आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 20
समुद्र के ऊपर कृष्ण और शाल्व का युद्ध
कृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि राजसूय के बाद द्वारका लौटने पर उन्होंने नगरी को श्रीहीन पाया और कृतवर्मा से शाल्व के घेरे का समाचार सुना। आहुक, वसुदेव और वृष्णियों को आश्वासन देकर वे सेना के साथ निकले, शाल्व का पीछा करते हुए समुद्र तक पहुँचे और आकाश में ठहरे उसके नगर सौभ से युद्ध किया। कृष्ण के बाणों ने दानवों का संहार किया, पर शाल्व ने मायायुद्ध छेड़ दिया—अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा, अन्धकार, और अनेक मिथ्या सूर्य-चन्द्र। अन्त में कृष्ण ने प्रज्ञास्त्र से माया को छिन्न किया और फिर युद्ध करने लगे।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (3.20.1)
आनर्तनगरं मुक्तं ततोऽहमगमं तदा । महाक्रतौ राजसूये निवृत्ते नृपते तव ॥
ānartanagaraṃ muktaṃ tato'hamagamaṃ tadā | mahākratau rājasūye nivṛtte nṛpate tava
हे राजन्, जब आपका महायज्ञ राजसूय पूरा हो गया, तब मैं आनर्तों की उस नगरी में गया जो अभी-अभी घेरे से मुक्त हुई थी।
श्लोक 2 (3.20.2)
अपश्यं द्वारकां चाहं महाराज हतत्विषम् । निःस्वाध्यायवषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रियम् ॥
apaśyaṃ dvārakāṃ cāhaṃ mahārāja hatatviṣam | niḥsvādhyāyavaṣaṭkārāṃ nirbhūṣaṇavarastriyam
हे महाराज, मैंने द्वारका को श्रीहीन देखा; वहाँ न वेदपाठ था, न वषट्कार, और उसकी सुन्दर स्त्रियाँ आभूषणों से रहित थीं।
श्लोक 3 (3.20.3)
अनभिज्ञेयरूपाणि द्वारकोपवनानि च । दृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम् ॥
anabhijñeyarūpāṇi dvārakopavanāni ca | dṛṣṭvā śaṅkopapanno'hamapṛcchaṃ hṛdikātmajam
द्वारका के उपवनों को पहचान में न आने लायक देखकर मेरे मन में शंका उठी और मैंने हृदिक के पुत्र से पूछा—
श्लोक 4 (3.20.4)
अस्वस्थनरनारीकमिदं वृष्णिकुलं भृशम् । किमिदं नरशार्दूल श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
asvasthanaranārīkamidaṃ vṛṣṇikulaṃ bhṛśam | kimidaṃ naraśārdūla śrotumicchāmi tattvataḥ
'हे पुरुषसिंह, वृष्णिकुल के स्त्री-पुरुष अत्यन्त अस्वस्थ दिख रहे हैं। यह क्या बात है? मैं इसका सच जानना चाहता हूँ।'
श्लोक 5 (3.20.5)
एवमुक्तः स तु मया विस्तरेणेदमब्रवीत् । रोधं मोक्षं च साल्वेन हार्दिक्यो राजसत्तम ॥
evamuktaḥ sa tu mayā vistareṇedamabravīt | rodhaṃ mokṣaṃ ca sālvena hārdikyo rājasattama
हे राजश्रेष्ठ, मेरे ऐसा पूछने पर हार्दिक्य ने विस्तार से शाल्व द्वारा किए गए घेरे और उससे मुक्ति का सारा हाल सुनाया।
श्लोक 6 (3.20.6)
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ श्रुत्वा सर्वमशेषतः । विनाशे साल्वराजस्य तदैवाकरवं मतिम् ॥
