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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 21

शाल्व की माया: वसुदेव का गिरना

कृष्ण शाल्व से युद्ध का वृत्तान्त आगे सुनाते हैं। शाल्व आकाश में उठकर हर प्रकार के अस्त्र फेंकता है; दारुक घावों से भर जाता है और मुश्किल से खड़ा रह पाता है। द्वारका से एक दूत राजा आहुक का सन्देश लाता है कि शाल्व ने नगर पर आक्रमण करके कृष्ण के पिता वसुदेव को मार डाला है। बलराम और अन्य वृष्णियों की चिन्ता में डूबे कृष्ण अपने पिता को सौभ से गिरते देखते हैं और स्वयं रथ में मूर्छित हो जाते हैं। होश आने पर न सौभ दिखता है, न शाल्व, न पिता; तब वे समझ जाते हैं कि यह सब माया थी।

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

वासुदेव उवाच

श्लोक 1 (3.21.1)

एवं स पुरुषव्याघ्रः साल्वो राज्ञां महारिपुः । युध्यमानो मया सङ्ख्ये वियदभ्यगमत्पुनः ॥

evaṃ sa puruṣavyāghraḥ sālvo rājñāṃ mahāripuḥ | yudhyamāno mayā saṅkhye viyadabhyagamatpunaḥ

इस प्रकार राजाओं का महाशत्रु, वह पुरुषसिंह शाल्व, युद्ध में मुझसे लड़ता हुआ फिर आकाश में चढ़ गया।

श्लोक 2 (3.21.2)

ततः शतघ्नीश्च महागदाश्च । दीप्ताश्च शूलान्मुसलानसींश्च । चिक्षेप रोषान्मयि मन्दबुद्धिः । साल्वो महाराज जयाभिकाङ्क्षी ॥

tataḥ śataghnīśca mahāgadāśca | dīptāśca śūlānmusalānasīṃśca | cikṣepa roṣānmayi mandabuddhiḥ | sālvo mahārāja jayābhikāṅkṣī

हे महाराज, तब विजय के इच्छुक उस मन्दबुद्धि शाल्व ने क्रोध में भरकर मुझ पर शतघ्नियाँ, बड़ी-बड़ी दहकती गदाएँ, शूल, मूसल और तलवारें फेंकीं।

श्लोक 3 (3.21.3)

तानाशुगैरापततोऽहमाशु । निवार्य तूर्णं खगमान्ख एव । द्विधा त्रिधा चाच्छिनमाशु मुक्तै- । स्ततोऽन्तरिक्षे निनदो बभूव ॥

tānāśugairāpatato'hamāśu | nivārya tūrṇaṃ khagamānkha eva | dvidhā tridhā cācchinamāśu muktai- | stato'ntarikṣe ninado babhūva

जैसे ही वे मुझ पर गिरने लगे, मैंने अपने तेज़ बाणों से उन्हें आकाश में ही शीघ्र रोक दिया और फुर्ती से छोड़े बाणों से उनके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर डाले; तब अन्तरिक्ष में भारी कोलाहल हुआ।

श्लोक 4 (3.21.4)

ततः शतसहस्रेण शराणां नतपर्वणाम् । दारुकं वाजिनश्चैव रथं च समवाकिरत् ॥

tataḥ śatasahasreṇa śarāṇāṃ nataparvaṇām | dārukaṃ vājinaścaiva rathaṃ ca samavākirat

तब उसने दारुक, घोड़ों और रथ को झुकी गाँठों वाले लाख बाणों से ढक दिया।

श्लोक 5 (3.21.5)

ततो मामब्रवीद्वीर दारुको विह्वलन्निव । स्थातव्यमिति तिष्ठामि साल्वबाणप्रपीडितः । अवस्थातुं न शक्नोमि अङ्गं मे व्यवसीदति ॥

tato māmabravīdvīra dāruko vihvalanniva | sthātavyamiti tiṣṭhāmi sālvabāṇaprapīḍitaḥ | avasthātuṃ na śaknomi aṅgaṃ me vyavasīdati

हे वीर, तब दारुक ने लड़खड़ाते हुए-से मुझसे कहा, 'डटे रहना है, इसलिए शाल्व के बाणों से पीड़ित होकर भी मैं खड़ा हूँ; पर अब और नहीं टिक पा रहा, मेरा शरीर शिथिल हो रहा है।'

श्लोक 6 (3.21.6)

इति तस्य निशम्याहं सारथेः करुणं वचः । अवेक्षमाणो यन्तारमपश्यं शरपीडितम् ॥

iti tasya niśamyāhaṃ sāratheḥ karuṇaṃ vacaḥ | avekṣamāṇo yantāramapaśyaṃ śarapīḍitam

