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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 23

पुरवासियों की पाण्डवों से विदाई

कृष्ण के जाने के बाद युधिष्ठिर, उनके भाई, द्रौपदी और धौम्य विद्वान ब्राह्मणों को स्वर्ण, वस्त्र और गौएँ दान करके रथों पर आगे वन की ओर चलते हैं; शस्त्रधारी सेवक और परिजनों सहित इन्द्रसेन पीछे-पीछे चलते हैं। कुरुजाङ्गल के पुरवासी और प्रमुख लोग उन्हें घेर लेते हैं, अपने राजा के चले जाने पर विलाप करते हैं और दुर्योधन, शकुनि तथा कर्ण को धिक्कारते हैं। अर्जुन उन्हें आश्वासन देते हैं कि राजा लौटकर अपना यश वापस लेंगे, और उनसे ब्राह्मणों तथा तपस्वियों का आशीर्वाद माँगने को कहते हैं; लोग पाण्डवों की प्रदक्षिणा करके उदास मन से घर लौट जाते हैं।

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.23.1)

तस्मिन्दशार्हाधिपतौ प्रयाते । युधिष्ठिरो भीमसेनार्जुनौ च । यमौ च कृष्णा च पुरोहितश्च । रथान्महार्हान्परमाश्वयुक्तान् ॥

tasmindaśārhādhipatau prayāte | yudhiṣṭhiro bhīmasenārjunau ca | yamau ca kṛṣṇā ca purohitaśca | rathānmahārhānparamāśvayuktān

दाशार्हों के स्वामी कृष्ण के चले जाने पर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, कृष्णा (द्रौपदी) और पुरोहित धौम्य, उत्तम घोड़ों से जुते बहुमूल्य रथों पर —

श्लोक 2 (3.23.2)

आस्थाय वीराः सहिता वनाय । प्रतस्थिरे भूतपतिप्रकाशाः । हिरण्यनिष्कान्वसनानि गाश्च । प्रदाय शिक्षाक्षरमन्त्रविद्भ्यः ॥

āsthāya vīrāḥ sahitā vanāya | pratasthire bhūtapatiprakāśāḥ | hiraṇyaniṣkānvasanāni gāśca | pradāya śikṣākṣaramantravidbhyaḥ

— वे वीर एक साथ सवार होकर, भूतनाथ शिव के समान दीप्तिमान, वन के लिए चल पड़े; चलने से पहले उन्होंने शिक्षा, वेदाक्षर और मन्त्रों के ज्ञाताओं को स्वर्ण-निष्क, वस्त्र और गौएँ दान कीं।

श्लोक 3 (3.23.3)

प्रेष्याः पुरो विंशतिरात्तशस्त्रा । धनूंषि शस्त्राणि शरांश्च दीप्तान् । मौर्वीश्च यन्त्राणि च सायकांश्च । सर्वे समादाय जघन्यमीयुः ॥

preṣyāḥ puro viṃśatirāttaśastrā | dhanūṃṣi śastrāṇi śarāṃśca dīptān | maurvīśca yantrāṇi ca sāyakāṃśca | sarve samādāya jaghanyamīyuḥ

बीस शस्त्रधारी सेवक पहले से ही धनुष, शस्त्र, चमकते बाण, प्रत्यंचाएँ, यन्त्र और सायक लेकर पीछे-पीछे चले।

श्लोक 4 (3.23.4)

ततस्तु वासांसि च राजपुत्र्या । धात्र्यश्च दास्यश्च विभूषणं च । तदिन्द्रसेनस्त्वरितः प्रगृह्य । जघन्यमेवोपययौ रथेन ॥

tatastu vāsāṃsi ca rājaputryā | dhātryaśca dāsyaśca vibhūṣaṇaṃ ca | tadindrasenastvaritaḥ pragṛhya | jaghanyamevopayayau rathena

फिर इन्द्रसेन राजकुमारी के वस्त्र, धाइयाँ, दासियाँ और आभूषण लेकर तुरन्त रथ से पीछे-पीछे चला।

श्लोक 5 (3.23.5)

ततः कुरुश्रेष्ठमुपेत्य पौराः । प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः । तं ब्राह्मणाश्चाभ्यवदन्प्रसन्ना । मुख्याश्च सर्वे कुरुजाङ्गलानाम् ॥

tataḥ kuruśreṣṭhamupetya paurāḥ | pradakṣiṇaṃ cakruradīnasattvāḥ | taṃ brāhmaṇāścābhyavadanprasannā | mukhyāśca sarve kurujāṅgalānām