tato'haṃ bharataśreṣṭha śrutvā sarvamaśeṣataḥ | vināśe sālvarājasya tadaivākaravaṃ matim
हे भरतश्रेष्ठ, सब कुछ पूरा सुनकर मैंने उसी समय शाल्वराज का विनाश करने का निश्चय कर लिया।
श्लोक 7 (3.20.7)
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ समाश्वास्य पुरे जनम् । राजानमाहुकं चैव तथैवानकदुन्दुभिम् ॥
tato'haṃ bharataśreṣṭha samāśvāsya pure janam | rājānamāhukaṃ caiva tathaivānakadundubhim
हे भरतश्रेष्ठ, तब मैंने नगर के लोगों को, राजा आहुक को और वैसे ही आनकदुन्दुभि (वसुदेव) को धीरज बँधाया,
श्लोक 8 (3.20.8)
सर्वान्वृष्णिप्रवीरांश्च हर्षयन्नब्रुवं तदा । अप्रमादः सदा कार्यो नगरे यादवर्षभाः ॥
sarvānvṛṣṇipravīrāṃśca harṣayannabruvaṃ tadā | apramādaḥ sadā kāryo nagare yādavarṣabhāḥ
और सब वृष्णि-वीरों का उत्साह बढ़ाते हुए तब कहा— 'हे यादवश्रेष्ठो, नगर में सदा सावधान रहना।
श्लोक 9 (3.20.9)
साल्वराजविनाशाय प्रयातं मां निबोधत । नाहत्वा तं निवर्तिष्ये पुरीं द्वारवतीं प्रति ॥
sālvarājavināśāya prayātaṃ māṃ nibodhata | nāhatvā taṃ nivartiṣye purīṃ dvāravatīṃ prati
जान लो कि मैं शाल्वराज का विनाश करने निकला हूँ। उसे मारे बिना मैं द्वारवती नगरी नहीं लौटूँगा।
श्लोक 10 (3.20.10)
ससाल्वं सौभनगरं हत्वा द्रष्टास्मि वः पुनः । त्रिःसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीषणा ॥
sasālvaṃ saubhanagaraṃ hatvā draṣṭāsmi vaḥ punaḥ | triḥsāmā hanyatāmeṣā dundubhiḥ śatrubhīṣaṇā
शाल्व सहित सौभ नगर को नष्ट करके ही मैं तुमसे फिर मिलूँगा। शत्रुओं को भयभीत करने वाली यह दुन्दुभि तीन स्वरों में बजाई जाए।'
श्लोक 11 (3.20.11)
ते मयाऽऽश्वासिता वीरा यथावद्भरतर्षभ । सर्वे मामब्रुवन्हृष्टाः प्रयाहि जहि शात्रवान् ॥
te mayā''śvāsitā vīrā yathāvadbharatarṣabha | sarve māmabruvanhṛṣṭāḥ prayāhi jahi śātravān
हे भरतर्षभ, मेरे द्वारा भली-भाँति आश्वस्त किए गए उन सब वीरों ने प्रसन्न होकर मुझसे कहा, 'जाइए, शत्रुओं का संहार कीजिए!'
श्लोक 12 (3.20.12)
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितः । वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान्प्रणम्य शिरसा भवम् ॥
taiḥ prahṛṣṭātmabhirvīrairāśīrbhirabhinanditaḥ | vācayitvā dvijaśreṣṭhānpraṇamya śirasā bhavam
उन प्रसन्नचित्त वीरों के आशीर्वादों से अभिनन्दित होकर मैंने श्रेष्ठ ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया और भव (शिव) को सिर झुकाकर प्रणाम किया,
श्लोक 13 (3.20.13)
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनानादयन्दिशः । प्रध्माय शङ्खप्रवरं पाञ्चजन्यमहं नृप ॥
śaibyasugrīvayuktena rathenānādayandiśaḥ | pradhmāya śaṅkhapravaraṃ pāñcajanyamahaṃ nṛpa
