आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 22
कृष्ण द्वारा सौभ का विनाश और शाल्व-वध
कृष्ण युधिष्ठिर को शाल्व से हुए अपने युद्ध का शेष वृत्तान्त सुनाते हैं: आकाशगामी नगर सौभ माया से अदृश्य हो जाता है, एक दानव शिलावर्षा से उन्हें ढक देता है, और सारथि दारुक उनसे शाल्व पर कोई दया न करने का आग्रह करता है। सुदर्शन चक्र से कृष्ण सौभ के दो टुकड़े कर देते हैं और शाल्व को मार डालते हैं; वे बताते हैं कि इसी कारण वे हस्तिनापुर आकर द्यूत को रोक न सके। फिर वे पाण्डवों से विदा लेकर सुभद्रा और अभिमन्यु के साथ द्वारका लौटते हैं; धृष्टद्युम्न, धृष्टकेतु और केकय भी चले जाते हैं, पर ब्राह्मण और देशवासी पाण्डवों को छोड़कर नहीं जाते।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (3.22.1)
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रगृह्य रुचिरं धनुः । शरैरपातयं सौभाच्छिरांसि विबुधद्विषाम् ॥
tato'haṃ bharataśreṣṭha pragṛhya ruciraṃ dhanuḥ | śarairapātayaṃ saubhācchirāṃsi vibudhadviṣām
तब, हे भरतश्रेष्ठ, मैंने अपना सुन्दर धनुष उठाया और बाणों से सौभ पर से देवशत्रुओं के सिर काट गिराए।
श्लोक 2 (3.22.2)
शरांश्चाशीविषाकारानूर्ध्वगांस्तिग्मतेजसः । प्रैषयं साल्वराजाय शार्ङ्गमुक्तान्सुवाससः ॥
śarāṃścāśīviṣākārānūrdhvagāṃstigmatejasaḥ | praiṣayaṃ sālvarājāya śārṅgamuktānsuvāsasaḥ
शार्ङ्ग धनुष से छूटे, विषैले सर्पों जैसे, ऊपर की ओर उठने वाले, प्रचण्ड तेज वाले और सुन्दर पंखों वाले बाण मैंने शाल्वराज पर चलाए।
श्लोक 3 (3.22.3)
ततो नादृश्यत तदा सौभं कुरुकुलोद्वह । अन्तर्हितं माययाऽभूत्ततोऽहं विस्मितोऽभवम् ॥
tato nādṛśyata tadā saubhaṃ kurukulodvaha | antarhitaṃ māyayā'bhūttato'haṃ vismito'bhavam
तब, हे कुरुकुल को धारण करने वाले, सौभ दिखाई देना बंद हो गया। वह माया से अदृश्य हो गया था, और मैं विस्मित रह गया।
श्लोक 4 (3.22.4)
अथ दानवसङ्घास्ते विकृताननमूर्धजाः । उदक्रोशन्महाराज धिष्ठिते मयि भारत ॥
atha dānavasaṅghāste vikṛtānanamūrdhajāḥ | udakrośanmahārāja dhiṣṭhite mayi bhārata
तब, हे महाराज, विकृत मुखों और केशों वाले वे दानवों के झुण्ड, मेरे वहाँ डटे रहते, जोर-जोर से चीत्कार करने लगे, हे भारत।
श्लोक 5 (3.22.5)
ततोऽस्त्रं शब्दसाहं वै त्वरमाणो महारणे । अयोजयं तद्वधाय ततः शब्द उपारमत् ॥
tato'straṃ śabdasāhaṃ vai tvaramāṇo mahāraṇe | ayojayaṃ tadvadhāya tataḥ śabda upāramat
तब उस महायुद्ध में मैंने शीघ्रता से उनके वध के लिए शब्द को लक्ष्य करने वाला अस्त्र जोड़ा, और वह कोलाहल थम गया।
श्लोक 6 (3.22.6)
हतास्ते दानवाः सर्वे यैः स शब्द उदीरितः । शरैरादित्यसंकाशैर्ज्वलितैः शब्दसाधनैः ॥
hatāste dānavāḥ sarve yaiḥ sa śabda udīritaḥ | śarairādityasaṃkāśairjvalitaiḥ śabdasādhanaiḥ
