mahāmerurmahābhāga śivo brahmavidāṃ gatiḥ
"हे महाभाग, उत्तर दिशा को प्रकाशित करता हुआ यह यशस्वी महामेरु स्थित है, जो कल्याणमय है और ब्रह्मज्ञानियों की गति है।
श्लोक 12 (3.164.12)
यस्मिन्ब्रह्मसदश्चैव भूतात्मा चावतिष्ठते । प्रजापतिः सृजन्सर्वं यत्किंचिज्जङ्गमागमम् ॥
yasminbrahmasadaścaiva bhūtātmā cāvatiṣṭhate | prajāpatiḥ sṛjansarvaṃ yatkiṃcijjaṅgamāgamam
"उसी पर ब्रह्मा की सभा है, और वहीं समस्त प्राणियों के आत्मा प्रजापति स्थित रहते हैं, जो चर-अचर जो कुछ भी है, उस सबकी सृष्टि करते हैं।
श्लोक 13 (3.164.13)
यानाहुर्ब्रह्मणः पुत्रान्मानसान्दक्षसप्तमान् । तेषामपि महामेरुः शिवं स्थानमनामयम् ॥
yānāhurbrahmaṇaḥ putrānmānasāndakṣasaptamān | teṣāmapi mahāmeruḥ śivaṃ sthānamanāmayam
"जिन्हें ब्रह्मा के मानस पुत्र कहा जाता है, जिनमें सातवें दक्ष हैं, उनके लिए भी महामेरु कल्याणकारी और निरापद स्थान है।
श्लोक 14 (3.164.14)
अत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनरत्रोदयन्ति च । सप्त देवर्षयस्तात वसिष्ठप्रमुखास्तदा ॥
atraiva pratitiṣṭhanti punaratrodayanti ca | sapta devarṣayastāta vasiṣṭhapramukhāstadā
"हे तात, वसिष्ठ आदि सात देवर्षि यहीं अस्त होकर ठहरते हैं और यहीं फिर उदित होते हैं।
श्लोक 15 (3.164.15)
देशं विरजसं पश्य मेरोः शिखरमुत्तमम् । यत्रात्मतृप्तैरध्यास्ते देवैः सह पितामहः ॥
deśaṃ virajasaṃ paśya meroḥ śikharamuttamam | yatrātmatṛptairadhyāste devaiḥ saha pitāmahaḥ
"मेरु के उस श्रेष्ठ शिखर, उस निर्मल प्रदेश को देखो, जहाँ आत्मतृप्त देवताओं के साथ पितामह ब्रह्मा निवास करते हैं।
श्लोक 16 (3.164.16)
यमाहुः सर्वभूतानां प्रकृतेः प्रकृतिं ध्रुवम् । अनादिनिधनं देवं प्रभुं नारायणं परम् ॥
yamāhuḥ sarvabhūtānāṃ prakṛteḥ prakṛtiṃ dhruvam | anādinidhanaṃ devaṃ prabhuṃ nārāyaṇaṃ param
"जिन्हें सब प्राणियों की प्रकृति की भी अविनाशी प्रकृति, आदि और अन्त से रहित देव, प्रभु और परम नारायण कहा जाता है —
श्लोक 17 (3.164.17)
ब्रह्मणः सदनात्तस्य परं स्थानं प्रकाशते । देवाश्च यत्नात्पश्यन्ति सर्वतेजोमयं शुभम् ॥
brahmaṇaḥ sadanāttasya paraṃ sthānaṃ prakāśate | devāśca yatnātpaśyanti sarvatejomayaṃ śubham
"— उनका परम धाम ब्रह्मा के भवन से भी परे प्रकाशित होता है। वह सर्वतेजोमय और मंगलमय है; देवता भी उसे बड़े प्रयत्न से ही देख पाते हैं।
श्लोक 18 (3.164.18)
अत्यर्कानलदीप्तं तत्स्थानं विष्णोर्महात्मनः । स्वयैव प्रभया राजन्दुष्प्रेक्ष्यं देवदानवैः ॥
atyarkānaladīptaṃ tatsthānaṃ viṣṇormahātmanaḥ | svayaiva prabhayā rājanduṣprekṣyaṃ devadānavaiḥ
"महात्मा विष्णु का वह धाम सूर्य और अग्नि से भी अधिक दीप्तिमान है। हे राजन्, अपनी ही प्रभा के कारण देवता और दानव भी उसकी ओर कठिनाई से देख पाते हैं।