अपने सारथि के ये करुण वचन सुनकर मैंने उसकी ओर देखा और पाया कि वह बाणों से पीड़ित था।

श्लोक 7 (3.21.7)

न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काये न भुजद्वये । अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्याम्यनिचितं शरैः ॥

na tasyorasi no mūrdhni na kāye na bhujadvaye | antaraṃ pāṇḍavaśreṣṭha paśyāmyanicitaṃ śaraiḥ

हे पाण्डवश्रेष्ठ, उसकी छाती, सिर, शरीर और दोनों भुजाओं पर मुझे कोई ऐसा स्थान नहीं दिखा जो बाणों से भरा न हो।

श्लोक 8 (3.21.8)

स तु बाणवरोत्पीडाद्विस्रवत्यसृगुल्बणम् । अभिवृष्टो यथा मेघैर्गिरिर्गैरिकधातुमान् ॥

sa tu bāṇavarotpīḍādvisravatyasṛgulbaṇam | abhivṛṣṭo yathā meghairgirirgairikadhātumān

उत्तम बाणों के घावों से गाढ़ा रक्त बह रहा था, जैसे बादलों की वर्षा में गेरू-धातु वाले पर्वत से लाल धारें बहती हैं।

श्लोक 9 (3.21.9)

अभीशुहस्तं तं दृष्ट्वा सीदन्तं सारथिं रणे । अस्तम्भयं महाबाहो साल्वबाणप्रपीडितम् ॥

abhīśuhastaṃ taṃ dṛṣṭvā sīdantaṃ sārathiṃ raṇe | astambhayaṃ mahābāho sālvabāṇaprapīḍitam

हे महाबाहु, लगाम हाथ में लिए, शाल्व के बाणों से पीड़ित होकर युद्ध में शिथिल होते सारथि को देखकर मैंने उसे सँभाला और धीरज दिया।

श्लोक 10 (3.21.10)

अथ मां पुरुषः कश्चिद्द्वारकानिलयोऽब्रवीत् । त्वरितो रथमारोप्य सौहृदादिव भारत ॥

atha māṃ puruṣaḥ kaściddvārakānilayo'bravīt | tvarito rathamāropya sauhṛdādiva bhārata

हे भारत, तब द्वारका में रहने वाला एक पुरुष शीघ्रता से रथ पर आया और मानो मित्रभाव से मुझसे बोला।

श्लोक 11 (3.21.11)

आहुकस्य वचो वीर तस्यैव परिचारकः । विषण्णः सन्नकण्ठेन तन्निबोध युधिष्ठिर ॥

āhukasya vaco vīra tasyaiva paricārakaḥ | viṣaṇṇaḥ sannakaṇṭhena tannibodha yudhiṣṭhira

हे वीर, वह आहुक का ही सेवक था और आहुक का सन्देश लाया था; उदास होकर, रुँधे गले से वह बोला। हे युधिष्ठिर, उसे सुनिए।

परिचारक उवाच

श्लोक 12 (3.21.12)

द्वारकाधिपतिर्वीर आह त्वामाहुको वचः । केशवैहि विजानीष्व यत्त्वां पितृसखोऽब्रवीत् ॥

dvārakādhipatirvīra āha tvāmāhuko vacaḥ | keśavaihi vijānīṣva yattvāṃ pitṛsakho'bravīt

"हे वीर, द्वारका के अधिपति आहुक ने आपके लिए सन्देश भेजा है। हे केशव, आइए, और जानिए कि आपके पिता के मित्र ने आपसे क्या कहा है—

श्लोक 13 (3.21.13)

उपयात्वा तु साल्वेन द्वारकां वृष्णिनन्दन । विषक्ते त्वयि दुर्धर्ष हतः शूरसुतो बलात् ॥

upayātvā tu sālvena dvārakāṃ vṛṣṇinandana | viṣakte tvayi durdharṣa hataḥ śūrasuto balāt

'हे वृष्णिनन्दन, हे दुर्धर्ष, जब आप दूसरी ओर उलझे हुए थे, तब शाल्व ने द्वारका पर चढ़ाई करके शूरपुत्र (वसुदेव) को बलपूर्वक मार डाला।

श्लोक 14 (3.21.14)

तदलं साधुयुद्धेन निवर्तस्व जनार्दन । द्वारकामेव रक्षस्व कार्यमेतन्महत्तव ॥

tadalaṃ sādhuyuddhena nivartasva janārdana | dvārakāmeva rakṣasva kāryametanmahattava

