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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 19

प्रद्युम्न द्वारा शाल्व की पराजय

दारुक का पुत्र बताता है कि वह केवल मूर्छित प्रद्युम्न की रक्षा के लिए पीछे हटा था, और फिर घोड़ों को शत्रु-सेना के बीच घुमाकर अपना कौशल दिखाता है। प्रद्युम्न शाल्व के बाणों और उसके आसुरी अस्त्र को काट डालते हैं और शाल्व को अचेत कर देते हैं, पर जब वे एक घातक बाण चढ़ाते हैं तो देवता नारद और वायु को भेजकर उन्हें रोक देते हैं: शाल्व का वध केवल कृष्ण के हाथ से नियत है। प्रद्युम्न बाण उतार लेते हैं, और बुरी तरह घायल शाल्व द्वारका छोड़कर अपने आकाशगामी नगर सौभ में बैठकर आकाश में चला जाता है।

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

वासुदेव उवाच

श्लोक 1 (3.19.1)

एवमुक्तस्तु कौन्तेय सूतपुत्रस्ततो मृधे । प्रद्युम्नमब्रवीच्छ्लक्ष्णं मधुरं वाक्यमञ्जसा ॥

evamuktastu kaunteya sūtaputrastato mṛdhe | pradyumnamabravīcchlakṣṇaṃ madhuraṃ vākyamañjasā

हे कुन्तीपुत्र, युद्ध में इस प्रकार कहे जाने पर सारथि-पुत्र ने तुरन्त प्रद्युम्न को कोमल और मधुर वचनों में उत्तर दिया—

सौतिरुवाच

श्लोक 2 (3.19.2)

न मे भयं रौक्मिणेय संग्रामे यच्छतो हयान् । युद्धज्ञोऽस्मि च वृष्णीनां नात्र किंचिदतोऽन्यथा ॥

na me bhayaṃ raukmiṇeya saṃgrāme yacchato hayān | yuddhajño'smi ca vṛṣṇīnāṃ nātra kiṃcidato'nyathā

"हे रुक्मिणीनन्दन, युद्ध में घोड़े हाँकते हुए मुझे कोई भय नहीं है, और मैं वृष्णियों की युद्ध-रीति जानता हूँ; इसमें इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है।

श्लोक 3 (3.19.3)

आयुष्मन्नुपदेशस्तु सारथ्ये वर्ततां स्मृतः । सर्वार्थेषु रथी रक्ष्यस्त्वं चापि भृशपीडितः ॥

āyuṣmannupadeśastu sārathye vartatāṃ smṛtaḥ | sarvārtheṣu rathī rakṣyastvaṃ cāpi bhṛśapīḍitaḥ

पर हे आयुष्मन्, सारथि के धर्म का यह उपदेश स्मरण रहे कि हर स्थिति में रथी की रक्षा की जाए; और आप बुरी तरह घायल थे।

श्लोक 4 (3.19.4)

त्वं हि साल्वप्रयुक्तेन शरेणाभिहतो भृशम् । कश्मलाभिहतो वीर ततोऽहमपयातवान् ॥

tvaṃ hi sālvaprayuktena śareṇābhihato bhṛśam | kaśmalābhihato vīra tato'hamapayātavān

हे वीर, शाल्व के छोड़े बाण से आप गहरे आहत हुए थे और मूर्छित हो गए थे; इसीलिए मैं पीछे हटा था।

श्लोक 5 (3.19.5)

स त्वं सात्वतमुख्याद्य लब्धसंज्ञो यदृच्छया । पश्य मे हयसंयाने शिक्षां केशवनन्दन ॥

sa tvaṃ sātvatamukhyādya labdhasaṃjño yadṛcchayā | paśya me hayasaṃyāne śikṣāṃ keśavanandana

हे सात्वतों में प्रमुख, अब जब आप सौभाग्य से होश में आ गए हैं, तो हे केशवनन्दन, घोड़े चलाने में मेरी शिक्षा देखिए।

श्लोक 6 (3.19.6)