श्लोक 19 (3.164.19)
प्राच्यां नारायणस्थानं मेरावतिविराजते ॥
prācyāṃ nārāyaṇasthānaṃ merāvativirājate
"मेरु पर पूर्व दिशा में नारायण का धाम अत्यन्त शोभायमान है।
श्लोक 20 (3.164.20)
यत्र भूतेश्वरस्तात सर्वप्रकृतिरात्मभूः । भासयन्सर्वभूतानि सुश्रियाऽभिविराजते ॥
yatra bhūteśvarastāta sarvaprakṛtirātmabhūḥ | bhāsayansarvabhūtāni suśriyā'bhivirājate
"हे तात, वहाँ समस्त प्रकृति के मूल, स्वयम्भू भूतेश्वर सब प्राणियों को प्रकाशित करते हुए अपनी परम शोभा से विराजमान हैं।
श्लोक 21 (3.164.21)
नात्र ब्रह्मर्षयस्तात कुत एव महर्षयः । प्राप्नुवन्ति गतिं ह्येतां यतीनां भावितात्मनाम् ॥
nātra brahmarṣayastāta kuta eva maharṣayaḥ | prāpnuvanti gatiṃ hyetāṃ yatīnāṃ bhāvitātmanām
"हे तात, यहाँ ब्रह्मर्षि भी नहीं पहुँच पाते, फिर महर्षियों की तो बात ही क्या; यह गति तो शुद्ध अन्तःकरण वाले यतियों की है।
श्लोक 22 (3.164.22)
न तं ज्योतींषि सर्वाणि प्राप्य भासन्ति पाण्डव । स्वयंप्रभुरचिन्त्यात्मा तत्र ह्यतिविराजते ॥
na taṃ jyotīṃṣi sarvāṇi prāpya bhāsanti pāṇḍava | svayaṃprabhuracintyātmā tatra hyativirājate
"हे पाण्डुनन्दन, सारी ज्योतियाँ भी उनके पास पहुँचकर प्रकाशित नहीं होतीं; वहाँ तो स्वयंप्रकाश, अचिन्त्यस्वरूप प्रभु ही अतिशय शोभा से विराजते हैं।
श्लोक 23 (3.164.23)
यतयस्तत्र गच्छन्ति भक्त्या नारायणं हरिम् । परेण तपसा युक्ता भाविताः कर्मभिः शुभैः । योगसिद्धा महात्मानस्तमोमोहविवर्जिताः ॥
yatayastatra gacchanti bhaktyā nārāyaṇaṃ harim | pareṇa tapasā yuktā bhāvitāḥ karmabhiḥ śubhaiḥ | yogasiddhā mahātmānastamomohavivarjitāḥ
"परम तप से युक्त, शुभ कर्मों से पवित्र हुए, योग में सिद्ध और तमोगुण तथा मोह से रहित महात्मा यति भक्ति के द्वारा वहाँ भगवान् नारायण हरि के पास जाते हैं।
श्लोक 24 (3.164.24)
तत्र गत्वा पुनर्नेमं लोकमायान्ति भारत । स्वयंभुवं महात्मानं देवदेवं सनातनम् ॥
tatra gatvā punarnemaṃ lokamāyānti bhārata | svayaṃbhuvaṃ mahātmānaṃ devadevaṃ sanātanam
"हे भारत, वहाँ उन स्वयम्भू, महात्मा, सनातन देवाधिदेव के पास पहुँचकर वे फिर इस लोक में नहीं लौटते।
श्लोक 25 (3.164.25)
स्थानमेतन्महाभाग ध्रुवमक्षयमव्ययम् । ईश्वरस्य सदा ह्येतत्प्रणमात्र युधिष्ठिर ॥
sthānametanmahābhāga dhruvamakṣayamavyayam | īśvarasya sadā hyetatpraṇamātra yudhiṣṭhira
"हे महाभाग, यह धाम अटल, अक्षय और अविनाशी है; यह सदा ईश्वर का है। युधिष्ठिर, यहाँ इसे प्रणाम करो।
श्लोक 26 (3.164.26)
एनं त्वहरहर्मेरुं सूर्याचन्द्रमसौ ध्रुवम् । प्रदक्षिणमुपावृत्य कुरुतः कुरुनन्दन ॥
enaṃ tvaharaharmeruṃ sūryācandramasau dhruvam | pradakṣiṇamupāvṛtya kurutaḥ kurunandana
