आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 18
प्रद्युम्न का सारथि को उलाहना
कृष्ण युधिष्ठिर को द्वारका पर शाल्व के आक्रमण का वृत्तान्त सुनाते जा रहे हैं। शाल्व के बाणों से प्रद्युम्न मूर्छित हो जाते हैं तो उनका सारथि, दारुक का पुत्र, उन्हें रणभूमि से हटा ले जाता है। होश में आने पर प्रद्युम्न क्रोध से उसे धिक्कारते हैं: कोई वृष्णि युद्ध से पीठ नहीं दिखाता, और भागे हुए के रूप में कृष्ण, बलराम, सात्यकि तथा वृष्णि-स्त्रियों के सामने जाने से तो मर जाना अच्छा है। वे सारथि को रथ फिर युद्ध की ओर लौटाने का आदेश देते हैं।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (3.18.1)
साल्वबाणार्दिते तस्मिन्प्रद्युम्ने बलिनां वरे । वृष्णयो भग्नसंकल्पा विव्यथुः पृतनामुखे ॥
sālvabāṇārdite tasminpradyumne balināṃ vare | vṛṣṇayo bhagnasaṃkalpā vivyathuḥ pṛtanāmukhe
जब बलवानों में श्रेष्ठ प्रद्युम्न शाल्व के बाणों से आहत हो गए, तब वृष्णियों का उत्साह टूट गया और वे सेना के अग्रभाग में व्याकुल हो उठे।
श्लोक 2 (3.18.2)
हाहाकृतमभूत्सर्वं वृष्ण्यन्धकबलं ततः । प्रद्युम्ने मोहिते राजन्साल्वः प्रमुदितोऽभवत् ॥
hāhākṛtamabhūtsarvaṃ vṛṣṇyandhakabalaṃ tataḥ | pradyumne mohite rājansālvaḥ pramudito'bhavat
हे राजन्, तब वृष्णियों और अन्धकों की सारी सेना में हाहाकार मच गया; और प्रद्युम्न के मूर्छित होने पर शाल्व प्रसन्न हो उठा।
श्लोक 3 (3.18.3)
तं तथा मोहितं दृष्ट्वा सारथिर्जवनैर्हयैः । रणादपाहरत्तूर्णं शिक्षितो दारुकिस्तदा ॥
taṃ tathā mohitaṃ dṛṣṭvā sārathirjavanairhayaiḥ | raṇādapāharattūrṇaṃ śikṣito dārukistadā
उन्हें इस प्रकार मूर्छित देखकर उनका सुशिक्षित सारथि, दारुक का पुत्र, अपने वेगवान घोड़ों के सहारे उन्हें तुरन्त रणभूमि से दूर ले गया।
श्लोक 4 (3.18.4)
नातिदूरापयाते तु रथे रथवरप्रणुत् । धनुर्गृहीत्वा यन्तारं लब्धसंज्ञोऽब्रवीदिदम् ॥
nātidūrāpayāte tu rathe rathavarapraṇut | dhanurgṛhītvā yantāraṃ labdhasaṃjño'bravīdidam
रथ अभी अधिक दूर नहीं गया था कि श्रेष्ठ रथियों को भी पीछे धकेलने वाले प्रद्युम्न को होश आ गया। उन्होंने धनुष उठाया और सारथि से यह कहा—
प्रद्युम्न उवाच
श्लोक 5 (3.18.5)
सौते किं ते व्यवसितं कस्माद्यासि पराङ्मुखः । नैष वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते ॥
saute kiṃ te vyavasitaṃ kasmādyāsi parāṅmukhaḥ | naiṣa vṛṣṇipravīrāṇāmāhave dharma ucyate
"हे सूतपुत्र, तुमने क्या ठान लिया है? तुम पीठ फेरकर क्यों जा रहे हो? युद्ध में वृष्णि-वीरों का यह धर्म नहीं कहा जाता।
