आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 241
द्वैतवन में गन्धर्वों द्वारा मार्ग रोकना
दुर्योधन गोष्ठों के पास डेरा डालता है, गौओं की गिनती करवाकर उन पर चिह्न लगवाता है, और भोज, संगीत और शिकार में दिन बिताकर सुन्दर द्वैतवन सरोवर की ओर बढ़ता है, जिसके किनारे युधिष्ठिर और द्रौपदी रहते हुए एक दिन का यज्ञ कर रहे हैं। जब दुर्योधन के सेवक सरोवर के किनारे क्रीड़ा-भवन बनाने आते हैं, तब गन्धर्व उन्हें लौटा देते हैं, क्योंकि गन्धर्वराज अप्सराओं और देवपुत्रों के साथ कुबेर के भवन से वहाँ पहले ही आ चुका है। उन्हें हटाने के लिए भेजे गए सैनिकों की गन्धर्व हँसी उड़ाते हैं और कहते हैं कि लौट जाओ नहीं तो मरोगे; सैनिक भागकर अपने राजा के पास लौट आते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.241.1)
अथ दुर्योधनो राजा तत्रतत्र वने वसन् । जगाम घोषानभितस्तत्र चक्रे निवेशनम् ॥
atha duryodhano rājā tatratatra vane vasan | jagāma ghoṣānabhitastatra cakre niveśanam
तब राजा दुर्योधन वन में जगह-जगह ठहरता हुआ गोष्ठों के पास पहुँचा और वहाँ उसने डेरा डाला।
श्लोक 2 (3.241.2)
रमणीये समाज्ञाते सोदके समहीरुहे । देशे सर्वगुणोपेते चक्रुरावसथान्नराः ॥
ramaṇīye samājñāte sodake samahīruhe | deśe sarvaguṇopete cakrurāvasathānnarāḥ
जल और वृक्षों से युक्त, सब गुणों से सम्पन्न, एक सुन्दर और जाने-पहचाने स्थान पर उसके लोगों ने आवास बनाए।
श्लोक 3 (3.241.3)
तथैव तत्समीपस्थान्पृथगावसथान्बहून् । कर्णस्य शकुनेश्चैव भ्रातॄणां चैव सर्वशः ॥
tathaiva tatsamīpasthānpṛthagāvasathānbahūn | karṇasya śakuneścaiva bhrātṝṇāṃ caiva sarvaśaḥ
इसी प्रकार उसके पास ही कर्ण, शकुनि और सभी भाइयों के लिए अलग-अलग अनेक आवास बनाए गए।
श्लोक 4 (3.241.4)
पश्यन्तस्ते तदा गावः शतशोऽथ सहस्रशः । अङ्कैर्लक्षैश्च ताः सर्वा लक्षयामास पार्थिवः ॥
paśyantaste tadā gāvaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | aṅkairlakṣaiśca tāḥ sarvā lakṣayāmāsa pārthivaḥ
जब वे सैकड़ों-हज़ारों गौओं को देख रहे थे, तब राजा ने उन सबको चिह्नों और गिनती के द्वारा अंकित करवाया।
श्लोक 5 (3.241.5)
अङ्कयामास वत्सांश्च जज्ञे चोपसृतांस्त्वपि । बालवत्साश्च या गावः कालयामास ता अपि ॥
aṅkayāmāsa vatsāṃśca jajñe copasṛtāṃstvapi | bālavatsāśca yā gāvaḥ kālayāmāsa tā api
उसने बछड़ों पर चिह्न लगवाए, सधाने योग्य बछड़ों को पहचाना, और जिन गौओं के बछड़े छोटे थे, उनकी भी गिनती करवाई।
श्लोक 6 (3.241.6)
अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान् । वृतो गोपालकैः प्रीतो व्याहरत्कुरुनन्दनः ॥
atha sa smāraṇaṃ kṛtvā lakṣayitvā trihāyanān | vṛto gopālakaiḥ prīto vyāharatkurunandanaḥ
फिर गिनती पूरी करके और तीन वर्ष के बैलों को चिह्नित करके कुरुनन्दन दुर्योधन ग्वालों से घिरा हुआ प्रसन्नता से विहार करने लगा।
श्लोक 7 (3.241.7)
स च पौरजनः सर्वः सैनिकाश्च सहस्रशः । यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन्यथाऽमराः ॥
sa ca paurajanaḥ sarvaḥ sainikāśca sahasraśaḥ | yathopajoṣaṃ cikrīḍurvane tasminyathā'marāḥ
