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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 240

धृतराष्ट्र द्वारा अनिच्छा से घोषयात्रा की अनुमति

पहले से सिखाए गए एक ग्वाले के संकेत पर कर्ण और शकुनि धृतराष्ट्र से प्रार्थना करते हैं कि दुर्योधन को गौओं की गिनती, बछड़ों पर चिह्न लगाने और शिकार के लिए जाने दिया जाए। राजा पहले मना करते हैं: पाण्डव पास ही ठहरे हैं, भीम और द्रौपदी अपमान क्षमा नहीं करेंगे, अर्जुन स्वर्ग से दिव्य अस्त्र लेकर लौटा है, और कोई भी टकराव विनाश या कलंक में समाप्त होगा। शकुनि विश्वास दिलाता है कि युधिष्ठिर अपनी प्रतिज्ञा निभाएँगे और वे पाण्डवों के निवास के पास नहीं जाएँगे; तब धृतराष्ट्र अनिच्छा से अनुमति दे देते हैं। दुर्योधन भाइयों, कर्ण, शकुनि, पुरवासियों और विशाल सेना व साज-सामान के साथ निकलता है और द्वैतवन सरोवर से कुछ दूरी पर पड़ाव डालता है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.240.1)

धृतराष्ट्रं ततः सर्वेददृशुर्जनमेजय । दृष्ट्वा सुखमथो राज्ञः पृष्टा राज्ञा च भारत ॥

dhṛtarāṣṭraṃ tataḥ sarvedadṛśurjanamejaya | dṛṣṭvā sukhamatho rājñaḥ pṛṣṭā rājñā ca bhārata

हे जनमेजय, तब वे सब धृतराष्ट्र से मिले। हे भारत, उन्होंने राजा को कुशल देखा और राजा ने भी उनसे कुशल पूछा।

श्लोक 2 (3.240.2)

ततस्तैर्विहितः पूर्वं संगवो नाम वल्लवः । समीपस्थास्तदा गावो धृतराष्ट्रे न्यवेदयत् ॥

tatastairvihitaḥ pūrvaṃ saṃgavo nāma vallavaḥ | samīpasthāstadā gāvo dhṛtarāṣṭre nyavedayat

तब उनके द्वारा पहले से सिखाए हुए संगव नामक ग्वाले ने धृतराष्ट्र को बताया कि गौएँ इस समय पास ही हैं।

श्लोक 3 (3.240.3)

अनन्तरं च राधेयः शकुनिश्च विशांपते । आहतुः पार्थिवश्रेष्ठं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥

anantaraṃ ca rādheyaḥ śakuniśca viśāṃpate | āhatuḥ pārthivaśreṣṭhaṃ dhṛtarāṣṭraṃ janādhipam

हे प्रजानाथ, उसके तुरन्त बाद राधानन्दन कर्ण और शकुनि ने राजाओं में श्रेष्ठ, जनाधिप धृतराष्ट्र से कहा —

कर्णशकुनी ऊचतुः

श्लोक 4 (3.240.4)

रमणीयेषु देशेषु घोषाः संप्रति कौरव । स्मारणे समयः प्राप्तो वत्सानामपि चाङ्कनम् ॥

ramaṇīyeṣu deśeṣu ghoṣāḥ saṃprati kaurava | smāraṇe samayaḥ prāpto vatsānāmapi cāṅkanam

हे कौरव, इस समय गोष्ठ रमणीय प्रदेशों में हैं। गौओं की गिनती का और बछड़ों पर चिह्न लगाने का समय आ गया है।

श्लोक 5 (3.240.5)

मृगया चोचिता राजन्नस्मिन्काले सुतस्यते । दुर्योधनस्य गमनं त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥

mṛgayā cocitā rājannasminkāle sutasyate | duryodhanasya gamanaṃ tvamanujñātumarhasi

हे राजन्, इस ऋतु में आपके पुत्र के लिए शिकार भी उचित है। अतः आप दुर्योधन को जाने की अनुमति दें।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 6 (3.240.6)

मृगया शोभना तात गवां हि समवेक्षणम् । विस्रम्भस्तु न गन्तव्यो वल्लवानामिति स्मरे ॥

mṛgayā śobhanā tāta gavāṃ hi samavekṣaṇam | visrambhastu na gantavyo vallavānāmiti smare