दारुकेणाहमुत्पन्नो यथावच्चैव शिक्षितः । वीतभीः प्रविशाम्येतां साल्वस्य महतीं चमूम् ॥

dārukeṇāhamutpanno yathāvaccaiva śikṣitaḥ | vītabhīḥ praviśāmyetāṃ sālvasya mahatīṃ camūm

मैं दारुक का पुत्र हूँ और मुझे विधिवत् शिक्षा मिली है। मैं निडर होकर शाल्व की इस विशाल सेना में प्रवेश करता हूँ।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 7 (3.19.7)

एवमुक्त्वा ततो वीरो हयान्संचोद्य संगरे । रश्मिभिस्तु समुद्यम्य जवेनाभ्यपतत्तदा ॥

evamuktvā tato vīro hayānsaṃcodya saṃgare | raśmibhistu samudyamya javenābhyapatattadā

यह कहकर उस वीर ने युद्ध में घोड़ों को हाँका, लगाम से उन्हें साधा और बड़े वेग से आगे झपटा।

श्लोक 8 (3.19.8)

मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च । सव्यानि च विचित्राणि दक्षिणानि च सर्वशः ॥

maṇḍalāni vicitrāṇi yamakānītarāṇi ca | savyāni ca vicitrāṇi dakṣiṇāni ca sarvaśaḥ

उसने घोड़ों को अद्भुत मण्डलों में घुमाया, कुछ एक-जैसे और कुछ भिन्न, बायीं ओर और दायीं ओर, सब दिशाओं में।

श्लोक 9 (3.19.9)

प्रतोदेनाहता राजन्रश्मिभिश्च समुद्यताः । उत्पतन्त इवाकाशं विबभुस्ते हयोत्तमाः ॥

pratodenāhatā rājanraśmibhiśca samudyatāḥ | utpatanta ivākāśaṃ vibabhuste hayottamāḥ

हे राजन्, चाबुक की चोट खाकर और लगाम से साधे जाकर वे उत्तम घोड़े ऐसे शोभा पाने लगे मानो आकाश में उड़ रहे हों।

श्लोक 10 (3.19.10)

ते हस्तलाघवोपेतं विज्ञाय नृप दारुकिम् । उह्यमाना इव तदा नास्पृशंश्चरणैर्महीम् ॥

te hastalāghavopetaṃ vijñāya nṛpa dārukim | uhyamānā iva tadā nāspṛśaṃścaraṇairmahīm

हे नरेश, दारुकपुत्र को हाथ का सधा हुआ जानकर वे घोड़े ऐसे दौड़े मानो उड़ाए जा रहे हों, और उनके खुर धरती को छूते तक न थे।

श्लोक 11 (3.19.11)

सोऽपसव्यां चमूं तस्य साल्वस्य भरतर्षभ । चकार नातियत्नेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥

so'pasavyāṃ camūṃ tasya sālvasya bharatarṣabha | cakāra nātiyatnena tadadbhutamivābhavat

हे भरतश्रेष्ठ, उसने बिना अधिक प्रयास के शाल्व की सेना को दाहिनी ओर रखते हुए उसका चक्कर लगा लिया; यह एक अद्भुत-सी बात थी।

श्लोक 12 (3.19.12)

अमृष्यमाणोऽपसव्यं साल्वः समितिदारुणः । यन्तारमस्य सहसा त्रिभिर्बाणैः समार्दयत् ॥

amṛṣyamāṇo'pasavyaṃ sālvaḥ samitidāruṇaḥ | yantāramasya sahasā tribhirbāṇaiḥ samārdayat

इस प्रकार अपनी परिक्रमा किया जाना सहन न कर पाने वाले, युद्ध में भयंकर शाल्व ने सहसा प्रद्युम्न के सारथि को तीन बाणों से पीड़ित किया।

श्लोक 13 (3.19.13)

दारुकस्य सुतस्तं तु बाणवेगमचिन्तयन् । भूय एव महाबाहो प्रययावपसव्यतः ॥

dārukasya sutastaṃ tu bāṇavegamacintayan | bhūya eva mahābāho prayayāvapasavyataḥ

हे महाबाहु, पर दारुक के पुत्र ने बाणों के वेग की कोई परवाह नहीं की और शत्रु को दाहिनी ओर रखते हुए फिर आगे बढ़ चला।

