आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 165
गन्धमादन पर अर्जुन की प्रतीक्षा
पाण्डव उस पर्वत पर कुबेर के कमल-सरोवरों और क्रीडा-स्थलों के बीच रहते हैं, जहाँ गन्धर्व और महर्षि उनसे मिलने आते हैं। व्रतों का पालन करते और सूर्य का उदय-अस्त देखते हुए वे अर्जुन के लिए व्याकुल रहते हैं, यहाँ तक कि हर दिन-रात उन्हें एक वर्ष के समान लगता है। उधर अर्जुन इन्द्र के भवन में पाँच वर्ष रहकर अनेक देवताओं के दिव्य अस्त्र प्राप्त कर चुके हैं, और इन्द्र की आज्ञा लेकर गन्धमादन की ओर चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.165.1)
तस्मिन्नगेन्द्रे वसतां तु तेषां । महात्मनां सद्व्रतमास्थितानाम् । रतिः प्रमोदश्च बभूव तेषा- । माकाङ्क्षतां दर्शनमर्जुनस्य ॥
tasminnagendre vasatāṃ tu teṣāṃ | mahātmanāṃ sadvratamāsthitānām | ratiḥ pramodaśca babhūva teṣā- | mākāṅkṣatāṃ darśanamarjunasya
उस पर्वतराज पर उत्तम व्रतों का पालन करते हुए रहने वाले उन महात्माओं को, जो अर्जुन के दर्शन की आकांक्षा कर रहे थे, वहाँ आनन्द और प्रसन्नता मिली।
श्लोक 2 (3.165.2)
तान्वीर्ययुक्तान्सुविशुद्धसत्त्वां- । स्तेजस्विनः सत्यधृतिप्रधानान् । संप्रीयमाणा बहवोऽभिजग्मु- । र्गन्धर्वसङ्घाश्च महर्षयश्च ॥
tānvīryayuktānsuviśuddhasattvāṃ- | stejasvinaḥ satyadhṛtipradhānān | saṃprīyamāṇā bahavo'bhijagmu- | rgandharvasaṅghāśca maharṣayaśca
उन पराक्रमी, अत्यन्त शुद्ध स्वभाव वाले, तेजस्वी तथा सत्य और धैर्य में अग्रणी वीरों के पास गन्धर्वों के बहुत-से समूह और महर्षि प्रसन्न होकर आए।
श्लोक 3 (3.165.3)
तं पादपैः पुष्पफलैरुपेतं । नगोत्तमं प्राप्य महारथानाम् । मनःप्रसादः परमो बभूव । यथा दिवं प्राप्य मरुद्गणानाम् ॥
taṃ pādapaiḥ puṣpaphalairupetaṃ | nagottamaṃ prāpya mahārathānām | manaḥprasādaḥ paramo babhūva | yathā divaṃ prāpya marudgaṇānām
फूलों और फलों से लदे वृक्षों वाले उस श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँचकर उन महारथियों के मन को वैसी ही परम प्रसन्नता हुई जैसी मरुद्गणों को स्वर्ग पहुँचकर होती है।
श्लोक 4 (3.165.4)
मयूरहंसस्वननादितानि । पुष्पोपकीर्णानि महाचलस्य । शृङ्गाणि सानूनि च पश्यमाना । गिरेः परं हर्षमवाप्य तस्थुः ॥
mayūrahaṃsasvananāditāni | puṣpopakīrṇāni mahācalasya | śṛṅgāṇi sānūni ca paśyamānā | gireḥ paraṃ harṣamavāpya tasthuḥ
मोरों और हंसों के कलरव से गूँजते और फूलों से ढके उस महान् पर्वत के शिखरों और ढलानों को देखते हुए वे परम हर्ष से भर गए।
श्लोक 5 (3.165.5)
साक्षात्कुबेरेण कृताश्च तस्मि- । न्नगोत्तमे संवृतकूटगुल्माः । कादम्बकारण्डवहंसजुष्टाः । पद्माकुलाः पुष्करिणीरपश्यन् ॥
sākṣātkubereṇa kṛtāśca tasmi- | nnagottame saṃvṛtakūṭagulmāḥ | kādambakāraṇḍavahaṃsajuṣṭāḥ | padmākulāḥ puṣkariṇīrapaśyan
उस श्रेष्ठ पर्वत पर उन्होंने स्वयं कुबेर के बनाए हुए सरोवर देखे, जो टीलों और झाड़ियों से घिरे थे, जिन पर कादम्ब, कारण्डव और हंस विचरते थे और जो कमलों से भरे थे।
श्लोक 6 (3.165.6)
क्रीडाप्रदेशांश्च समृद्धरूपा- । न्सवेदिकांस्ते न्यवसन्सुवेशान् । मणिप्रकीर्णांश्च मनोरमांश्च । यथा भवेयुर्धनदस्य राज्ञः ॥
krīḍāpradeśāṃśca samṛddharūpā- | nsavedikāṃste nyavasansuveśān | maṇiprakīrṇāṃśca manoramāṃśca | yathā bhaveyurdhanadasya rājñaḥ
वे ऐसे समृद्ध और सुन्दर क्रीडा-स्थलों में रहे, जो वेदियों से युक्त, सुसज्जित, मणियों से जड़े और मनोरम थे — मानो धन देने वाले राजा कुबेर के योग्य हों।
श्लोक 7 (3.165.7)
अनेकवर्णैश्च सुगन्धिभिश्च । महाद्रुमैः संततमभ्रजालैः । तपःप्रधानाः सततं चरन्तः । शृङ्गं गिरेश्चिन्तयितुं न शेकुः ॥