तात, शिकार अच्छा है और गौओं की देखभाल भी; परन्तु मुझे याद है कि ग्वालों पर पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए।

श्लोक 7 (3.240.7)

ते तु तत्रनरव्याघ्राः समीप इति नः श्रुतम् । अतो नाभ्यनुजानामि गमनं तत्र वः स्वयम् ॥

te tu tatranaravyāghrāḥ samīpa iti naḥ śrutam | ato nābhyanujānāmi gamanaṃ tatra vaḥ svayam

किन्तु हमने सुना है कि वे नरश्रेष्ठ पाण्डव वहीं पास में हैं। इसलिए मैं तुम्हें स्वयं वहाँ जाने की अनुमति नहीं देता।

श्लोक 8 (3.240.8)

छद्मना निर्जितास्ते तु कर्शिताश्च महावने । तपोनित्याश्च राधेय समर्थाश्च महारथाः ॥

chadmanā nirjitāste tu karśitāśca mahāvane | taponityāśca rādheya samarthāśca mahārathāḥ

राधानन्दन, वे छल से जीते गए हैं और महावन में कष्ट से दुर्बल हो गए हैं; फिर भी वे नित्य तप में लगे रहते हैं, समर्थ हैं और महारथी हैं।

श्लोक 9 (3.240.9)

धर्मराजो न संक्रुद्ध्येद्भीमसेनस्त्वमर्षणः । यज्ञसेनस्य दुहिता तेज एवतु केवलम् ॥

dharmarājo na saṃkruddhyedbhīmasenastvamarṣaṇaḥ | yajñasenasya duhitā teja evatu kevalam

धर्मराज तो क्रोध नहीं करेंगे, परन्तु भीमसेन असहिष्णु है, और यज्ञसेन की पुत्री द्रौपदी तो साक्षात् अग्नि ही है।

श्लोक 10 (3.240.10)

यूयंचाप्यपराध्येयुर्दर्पमोहसमन्विताः । ततो विनिर्दहेयुस्ते तपसा हि समन्विताः ॥

yūyaṃcāpyaparādhyeyurdarpamohasamanvitāḥ | tato vinirdaheyuste tapasā hi samanvitāḥ

और तुम लोग अहंकार और मोह में भरकर कोई अपराध कर बैठोगे; तब तप से सम्पन्न वे तुम्हें भस्म कर देंगे।

श्लोक 11 (3.240.11)

अथवा सायुधावीरा मन्युनाऽभिपरिप्लुताः । सहिता बद्धनिस्त्रिंशा दहेयुः शस्त्रतेजसा ॥

athavā sāyudhāvīrā manyunā'bhipariplutāḥ | sahitā baddhanistriṃśā daheyuḥ śastratejasā

अथवा वे वीर क्रोध से भरकर, शस्त्र लेकर और तलवारें बाँधकर, एक साथ अपने शस्त्रों के तेज से तुम्हें जला डालेंगे।

श्लोक 12 (3.240.12)

अथ यूयं बहुत्वात्तानारभध्वं कथंचन । अनार्यं परमं तत्स्यादशक्यं तच्च वै मतम् ॥

atha yūyaṃ bahutvāttānārabhadhvaṃ kathaṃcana | anāryaṃ paramaṃ tatsyādaśakyaṃ tacca vai matam

और यदि तुम अपनी अधिक संख्या के भरोसे किसी प्रकार उन पर आक्रमण करोगे, तो वह अत्यन्त अनार्य कर्म होगा, और उसे असम्भव भी माना जाता है।

श्लोक 13 (3.240.13)

उषितो हि महाबाहुरिन्द्रलोके धनंजयः । दिव्यान्यस्त्राण्यवाप्याथ ततः प्रत्यागतो वनं ॥

uṣito hi mahābāhurindraloke dhanaṃjayaḥ | divyānyastrāṇyavāpyātha tataḥ pratyāgato vanaṃ

महाबाहु धनंजय इन्द्रलोक में रह चुका है, और दिव्य अस्त्र प्राप्त करके वहाँ से फिर वन में लौट आया है।

श्लोक 14 (3.240.14)

अकृतास्त्रेण पृथिवी जिता बीभत्सुना पुरा । किं पुनः सकृतास्त्रोऽद्य न हन्याद्वो महारथः ॥

akṛtāstreṇa pṛthivī jitā bībhatsunā purā | kiṃ punaḥ sakṛtāstro'dya na hanyādvo mahārathaḥ

बीभत्सु अर्जुन ने पहले बिना दिव्य अस्त्रों के ही पृथ्वी जीत ली थी; अब अस्त्रों में निपुण होकर वह महारथी तुम्हें क्यों न मार डालेगा?