श्लोक 14 (3.19.14)

ततो बाणान्बहुविधान्पुनरेव स सौभराट् । मुमोच तनये वीर मम रुक्मिणिनन्दने ॥

tato bāṇānbahuvidhānpunareva sa saubharāṭ | mumoca tanaye vīra mama rukmiṇinandane

हे वीर, तब सौभ के स्वामी ने फिर से मेरे पुत्र, रुक्मिणीनन्दन पर अनेक प्रकार के बाण छोड़े।

श्लोक 15 (3.19.15)

तानप्राप्ताञ्शितैर्बाणैश्चिच्छेद परवीरहा । रौक्मिणेयः स्मितं कृत्वा दर्शयन्हस्तलाघवं ॥

tānaprāptāñśitairbāṇaiściccheda paravīrahā | raukmiṇeyaḥ smitaṃ kṛtvā darśayanhastalāghavaṃ

शत्रुवीरों का संहार करने वाले रुक्मिणीनन्दन ने मुस्कुराते हुए, अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए, उन बाणों को पास पहुँचने से पहले ही तीखे बाणों से काट डाला।

श्लोक 16 (3.19.16)

छिन्नान्दृष्ट्वा तु तान्बाणान्प्रद्युम्नेन च सौभराट् । आसुरीं दारुणीं मायामास्थाय व्यसृजच्छरान् ॥

chinnāndṛṣṭvā tu tānbāṇānpradyumnena ca saubharāṭ | āsurīṃ dāruṇīṃ māyāmāsthāya vyasṛjaccharān

प्रद्युम्न द्वारा उन बाणों को कटा देखकर सौभ के स्वामी ने भयंकर आसुरी माया का सहारा लिया और बाण छोड़े।

श्लोक 17 (3.19.17)

प्रयुज्यमानमाज्ञाय दैतेयास्त्रं महाबलम् । ब्रह्मास्त्रेणान्तरा च्छित्त्वा मुमोचान्यान्पतत्रिणः ॥

prayujyamānamājñāya daiteyāstraṃ mahābalam | brahmāstreṇāntarā cchittvā mumocānyānpatatriṇaḥ

दैत्यों के उस महाबली अस्त्र को चलाया जाता देखकर उन्होंने ब्रह्मास्त्र से उसे बीच में ही काट डाला और दूसरे पंखदार बाण छोड़े।

श्लोक 18 (3.19.18)

ते तदस्त्रं विधूयाशु विव्यधू रुधिराशनाः । शिरस्युरसि वक्त्रे च स मुमोह पपात च ॥

te tadastraṃ vidhūyāśu vivyadhū rudhirāśanāḥ | śirasyurasi vaktre ca sa mumoha papāta ca

रक्त पीने वाले उन बाणों ने उस अस्त्र को शीघ्र छिन्न-भिन्न कर दिया और शाल्व के सिर, छाती और मुख को बींध डाला; वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।

श्लोक 19 (3.19.19)

तस्मिन्निपतिते क्षुद्रे साल्वे बाणप्रपीडिते । रौक्मिणेयोऽपरं बाणं संदधे शत्रुतापनः ॥

tasminnipatite kṣudre sālve bāṇaprapīḍite | raukmiṇeyo'paraṃ bāṇaṃ saṃdadhe śatrutāpanaḥ

जब वह नीच शाल्व बाणों से पीड़ित होकर गिर पड़ा, तब शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले रुक्मिणीनन्दन ने एक और बाण चढ़ाया।

श्लोक 20 (3.19.20)

तमर्चितं सर्वदाशार्हपूगै- । राशीर्भिरर्कज्वलनप्रकाशम् । दृष्ट्वा शरं ज्यामभिनीयमानं । बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम् ॥

tamarcitaṃ sarvadāśārhapūgai- | rāśīrbhirarkajvalanaprakāśam | dṛṣṭvā śaraṃ jyāmabhinīyamānaṃ | babhūva hāhākṛtamantarikṣam

जब उन्होंने देखा कि दाशार्हों के सारे समूहों द्वारा आशीर्वादों से पूजित, सूर्य और अग्नि के समान दहकता वह बाण प्रत्यंचा पर खींचा जा रहा है, तो सारे अन्तरिक्ष में हाहाकार मच गया।