और सभी पुरवासी तथा हज़ारों सैनिक उस वन में देवताओं की भाँति इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे।
श्लोक 8 (3.241.8)
ततोऽध्वगमनाच्छ्रान्तं कुशला नृत्यवादितैः । धार्तराष्ट्रमुपातिष्ठन्कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥
tato'dhvagamanācchrāntaṃ kuśalā nṛtyavāditaiḥ | dhārtarāṣṭramupātiṣṭhankanyāścaiva svalaṃkṛtāḥ
तब मार्ग की थकान से श्रान्त धृतराष्ट्रपुत्र की सेवा में नृत्य और वाद्य में कुशल लोग तथा सजी-धजी कन्याएँ उपस्थित हुईं।
श्लोक 9 (3.241.9)
स स्त्रीगणवृतो राजा प्रहृष्टः प्रददौ वसु । तेभ्यो यथार्हमन्नानि पानानि विविधानि च ॥
sa strīgaṇavṛto rājā prahṛṣṭaḥ pradadau vasu | tebhyo yathārhamannāni pānāni vividhāni ca
स्त्रियों के समूह से घिरे हुए प्रसन्न राजा ने उन्हें धन दिया, और यथायोग्य अनेक प्रकार के भोजन और पेय भी दिए।
श्लोक 10 (3.241.10)
ततस्ते सहिताः सर्वे तरक्षून्महिषान्मृगान् । गवयर्क्षवराहांश्च समन्तात्पर्यवारयन् ॥
tataste sahitāḥ sarve tarakṣūnmahiṣānmṛgān | gavayarkṣavarāhāṃśca samantātparyavārayan
फिर सबने मिलकर चारों ओर से लकड़बग्घों, भैंसों, हिरनों, गवयों, भालुओं और सूअरों को घेर लिया।
श्लोक 11 (3.241.11)
स ताञ्छरैर्विनिर्भिद्य गजांश्च सुबहून्वने । रमणीयेषु देशेषु ग्राहयामास वै मृगान् ॥
sa tāñcharairvinirbhidya gajāṃśca subahūnvane | ramaṇīyeṣu deśeṣu grāhayāmāsa vai mṛgān
उसने बाणों से उन्हें और वन के बहुत-से हाथियों को भी बींधा, और रमणीय स्थानों में पशुओं को पकड़वाया।
श्लोक 12 (3.241.12)
गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्च भारत । पश्यन्स रमणीयानि वनान्युपवनानि च ॥
gorasānupayuñjāna upabhogāṃśca bhārata | paśyansa ramaṇīyāni vanānyupavanāni ca
हे भारत, गोरस और अन्य भोगों का सेवन करते हुए, और सुन्दर वनों तथा उपवनों को देखते हुए,
श्लोक 13 (3.241.13)
मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च । अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥
mattabhramarajuṣṭāni barhiṇābhirutāni ca | agacchadānupūrvyeṇa puṇyaṃ dvaitavanaṃ saraḥ
जो मतवाले भौंरों से सेवित थे और मोरों की ध्वनि से गूँजते थे, वह क्रम से पवित्र द्वैतवन सरोवर पर पहुँचा —
श्लोक 14 (3.241.14)
मत्तभ्रमरसंजुष्टं नीलकण्ठरवाकुलम् । सप्तच्छदसमाकीर्णं पुन्नागवकुलैर्युतम् ॥
mattabhramarasaṃjuṣṭaṃ nīlakaṇṭharavākulam | saptacchadasamākīrṇaṃ punnāgavakulairyutam
जो मतवाले भौंरों से भरा था, नीलकण्ठ मोरों की ध्वनि से गूँज रहा था, सप्तच्छद वृक्षों से घिरा था और पुन्नाग तथा बकुल के वृक्षों से युक्त था।
श्लोक 15 (3.241.15)
ऋद्ध्या परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
ṛddhyā paramayā yukto mahendra iva vajrabhṛt | yadṛcchayā ca tatrastho dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ
वह वज्रधारी महेन्द्र के समान परम ऐश्वर्य से सम्पन्न था। और संयोग से वहीं रहने वाले धर्मपुत्र युधिष्ठिर