श्लोक 6 (3.18.6)
कच्चित्सौते न ते मोहः साल्वं दृष्ट्वा महाहवे । विषादो वा रणं दृष्ट्वा ब्रूहि मे त्वं यथातथम् ॥
kaccitsaute na te mohaḥ sālvaṃ dṛṣṭvā mahāhave | viṣādo vā raṇaṃ dṛṣṭvā brūhi me tvaṃ yathātatham
कहीं इस महायुद्ध में शाल्व को देखकर तुम्हें मोह तो नहीं हो गया, या युद्ध देखकर तुम्हारा मन तो नहीं बैठ गया? मुझे ठीक-ठीक बताओ।"
सौतिरुवाच
श्लोक 7 (3.18.7)
जानार्दने न मे मोहो नापि मां भयमाविशत् । अतिभारं तु ते मन्ये साल्वं केशवनन्दन ॥
jānārdane na me moho nāpi māṃ bhayamāviśat | atibhāraṃ tu te manye sālvaṃ keśavanandana
"हे जनार्दन-पुत्र, न मुझे मोह हुआ है और न मुझमें भय समाया है। पर मुझे लगा कि शाल्व आपके लिए बहुत भारी पड़ रहा है।
श्लोक 8 (3.18.8)
सोऽभियाति शनैर्वीर बलवानेष पापकृत् । मोहितश्च रणे शूरो रक्ष्यः सारथिना रथी ॥
so'bhiyāti śanairvīra balavāneṣa pāpakṛt | mohitaśca raṇe śūro rakṣyaḥ sārathinā rathī
हे वीर, यह बलवान पापी धीरे-धीरे आगे बढ़ा आ रहा है; और युद्ध में मूर्छित हुए शूर रथी की रक्षा सारथि को करनी ही चाहिए।
श्लोक 9 (3.18.9)
आयुष्मंस्त्वं मया नित्यं रक्षितव्यस्त्वयाऽप्यहम् । रक्षितव्यो रणे नित्यमिति कृत्वाऽपयाम्यहम् ॥
āyuṣmaṃstvaṃ mayā nityaṃ rakṣitavyastvayā'pyaham | rakṣitavyo raṇe nityamiti kṛtvā'payāmyaham
आप चिरंजीवी हों! मुझे सदा आपकी रक्षा करनी है और आपको मेरी; युद्ध में रथी की रक्षा सदा की जानी चाहिए। यही सोचकर मैं पीछे हट रहा हूँ।
श्लोक 10 (3.18.10)
एकश्चासि महाबाहो बहवश्चापि दानवाः । न समं रौक्मिणेयाहं रणं मत्वाऽपयामि वा ॥
ekaścāsi mahābāho bahavaścāpi dānavāḥ | na samaṃ raukmiṇeyāhaṃ raṇaṃ matvā'payāmi vā
हे महाबाहु, आप अकेले हैं और दानव बहुत हैं। हे रुक्मिणीनन्दन, इस युद्ध को बराबरी का न मानकर मैं पीछे हट रहा हूँ।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 11 (3.18.11)
एवं ब्रुवति सूते तु तदा मकरकेतुमान् । उवाच सूतं कौरव्य संनिवर्त्य रथं पुनः ॥
evaṃ bruvati sūte tu tadā makaraketumān | uvāca sūtaṃ kauravya saṃnivartya rathaṃ punaḥ
हे कौरव्य, सारथि के ऐसा कहते ही मकरध्वज प्रद्युम्न ने रथ को फिर से लौटाया और सारथि से कहा—
प्रद्युम्न उवाच
श्लोक 12 (3.18.12)
दारुकात्मज मैवं त्वं पुनः कार्षीः कथंचन । व्यपयानं रणात्सौते जीवतो मम कर्हिचित् ॥
dārukātmaja maivaṃ tvaṃ punaḥ kārṣīḥ kathaṃcana | vyapayānaṃ raṇātsaute jīvato mama karhicit