और हे राजन्, शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से जुते रथ से दिशाओं को गुँजाते हुए, शंखों में श्रेष्ठ पाञ्चजन्य को बजाकर,
श्लोक 14 (3.20.14)
प्रयातोऽस्मि नरव्याघ्र बलेन महता वृतः । क्लृप्तेन चतुरङ्गेण यत्तेन जितकाशिना ॥
prayāto'smi naravyāghra balena mahatā vṛtaḥ | klṛptena caturaṅgeṇa yattena jitakāśinā
हे पुरुषसिंह, मैं एक विशाल, सुव्यवस्थित, सजग और विजय के तेज से दीप्त चतुरंगिणी सेना से घिरा हुआ चल पड़ा।
श्लोक 15 (3.20.15)
समतीत्य बहून्देशान्गिरींश्च बहुपादपान् । सरांसि सरितश्चैव मार्तिकावतमासदम् ॥
samatītya bahūndeśāngirīṃśca bahupādapān | sarāṃsi saritaścaiva mārtikāvatamāsadam
अनेक देशों, घने वृक्षों वाले पर्वतों, सरोवरों और नदियों को पार करके मैं मार्तिकावत देश पहुँचा।
श्लोक 16 (3.20.16)
तत्राश्रौषं नरव्याघ्र साल्वं सागरमन्तिकात् । प्रयान्तं सौभमास्थाय तमहं पृष्ठतोऽन्वगाम् ॥
tatrāśrauṣaṃ naravyāghra sālvaṃ sāgaramantikāt | prayāntaṃ saubhamāsthāya tamahaṃ pṛṣṭhato'nvagām
हे पुरुषसिंह, वहाँ मैंने सुना कि शाल्व सौभ पर सवार होकर समुद्र के निकट जा रहा है, और मैं उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
श्लोक 17 (3.20.17)
दृष्टवानस्मि राजेन्द्र साल्वराजमथान्तिके । ततः सागरमासाद्य कुक्षौ तस्य महोर्मिणः । समुद्रनाभ्यां साल्वोऽभूत्सौभमास्थाय शत्रुहन् ॥
dṛṣṭavānasmi rājendra sālvarājamathāntike | tataḥ sāgaramāsādya kukṣau tasya mahormiṇaḥ | samudranābhyāṃ sālvo'bhūtsaubhamāsthāya śatruhan
हे राजेन्द्र, तब मैंने शाल्वराज को निकट ही देखा। हे शत्रुसूदन, समुद्र तक पहुँचकर शाल्व सौभ पर सवार हो ऊँची लहरों वाले उस सागर के गर्भ में, समुद्र की नाभि के ऊपर ठहर गया।
श्लोक 18 (3.20.18)
स मामालोक्य सहसा सेनां स्वां प्राहिणोन्मृधे । मद्बाहुना च सेनायां शिष्टायां किंचिदेव च ॥
sa māmālokya sahasā senāṃ svāṃ prāhiṇonmṛdhe | madbāhunā ca senāyāṃ śiṣṭāyāṃ kiṃcideva ca
मुझे देखते ही उसने सहसा अपनी सेना युद्ध में भेज दी; और जब मेरी भुजाओं के बल से उस सेना का थोड़ा-सा ही भाग बचा,
श्लोक 19 (3.20.19)
स समालोक्य सहसा स्मयन्निव युधिष्ठिर । आह्वयामास दुष्टात्मा युद्धायैव मुहुर्मुहुः ॥
sa samālokya sahasā smayanniva yudhiṣṭhira | āhvayāmāsa duṣṭātmā yuddhāyaiva muhurmuhuḥ
तब हे युधिष्ठिर, उस दुष्टात्मा ने सहसा मेरी ओर देखा और मानो मुस्कुराते हुए मुझे बार-बार युद्ध के लिए ललकारा।
श्लोक 20 (3.20.20)
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्बहुभिर्मर्मभेदिभिः । पुरं नासाद्यत शरैस्ततो मां रोष आविशत् ॥
tasya śārṅgavinirmuktairbahubhirmarmabhedibhiḥ | puraṃ nāsādyata śaraistato māṃ roṣa āviśat
