आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 24
पाण्डवों का द्वैतवन में प्रवेश
युधिष्ठिर अपने भाइयों से ऐसा रमणीय स्थान खोजने को कहते हैं, जहाँ मृग, फूल और फल प्रचुर हों और वनवास के बारह वर्ष बिताए जा सकें। अर्जुन बड़े भाई की बुद्धि का आदर करते हुए पवित्र द्वैतवन सरोवर का सुझाव देते हैं, और युधिष्ठिर सहमत होते हैं। बहुत से ब्राह्मणों और तपस्वियों के साथ पाण्डव ग्रीष्म के अन्त में उस सुन्दर वन में प्रवेश करते हैं, वहाँ रहने वाले ऋषि, सिद्ध और चारण उनका स्वागत करते हैं, और वे फूलों से लदे एक विशाल वृक्ष के नीचे बस जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.24.1)
ततस्तेषु प्रयातेषु कौन्तेयः सत्यसंगरः । अभ्यभाषत धर्मात्मा भ्रातॄन्सर्वान्युधिष्ठिरः ॥
tatasteṣu prayāteṣu kaunteyaḥ satyasaṃgaraḥ | abhyabhāṣata dharmātmā bhrātṝnsarvānyudhiṣṭhiraḥ
उन सबके चले जाने पर सत्यप्रतिज्ञ धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने अपने सब भाइयों से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (3.24.2)
द्वादशेमाः समाऽस्माभिर्वस्तव्यं निर्जने वने । समीक्षध्वं महारण्ये देशं बहुमृगद्विजम् ॥
dvādaśemāḥ samā'smābhirvastavyaṃ nirjane vane | samīkṣadhvaṃ mahāraṇye deśaṃ bahumṛgadvijam
"ये बारह वर्ष हमें निर्जन वन में रहना है। इस महावन में ऐसा स्थान खोजो जहाँ बहुत से मृग और पक्षी हों,"
श्लोक 3 (3.24.3)
बहुपुष्पफलं रम्यं शिवं पुण्यजनोचितम् । यत्रेमा द्वादश समाः सुखं प्रतिवसेमहि ॥
bahupuṣpaphalaṃ ramyaṃ śivaṃ puṇyajanocitam | yatremā dvādaśa samāḥ sukhaṃ prativasemahi
"जो फूलों और फलों से भरा, रमणीय, मंगलमय और पुण्यात्माओं के योग्य हो, जहाँ हम ये बारह वर्ष सुख से रह सकें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (3.24.4)
एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनंजयः । गुरुवन्मानववरं मानयित्वा मनस्विनम् ॥
evamukte pratyuvāca dharmarājaṃ dhanaṃjayaḥ | guruvanmānavavaraṃ mānayitvā manasvinam
उनके ऐसा कहने पर धनंजय ने मनस्वी, मनुष्यों में श्रेष्ठ धर्मराज का गुरु के समान सम्मान करते हुए उत्तर दिया —
अर्जुन उवाच
श्लोक 5 (3.24.5)
भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता । अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किंचन ॥
bhavāneva maharṣīṇāṃ vṛddhānāṃ paryupāsitā | ajñātaṃ mānuṣe loke bhavato nāsti kiṃcana
"आपने स्वयं वृद्ध महर्षियों की सेवा की है; मनुष्यलोक में ऐसा कुछ नहीं जो आपको ज्ञात न हो।"
श्लोक 6 (3.24.6)
त्वया ह्युपासिता नित्यं ब्राह्मणा वेदपारगाः । द्वैपायनप्रभृतयो नारदश्च महातपाः ॥
tvayā hyupāsitā nityaṃ brāhmaṇā vedapāragāḥ | dvaipāyanaprabhṛtayo nāradaśca mahātapāḥ
"आपने सदा वेदों में पारंगत ब्राह्मणों की उपासना की है — द्वैपायन आदि की और महातपस्वी नारद की,"
श्लोक 7 (3.24.7)
यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं संचरते वशी । देवलोकाद्ब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि ॥
yaḥ sarvalokadvārāṇi nityaṃ saṃcarate vaśī | devalokādbrahmalokaṃ gandharvāpsarasāmapi
"जो जितेन्द्रिय होकर देवलोक से ब्रह्मलोक तक और गन्धर्वों तथा अप्सराओं के लोक में भी, सब लोकों के द्वारों से सदा आते-जाते हैं।"
श्लोक 8 (3.24.8)
अनुभावांश्च जानासि ब्राह्मणानां न संशयः । प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेषामेव पार्थिव ॥
anubhāvāṃśca jānāsi brāhmaṇānāṃ na saṃśayaḥ | prabhāvāṃścaiva vettha tvaṃ sarveṣāmeva pārthiva
"आप ब्राह्मणों के निर्णयों को निःसन्देह जानते हैं, और हे राजन्, आप उन सबके प्रभाव को भी जानते हैं।"
श्लोक 9 (3.24.9)
त्वमेव राजञ्जानासि श्रेयःकारणमेव च । यत्रेच्छसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे ॥
tvameva rājañjānāsi śreyaḥkāraṇameva ca | yatrecchasi mahārāja nivāsaṃ tatra kurmahe
"हे राजन्, हमारे कल्याण का उपाय आप ही जानते हैं। हे महाराज, आप जहाँ चाहें, वहीं हम निवास करेंगे।"
श्लोक 10 (3.24.10)
इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजनोषितम् । बहुपुष्पफलं रम्यं नानाद्विजनिषेवितम् ॥
idaṃ dvaitavanaṃ nāma saraḥ puṇyajanoṣitam | bahupuṣpaphalaṃ ramyaṃ nānādvijaniṣevitam
"यह द्वैतवन नाम का सरोवर है, जहाँ पुण्यात्मा रहते हैं; यह फूलों और फलों से भरा, रमणीय और भाँति-भाँति के पक्षियों से सेवित है।"
श्लोक 11 (3.24.11)
अत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचये । यदि तेऽनुमतं राजन्किमन्यन्मन्यते भवान् ॥
atremā dvādaśa samā viharemeti rocaye | yadi te'numataṃ rājankimanyanmanyate bhavān
"मेरी इच्छा है कि ये बारह वर्ष हम यहीं बिताएँ, यदि आपको स्वीकार हो, हे राजन् — या आप कुछ और सोचते हैं?"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (3.24.12)
ममाप्येतन्मतं पार्थ त्वया यत्समुदाहृतम् । गच्छामः पुण्यविख्यातं महद्द्वैतवनं सरः ॥
mamāpyetanmataṃ pārtha tvayā yatsamudāhṛtam | gacchāmaḥ puṇyavikhyātaṃ mahaddvaitavanaṃ saraḥ
"हे पार्थ, तुमने जो कहा, वही मेरा भी मत है। चलो, पुण्य के लिए विख्यात विशाल द्वैतवन सरोवर चलें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (3.24.13)
ततस्ते प्रययुः सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥
tataste prayayuḥ sarve pāṇḍavā dharmacāriṇaḥ | brāhmaṇairbahubhiḥ sārdhaṃ puṇyaṃ dvaitavanaṃ saraḥ
तब धर्म का आचरण करने वाले सब पाण्डव बहुत से ब्राह्मणों के साथ पवित्र द्वैतवन सरोवर की ओर चल पड़े —
श्लोक 14 (3.24.14)
ब्राह्मणाः साग्निहोत्राश्च तथैव च निरग्नयः । स्वाध्यायिनो भिक्षवश्च तथैव वनवासिनः ॥
brāhmaṇāḥ sāgnihotrāśca tathaiva ca niragnayaḥ | svādhyāyino bhikṣavaśca tathaiva vanavāsinaḥ
अग्निहोत्री ब्राह्मण और अग्निहोत्र न रखने वाले भी, स्वाध्यायी, भिक्षु और वनवासी भी।