श्लोक 15 (3.240.15)

अथवा मद्वचः श्रुत्वा तत्र यत्ता भविष्यथ । उद्विग्नवासा विस्रब्धा दुःखं तत्रगमिष्यथ ॥

athavā madvacaḥ śrutvā tatra yattā bhaviṣyatha | udvignavāsā visrabdhā duḥkhaṃ tatragamiṣyatha

अथवा मेरी बात सुनकर यदि तुम वहाँ सावधान रहोगे, तो तुम्हारा वहाँ रहना उद्वेग से भरा होगा, और निश्चिन्त रहने पर भी तुम वहाँ दुःख ही पाओगे।

श्लोक 16 (3.240.16)

अथवा सैनिकाः केचिदपकुर्युर्युधिष्ठिरे । तदबुद्धिकृतंकर्म दोषमुत्पादयेच्च वः ॥

athavā sainikāḥ kecidapakuryuryudhiṣṭhire | tadabuddhikṛtaṃkarma doṣamutpādayecca vaḥ

अथवा कोई सैनिक युधिष्ठिर का कुछ अनिष्ट कर दे, तो बिना सोचे-समझे किया गया वह कर्म तुम पर दोष ला देगा।

श्लोक 17 (3.240.17)

तस्मादन्ये नरा यान्तु स्मारणायाप्तकारिणः । न स्वयं तत्रगमनं रोचये तव भारत ॥

tasmādanye narā yāntu smāraṇāyāptakāriṇaḥ | na svayaṃ tatragamanaṃ rocaye tava bhārata

इसलिए गौओं की गिनती के लिए दूसरे विश्वस्त लोग जाएँ। हे भारत, तुम्हारा स्वयं वहाँ जाना मुझे ठीक नहीं लगता।

शकुनिरुवाच

श्लोक 18 (3.240.18)

धर्मज्ञः पाण्डवो ज्येष्ठः प्रतिज्ञातं च संसदि । तेन द्वादशवर्षाणि वस्तव्यानीति भारत ॥

dharmajñaḥ pāṇḍavo jyeṣṭhaḥ pratijñātaṃ ca saṃsadi | tena dvādaśavarṣāṇi vastavyānīti bhārata

हे भारत, ज्येष्ठ पाण्डव धर्म को जानते हैं, और उन्होंने सभा में प्रतिज्ञा की थी कि उन्हें बारह वर्ष वन में रहना है।

श्लोक 19 (3.240.19)

अनुवृत्ताश्च तं सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो न नः कोपं करिष्यति ॥

anuvṛttāśca taṃ sarve pāṇḍavā dharmacāriṇaḥ | yudhiṣṭhirastu kaunteyo na naḥ kopaṃ kariṣyati

धर्म का आचरण करने वाले सभी पाण्डव उन्हीं का अनुसरण करते हैं; और कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर हम पर क्रोध नहीं करेंगे।

श्लोक 20 (3.240.20)

मृगयां चैव नो गन्तुमिच्छा संवर्धते भृशम् । स्मारणं तु चिकीर्षामो न तु पाण्डवदर्शनम् ॥

mṛgayāṃ caiva no gantumicchā saṃvardhate bhṛśam | smāraṇaṃ tu cikīrṣāmo na tu pāṇḍavadarśanam

शिकार पर जाने की हमारी इच्छा बहुत बढ़ रही है; हम तो गौओं की गिनती करना चाहते हैं, पाण्डवों से मिलना नहीं।

श्लोक 21 (3.240.21)

न चानार्यसमाचारः कश्चित्तत्र भविष्यति । न च तत्र गमिष्यामो यत्र तेषां प्रतिश्रयः ॥

na cānāryasamācāraḥ kaścittatra bhaviṣyati | na ca tatra gamiṣyāmo yatra teṣāṃ pratiśrayaḥ