मेरे शार्ङ्ग धनुष से छूटे मर्मभेदी अनेक बाण उसके नगर तक नहीं पहुँचे; तब मुझ पर क्रोध छा गया।
श्लोक 21 (3.20.21)
स चापि पापप्रकृतिर्दैतेयापशदो नृप । मय्यवर्षत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः ॥
sa cāpi pāpaprakṛtirdaiteyāpaśado nṛpa | mayyavarṣata durdharṣaḥ śaradhārāḥ sahasraśaḥ
हे राजन्, और उस पापी स्वभाव वाले, दुर्जेय, दैत्यों में अधम ने मुझ पर सहस्रों बाण-धाराएँ बरसाईं।
श्लोक 22 (3.20.22)
सैनिकान्मम सूतं च हयांश्च स समाकिरत् । अचिन्तयन्तस्तु शरान्वयं युध्याम भारत ॥
sainikānmama sūtaṃ ca hayāṃśca sa samākirat | acintayantastu śarānvayaṃ yudhyāma bhārata
उसने मेरे सैनिकों, सारथि और घोड़ों को बाणों से ढक दिया; पर हे भारत, हम बाणों की परवाह किए बिना लड़ते रहे।
श्लोक 23 (3.20.23)
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् । चिक्षिपुः समरे वीरा मयि साल्वपदानुगाः ॥
tataḥ śatasahasrāṇi śarāṇāṃ nataparvaṇām | cikṣipuḥ samare vīrā mayi sālvapadānugāḥ
तब शाल्व के अनुयायी वीरों ने युद्ध में मुझ पर झुकी गाँठों वाले लाखों बाण फेंके।
श्लोक 24 (3.20.24)
ते हयांश्च रथं चैव ध्वजं दारुकमेव च । छादयामासुरसुरास्तैर्बाणैर्मर्मभेदिभिः ॥
te hayāṃśca rathaṃ caiva dhvajaṃ dārukameva ca | chādayāmāsurasurāstairbāṇairmarmabhedibhiḥ
असुरों ने उन मर्मभेदी बाणों से मेरे घोड़ों, रथ, ध्वजा और दारुक को ढक दिया।
श्लोक 25 (3.20.25)
न हया न रथो वीर न ध्वजो न च दारुकः । अदृश्यन्त शरैश्छन्नास्तथाऽहं सैनिकाश्च मे ॥
na hayā na ratho vīra na dhvajo na ca dārukaḥ | adṛśyanta śaraiśchannāstathā'haṃ sainikāśca me
हे वीर, बाणों से ढके होने के कारण न घोड़े दिखाई देते थे, न रथ, न ध्वजा, न दारुक; और न मैं तथा मेरे सैनिक।
श्लोक 26 (3.20.26)
ततोऽहमपि कौन्तेय शराणामयुतान्बहून् । आमन्त्रितानां धनुषा दिव्येन विधिनाऽक्षिपम् ॥
tato'hamapi kaunteya śarāṇāmayutānbahūn | āmantritānāṃ dhanuṣā divyena vidhinā'kṣipam
हे कुन्तीपुत्र, तब मैंने भी दिव्य विधि से अपने धनुष द्वारा मन्त्रों से अभिमन्त्रित दसियों हज़ार बाण छोड़े।
श्लोक 27 (3.20.27)
न तत्र विषयस्त्वासीन्मम सैन्यस्य भारत । खे विषक्तं हि तत्सौभं क्रोशमात्र इवाभवत् ॥
na tatra viṣayastvāsīnmama sainyasya bhārata | khe viṣaktaṃ hi tatsaubhaṃ krośamātra ivābhavat
हे भारत, पर वहाँ मेरे सैनिकों के लिए कोई लक्ष्य नहीं था, क्योंकि वह सौभ आकाश में टँगा था, मानो एक कोस दूर हो।
श्लोक 28 (3.20.28)
ततस्ते प्रेक्षकाः सर्वे देवा वै दिवमास्थिताः । हर्षयामासुरुच्चैर्मां सिंहनादतलस्वनैः ॥
tataste prekṣakāḥ sarve devā vai divamāsthitāḥ | harṣayāmāsuruccairmāṃ siṃhanādatalasvanaiḥ