जिन दानवों ने वह कोलाहल किया था, वे सब सूर्य के समान चमकते, शब्द से लक्ष्य पाने वाले मेरे प्रज्वलित बाणों से मारे गए।
श्लोक 7 (3.22.7)
तस्मिन्नुपरते शब्दे पुनरेवान्यतोऽभवत् । शब्दोऽपरो महाराज तत्रापि प्राहरं शरैः ॥
tasminnuparate śabde punarevānyato'bhavat | śabdo'paro mahārāja tatrāpi prāharaṃ śaraiḥ
वह शब्द थमते ही, हे महाराज, दूसरी ओर से फिर एक और शब्द उठा; वहाँ भी मैंने बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 8 (3.22.8)
एवं दश दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च भारत । नादयामासुरसुरास्ते चापि निहता मया ॥
evaṃ daśa diśaḥ sarvāstiryagūrdhvaṃ ca bhārata | nādayāmāsurasurāste cāpi nihatā mayā
इस प्रकार, हे भारत, असुरों ने दसों दिशाओं को, आड़े-तिरछे और ऊपर भी, गुँजा दिया, और वे भी मेरे हाथों मारे गए।
श्लोक 9 (3.22.9)
ततः प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनरेव व्यदृश्यत । सौभं कामगमं वीर मोहयन्मम चक्षुषी ॥
tataḥ prāgjyotiṣaṃ gatvā punareva vyadṛśyata | saubhaṃ kāmagamaṃ vīra mohayanmama cakṣuṣī
फिर इच्छानुसार चलने वाला सौभ, हे वीर, प्राग्ज्योतिष की ओर जाकर मेरी आँखों को भ्रमित करता हुआ फिर दिखाई दिया।
श्लोक 10 (3.22.10)
ततो लोकान्तकरणो दानवो दारुणाकृतिः । शिलावर्षेण महता सहसा मां समावृणोत् ॥
tato lokāntakaraṇo dānavo dāruṇākṛtiḥ | śilāvarṣeṇa mahatā sahasā māṃ samāvṛṇot
तब लोकों का विनाश करने वाले, भयानक आकृति वाले एक दानव ने अचानक भारी शिलावर्षा से मुझे ढक दिया।
श्लोक 11 (3.22.11)
सोऽहं पर्वतवर्षेण वध्यमानः समन्ततः । वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितोऽभवम् ॥
so'haṃ parvatavarṣeṇa vadhyamānaḥ samantataḥ | valmīka iva rājendra parvatopacito'bhavam
हे राजेन्द्र, चारों ओर से पर्वतों की उस वर्षा की मार खाते हुए मैं चट्टानों से ऐसा ढक गया मानो कोई बाँबी हो।
श्लोक 12 (3.22.12)
ततोऽहं पर्वतचितः सहयः सहसारथिः । अप्रख्यातिमियां राजन्सध्वजः पर्वतैश्चितः ॥
tato'haṃ parvatacitaḥ sahayaḥ sahasārathiḥ | aprakhyātimiyāṃ rājansadhvajaḥ parvataiścitaḥ
हे राजन्, घोड़ों, सारथि और ध्वजा सहित चट्टानों के नीचे दबकर, पर्वतों से ढका मैं अदृश्य हो गया।
श्लोक 13 (3.22.13)
ततो वृष्णिप्रवीरा ये ममासन्सैनिकास्तदा । ते भयार्ता दिशः सर्वे सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥
tato vṛṣṇipravīrā ye mamāsansainikāstadā | te bhayārtā diśaḥ sarve sahasā vipradudruvuḥ
तब उस समय मेरे सैनिक जो वृष्णिवीर थे, वे सब भय से व्याकुल होकर अचानक सब दिशाओं में भाग खड़े हुए।
श्लोक 14 (3.22.14)
ततो हाहाकृतमभूत्सर्वं किल विशांपते । द्यौश्च भूमिश्च खं चैवादृश्यमाने तथा मयि ॥
tato hāhākṛtamabhūtsarvaṃ kila viśāṃpate | dyauśca bhūmiśca khaṃ caivādṛśyamāne tathā mayi