"हे दारुकपुत्र, फिर कभी किसी भी प्रकार ऐसा मत करना। हे सूतपुत्र, मेरे जीते-जी युद्ध से कभी पीछे मत हटना।
श्लोक 13 (3.18.13)
न स वृष्णिकुले जातो यो वै त्यजति संगरम् । यो वा निपतितं हन्ति तवास्मीति च वादिनम् ॥
na sa vṛṣṇikule jāto yo vai tyajati saṃgaram | yo vā nipatitaṃ hanti tavāsmīti ca vādinam
वह वृष्णिकुल में जन्मा ही नहीं जो युद्ध छोड़ दे, या जो गिरे हुए को अथवा 'मैं आपका हूँ' कहने वाले को मारे।
श्लोक 14 (3.18.14)
तथा स्त्रियं च यो हन्ति बालं वृद्धं तथैव च । विरथं मुक्तकेशं च भग्नशस्त्रायुधं तथा ॥
tathā striyaṃ ca yo hanti bālaṃ vṛddhaṃ tathaiva ca | virathaṃ muktakeśaṃ ca bhagnaśastrāyudhaṃ tathā
न वह जो स्त्री, बालक या वृद्ध को मारे, न वह जो रथहीन, खुले केशों वाले या टूटे शस्त्रों वाले को मारे।
श्लोक 15 (3.18.15)
त्वं च सूतकुले जातो विदितः सूतकर्मणि । धर्मज्ञश्चासि वृष्णीनामाहवेष्वपि दारुके ॥
tvaṃ ca sūtakule jāto viditaḥ sūtakarmaṇi | dharmajñaścāsi vṛṣṇīnāmāhaveṣvapi dāruke
तुम सूतकुल में जन्मे हो और सारथि-कर्म में जाने-माने हो; हे दारुकपुत्र, युद्ध में वृष्णियों का धर्म भी तुम जानते हो।
श्लोक 16 (3.18.16)
स जानंश्चरितं कृत्स्नं वृष्णीनां पृतनामुखे । अपयानं पुनः सौते मैवं कार्षीः कथंचन ॥
sa jānaṃścaritaṃ kṛtsnaṃ vṛṣṇīnāṃ pṛtanāmukhe | apayānaṃ punaḥ saute maivaṃ kārṣīḥ kathaṃcana
हे सूतपुत्र, युद्ध के मोर्चे पर वृष्णियों का सारा आचरण जानते हुए भी तुम फिर कभी किसी प्रकार ऐसे पीछे मत हटना।
श्लोक 17 (3.18.17)
अपयातं हतं पृष्ठे भ्रान्तं रणपलायितम् । गदाग्रजो दुराधर्षः किं मां वक्ष्यति माधवः ॥
apayātaṃ hataṃ pṛṣṭhe bhrāntaṃ raṇapalāyitam | gadāgrajo durādharṣaḥ kiṃ māṃ vakṣyati mādhavaḥ
पीठ पर घाव खाए, घबराकर रण से भागे हुए मुझे देखकर गद के अजेय बड़े भाई माधव मुझसे क्या कहेंगे?
श्लोक 18 (3.18.18)
केशवस्याग्रजो वाऽपि नीलवासा मदोत्कटः । किं वक्ष्यति महाबाहुर्बलदेवः समागतः ॥
keśavasyāgrajo vā'pi nīlavāsā madotkaṭaḥ | kiṃ vakṣyati mahābāhurbaladevaḥ samāgataḥ
या केशव के बड़े भाई, नीले वस्त्र धारण करने वाले, मद से उन्मत्त महाबाहु बलदेव मिलने पर क्या कहेंगे?
श्लोक 19 (3.18.19)
किं वक्ष्यति शिनेर्नप्ता रणसिंहो महारथः । अपयातं रणात्सूत साम्बश्च समितिंजयः ॥
kiṃ vakṣyati śinernaptā raṇasiṃho mahārathaḥ | apayātaṃ raṇātsūta sāmbaśca samitiṃjayaḥ
हे सूत, रण से भागे हुए मुझे देखकर शिनि के पौत्र, युद्ध के सिंह महारथी सात्यकि क्या कहेंगे? और युद्धविजयी साम्ब क्या कहेंगे?