श्लोक 21 (3.19.21)

ततो देवगणाः सर्वे सेन्द्राः सहधनेश्वराः । नारदं प्रेषयामासुः श्वसनं च मनोजवम् ॥

tato devagaṇāḥ sarve sendrāḥ sahadhaneśvarāḥ | nāradaṃ preṣayāmāsuḥ śvasanaṃ ca manojavam

तब इन्द्र और धनपति कुबेर सहित सभी देवगणों ने नारद और मन के समान वेगवान वायुदेव को भेजा।

श्लोक 22 (3.19.22)

तौ रौक्मिणेयमागम्य वचोऽब्रूतां दिवौकसाम् । नैव वध्यस्त्वया वीर साल्वराजः कथंचन ॥

tau raukmiṇeyamāgamya vaco'brūtāṃ divaukasām | naiva vadhyastvayā vīra sālvarājaḥ kathaṃcana

उन दोनों ने रुक्मिणीनन्दन के पास आकर स्वर्गवासियों का सन्देश दिया— "हे वीर, राजा शाल्व का वध तुम्हें किसी भी प्रकार नहीं करना है।

नारदश्वसनावूचतुः

श्लोक 23 (3.19.23)

संहरस्व पुनर्बाणमवध्योऽयं त्वया रणे । एतस्य च शरस्याजौ नावध्योऽस्ति पुमान्क्वचित् ॥

saṃharasva punarbāṇamavadhyo'yaṃ tvayā raṇe | etasya ca śarasyājau nāvadhyo'sti pumānkvacit

बाण को फिर उतार लो; युद्ध में यह तुम्हारे हाथों मारा जाने वाला नहीं है। यद्यपि युद्ध में ऐसा कोई पुरुष कहीं नहीं जिसे यह बाण न मार सके।

श्लोक 24 (3.19.24)

मृत्युरस्य महाबाहो रणे देवकिनन्दनः । कृष्णः संकल्पितो धात्रा तन्मिथ्या न भवेदिति ॥

mṛtyurasya mahābāho raṇe devakinandanaḥ | kṛṣṇaḥ saṃkalpito dhātrā tanmithyā na bhavediti

हे महाबाहु, विधाता ने निश्चित कर दिया है कि युद्ध में इसकी मृत्यु देवकीनन्दन कृष्ण के हाथ से होगी, और वह मिथ्या नहीं हो सकता।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 25 (3.19.25)

ततः परमसंहृष्टः प्रद्युम्नः शरमुत्तमम् । संजहार धनुःश्रेष्ठात्तूणे चैव न्यवेशयत् ॥

tataḥ paramasaṃhṛṣṭaḥ pradyumnaḥ śaramuttamam | saṃjahāra dhanuḥśreṣṭhāttūṇe caiva nyaveśayat

तब अत्यन्त प्रसन्न होकर प्रद्युम्न ने वह उत्तम बाण अपने श्रेष्ठ धनुष से उतार लिया और तरकश में रख दिया।

श्लोक 26 (3.19.26)

तत उत्थाय राजेन्द्र साल्वः परमदुर्मनाः । व्यपायात्सबलस्तूर्णं प्रद्युम्नशरपीडितः ॥

tata utthāya rājendra sālvaḥ paramadurmanāḥ | vyapāyātsabalastūrṇaṃ pradyumnaśarapīḍitaḥ

हे राजेन्द्र, तब अत्यन्त खिन्न मन वाला शाल्व उठा और प्रद्युम्न के बाणों से पीड़ित होकर अपनी सेना सहित शीघ्र हट गया।

श्लोक 27 (3.19.27)

स द्वारकां परित्यज्य साल्वो वृष्णिभिरर्दितः । सौभमास्थाय राजेन्द्र दिवमाचक्रमे तदा ॥

sa dvārakāṃ parityajya sālvo vṛṣṇibhirarditaḥ | saubhamāsthāya rājendra divamācakrame tadā

हे राजेन्द्र, वृष्णियों से पीड़ित शाल्व द्वारका छोड़कर सौभ पर सवार हुआ और आकाश में चढ़ गया।

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