हे प्रजापालक, तब मेरे अदृश्य हो जाने पर चारों ओर हाहाकार मच गया; कहते हैं, स्वर्ग, पृथ्वी और आकाश सब विलाप करने लगे।
श्लोक 15 (3.22.15)
ततो विषण्णमनसो मम राजन्सुहृज्जनाः । रुरुदुश्चुक्रुशुश्चैव दुःखशोकसमन्विताः ॥
tato viṣaṇṇamanaso mama rājansuhṛjjanāḥ | ruruduścukruśuścaiva duḥkhaśokasamanvitāḥ
तब, हे राजन्, मेरे सुहृद् उदास मन से, दुःख और शोक में डूबकर रोने और चीखने लगे।
श्लोक 16 (3.22.16)
द्विषतां च प्रहर्षोऽभूदार्तिश्च सुहृदामपि । एवं विजितवान्वीर पश्चादश्रौषमच्युत ॥
dviṣatāṃ ca praharṣo'bhūdārtiśca suhṛdāmapi | evaṃ vijitavānvīra paścādaśrauṣamacyuta
शत्रुओं में हर्ष छा गया और मित्र व्यथित हो उठे। हे वीर, हे अच्युत, इस प्रकार मानो मुझे जीत लिया गया था — यह मैंने बाद में सुना।
श्लोक 17 (3.22.17)
ततोऽहमिन्द्रदयितं सर्वपाषाणभेदनम् । वज्रमुद्यम्य तान्सर्वान्पर्वतान्समशातयम् ॥
tato'hamindradayitaṃ sarvapāṣāṇabhedanam | vajramudyamya tānsarvānparvatānsamaśātayam
तब मैंने इन्द्र को प्रिय, सब पत्थरों को तोड़ने वाला वज्र उठाया और उन सब पर्वतों को चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 18 (3.22.18)
ततः पर्वतभारार्ता मन्दप्राणविचेष्टिताः । हया मम महाराज वेपमाना इवाभवन् ॥
tataḥ parvatabhārārtā mandaprāṇaviceṣṭitāḥ | hayā mama mahārāja vepamānā ivābhavan
हे महाराज, पर्वतों के भार से पीड़ित, मन्द साँस और शिथिल गति वाले मेरे घोड़े मानो काँप रहे थे।
श्लोक 19 (3.22.19)
मेघजाल इवाकाशे विदार्याभ्युदितं रविम् । दृष्ट्वा मां बान्धवाः सर्वे हर्षमाहारयन्पुनः ॥
meghajāla ivākāśe vidāryābhyuditaṃ ravim | dṛṣṭvā māṃ bāndhavāḥ sarve harṣamāhārayanpunaḥ
बादलों के समूह को चीरकर आकाश में उदित हुए सूर्य के समान मुझे देखकर मेरे सब बन्धु फिर हर्षित हो उठे।
श्लोक 20 (3.22.20)
ततः पर्वतभारार्तान्मन्दप्राणविचेष्टितान् । हयान्संदृश्य मां सूतः प्राह तात्कालिकं वचः ॥
tataḥ parvatabhārārtānmandaprāṇaviceṣṭitān | hayānsaṃdṛśya māṃ sūtaḥ prāha tātkālikaṃ vacaḥ
तब पर्वतों के भार से पीड़ित, मन्द साँस और शिथिल गति वाले घोड़ों को देखकर मेरे सारथि ने मुझसे उस घड़ी के योग्य वचन कहे —
दारुक उवाच
श्लोक 21 (3.22.21)
साधु संपश्य वार्ष्णेय साल्वं सौभपतिं स्थितम् । अलं कृष्णावमन्यैनं साधु यत्नं समाचर ॥
sādhu saṃpaśya vārṣṇeya sālvaṃ saubhapatiṃ sthitam | alaṃ kṛṣṇāvamanyainaṃ sādhu yatnaṃ samācara
"हे वार्ष्णेय, सौभपति शाल्व को वहाँ खड़ा भली-भाँति देखिए। हे कृष्ण, उसकी उपेक्षा बहुत हुई; अब पूरा प्रयत्न कीजिए।"
श्लोक 22 (3.22.22)
मार्दवं सखितां चैव साल्वादद्य व्यपाहर । जहि साल्वं महाबाहो मैनं जीवय केशव ॥
mārdavaṃ sakhitāṃ caiva sālvādadya vyapāhara | jahi sālvaṃ mahābāho mainaṃ jīvaya keśava
"आज शाल्व के प्रति सारी कोमलता और मित्रता त्याग दीजिए। हे महाबाहु, शाल्व को मार डालिए; हे केशव, इसे जीवित मत छोड़िए।"