श्लोक 20 (3.18.20)
चारुदेष्णश्च दुर्धर्षस्तथैव गदसारणौ । अक्रूरश्च महाबाहुः किं मां वक्ष्यति सारथे ॥
cārudeṣṇaśca durdharṣastathaiva gadasāraṇau | akrūraśca mahābāhuḥ kiṃ māṃ vakṣyati sārathe
हे सारथि, दुर्धर्ष चारुदेष्ण, और वैसे ही गद और सारण, तथा महाबाहु अक्रूर मुझसे क्या कहेंगे?
श्लोक 21 (3.18.21)
शूरं संभावितं शान्तं नित्यं पुरुषमानिनम् । स्त्रियश्च वृष्णिवीराणां किं मां वक्ष्यन्ति संगताः ॥
śūraṃ saṃbhāvitaṃ śāntaṃ nityaṃ puruṣamāninam | striyaśca vṛṣṇivīrāṇāṃ kiṃ māṃ vakṣyanti saṃgatāḥ
मुझे सदा वीर, सम्मानित, धीर और अपने पौरुष पर गर्व करने वाला माना गया है; अब वृष्णि-वीरों की स्त्रियाँ इकट्ठी होकर मुझसे क्या कहेंगी?
श्लोक 22 (3.18.22)
प्रद्युम्नोऽयमुपायाति भीतस्त्यक्त्वा महाहवम् । धिगेनमिति वक्ष्यन्ति न तु वक्ष्यन्ति साध्विति ॥
pradyumno'yamupāyāti bhītastyaktvā mahāhavam | dhigenamiti vakṣyanti na tu vakṣyanti sādhviti
'यह देखो प्रद्युम्न आ रहा है, जो डरकर महायुद्ध छोड़ आया!' वे कहेंगी 'इसे धिक्कार है!'; 'शाबाश' कोई नहीं कहेगा।
श्लोक 23 (3.18.23)
धिग्वाचा परिहासोऽपि मम वा मद्विधस्य वा । मृत्युनाऽभ्यधिकः सौते स त्वं मा व्यपयाः पुनः ॥
dhigvācā parihāso'pi mama vā madvidhasya vā | mṛtyunā'bhyadhikaḥ saute sa tvaṃ mā vyapayāḥ punaḥ
हे सूतपुत्र, मेरे लिए या मुझ जैसे किसी के लिए 'धिक्कार' कहकर किया गया उपहास भी मृत्यु से बढ़कर है। इसलिए फिर कभी पीछे मत हटना।
श्लोक 24 (3.18.24)
भारं हि मयि संन्यस्य यातो मधुनिहा हरिः । यज्ञं भरतसिंहस्य न हि शक्योऽद्यमर्षितुम् ॥
bhāraṃ hi mayi saṃnyasya yāto madhunihā hariḥ | yajñaṃ bharatasiṃhasya na hi śakyo'dyamarṣitum
मधु का वध करने वाले हरि यह भार मुझ पर डालकर भरतसिंह के यज्ञ में गए हैं; आज यह (अपमान) सहा नहीं जा सकता।
श्लोक 25 (3.18.25)
कृतवर्मा मया वीरो निर्यास्यन्नेव वारितः । साल्वं निवारयिष्येऽहं तिष्ठ त्वमिति सूतज ॥
kṛtavarmā mayā vīro niryāsyanneva vāritaḥ | sālvaṃ nivārayiṣye'haṃ tiṣṭha tvamiti sūtaja
हे सूतपुत्र, वीर कृतवर्मा युद्ध के लिए निकलने ही वाले थे कि मैंने उन्हें रोक दिया और कहा, 'शाल्व को मैं रोकूँगा, तुम यहीं ठहरो।'
श्लोक 26 (3.18.26)
स च संभावयन्मां वै निवृत्तो हृदिकात्मजः । तं समेत्य रणं त्यक्त्वा किं वक्ष्यामि महारथं ॥
sa ca saṃbhāvayanmāṃ vai nivṛtto hṛdikātmajaḥ | taṃ sametya raṇaṃ tyaktvā kiṃ vakṣyāmi mahārathaṃ
और हृदिक के पुत्र मुझ पर भरोसा करके लौट गए। युद्ध छोड़कर उस महारथी से मिलूँगा तो उनसे क्या कहूँगा?