anekavarṇaiśca sugandhibhiśca | mahādrumaiḥ saṃtatamabhrajālaiḥ | tapaḥpradhānāḥ satataṃ carantaḥ | śṛṅgaṃ gireścintayituṃ na śekuḥ
तप में लगे वे निरन्तर वहाँ विचरते रहे, फिर भी अनेक रंगों वाले सुगन्धित महावृक्षों और मेघ-समूहों से सदा ढके उस पर्वत-शिखर की थाह वे मन से भी न ले सके।
श्लोक 8 (3.165.8)
स्वतेजसा तस्य नगोत्तमस्य । महौषधीनां च तथा प्रभावात् । विभक्तरूपः सविता बभूव । निशामुखं प्राप्य नरर्षभाणाम् ॥
svatejasā tasya nagottamasya | mahauṣadhīnāṃ ca tathā prabhāvāt | vibhaktarūpaḥ savitā babhūva | niśāmukhaṃ prāpya nararṣabhāṇām
उस श्रेष्ठ पर्वत के अपने तेज और महौषधियों के प्रभाव से, रात्रि का आरम्भ होने पर उन नरश्रेष्ठों के लिए सूर्य एक भिन्न रूप वाला हो गया।
श्लोक 9 (3.165.9)
यमास्थितः स्थावरजङ्गमानां । विभावसुर्भावयिता हरीशः । तस्योदयं चास्तमनं च वीरा- । स्तत्रस्थितास्ते ददृशुर्नृसिंहाः ॥
yamāsthitaḥ sthāvarajaṅgamānāṃ | vibhāvasurbhāvayitā harīśaḥ | tasyodayaṃ cāstamanaṃ ca vīrā- | statrasthitāste dadṛśurnṛsiṃhāḥ
वहाँ रहते हुए उन नरसिंह वीरों ने उस सूर्य का उदय और अस्त देखा, जिसका आश्रय लेकर तेजस्वी अग्नि, दीप्त अश्वों के स्वामी, स्थावर-जंगम सबका पोषण करते हैं।
श्लोक 10 (3.165.10)
रवेस्तमिस्रागमनिर्गमांस्ते । तथोदयं चास्तमनं च वीराः । समावृताः प्रेक्ष्य तमोनुदस्य । गभस्तिजालैः प्रदिशो दिशश्च ॥
ravestamisrāgamanirgamāṃste | tathodayaṃ cāstamanaṃ ca vīrāḥ | samāvṛtāḥ prekṣya tamonudasya | gabhastijālaiḥ pradiśo diśaśca
उन वीरों ने अन्धकार मिटाने वाले सूर्य के रात्रि के साथ आने-जाने को, उसके उदय और अस्त को देखा, और देखा कि दिशाएँ और विदिशाएँ उसकी किरणों के जाल से ढकी हुई हैं।
श्लोक 11 (3.165.11)
स्वाध्यायवन्तः सततक्रियाश्च । धर्मप्रधानाश्च शुचिव्रताश्च । सत्ये स्थितास्तस्य महारथस्य । सत्यव्रतस्यागमनप्रतीक्षाः ॥
svādhyāyavantaḥ satatakriyāśca | dharmapradhānāśca śucivratāśca | satye sthitāstasya mahārathasya | satyavratasyāgamanapratīkṣāḥ
स्वाध्याय में लगे, निरन्तर कर्मानुष्ठान करने वाले, धर्मपरायण, पवित्र व्रतों वाले और सत्य में स्थित वे सब उस सत्यव्रती महारथी के आगमन की प्रतीक्षा करते रहे।
श्लोक 12 (3.165.12)
इहैव हर्षोऽस्तु समागतानां । क्षिप्रं कृतास्त्रेण धनंजयेन । इति ब्रुवन्तः परमाशिषस्ते । पार्थास्तपोयोगपरा बभूवुः ॥
ihaiva harṣo'stu samāgatānāṃ | kṣipraṃ kṛtāstreṇa dhanaṃjayena | iti bruvantaḥ paramāśiṣaste | pārthāstapoyogaparā babhūvuḥ
"धनंजय शीघ्र ही अस्त्र प्राप्त करके आएँ और हम सब मिलकर यहीं आनन्द मनाएँ" — ऐसी उत्तम मंगलकामनाएँ करते हुए पृथा के पुत्र तप और योग में लग गए।
श्लोक 13 (3.165.13)
दृष्ट्वा विचित्राणि गिरौ वनानि । किरीटिनं चिन्तयतामभीक्ष्णम् । बभूव रात्रिर्दिवसश्च तेषां । संवत्सरेणैव समानरूपः ॥
dṛṣṭvā vicitrāṇi girau vanāni | kirīṭinaṃ cintayatāmabhīkṣṇam | babhūva rātrirdivasaśca teṣāṃ | saṃvatsareṇaiva samānarūpaḥ
पर्वत पर विचित्र वनों को देखते हुए भी वे निरन्तर किरीटधारी अर्जुन का ही चिन्तन करते रहे, और उनके लिए एक-एक रात और दिन वर्ष के समान हो गया।
श्लोक 14 (3.165.14)
यदैव धौम्यानुमते महात्मा । कृत्वा जटां प्रव्रजितः स जिष्णुः । तदैव तेषां न बभूव हर्षः । कुतो रतिस्तद्गतमानसानाम् ॥
yadaiva dhaumyānumate mahātmā | kṛtvā jaṭāṃ pravrajitaḥ sa jiṣṇuḥ | tadaiva teṣāṃ na babhūva harṣaḥ | kuto ratistadgatamānasānām
जिस समय से महात्मा जिष्णु धौम्य की अनुमति लेकर जटा बाँधकर चले गए थे, उसी समय से उनका हर्ष जाता रहा; जिनका मन उन्हीं में लगा था, उन्हें आनन्द कहाँ से मिलता?