तब दृढ़ मन वाले पुरवासियों ने कुरुश्रेष्ठ के पास आकर उनकी प्रदक्षिणा की; ब्राह्मणों और कुरुजाङ्गल के सब प्रमुख लोगों ने प्रसन्न होकर उनका अभिवादन किया।

श्लोक 6 (3.23.6)

स चापि तानभ्यवदत्प्रसन्नः । सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराजः । तस्थौ च तत्राधिपतिर्महात्मा । दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम् ॥

sa cāpi tānabhyavadatprasannaḥ | sahaiva tairbhrātṛbhirdharmarājaḥ | tasthau ca tatrādhipatirmahātmā | dṛṣṭvā janaughaṃ kurujāṅgalānām

धर्मराज ने भी भाइयों सहित प्रसन्न होकर उनका अभिवादन किया, और वे महात्मा राजा कुरुजाङ्गल के जनसमूह को देखते हुए वहीं खड़े रहे।

श्लोक 7 (3.23.7)

पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं । चक्रे कुरूणामृषभो महात्मा । ते चापि तस्मिन्भरतप्रबर्हे । तथा बभूवुः पितरीव पुत्राः ॥

piteva putreṣu sa teṣu bhāvaṃ | cakre kurūṇāmṛṣabho mahātmā | te cāpi tasminbharataprabarhe | tathā babhūvuḥ pitarīva putrāḥ

कुरुश्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिर उनके प्रति वैसा ही भाव रखते थे जैसा पिता पुत्रों के प्रति रखता है, और वे भी उन भरतश्रेष्ठ के प्रति वैसे ही थे जैसे पिता के प्रति पुत्र।

श्लोक 8 (3.23.8)

ततस्तमासाद्य महाजनौघाः । कुरुप्रवीरं परिवार्य तस्थुः । हा नाथ हा धर्म इति ब्रुवाणा । ह्रीताश्च सर्वेऽश्रुमुखा बभूवुः ॥

tatastamāsādya mahājanaughāḥ | kurupravīraṃ parivārya tasthuḥ | hā nātha hā dharma iti bruvāṇā | hrītāśca sarve'śrumukhā babhūvuḥ

तब विशाल जनसमूह कुरुवीर के पास आकर उन्हें घेरकर खड़ा हो गया और "हा नाथ! हा धर्म!" कहने लगा; सब लज्जित होकर आँसू बहाने लगे।

पौरा ऊचुः

श्लोक 9 (3.23.9)

वरः कुरूणामधिपः प्रजानां । पितेव पुत्रानपहाय चास्मान् । पौरानिमाञ्जानपदांश्च सर्वान् । हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥

varaḥ kurūṇāmadhipaḥ prajānāṃ | piteva putrānapahāya cāsmān | paurānimāñjānapadāṃśca sarvān | hitvā prayātaḥ kva nu dharmarājaḥ

"कुरुओं में श्रेष्ठ, प्रजा के स्वामी धर्मराज, जैसे पिता पुत्रों को छोड़ दे वैसे हमें छोड़कर, इन पुरवासियों और सब जनपदवासियों को त्यागकर कहाँ जा रहे हैं?"

श्लोक 10 (3.23.10)

धिग्धार्तराष्ट्रं सुनृशंसबुद्धिं । धिक्सौबलं पापमतिं च कर्णम् । अनर्थमिच्छन्ति नरेन्द्र पापा । ये धर्मनित्यस्य सतस्तवोग्राः ॥

dhigdhārtarāṣṭraṃ sunṛśaṃsabuddhiṃ | dhiksaubalaṃ pāpamatiṃ ca karṇam | anarthamicchanti narendra pāpā | ye dharmanityasya satastavogrāḥ

"धिक्कार है क्रूर बुद्धि वाले धृतराष्ट्रपुत्र को! धिक्कार है सौबल शकुनि को और पापबुद्धि कर्ण को! हे नरेन्द्र, वे उग्र पापी आप जैसे सदा धर्मपरायण सज्जन का अनर्थ चाहते हैं।"

श्लोक 11 (3.23.11)

स्वयं निवेश्याप्रतिमं महात्मा । पुरं महादेवपुरप्रकाशम् । शतक्रतुप्रस्थममोघकर्मा । हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥

svayaṃ niveśyāpratimaṃ mahātmā | puraṃ mahādevapuraprakāśam | śatakratuprasthamamoghakarmā | hitvā prayātaḥ kva nu dharmarājaḥ

"जिन अमोघकर्मा महात्मा ने स्वयं महादेव की पुरी के समान दीप्तिमान, अनुपम इन्द्रप्रस्थ नगर बसाया, वे धर्मराज उसे छोड़कर कहाँ जा रहे हैं?"