श्लोक 16 (3.241.16)
ईजे राजर्षियज्ञेन साद्यस्केन विशांपते । दिव्येन विधिना चैव वन्येन कुरुसत्तम ॥
īje rājarṣiyajñena sādyaskena viśāṃpate | divyena vidhinā caiva vanyena kurusattama
हे प्रजानाथ, हे कुरुश्रेष्ठ, एक ही दिन में पूर्ण होने वाला राजर्षियों का साद्यस्क यज्ञ दिव्य विधि से और वन में मिलने वाली सामग्री से कर रहे थे।
श्लोक 17 (3.241.17)
विद्वद्भिः सहितो धीमान्ब्राह्मणैर्वनवासिभिः । कृत्वा निवेशमभितः सरसस्तस्य कौरव । द्रौपद्या सहितो धीमान्धर्मपत्न्या नराधिपः ॥
vidvadbhiḥ sahito dhīmānbrāhmaṇairvanavāsibhiḥ | kṛtvā niveśamabhitaḥ sarasastasya kaurava | draupadyā sahito dhīmāndharmapatnyā narādhipaḥ
वनवासी विद्वान् ब्राह्मण भी उनके साथ थे। हे कौरव, बुद्धिमान् नरेश युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी द्रौपदी के साथ उस सरोवर के किनारे निवास बनाकर रह रहे थे।
श्लोक 18 (3.241.18)
ततो दुर्योधनः प्रेष्यानादिदेश सहानुजः । आक्रीडावसथाञ्शीघ्रं कुरुध्वं सरसोऽभितः ॥
tato duryodhanaḥ preṣyānādideśa sahānujaḥ | ākrīḍāvasathāñśīghraṃ kurudhvaṃ saraso'bhitaḥ
तब अपने छोटे भाइयों सहित दुर्योधन ने सेवकों को आज्ञा दी — "सरोवर के चारों ओर शीघ्र क्रीड़ा-भवन बनाओ।"
श्लोक 19 (3.241.19)
ते तथेत्येव कौरव्यमुक्त्वा वचनकारिणः । चिकीर्षन्तस्तदाक्रीडाञ्जग्मुर्द्वैतवनं सरः ॥
te tathetyeva kauravyamuktvā vacanakāriṇaḥ | cikīrṣantastadākrīḍāñjagmurdvaitavanaṃ saraḥ
"ऐसा ही हो" कहकर आज्ञा का पालन करने वाले वे सेवक क्रीड़ा-भवन बनाने के लिए द्वैतवन सरोवर पर गए।
श्लोक 20 (3.241.20)
सेनाग्र्यं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सरः । प्रविशन्तं वनद्वारि गन्धर्वाः समवारयन् ॥
senāgryaṃ dhārtarāṣṭrasya prāptaṃ dvaitavanaṃ saraḥ | praviśantaṃ vanadvāri gandharvāḥ samavārayan
धृतराष्ट्रपुत्र की सेना का अगला भाग द्वैतवन सरोवर पर पहुँचा; वन के द्वार में प्रवेश करते समय गन्धर्वों ने उसे रोक दिया।
श्लोक 21 (3.241.21)
तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशांपते । कुबेरभवनाद्राजन्नाजगाम गणावृतः ॥
tatra gandharvarājo vai pūrvameva viśāṃpate | kuberabhavanādrājannājagāma gaṇāvṛtaḥ
हे प्रजानाथ, क्योंकि गन्धर्वराज अपने गणों से घिरा हुआ कुबेर के भवन से पहले ही वहाँ आ पहुँचा था;
श्लोक 22 (3.241.22)
गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथाऽऽत्मजैः । विहारशीलैः क्रीडार्थं तेन तत्संवृतं सरः ॥
gaṇairapsarasāṃ caiva tridaśānāṃ tathā''tmajaiḥ | vihāraśīlaiḥ krīḍārthaṃ tena tatsaṃvṛtaṃ saraḥ
अप्सराओं के समूहों और विहारप्रिय देवपुत्रों के साथ वह क्रीड़ा के लिए आया था, और उसने उस सरोवर को घेर रखा था।
श्लोक 23 (3.241.23)
तेन तत्संवृतं दृष्ट्वा ते राजपरिचारकाः । प्रतिजग्मुस्ततो राजन्यत्र दुर्योधनो नृपः ॥
tena tatsaṃvṛtaṃ dṛṣṭvā te rājaparicārakāḥ | pratijagmustato rājanyatra duryodhano nṛpaḥ
हे राजन्, उसके द्वारा घिरे हुए सरोवर को देखकर राजा के वे सेवक वहाँ लौट गए जहाँ राजा दुर्योधन था।