वहाँ कोई अनार्य आचरण नहीं होगा, और जहाँ उनका निवास है, वहाँ हम जाएँगे भी नहीं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (3.240.22)

एवमुक्तः शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । दुर्योधनं सहामात्यमनुजज्ञे न कामतः ॥

evamuktaḥ śakuninā dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | duryodhanaṃ sahāmātyamanujajñe na kāmataḥ

शकुनि के ऐसा कहने पर जनेश्वर धृतराष्ट्र ने न चाहते हुए भी दुर्योधन को मन्त्रियों सहित जाने की अनुमति दे दी।

श्लोक 23 (3.240.23)

अनुज्ञातस्तु गान्धारिः कर्णेन सहितस्तदा । निर्ययौ भरतश्रेष्ठो बलेन महता वृतः ॥

anujñātastu gāndhāriḥ karṇena sahitastadā | niryayau bharataśreṣṭho balena mahatā vṛtaḥ

अनुमति पाकर भरतश्रेष्ठ गान्धारीपुत्र दुर्योधन कर्ण के साथ विशाल सेना से घिरकर निकल पड़ा।

श्लोक 24 (3.240.24)

दुःशासनेन च तथा सौबलेन च धीमता । संवृतो भ्रातृभिश्चान्यैः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ॥

duḥśāsanena ca tathā saubalena ca dhīmatā | saṃvṛto bhrātṛbhiścānyaiḥ strībhiścāpi sahasraśaḥ

उसके साथ दुःशासन और बुद्धिमान् शकुनि थे, तथा अन्य भाई और हज़ारों स्त्रियाँ भी उसे घेरे हुए थीं।

श्लोक 25 (3.240.25)

तं निर्यान्तं महाबाहुं द्रष्टुं द्वैतवनं सरः । पौराश्चानुययुः सर्वेसहदारा वनं च तत् ॥

taṃ niryāntaṃ mahābāhuṃ draṣṭuṃ dvaitavanaṃ saraḥ | paurāścānuyayuḥ sarvesahadārā vanaṃ ca tat

जब वह महाबाहु द्वैतवन सरोवर देखने निकला, तब सभी पुरवासी भी अपनी पत्नियों सहित उसके पीछे-पीछे उस वन की ओर चल पड़े।

श्लोक 26 (3.240.26)

अष्टौ रथसहस्राणि त्रीणि नागायुतानि च । पत्तयो बहुसाहस्रा हयाश्च नवतिः शताः ॥

aṣṭau rathasahasrāṇi trīṇi nāgāyutāni ca | pattayo bahusāhasrā hayāśca navatiḥ śatāḥ

आठ हज़ार रथ, तीस हज़ार हाथी, कई हज़ार पैदल सैनिक और नौ हज़ार घोड़े थे;

श्लोक 27 (3.240.27)

शकटापणवेशाश्च वणिजो वन्दिनस्तथा । नराश्च मृगयाशीलाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

śakaṭāpaṇaveśāśca vaṇijo vandinastathā | narāśca mṛgayāśīlāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

छकड़े, दुकानें और वेश्याओं के डेरे, व्यापारी और बन्दीजन, तथा शिकार के शौकीन सैकड़ों-हज़ारों लोग भी साथ थे।

श्लोक 28 (3.240.28)

ततः प्रयाणे नृपतेः सुमहानभवत्स्वनः । प्रावृषीव महावायोरुत्थितस्य विशांपते ॥

tataḥ prayāṇe nṛpateḥ sumahānabhavatsvanaḥ | prāvṛṣīva mahāvāyorutthitasya viśāṃpate

हे प्रजानाथ, तब राजा के प्रस्थान के समय वर्षा ऋतु में उठी प्रचण्ड आँधी के समान भारी कोलाहल हुआ।

श्लोक 29 (3.240.29)

गव्यूतिमात्रेन्यवसद्राजा दुर्योधनस्तदा । प्रयातो वाहनैः सर्वैस्ततो द्वैतवनं सरः ॥

gavyūtimātrenyavasadrājā duryodhanastadā | prayāto vāhanaiḥ sarvaistato dvaitavanaṃ saraḥ

राजा दुर्योधन ने एक गव्यूति (दो कोस) चलकर पड़ाव डाला, और फिर वहाँ से सब वाहनों के साथ द्वैतवन सरोवर की ओर बढ़ा।

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