श्लोक 23 (3.22.23)
सर्वैः पराक्रमैर्वीर वध्यः शत्रुरमित्रहन् । न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्बलोऽपि बलीयसा । योऽपि स्यात्पीठगः कश्चित्किं पुनः समरे स्थितः ॥
sarvaiḥ parākramairvīra vadhyaḥ śatruramitrahan | na śatruravamantavyo durbalo'pi balīyasā | yo'pi syātpīṭhagaḥ kaścitkiṃ punaḥ samare sthitaḥ
"हे शत्रुनाशक वीर, शत्रु को हर प्रकार के पराक्रम से मारना चाहिए। बलवान को दुर्बल शत्रु का भी अनादर नहीं करना चाहिए — जो अपने आसन पर बैठा हो उसका भी नहीं, फिर रणभूमि में डटे शत्रु का तो कहना ही क्या।"
श्लोक 24 (3.22.24)
स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वयत्नैरिमं प्रभो । जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालोऽत्यगात्पुनः ॥
sa tvaṃ puruṣaśārdūla sarvayatnairimaṃ prabho | jahi vṛṣṇikulaśreṣṭha mā tvāṃ kālo'tyagātpunaḥ
"इसलिए, हे पुरुषसिंह, हे प्रभो, हे वृष्णिकुलश्रेष्ठ, पूरे यत्न से इसे मारिए; यह अवसर फिर आपके हाथ से न निकल जाए।"
श्लोक 25 (3.22.25)
जितवाञ्जामदग्न्यं यः कोटिवर्षगणान्बहून् । स एष नान्यैर्वध्यो हि त्वामृते नास्ति कश्चन ॥
jitavāñjāmadagnyaṃ yaḥ koṭivarṣagaṇānbahūn | sa eṣa nānyairvadhyo hi tvāmṛte nāsti kaścana
"जिसने करोड़ों वर्षों के अनेक युगों तक जमदग्निपुत्र को भी परास्त किया, वह दूसरों से नहीं मारा जा सकता; आपके सिवा ऐसा कोई नहीं है।"
श्लोक 26 (3.22.26)
नैष मार्दवसाध्यो वै मतो नापि सखा तव । येन त्वं योधितो वीर द्वारका चावमर्दिता ॥
naiṣa mārdavasādhyo vai mato nāpi sakhā tava | yena tvaṃ yodhito vīra dvārakā cāvamarditā
"यह कोमलता से वश में आने वाला नहीं है, और न ही आपका मित्र माना जा सकता है — जिसने, हे वीर, आपसे युद्ध किया और द्वारका को रौंद डाला।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 27 (3.22.27)
एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्वाऽहं सारथेर्वचः । तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारयम् ॥
evamādi tu kaunteya śrutvā'haṃ sārathervacaḥ | tattvametaditi jñātvā yuddhe matimadhārayam
हे कुन्तीनन्दन, सारथि के ऐसे-ऐसे वचन सुनकर और उन्हें सत्य जानकर मैंने युद्ध का निश्चय किया —
श्लोक 28 (3.22.28)
वधाय साल्वराजस्य सौभस्य च निपातने । दारुकं चाब्रुवं वीर मुहूर्तं स्थीयतामिति ॥
vadhāya sālvarājasya saubhasya ca nipātane | dārukaṃ cābruvaṃ vīra muhūrtaṃ sthīyatāmiti
शाल्वराज के वध और सौभ को गिराने के लिए; और मैंने दारुक से कहा, "हे वीर, क्षण भर ठहरो।"
श्लोक 29 (3.22.29)
ततोऽप्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत् । आग्नेयमस्त्रं दयितं सर्वसाहं महाप्रभम् । योजयं तत्र धनुषा दानवान्तकरं रणे ॥