"हे कुरुनन्दन, सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन निरन्तर इस मेरु की प्रदक्षिणा करते हैं।
श्लोक 27 (3.164.27)
ज्योतींषि चाप्यशेषेण सर्वाण्यनघ सर्वतः । परियान्ति महाराज गिरिराजं प्रदक्षिणम् ॥
jyotīṃṣi cāpyaśeṣeṇa sarvāṇyanagha sarvataḥ | pariyānti mahārāja girirājaṃ pradakṣiṇam
"हे निष्पाप महाराज, सभी ज्योतियाँ भी बिना किसी अपवाद के सब ओर से गिरिराज की प्रदक्षिणा करती हैं।
श्लोक 28 (3.164.28)
एतं ज्योतींषि सर्वाणि प्रकर्षन्भगवानपि । कुरुते वितमस्कर्मा आदित्योऽभिप्रदक्षिणम् ॥
etaṃ jyotīṃṣi sarvāṇi prakarṣanbhagavānapi | kurute vitamaskarmā ādityo'bhipradakṣiṇam
"अन्धकार को मिटाने वाले भगवान् सूर्य भी सब ज्योतियों को अपने साथ खींचते हुए इस पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं।
श्लोक 29 (3.164.29)
अस्तं प्राप्य ततः सन्ध्यामतिक्रम्य दिवाकरः । उदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसुः ॥
astaṃ prāpya tataḥ sandhyāmatikramya divākaraḥ | udīcīṃ bhajate kāṣṭhāṃ diśameṣa vibhāvasuḥ
"फिर अस्ताचल पर पहुँचकर और सन्ध्या को पार करके ये तेजस्वी दिवाकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ते हैं।
श्लोक 30 (3.164.30)
सुमेरुमनुवृत्तः स पुनर्गच्छति पाण्डव । प्राङ्मुखः सविता देवः सर्वभूतहिते रतः ॥
sumerumanuvṛttaḥ sa punargacchati pāṇḍava | prāṅmukhaḥ savitā devaḥ sarvabhūtahite rataḥ
"हे पाण्डुनन्दन, सुमेरु का अनुसरण करते हुए, सब प्राणियों के हित में लगे सविता देव फिर पूर्व की ओर मुख करके चलते हैं।
श्लोक 31 (3.164.31)
स सम्यग्विभजन्कालान्बहुधा पर्वसन्धिषु । तथैव भगवान्सोमो नक्षत्रैः सह गच्छति ॥
sa samyagvibhajankālānbahudhā parvasandhiṣu | tathaiva bhagavānsomo nakṣatraiḥ saha gacchati
"वे पर्वसन्धियों में काल का भली-भाँति अनेक प्रकार से विभाजन करते हैं; उसी प्रकार भगवान् चन्द्रमा भी नक्षत्रों के साथ चलते हैं।
श्लोक 32 (3.164.32)
एवमेतं त्वतिक्रम्य महामेरुमतन्द्रितः । सोमश्च विभजन्कालं बहुधा पर्वसन्धिषु । भासयन्सर्वभूतानि पुनर्गच्छति सागरम् ॥
evametaṃ tvatikramya mahāmerumatandritaḥ | somaśca vibhajankālaṃ bahudhā parvasandhiṣu | bhāsayansarvabhūtāni punargacchati sāgaram
"इस प्रकार बिना थके महामेरु की परिक्रमा करके, पर्वसन्धियों में काल का अनेक प्रकार से विभाजन करते हुए, चन्द्रमा भी सब प्राणियों को प्रकाशित करते हुए फिर समुद्र की ओर जाते हैं।
श्लोक 33 (3.164.33)
तथा तमिस्रहा देवो मयूखैर्भासयञ्जगत् । मार्गमेतमसंबाधमादित्यः परिवर्तते ॥
tathā tamisrahā devo mayūkhairbhāsayañjagat | mārgametamasaṃbādhamādityaḥ parivartate
"इसी प्रकार अन्धकार का नाश करने वाले सूर्यदेव अपनी किरणों से जगत् को प्रकाशित करते हुए इस निर्बाध मार्ग पर घूमते हैं।