तब स्वर्ग में स्थित होकर देखने वाले सब देवता सिंहनाद और तालियों से ऊँचे स्वर में मेरा उत्साह बढ़ाने लगे।
श्लोक 29 (3.20.29)
मत्कार्मुकविनिर्मुक्ता दानवानां महारणे । अङ्गेषु रुधिराक्तास्ते विविशुः शलभा इव ॥
matkārmukavinirmuktā dānavānāṃ mahāraṇe | aṅgeṣu rudhirāktāste viviśuḥ śalabhā iva
उस महायुद्ध में मेरे धनुष से छूटे बाण रक्त से सने हुए पतंगों की तरह दानवों के अंगों में घुस गए।
श्लोक 30 (3.20.30)
ततो हलहलाशब्दः सौभमध्ये व्यवर्धत । वध्यतां विशिखैस्तीक्ष्णैः पततां च महार्णवे ॥
tato halahalāśabdaḥ saubhamadhye vyavardhata | vadhyatāṃ viśikhaistīkṣṇaiḥ patatāṃ ca mahārṇave
तब तीखे बाणों से मारे जा रहे और महासागर में गिर रहे दानवों का कोलाहल सौभ के भीतर बढ़ता गया।
श्लोक 31 (3.20.31)
ते निकृत्तभुजस्कन्धाः कबन्धाकृतिदर्शनाः । नदन्तो भैरवान्नादान्निपतन्ति स्म दानवाः । पतितास्तेऽपि भक्ष्यन्ते समुद्रांभोनिवासिभिः ॥
te nikṛttabhujaskandhāḥ kabandhākṛtidarśanāḥ | nadanto bhairavānnādānnipatanti sma dānavāḥ | patitāste'pi bhakṣyante samudrāṃbhonivāsibhiḥ
भुजाएँ और कन्धे कट जाने से धड़ मात्र दिखने वाले वे दानव भयानक गर्जना करते हुए गिरने लगे; और गिरते ही समुद्र के जलचर उन्हें खा जाते थे।
श्लोक 32 (3.20.32)
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभम् । जलजं पाञ्चजन्यं वै प्राणेनाहमपूरयम् ॥
tato gokṣīrakundendumṛṇālarajataprabham | jalajaṃ pāñcajanyaṃ vai prāṇenāhamapūrayam
तब मैंने गाय के दूध, कुन्द के फूल, चन्द्रमा, कमलनाल और चाँदी के समान उजले, जल से उत्पन्न पाञ्चजन्य शंख को अपनी साँस से भरकर बजाया।
श्लोक 33 (3.20.33)
तान्दृष्ट्वा पतितांस्तत्र साल्वः सौभपतिस्ततः । मायायुद्धेन महता योधयामास मां युधि ॥
tāndṛṣṭvā patitāṃstatra sālvaḥ saubhapatistataḥ | māyāyuddhena mahatā yodhayāmāsa māṃ yudhi
उन्हें वहाँ गिरा देखकर सौभ के स्वामी शाल्व ने तब महान मायायुद्ध से मुझसे लड़ना आरम्भ किया।
श्लोक 34 (3.20.34)
ततो गदा हलाः प्रासाः शूलशक्तिपरश्वधाः । असयः शक्तिकुलिशपाशर्ष्टिकनपाः शराः । पट्टसाश्च भुशुण्ड्यश्च प्रपतन्त्यनिशं मयि ॥
tato gadā halāḥ prāsāḥ śūlaśaktiparaśvadhāḥ | asayaḥ śaktikuliśapāśarṣṭikanapāḥ śarāḥ | paṭṭasāśca bhuśuṇḍyaśca prapatantyaniśaṃ mayi
तब मुझ पर लगातार गदाएँ, हल, प्रास, शूल, शक्तियाँ और फरसे; तलवारें, शक्तियाँ, वज्र, पाश, ऋष्टियाँ, कणप और बाण; तथा पट्टिश और भुशुण्डियाँ बरसने लगीं।
श्लोक 35 (3.20.35)
तामहं माययैवाशु प्रतिगृह्य व्यनाशयम् । तस्यां हतायां मायायां गिरिशृङ्गैरयोधयत् ॥
tāmahaṃ māyayaivāśu pratigṛhya vyanāśayam | tasyāṃ hatāyāṃ māyāyāṃ giriśṛṅgairayodhayat