श्लोक 27 (3.18.27)
उपयान्तं दुराधर्षं शङ्खचक्रगदाधरम् । पुरुषं पुण्डरीकाक्षं किं वक्ष्यामि महाभुजम् ॥
upayāntaṃ durādharṣaṃ śaṅkhacakragadādharam | puruṣaṃ puṇḍarīkākṣaṃ kiṃ vakṣyāmi mahābhujam
जब शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, दुर्जेय, कमलनयन महाबाहु पुरुषोत्तम लौटेंगे, तब मैं उनसे क्या कहूँगा?
श्लोक 28 (3.18.28)
सात्यकिं बलदेवं च ये चान्येऽन्धकवृष्णयः । मया स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहं ॥
sātyakiṃ baladevaṃ ca ye cānye'ndhakavṛṣṇayaḥ | mayā spardhanti satataṃ kiṃ nu vakṣyāmi tānahaṃ
सात्यकि, बलदेव और वे दूसरे अन्धक तथा वृष्णि जो सदा मुझसे होड़ करते हैं, उनसे मैं क्या कहूँगा?
श्लोक 29 (3.18.29)
त्यक्त्वा रणमिमं सौते पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः । त्वयाऽपनीतो विवशो न जीवेयं कथंचन ॥
tyaktvā raṇamimaṃ saute pṛṣṭhato'bhyāhataḥ śaraiḥ | tvayā'panīto vivaśo na jīveyaṃ kathaṃcana
हे सूतपुत्र, यह युद्ध छोड़कर, पीठ पर बाणों से घायल होकर और तुम्हारे द्वारा विवश अवस्था में हटाए जाकर मैं किसी भी तरह जीवित नहीं रह सकूँगा।
श्लोक 30 (3.18.30)
संनिवर्त रथेनाशु पुनर्दारुकनन्दन । न चैतदेवं कर्तव्यमथापत्सु कथंचन ॥
saṃnivarta rathenāśu punardārukanandana | na caitadevaṃ kartavyamathāpatsu kathaṃcana
हे दारुकनन्दन, शीघ्र रथ लेकर लौटो। संकट के समय भी ऐसा कभी मत करना।
श्लोक 31 (3.18.31)
न जीवितमहं सौते बहु मन्ये कथंचन । अपयातो रणाद्भीतः पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ॥
na jīvitamahaṃ saute bahu manye kathaṃcana | apayāto raṇādbhītaḥ pṛṣṭhato'bhyāhataḥ śaraiḥ
हे सूतपुत्र, यदि मैं डरकर, पीठ पर बाण खाकर युद्ध से भागा हूँ, तो ऐसे जीवन का मेरे लिए कोई मूल्य नहीं।
श्लोक 32 (3.18.32)
कदाऽपि सूतपुत्र त्वं जानीषे मां भयार्दितम् । अपयातं रणं हित्वा यथा कापुरुषं तथा ॥
kadā'pi sūtaputra tvaṃ jānīṣe māṃ bhayārditam | apayātaṃ raṇaṃ hitvā yathā kāpuruṣaṃ tathā
हे सूतपुत्र, क्या तुमने कभी मुझे भय से पीड़ित होकर, युद्ध छोड़कर कायर की तरह भागते देखा है?
श्लोक 33 (3.18.33)
अयुक्तं तु मया त्यक्तुं संग्रामं दारुकात्मज । मयि युद्धार्थिनि भृशं स त्वं याहि यतो रणम् ॥
ayuktaṃ tu mayā tyaktuṃ saṃgrāmaṃ dārukātmaja | mayi yuddhārthini bhṛśaṃ sa tvaṃ yāhi yato raṇam
हे दारुकपुत्र, जब मैं युद्ध के लिए इतना उत्सुक हूँ, तब मेरे लिए संग्राम छोड़ना उचित नहीं। इसलिए जहाँ युद्ध हो रहा है, वहीं चलो।"