श्लोक 15 (3.24.15)
बहवो ब्राह्मणास्तत्र परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् । तपस्विनः सत्यशीलाः शतशः संशितव्रताः ॥
bahavo brāhmaṇāstatra parivavruryudhiṣṭhiram | tapasvinaḥ satyaśīlāḥ śataśaḥ saṃśitavratāḥ
वहाँ सैकड़ों तपस्वी, सत्यशील और दृढ़व्रती ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर को घेर लिया।
श्लोक 16 (3.24.16)
ते यात्वा पाण्डवास्तत्र ब्राह्मणैर्बहुभिः सह । पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुर्भरतर्षभाः ॥
te yātvā pāṇḍavāstatra brāhmaṇairbahubhiḥ saha | puṇyaṃ dvaitavanaṃ ramyaṃ viviśurbharatarṣabhāḥ
बहुत से ब्राह्मणों के साथ वहाँ जाकर भरतश्रेष्ठ पाण्डवों ने पवित्र और रमणीय द्वैतवन में प्रवेश किया।
श्लोक 17 (3.24.17)
तत्सालतालाम्रमधूकनीप- । कदम्बसर्जार्जुनकर्णिकारैः । तपात्यये पुष्पधरैरुपेतं । महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥
tatsālatālāmramadhūkanīpa- | kadambasarjārjunakarṇikāraiḥ | tapātyaye puṣpadharairupetaṃ | mahāvanaṃ rāṣṭrapatirdadarśa
राजा ने वह विशाल वन देखा, जो ग्रीष्म के बीतने पर फूलों से लदे शाल, ताड़, आम, महुआ, नीप, कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और कर्णिकार के वृक्षों से भरा था।
श्लोक 18 (3.24.18)
महाद्रुमाणां शिखरेषु तस्थु- । र्मनोरमां वाचमुदीरयन्तः । मयूरदात्यूहचकोरसङ्घा- । स्तस्मिन्वने बर्हिणकोकिलाश्च ॥
mahādrumāṇāṃ śikhareṣu tasthu- | rmanoramāṃ vācamudīrayantaḥ | mayūradātyūhacakorasaṅghā- | stasminvane barhiṇakokilāśca
बड़े वृक्षों की चोटियों पर मोर, दात्यूह और चकोर पक्षियों के झुण्ड मनोहर बोली बोलते बैठे थे, और उस वन में मयूर और कोयल भी थे।
श्लोक 19 (3.24.19)
करेणुयूथैः सह यूथपानां । मदोत्कटानामचलप्रभाणाम् । महान्ति यूथानि महाद्विपानां । तस्मिन्वने राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥
kareṇuyūthaiḥ saha yūthapānāṃ | madotkaṭānāmacalaprabhāṇām | mahānti yūthāni mahādvipānāṃ | tasminvane rāṣṭrapatirdadarśa
उस वन में राजा ने बड़े-बड़े हाथियों के विशाल झुण्ड देखे — पर्वतों जैसे विशाल, मदमस्त यूथपति अपनी हथिनियों के झुण्डों के साथ।
श्लोक 20 (3.24.20)
मनोरमां भोगवतीमुपेत्य । पूतात्मनां चीरजटाधराणाम् । तस्मिन्वने धर्मभृतां निवासे । ददर्श सिद्धर्षिगणाननेकान् ॥
manoramāṃ bhogavatīmupetya | pūtātmanāṃ cīrajaṭādharāṇām | tasminvane dharmabhṛtāṃ nivāse | dadarśa siddharṣigaṇānanekān
मनोरम भोगवती नदी के पास पहुँचकर उन्होंने धर्मात्माओं के निवास उस वन में पवित्र अन्तःकरण वाले, वल्कल और जटा धारण करने वाले सिद्धों और ऋषियों के अनेक समूह देखे।
श्लोक 21 (3.24.21)
ततः स यानादवरुह्य राजा । सभ्रातृकः सजनः काननं तत् । विवेश धर्मात्मवतां वरिष्ठ- । स्त्रिविष्टपं शक्र इवामितौजाः ॥