tato'pratihataṃ divyamabhedyamativīryavat | āgneyamastraṃ dayitaṃ sarvasāhaṃ mahāprabham | yojayaṃ tatra dhanuṣā dānavāntakaraṃ raṇe
तब मैंने अपने धनुष पर वह दिव्य, प्रिय आग्नेय अस्त्र चढ़ाया, जो अप्रतिहत, अभेद्य, अत्यन्त पराक्रमी, सब कुछ सह लेने वाला, महातेजस्वी और रण में दानवों का अन्त करने वाला था,
श्लोक 30 (3.22.30)
यक्षाणां राक्षसानां च दानवानां च संयुगे । राज्ञां च प्रतिलोमानां भस्मान्तकरणं महत् ॥
yakṣāṇāṃ rākṣasānāṃ ca dānavānāṃ ca saṃyuge | rājñāṃ ca pratilomānāṃ bhasmāntakaraṇaṃ mahat
वह महान् अस्त्र जो युद्ध में यक्षों, राक्षसों, दानवों और धर्मविरोधी राजाओं को भस्म कर देता है।
श्लोक 31 (3.22.31)
क्षुरान्तममलं चक्रं कालान्तकयमोपमम् । अनुमन्त्र्याहमतुलं द्विषतां विनिबर्हणम् ॥
kṣurāntamamalaṃ cakraṃ kālāntakayamopamam | anumantryāhamatulaṃ dviṣatāṃ vinibarhaṇam
निर्मल, छुरे जैसी धार वाले, कालान्तक यम के समान, अतुलनीय और शत्रुओं का संहार करने वाले चक्र को मैंने अभिमन्त्रित किया —
श्लोक 32 (3.22.32)
जहि सौभं स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम । इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा ॥
jahi saubhaṃ svavīryeṇa ye cātra ripavo mama | ityuktvā bhujavīryeṇa tasmai prāhiṇavaṃ ruṣā
"अपने बल से सौभ को और उसमें जो मेरे शत्रु हैं उन्हें नष्ट करो।" यह कहकर मैंने क्रोध में भुजाओं के पूरे बल से उसे सौभ पर छोड़ दिया।
श्लोक 33 (3.22.33)
रूपं सुदर्शनस्यासीदाकाशे पततस्तदा । द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रतपिष्यतः ॥
rūpaṃ sudarśanasyāsīdākāśe patatastadā | dvitīyasyeva sūryasya yugānte pratapiṣyataḥ
तब आकाश में उड़ते सुदर्शन का रूप ऐसा था मानो युगान्त में तपता हुआ दूसरा सूर्य हो।
श्लोक 34 (3.22.34)
तत्समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम् । मध्येन पाटयामास क्रकचो दार्विवोच्छ्रितम् ॥
tatsamāsādya nagaraṃ saubhaṃ vyapagatatviṣam | madhyena pāṭayāmāsa krakaco dārvivocchritam
तेजहीन हो चुके सौभ नगर के पास पहुँचकर उसने उसे बीच से ऐसे चीर डाला जैसे आरा ऊँचे लट्ठे को चीरता है।
श्लोक 35 (3.22.35)
द्विधा कृतं ततः सौभं सुदर्शनबलाद्धतम् । महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा ॥
dvidhā kṛtaṃ tataḥ saubhaṃ sudarśanabalāddhatam | maheśvaraśaroddhūtaṃ papāta tripuraṃ yathā
सुदर्शन के बल से दो टुकड़े होकर सौभ ऐसे गिर पड़ा जैसे महेश्वर के बाण से ध्वस्त होकर त्रिपुर गिरा था।
श्लोक 36 (3.22.36)
तस्मिन्निपतिते सौभे चक्रमागात्करं मम । पुनश्चादाय वेगेन साल्वायेत्यहमब्रुवम् ॥
tasminnipatite saubhe cakramāgātkaraṃ mama | punaścādāya vegena sālvāyetyahamabruvam
सौभ के गिरने पर चक्र मेरे हाथ में लौट आया। उसे फिर वेग से लेकर मैंने कहा, "शाल्व पर!"