इसलिए अब युद्ध रहने दीजिए, हे जनार्दन, लौट आइए। द्वारका की ही रक्षा कीजिए; यही आपका महान कर्तव्य है।'"

वासुदेव उवाच

श्लोक 15 (3.21.15)

इत्यहं तस्य वचनं श्रुत्वा परमदुर्मनाः । निश्चयं नाधिगच्छामि कर्तव्यस्येतरस्य च ॥

ityahaṃ tasya vacanaṃ śrutvā paramadurmanāḥ | niścayaṃ nādhigacchāmi kartavyasyetarasya ca

उसकी बात सुनकर मैं अत्यन्त खिन्न हो गया और तय नहीं कर पाया कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

श्लोक 16 (3.21.16)

सात्यकिं बलदेवं च प्रद्युम्नं च महारथम् । जगर्हे मनसा वीर तच्छ्रुत्वा महदप्रियम् ॥

sātyakiṃ baladevaṃ ca pradyumnaṃ ca mahāratham | jagarhe manasā vīra tacchrutvā mahadapriyam

हे वीर, वह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर मैंने मन ही मन सात्यकि, बलदेव और महारथी प्रद्युम्न को दोष दिया।

श्लोक 17 (3.21.17)

अहं हि द्वारकायाश्च पितुश्च कुरुनन्दन । तेषु रक्षां समाधाय प्रयातः सौभयातने ॥

ahaṃ hi dvārakāyāśca pituśca kurunandana | teṣu rakṣāṃ samādhāya prayātaḥ saubhayātane

क्योंकि हे कुरुनन्दन, सौभ का नाश करने निकलते समय मैंने द्वारका और अपने पिता की रक्षा का भार उन्हीं पर छोड़ा था।

श्लोक 18 (3.21.18)

बलदेवो महाबाहुः कच्चिज्जीवति शत्रुहा । सात्यकी रौक्मिणेयश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् । साम्बप्रभृतयश्चैवेत्यहमासं सुदुर्मनाः ॥

baladevo mahābāhuḥ kaccijjīvati śatruhā | sātyakī raukmiṇeyaśca cārudeṣṇaśca vīryavān | sāmbaprabhṛtayaścaivetyahamāsaṃ sudurmanāḥ

'क्या शत्रुओं का संहार करने वाले महाबाहु बलदेव जीवित हैं? और सात्यकि, रुक्मिणीनन्दन, पराक्रमी चारुदेष्ण, साम्ब तथा अन्य?' इस प्रकार सोचते हुए मैं अत्यन्त व्याकुल हो गया।

श्लोक 19 (3.21.19)

एतेषु हि नरव्याघ्र जीवत्सु न कथंचन । शक्यः शूरसुतो हन्तुमपि वज्रभृता स्वयम् ॥

eteṣu hi naravyāghra jīvatsu na kathaṃcana | śakyaḥ śūrasuto hantumapi vajrabhṛtā svayam

क्योंकि हे पुरुषसिंह, उनके जीते-जी शूरपुत्र को किसी भी प्रकार मारा नहीं जा सकता था, स्वयं वज्रधारी इन्द्र भी नहीं मार सकते थे।

श्लोक 20 (3.21.20)

हतः शूरसुतो व्यक्तं व्यक्तं चैते परासवः । बलदेवमुखाः सर्व इति मे निश्चिता मतिः ॥

hataḥ śūrasuto vyaktaṃ vyaktaṃ caite parāsavaḥ | baladevamukhāḥ sarva iti me niścitā matiḥ

'स्पष्ट है कि शूरपुत्र मारे गए हैं, और स्पष्ट है कि बलदेव आदि सब भी प्राण त्याग चुके हैं'—मेरे मन ने यही निश्चय किया।

श्लोक 21 (3.21.21)

सोऽहं सर्वविनाशं तं चिन्तयानो मुहुर्मुहुः । अविह्वलो महाराज पुनः साल्वमयोधयम् ॥

so'haṃ sarvavināśaṃ taṃ cintayāno muhurmuhuḥ | avihvalo mahārāja punaḥ sālvamayodhayam

हे महाराज, उस सर्वनाश के बारे में बार-बार सोचते हुए भी मैं अविचलित रहकर फिर शाल्व से लड़ने लगा।

श्लोक 22 (3.21.22)

ततोऽपश्यं महाराज प्रपतन्तमहं तदा । सौभाच्छूरसुतं वीर ततो मां मोह आविशत् ॥

tato'paśyaṃ mahārāja prapatantamahaṃ tadā | saubhācchūrasutaṃ vīra tato māṃ moha āviśat

हे महाराज, हे वीर, तब मैंने शूरपुत्र को सौभ से गिरते देखा, और उसी समय मुझ पर मूर्छा छा गई।