मैंने उस माया को शीघ्र अपनी माया से पकड़कर नष्ट कर दिया। उस माया के नष्ट होने पर वह पर्वत-शिखरों से लड़ने लगा।
श्लोक 36 (3.20.36)
ततोऽभवत्तम इव प्रकाश इव चाभवत् । दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतमुष्णं च भारत ॥
tato'bhavattama iva prakāśa iva cābhavat | durdinaṃ sudinaṃ caiva śītamuṣṇaṃ ca bhārata
हे भारत, फिर कभी अन्धकार-सा छा जाता, कभी प्रकाश-सा हो जाता; कभी दुर्दिन, कभी सुदिन, कभी ठंड, कभी गर्मी।
श्लोक 37 (3.20.37)
अङ्गारपांसुवर्षं च शस्त्रवर्षं च भारत । एवं मायां प्रकुर्वाणो योधयामास मां रिपुः ॥
aṅgārapāṃsuvarṣaṃ ca śastravarṣaṃ ca bhārata | evaṃ māyāṃ prakurvāṇo yodhayāmāsa māṃ ripuḥ
हे भारत, अंगारों और धूल की वर्षा होती, शस्त्रों की वर्षा होती। इस प्रकार माया रचते हुए वह शत्रु मुझसे लड़ता रहा।
श्लोक 38 (3.20.38)
विज्ञाय तदहं सर्वं माययैव व्यनाशयम् । यथाकालं तु युद्धेन व्यधमं सर्वतः शरैः ॥
vijñāya tadahaṃ sarvaṃ māyayaiva vyanāśayam | yathākālaṃ tu yuddhena vyadhamaṃ sarvataḥ śaraiḥ
यह सब पहचानकर मैंने माया से ही उसे नष्ट कर दिया, और युद्ध में उचित समय पर चारों ओर से बाणों द्वारा उसे ध्वस्त किया।
श्लोक 39 (3.20.39)
ततो हतायां च मया मायायां युधि दानवः । मायामन्यां महाराज चकार मतिमोहिनीम् ॥
tato hatāyāṃ ca mayā māyāyāṃ yudhi dānavaḥ | māyāmanyāṃ mahārāja cakāra matimohinīm
हे महाराज, तब युद्ध में मेरे द्वारा उस माया के नष्ट होने पर दानव ने बुद्धि को मोहित करने वाली दूसरी माया रची।
श्लोक 40 (3.20.40)
ततो व्योम महाराज शतसूर्यमिवाभवत् । शतचन्द्रं च कौन्तेय सहस्रायुततारकम् ॥
tato vyoma mahārāja śatasūryamivābhavat | śatacandraṃ ca kaunteya sahasrāyutatārakam
हे महाराज, हे कुन्तीपुत्र, तब आकाश में मानो सौ सूर्य, सौ चन्द्रमा और करोड़ों तारे दिखाई देने लगे।
श्लोक 41 (3.20.41)
ततो नाज्ञायत तदा दिवारात्रं तथा दिशः । ततोऽहं मोहमापन्नः प्रज्ञास्त्रं समयोजयम् ॥
tato nājñāyata tadā divārātraṃ tathā diśaḥ | tato'haṃ mohamāpannaḥ prajñāstraṃ samayojayam
तब न दिन-रात का पता चलता था, न दिशाओं का। मोह में पड़कर तब मैंने प्रज्ञास्त्र का प्रयोग किया।
श्लोक 42 (3.20.42)
तदस्त्रमस्तमस्त्रेण विधूतं शरतूलवत् । तथा तदभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । लब्धालोकस्तु राजेन्द्र पुनः शत्रुमयोधयम् ॥
tadastramastamastreṇa vidhūtaṃ śaratūlavat | tathā tadabhavadyuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | labdhālokastu rājendra punaḥ śatrumayodhayam
उस अस्त्र ने उसकी माया को दूर फेंककर सरकण्डे की रुई की तरह उड़ा दिया। इस प्रकार वह युद्ध भीषण और रोंगटे खड़े कर देने वाला हो गया; हे राजेन्द्र, फिर से प्रकाश पाकर मैं शत्रु से लड़ने लगा।