श्लोक 37 (3.22.37)
ततः साल्वं गदां गुर्वीमाविध्यन्तं महाहवे । द्विधा चकार सहसा प्रजज्वाल च तेजसा ॥
tataḥ sālvaṃ gadāṃ gurvīmāvidhyantaṃ mahāhave | dvidhā cakāra sahasā prajajvāla ca tejasā
तब उस महायुद्ध में भारी गदा घुमाते शाल्व के उसने क्षण भर में दो टुकड़े कर दिए, और वह अपने तेज से प्रज्वलित हो उठा।
श्लोक 38 (3.22.38)
तस्मिन्विनिहते वीरे दानवास्त्रस्तचेतसः । हाहाभूता दिशो जग्मुरर्दिता मम सायकैः ॥
tasminvinihate vīre dānavāstrastacetasaḥ | hāhābhūtā diśo jagmurarditā mama sāyakaiḥ
उस वीर के मारे जाने पर भयभीत चित्त वाले दानव, मेरे बाणों से पीड़ित होकर, हाहाकार करते हुए सब दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 39 (3.22.39)
ततोऽहं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपतः । शङ्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृदः पर्यहर्षयम् ॥
tato'haṃ samavasthāpya rathaṃ saubhasamīpataḥ | śaṅkhaṃ pradhmāpya harṣeṇa suhṛdaḥ paryaharṣayam
तब मैंने अपना रथ सौभ के पास खड़ा किया और हर्ष से शंख बजाकर अपने सुहृदों को आनन्दित किया।
श्लोक 40 (3.22.40)
तन्मेरुशिखराकारं विध्वस्ताट्टालगोपुरम् । दह्यमानमभिप्रेक्ष्य स्त्रियस्ताः संप्रदुद्रुवुः ॥
tanmeruśikharākāraṃ vidhvastāṭṭālagopuram | dahyamānamabhiprekṣya striyastāḥ saṃpradudruvuḥ
मेरु के शिखर जैसे आकार वाले उस नगर को, जिसकी अटारियाँ और गोपुर ध्वस्त हो चुके थे, जलता देखकर वहाँ की स्त्रियाँ भाग खड़ी हुईं।
श्लोक 41 (3.22.41)
एवं निहत्य समरे सौभं साल्वं निपात्य च । आनर्तान्पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम् ॥
evaṃ nihatya samare saubhaṃ sālvaṃ nipātya ca | ānartānpunarāgamya suhṛdāṃ prītimāvaham
इस प्रकार युद्ध में सौभ को नष्ट कर और शाल्व को मार गिराकर मैं फिर आनर्त देश लौटा और अपने सुहृदों को आनन्दित किया।
श्लोक 42 (3.22.42)
तदेतत्कारणं राजन्नागमं नागसाह्वयम् । यद्यागां परवीरघ्न न हि जीवेत्सुयोधनः ॥
tadetatkāraṇaṃ rājannāgamaṃ nāgasāhvayam | yadyāgāṃ paravīraghna na hi jīvetsuyodhanaḥ
हे राजन्, यही कारण है कि मैं हस्तिनापुर नहीं आया। हे शत्रुवीरों के संहारक, यदि मैं आ जाता तो सुयोधन जीवित न रहता।
श्लोक 43 (3.22.43)
मय्यागतेऽथवा वीर द्यूतं न भविता तथा । अद्याहं किं करिष्यामि भिन्नसेतुरिवोदकम् ॥
mayyāgate'thavā vīra dyūtaṃ na bhavitā tathā | adyāhaṃ kiṃ kariṣyāmi bhinnaseturivodakam
अथवा, हे वीर, मेरे आ जाने पर वह द्यूत होता ही नहीं। अब मैं क्या कर सकता हूँ? यह तो बाँध टूट जाने के बाद पानी रोकने जैसा है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 44 (3.22.44)
एवमुक्त्वा महाबाहुः कौरवं पुरुषोत्तमः । आमन्त्र्य प्रययौ श्रीमान्पाण्डवान्मधुसूदनः ॥
evamuktvā mahābāhuḥ kauravaṃ puruṣottamaḥ | āmantrya prayayau śrīmānpāṇḍavānmadhusūdanaḥ
कौरव युधिष्ठिर से यह कहकर महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीमान् मधुसूदन पाण्डवों से विदा लेकर चल पड़े।
श्लोक 45 (3.22.45)
अभिवाद्य महाबाहुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् । राज्ञा मूर्धन्युपाघ्रातो भीमेन च महाभुजः ॥
abhivādya mahābāhurdharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | rājñā mūrdhanyupāghrāto bhīmena ca mahābhujaḥ