श्लोक 23 (3.21.23)

तस्य रूपं प्रपततः पितुर्मम नराधिप । ययातेः क्षीणपुण्यस्य स्वर्गादिव महीतलम् ॥

tasya rūpaṃ prapatataḥ piturmama narādhipa | yayāteḥ kṣīṇapuṇyasya svargādiva mahītalam

हे नराधिप, गिरते हुए मेरे पिता का रूप वैसा ही था जैसे पुण्य क्षीण होने पर ययाति स्वर्ग से धरती पर गिरे थे।

श्लोक 24 (3.21.24)

विशीर्णमलिनोष्णीषप्रकीर्णाम्बरमूर्धजः । प्रपतन्दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥

viśīrṇamalinoṣṇīṣaprakīrṇāmbaramūrdhajaḥ | prapatandṛśyate ha sma kṣīṇapuṇya iva grahaḥ

उनकी पगड़ी फटी और मैली थी, वस्त्र और केश बिखरे हुए थे; वे पुण्य क्षीण हुए ग्रह की भाँति गिरते दिखाई दिए।

श्लोक 25 (3.21.25)

ततः शार्ङ्गं धनुःश्रेष्ठं करात्प्रपतितं मम । मोहापन्नश्च कौन्तेय रथोपस्थ उपाविशम् ॥

tataḥ śārṅgaṃ dhanuḥśreṣṭhaṃ karātprapatitaṃ mama | mohāpannaśca kaunteya rathopastha upāviśam

हे कुन्तीपुत्र, तब धनुषों में श्रेष्ठ शार्ङ्ग मेरे हाथ से छूट गया और मूर्छित होकर मैं रथ के भीतर बैठ गया।

श्लोक 26 (3.21.26)

ततो हाहाकृतं सर्वं सैन्यं मे गतचेतनम् । मां दृष्ट्वा रथनीडस्थं गतासुमिव भारत ॥

tato hāhākṛtaṃ sarvaṃ sainyaṃ me gatacetanam | māṃ dṛṣṭvā rathanīḍasthaṃ gatāsumiva bhārata

हे भारत, तब मुझे रथ के आसन पर प्राणहीन-सा बैठा देखकर मेरी सारी सेना चेतनाहीन होकर हाहाकार करने लगी।

श्लोक 27 (3.21.27)

प्रसार्य बाहू पततः प्रसार्य चरणावपि । रूपं पितुर्मे विबभौ शकुनेः पततो यथा ॥

prasārya bāhū patataḥ prasārya caraṇāvapi | rūpaṃ piturme vibabhau śakuneḥ patato yathā

गिरते समय भुजाएँ और पैर फैलाए हुए मेरे पिता गिरते हुए पक्षी के समान दिखाई दिए।

श्लोक 28 (3.21.28)

तं पतन्तं महाबाहो शूलपट्टसपाणयः । अभिघ्नन्तो भृशं वीर मम चेतो ह्यकम्पयन् ॥

taṃ patantaṃ mahābāho śūlapaṭṭasapāṇayaḥ | abhighnanto bhṛśaṃ vīra mama ceto hyakampayan

हे महाबाहु, हे वीर, गिरते हुए उन पर हाथों में शूल और पट्टिश लिए योद्धा बुरी तरह प्रहार कर रहे थे, और इसने मेरे हृदय को कँपा दिया।

श्लोक 29 (3.21.29)

ततो मुहूर्तात्प्रतिलभ्य संज्ञा- । महं तदा वीर महाविमर्दे । न तत्र सौभं न रिपुं च साल्वं । पश्यामि वृद्धं पितरं न चापि ॥

tato muhūrtātpratilabhya saṃjñā- | mahaṃ tadā vīra mahāvimarde | na tatra saubhaṃ na ripuṃ ca sālvaṃ | paśyāmi vṛddhaṃ pitaraṃ na cāpi

हे वीर, फिर क्षणभर में उस महायुद्ध में मुझे होश आ गया; और वहाँ मुझे न सौभ दिखाई दिया, न मेरा शत्रु शाल्व, न मेरे वृद्ध पिता।

श्लोक 30 (3.21.30)

ततो ममासीन्मनसि मायेयमिति निश्चितम् । प्रबुद्धोऽस्मि ततो भूयः शतशो वाऽकिरं शरान् ॥

tato mamāsīnmanasi māyeyamiti niścitam | prabuddho'smi tato bhūyaḥ śataśo vā'kiraṃ śarān

तब मेरे मन में निश्चय हो गया कि 'यह माया है'। सचेत होकर मैंने फिर सैकड़ों बाण बरसाए।

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