श्लोक 15 (3.165.15)
भ्रातुर्नियोगात्तु युधिष्ठिरस्य । वनादसौ वारणमत्तगामी । यत्काम्यकात्प्रव्रजितः स जिष्णु- । स्तदैव ते शोकहता बभूवुः ॥
bhrāturniyogāttu yudhiṣṭhirasya | vanādasau vāraṇamattagāmī | yatkāmyakātpravrajitaḥ sa jiṣṇu- | stadaiva te śokahatā babhūvuḥ
जब मतवाले हाथी की-सी चाल वाले जिष्णु अपने भाई युधिष्ठिर की आज्ञा से काम्यक वन से चले गए, तभी से वे शोक से व्याकुल हो गए।
श्लोक 16 (3.165.16)
तथैव तं चिन्तयतां सिताश्व- । मस्त्रार्थिनं वासवमभ्युपेतम् । कालः स कृच्छ्रेण महानतीत- । स्तस्मिन्नगे भारत भारतानाम् ॥
tathaiva taṃ cintayatāṃ sitāśva- | mastrārthinaṃ vāsavamabhyupetam | kālaḥ sa kṛcchreṇa mahānatīta- | stasminnage bhārata bhāratānām
हे भारत, इसी प्रकार अस्त्रों की इच्छा से इन्द्र के पास गए श्वेत अश्वों वाले अर्जुन का चिन्तन करते हुए उस पर्वत पर भरतवंशियों का वह लम्बा समय बड़े कष्ट से बीता।
श्लोक 17 (3.165.17)
उषित्वा पञ्चवर्षाणि सहस्राक्षनिवेशने । अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि विबुधेश्वरात् ॥
uṣitvā pañcavarṣāṇi sahasrākṣaniveśane | avāpya divyānyastrāṇi sarvāṇi vibudheśvarāt
अर्जुन ने सहस्राक्ष इन्द्र के भवन में पाँच वर्ष रहकर देवेश्वर से सब दिव्य अस्त्र प्राप्त किए थे —
श्लोक 18 (3.165.18)
आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम् । ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः ॥
āgneyaṃ vāruṇaṃ saumyaṃ vāyavyamatha vaiṣṇavam | aindraṃ pāśupataṃ brāhmaṃ pārameṣṭhyaṃ prajāpateḥ
आग्नेय, वारुण, सौम्य, वायव्य और वैष्णव अस्त्र; ऐन्द्र, पाशुपत और ब्राह्म अस्त्र; प्रजापति का पारमेष्ठ्य अस्त्र;
श्लोक 19 (3.165.19)
यमस्य धातुः सवितुस्त्वष्टुर्वैश्रवणस्य च । तानि प्राप्य सहस्राक्षादभिवाद्य शतक्रतुम् ॥
yamasya dhātuḥ savitustvaṣṭurvaiśravaṇasya ca | tāni prāpya sahasrākṣādabhivādya śatakratum
तथा यम, धाता, सविता, त्वष्टा और वैश्रवण (कुबेर) के अस्त्र। सहस्राक्ष से ये अस्त्र पाकर उन्होंने शतक्रतु इन्द्र को प्रणाम किया,
श्लोक 20 (3.165.20)
अनुज्ञातस्तदा तेन कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । आगच्छदर्जुनः प्रीतः प्रहृष्टो गन्धमादनम् ॥
anujñātastadā tena kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | āgacchadarjunaḥ prītaḥ prahṛṣṭo gandhamādanam
और उनकी आज्ञा लेकर उनकी प्रदक्षिणा की; फिर प्रसन्न और हर्षित अर्जुन गन्धमादन पर्वत पर आ पहुँचे।