tataḥ sa yānādavaruhya rājā | sabhrātṛkaḥ sajanaḥ kānanaṃ tat | viveśa dharmātmavatāṃ variṣṭha- | striviṣṭapaṃ śakra ivāmitaujāḥ
तब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ राजा यान से उतरकर भाइयों और साथियों सहित उस वन में ऐसे प्रविष्ट हुए जैसे अमित तेजस्वी इन्द्र स्वर्ग में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 22 (3.24.22)
तं सत्यसन्धं सहिताऽभिपेतु- । र्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसङ्घाः । वनौकसश्चापि नरेन्द्रसिंहं । मनस्विनं तं परिवार्य तस्थुः ॥
taṃ satyasandhaṃ sahitā'bhipetu- | rdidṛkṣavaścāraṇasiddhasaṅghāḥ | vanaukasaścāpi narendrasiṃhaṃ | manasvinaṃ taṃ parivārya tasthuḥ
उन सत्यप्रतिज्ञ राजा को देखने की इच्छा से चारणों और सिद्धों के समूह एक साथ उनके पास आए, और वनवासी भी उस मनस्वी नरश्रेष्ठ को घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 23 (3.24.23)
स तत्र वृद्धानभिवाद्य सर्वान् । प्रत्यर्चितो राजवद्देववच्च । विवेश सर्वैः सहितो द्विजाग्र्यैः । कृताञ्जलिर्धर्मभृतां वरिष्ठः ॥
sa tatra vṛddhānabhivādya sarvān | pratyarcito rājavaddevavacca | viveśa sarvaiḥ sahito dvijāgryaiḥ | kṛtāñjalirdharmabhṛtāṃ variṣṭhaḥ
वहाँ उन्होंने सब वृद्धजनों को प्रणाम किया और उन्होंने राजा तथा देवता के समान उनका सत्कार किया; फिर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर हाथ जोड़े सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ भीतर गए।
श्लोक 24 (3.24.24)
स पुण्यशीलः पितृवन्महात्मा । तपस्विभिर्धर्मपरैरुपेत्य । प्रत्यर्चितः पुष्पधरस्य मूले । महाद्रुमस्योपविवेश राजा ॥
sa puṇyaśīlaḥ pitṛvanmahātmā | tapasvibhirdharmaparairupetya | pratyarcitaḥ puṣpadharasya mūle | mahādrumasyopaviveśa rājā
धर्मपरायण तपस्वियों द्वारा पास आकर पिता के समान सम्मानित वे पुण्यशील महात्मा राजा फूलों से लदे एक विशाल वृक्ष के मूल में बैठ गए।
श्लोक 25 (3.24.25)
भीमश्च कृष्णा च धनंजयश्च । यमौ च ते चानुचरा नरेन्द्रम् । विमुच्य वाहानवशाश्च सर्वे । तत्रोपतस्थुर्भरतप्रबर्हाः ॥
bhīmaśca kṛṣṇā ca dhanaṃjayaśca | yamau ca te cānucarā narendram | vimucya vāhānavaśāśca sarve | tatropatasthurbharataprabarhāḥ
भीम, कृष्णा (द्रौपदी), धनंजय, दोनों जुड़वाँ भाई और उनके अनुचर — उन सब भरतश्रेष्ठों ने वाहन खोल दिए और राजा के अधीन होकर वहाँ उनकी सेवा में उपस्थित हुए।
श्लोक 26 (3.24.26)
लतावतानावनतः स पाण्डवै- । र्महाद्रुमः पञ्चभिरेव धन्विभिः । बभौ निवासोपगतैर्महात्मभि- । र्महागिरिर्वारणयूथपैरिव ॥
latāvatānāvanataḥ sa pāṇḍavai- | rmahādrumaḥ pañcabhireva dhanvibhiḥ | babhau nivāsopagatairmahātmabhi- | rmahāgirirvāraṇayūthapairiva
लताओं के फैलाव से झुका वह विशाल वृक्ष, उसके नीचे निवास के लिए आए पाँच धनुर्धर महात्मा पाण्डवों से ऐसे शोभित हुआ जैसे गजयूथपतियों से कोई महान् पर्वत।