श्लोक 12 (3.23.12)

चकार यामप्रतिमां महात्मा । सभां मयो देवसभाप्रकाशाम् । तां देवगुप्तामिव देवमायां । हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥

cakāra yāmapratimāṃ mahātmā | sabhāṃ mayo devasabhāprakāśām | tāṃ devaguptāmiva devamāyāṃ | hitvā prayātaḥ kva nu dharmarājaḥ

"महात्मा मय ने देवसभा के समान दीप्तिमान जो अनुपम सभा बनाई, जो देवताओं से रक्षित देवमाया-सी है, उसे छोड़कर धर्मराज कहाँ जा रहे हैं?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.23.13)

तान्धर्मकामार्थविदुत्तमौजा । बीभत्सुरुच्चैः सहितानुवाच । आदास्यते वासमिमं निरुष्य । वनेषु राजा द्विषतां यशांसि ॥

tāndharmakāmārthaviduttamaujā | bībhatsuruccaiḥ sahitānuvāca | ādāsyate vāsamimaṃ niruṣya | vaneṣu rājā dviṣatāṃ yaśāṃsi

तब धर्म, काम और अर्थ के ज्ञाता, परम तेजस्वी बीभत्सु अर्जुन ने उन सबसे ऊँचे स्वर में कहा — "वनों में यह वास पूरा करके राजा शत्रुओं से उनका यश छीन लेंगे।"

अर्जुन उवाच

श्लोक 14 (3.23.14)

द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक्च । भवद्भिरासाद्य तपस्विनश्च । प्रसाद्य धर्मार्थविदश्च वाच्या । यथार्थसिद्धिः परमा भवेन्नः ॥

dvijātimukhyāḥ sahitāḥ pṛthakca | bhavadbhirāsādya tapasvinaśca | prasādya dharmārthavidaśca vācyā | yathārthasiddhiḥ paramā bhavennaḥ

"आप लोग मिलकर और अलग-अलग भी श्रेष्ठ ब्राह्मणों और तपस्वियों के पास जाइए, धर्म और अर्थ के उन ज्ञाताओं को प्रसन्न कीजिए और उनसे प्रार्थना कीजिए कि हमारे प्रयोजन की परम सिद्धि हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (3.23.15)

इत्येवमुक्ते वचनेऽर्जुनेन । ते ब्राह्मणाः सर्ववर्णाश्च राजन् । मुदाऽभ्यनन्दन्सहिताश्च चक्रुः । प्रदक्षिणं धर्मभृतां वरिष्ठम् ॥

ityevamukte vacane'rjunena | te brāhmaṇāḥ sarvavarṇāśca rājan | mudā'bhyanandansahitāśca cakruḥ | pradakṣiṇaṃ dharmabhṛtāṃ variṣṭham

हे राजन्, अर्जुन के यह कहने पर उन ब्राह्मणों और सब वर्णों के लोगों ने प्रसन्न होकर उनका अभिनन्दन किया और मिलकर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर की प्रदक्षिणा की।

श्लोक 16 (3.23.16)

आमन्त्र्य पार्थं च वृकोदरं च । धनंजयं याज्ञसेनीं यमौ च । प्रतस्थिरे राष्ट्रमपेतहर्षा । युधिष्ठिरेणानुमता यथास्वम् ॥

āmantrya pārthaṃ ca vṛkodaraṃ ca | dhanaṃjayaṃ yājñasenīṃ yamau ca | pratasthire rāṣṭramapetaharṣā | yudhiṣṭhireṇānumatā yathāsvam

पार्थ युधिष्ठिर, वृकोदर, धनंजय, याज्ञसेनी और दोनों जुड़वाँ भाइयों से विदा लेकर, युधिष्ठिर की अनुमति से वे सब उदास मन से अपने-अपने घर की ओर लौट चले।

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