श्लोक 24 (3.241.24)
स तु तेषां वचः श्रुत्वा सैनिकान्युद्धदुर्मदान् । प्रेषयामास कौरव्य उत्सारयत तानिति ॥
sa tu teṣāṃ vacaḥ śrutvā sainikānyuddhadurmadān | preṣayāmāsa kauravya utsārayata tāniti
उनकी बात सुनकर कौरव दुर्योधन ने युद्ध में उन्मत्त रहने वाले सैनिकों को यह कहकर भेजा — "उन्हें वहाँ से हटा दो।"
श्लोक 25 (3.241.25)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञः सेनाग्रयायिनः । सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमब्रुवन् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā rājñaḥ senāgrayāyinaḥ | saro dvaitavanaṃ gatvā gandharvānidamabruvan
राजा की यह आज्ञा सुनकर सेना के अग्रगामी सैनिकों ने द्वैतवन सरोवर पर जाकर गन्धर्वों से कहा —
सैनिका ऊचुः
श्लोक 26 (3.241.26)
राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो बली । चिक्रीडिषुरिहायाति तदर्थमपसर्पत ॥
rājā duryodhano nāma dhṛtarāṣṭrasuto balī | cikrīḍiṣurihāyāti tadarthamapasarpata
धृतराष्ट्र के बलवान् पुत्र राजा दुर्योधन यहाँ क्रीड़ा करने की इच्छा से आ रहे हैं; इसलिए तुम लोग यहाँ से हट जाओ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (3.241.27)
एवमुक्तास्तु गन्धर्वाः प्रहसन्तो विशांपते । प्रत्यब्रुवंस्तान्पुरुषानिदं हि परुषं वचः ॥
evamuktāstu gandharvāḥ prahasanto viśāṃpate | pratyabruvaṃstānpuruṣānidaṃ hi paruṣaṃ vacaḥ
हे प्रजानाथ, ऐसा कहे जाने पर गन्धर्व हँस पड़े और उन लोगों को ये कठोर वचन कहे —
गन्धर्वा ऊचुः
श्लोक 28 (3.241.28)
न चेतयति वो राजा मन्दबुद्धिः सुयोधनः । योऽस्मानाज्ञापयत्येवं वश्यानिव दिवौकसः ॥
na cetayati vo rājā mandabuddhiḥ suyodhanaḥ | yo'smānājñāpayatyevaṃ vaśyāniva divaukasaḥ
तुम्हारा मन्दबुद्धि राजा सुयोधन होश में नहीं है, जो हम स्वर्गवासियों को इस प्रकार आज्ञा दे रहा है मानो हम उसके अधीन हों।
श्लोक 29 (3.241.29)
यूयं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशयः । ये तस्य वचनादेवमस्मान्ब्रूथ विचेतसः ॥
yūyaṃ mumūrṣavaścāpi mandaprajñā na saṃśayaḥ | ye tasya vacanādevamasmānbrūtha vicetasaḥ
और तुम भी निःसंदेह मन्दबुद्धि हो और मरना चाहते हो, अरे विवेकहीनो, जो उसके कहने पर हमसे ऐसी बात कह रहे हो।
श्लोक 30 (3.241.30)
गच्छध्वं त्वरिताः सर्वे यत्र राजा स कौरवः । न चेदद्यैव गच्छध्वं धर्मराजनिवेशनम् ॥
gacchadhvaṃ tvaritāḥ sarve yatra rājā sa kauravaḥ | na cedadyaiva gacchadhvaṃ dharmarājaniveśanam
तुम सब शीघ्र वहाँ लौट जाओ जहाँ वह कौरव राजा है; नहीं तो आज ही धर्मराज यम के घर पहुँच जाओगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (3.241.31)
एवमुक्तास्तु गन्धर्वै राज्ञः सेनाग्रयायिनः । संप्राद्रवन्यतो राजा धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् ॥
evamuktāstu gandharvai rājñaḥ senāgrayāyinaḥ | saṃprādravanyato rājā dhṛtarāṣṭrasuto'bhavat
गन्धर्वों के ऐसा कहने पर राजा के अग्रगामी सैनिक दौड़कर वहाँ लौटे जहाँ धृतराष्ट्रपुत्र राजा था।