श्लोक 34 (3.164.34)
सिसृक्षुः शिशिराण्येव दक्षिणां भजते दिशम् । ततः सर्वाणि भूतानि कालः शिशिरमृच्छति ॥
sisṛkṣuḥ śiśirāṇyeva dakṣiṇāṃ bhajate diśam | tataḥ sarvāṇi bhūtāni kālaḥ śiśiramṛcchati
"शीत उत्पन्न करने की इच्छा से वे दक्षिण दिशा का आश्रय लेते हैं; तब सब प्राणियों पर शिशिर ऋतु आ जाती है।
श्लोक 35 (3.164.35)
स्थावराणां च भूतानां जङ्गमानां च तेजसा । तेजांसि समुपादत्ते निवृत्तः स विभावसुः ॥
sthāvarāṇāṃ ca bhūtānāṃ jaṅgamānāṃ ca tejasā | tejāṃsi samupādatte nivṛttaḥ sa vibhāvasuḥ
"लौटने पर वे विभावसु अपने तेज से स्थावर और जंगम सब प्राणियों का तेज खींच लेते हैं।
श्लोक 36 (3.164.36)
ततः स्वेदः क्लमस्तन्द्री ग्लानिश्च भजते नरान् । प्राणिभिः सततं स्वप्नो ह्यभीक्ष्णं च निषेव्यते ॥
tataḥ svedaḥ klamastandrī glāniśca bhajate narān | prāṇibhiḥ satataṃ svapno hyabhīkṣṇaṃ ca niṣevyate
"तब मनुष्यों को पसीना, थकान, तन्द्रा और शिथिलता घेर लेती है, और प्राणी बार-बार निद्रा का सेवन करते हैं।
श्लोक 37 (3.164.37)
एवमेतमनिर्देश्यं मार्गमावृत्य भानुमान् । पुनः सृजति वर्षाणि भगवान्भासयन्प्रजाः ॥
evametamanirdeśyaṃ mārgamāvṛtya bhānumān | punaḥ sṛjati varṣāṇi bhagavānbhāsayanprajāḥ
"इस प्रकार इस अनिर्वचनीय मार्ग पर चलकर भगवान् भानुमान् प्रजाओं को प्रकाशित करते हुए फिर वर्षा की सृष्टि करते हैं।
श्लोक 38 (3.164.38)
वृष्टिमारुतसंतापैः सुखैः स्थावरजङ्गमान् । वर्धयन्सुमहातेजाः पुनः प्रतिनिवर्तते ॥
vṛṣṭimārutasaṃtāpaiḥ sukhaiḥ sthāvarajaṅgamān | vardhayansumahātejāḥ punaḥ pratinivartate
"सुखद वर्षा, वायु और ताप से स्थावर-जंगम को बढ़ाते हुए वे महातेजस्वी फिर लौट आते हैं।
श्लोक 39 (3.164.39)
एवमेष चरन्पार्थ कालचक्रमतन्द्रितः । प्रकर्षन्सर्वभूतानि सविता परिवर्तते ॥
evameṣa caranpārtha kālacakramatandritaḥ | prakarṣansarvabhūtāni savitā parivartate
"हे पार्थ, इस प्रकार बिना थके कालचक्र को चलाते हुए और सब प्राणियों को साथ खींचते हुए सविता घूमते रहते हैं।
श्लोक 40 (3.164.40)
संतता गतिरेतस्य नैष तिष्ठति पाण्डव । आदायैव तु भूतानां तेजो विसृजते पुनः ॥
saṃtatā gatiretasya naiṣa tiṣṭhati pāṇḍava | ādāyaiva tu bhūtānāṃ tejo visṛjate punaḥ
"हे पाण्डुनन्दन, उनकी गति निरन्तर है, वे कभी ठहरते नहीं। प्राणियों का तेज लेकर वे उसे फिर लौटा देते हैं।
श्लोक 41 (3.164.41)
विभजन्सर्वभूतानामायुः कर्म च भारत । अहोरात्रं कलाः काष्ठाः सृजत्येष सदा विभुः ॥
vibhajansarvabhūtānāmāyuḥ karma ca bhārata | ahorātraṃ kalāḥ kāṣṭhāḥ sṛjatyeṣa sadā vibhuḥ
"हे भारत, सब प्राणियों की आयु और कर्मों का विभाजन करते हुए ये विभु सदा दिन-रात, कलाओं और काष्ठाओं की सृष्टि करते हैं।"