महाबाहु कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को प्रणाम किया, और राजा ने तथा महाबली भीम ने स्नेह से उनका सिर सूँघा।
श्लोक 46 (3.22.46)
परिष्वक्तश्चार्जुनेन यमाभ्यां चाभिवादितः । संमानितश्च धौम्येन द्रौपद्या चार्चितोऽश्रुभिः ॥
pariṣvaktaścārjunena yamābhyāṃ cābhivāditaḥ | saṃmānitaśca dhaumyena draupadyā cārcito'śrubhiḥ
अर्जुन ने उन्हें गले लगाया, नकुल-सहदेव ने प्रणाम किया, धौम्य ने सम्मान किया और द्रौपदी ने आँसुओं से उनका सत्कार किया।
श्लोक 47 (3.22.47)
सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य काञ्चनम् । आरुरोह रथं कृष्णः पाण्डवैरभिपूजितः ॥
subhadrāmabhimanyuṃ ca rathamāropya kāñcanam | āruroha rathaṃ kṛṣṇaḥ pāṇḍavairabhipūjitaḥ
सुभद्रा और अभिमन्यु को सोने के रथ पर बिठाकर, पाण्डवों से सम्मानित कृष्ण स्वयं भी रथ पर चढ़े।
श्लोक 48 (3.22.48)
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा । द्वारकां प्रययौ कृष्णः समाश्वास्य युधिष्ठिरम् ॥
śaibyasugrīvayuktena rathenādityavarcasā | dvārakāṃ prayayau kṛṣṇaḥ samāśvāsya yudhiṣṭhiram
युधिष्ठिर को ढाढ़स बँधाकर कृष्ण शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से जुते, सूर्य के समान तेजस्वी रथ से द्वारका की ओर चल दिए।
श्लोक 49 (3.22.49)
ततः प्रयाते दाशार्हे धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः । द्रौपदेयानुपादाय प्रययौ स्वपुरं तदा ॥
tataḥ prayāte dāśārhe dhṛṣṭadyumno'pi pārṣataḥ | draupadeyānupādāya prayayau svapuraṃ tadā
दाशार्ह कृष्ण के चले जाने पर पृषतवंशी धृष्टद्युम्न भी द्रौपदी के पुत्रों को लेकर अपने नगर को चले गए।
श्लोक 50 (3.22.50)
धृष्टकेतुः स्वसारं च समादायाथ चेदिराट् । जगाम पाण्डवान्दृष्ट्वा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम् ॥
dhṛṣṭaketuḥ svasāraṃ ca samādāyātha cedirāṭ | jagāma pāṇḍavāndṛṣṭvā ramyāṃ śuktimatīṃ purīm
चेदिराज धृष्टकेतु अपनी बहन को साथ लेकर, पाण्डवों से मिलने के बाद, रमणीय शुक्तिमती नगरी को चले गए।
श्लोक 51 (3.22.51)
केकयाश्चाप्यनुज्ञाताः कौन्तेयेनामितौजसा । आमन्त्र्य पाण्डवान्सर्वान्प्रययुस्तेऽपि भारत ॥
kekayāścāpyanujñātāḥ kaunteyenāmitaujasā | āmantrya pāṇḍavānsarvānprayayuste'pi bhārata
हे भारत, अपार तेजस्वी कुन्तीपुत्र की अनुमति पाकर केकय भी सब पाण्डवों से विदा लेकर चले गए।
श्लोक 52 (3.22.52)
ब्राह्मणाश्च विशश्चैव तथा विषयवासिनः । विसृज्यमानाः सुभृशं न त्यजन्ति स्म पाण्डवान् ॥
brāhmaṇāśca viśaścaiva tathā viṣayavāsinaḥ | visṛjyamānāḥ subhṛśaṃ na tyajanti sma pāṇḍavān
पर ब्राह्मण, वैश्य और देश के निवासी, बार-बार विदा किए जाने पर भी, पाण्डवों को छोड़कर नहीं गए।
श्लोक 53 (3.22.53)
समवायः स राजेन्द्र सुमहाद्भुतदर्शनः । आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ ॥
samavāyaḥ sa rājendra sumahādbhutadarśanaḥ | āsīnmahātmanāṃ teṣāṃ kāmyake bharatarṣabha
हे राजेन्द्र, हे भरतश्रेष्ठ, काम्यक वन में उन महात्माओं का वह समागम देखने में अत्यन्त अद्भुत था।
श्लोक 54 (3.22.54)
युधिष्ठिरस्तु विप्रांस्ताननुमान्य महामनाः । शशास पुरुषान्काले रथान्योजयतेति वै ॥
yudhiṣṭhirastu viprāṃstānanumānya mahāmanāḥ | śaśāsa puruṣānkāle rathānyojayateti vai
तब उदारचित्त युधिष्ठिर ने उन ब्राह्मणों से विनयपूर्वक अनुमति लेकर समय पर अपने सेवकों को आज्ञा दी, "रथ जोतो।"