आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 239
घोषयात्रा का बहाना
दुर्योधन कर्ण से कहता है कि वह पाण्डवों और द्रौपदी को दुःख में देखना और स्वयं अपने वैभव में उन्हें दिखना चाहता है, पर उसे डर है कि पाण्डवों के लिए शोक करने वाले और उसके इरादे पर संदेह करने वाले धृतराष्ट्र उसे द्वैतवन जाने नहीं देंगे। वह कर्ण, शकुनि और दुःशासन से कोई उपाय खोजने को कहता है। अगली सुबह कर्ण द्वैतवन के पास राजकीय गोष्ठों के निरीक्षण (घोषयात्रा) को बहाना बनाने का सुझाव देता है; शकुनि सहमत होता है, और हँसते हुए, ताली बजाते हुए वे सब धृतराष्ट्र से मिलने जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.239.1)
कर्णस्य वचनं श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्ततः । हृष्टो भूत्वापुनर्दीनो राधेयमिदमब्रवीत् ॥
karṇasya vacanaṃ śrutvā rājā duryodhanastataḥ | hṛṣṭo bhūtvāpunardīno rādheyamidamabravīt
कर्ण की बात सुनकर राजा दुर्योधन पहले तो हर्षित हुआ, फिर उदास होकर राधानन्दन कर्ण से यह बोला।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 2 (3.239.2)
ब्रवीषि यदिदं कर्ण सर्वं मनसि मे स्थितम् । न त्वभ्यनुज्ञां लप्स्यामि गमने यत्रपाण्डवाः ॥
bravīṣi yadidaṃ karṇa sarvaṃ manasi me sthitam | na tvabhyanujñāṃ lapsyāmi gamane yatrapāṇḍavāḥ
कर्ण, तुम जो कह रहे हो, वह सब मेरे मन में भी बसा है; परन्तु जहाँ पाण्डव हैं, वहाँ जाने की अनुमति मुझे नहीं मिलेगी।
श्लोक 3 (3.239.3)
परिदेवति तान्वीरान्धृतराष्ट्रो महीपतिः । मन्यतेऽभ्यधिकांश्चापि तपोयोगेन पाण्डवान् ॥
paridevati tānvīrāndhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | manyate'bhyadhikāṃścāpi tapoyogena pāṇḍavān
महाराज धृतराष्ट्र उन वीरों के लिए विलाप करते रहते हैं, और तप के बल के कारण पाण्डवों को हमसे बढ़कर भी मानते हैं।
श्लोक 4 (3.239.4)
अथवाऽप्यनुबुध्येत नृपोऽस्माकं चिकीर्षितम् । एतामप्यायतिं रक्षन्नाभ्यनुज्ञातुमर्हति ॥
athavā'pyanubudhyeta nṛpo'smākaṃ cikīrṣitam | etāmapyāyatiṃ rakṣannābhyanujñātumarhati
अथवा यदि महाराज हमारे इरादे को भाँप लें, तो आगे के परिणाम से बचने के लिए भी वे हमें अनुमति नहीं देंगे।
श्लोक 5 (3.239.5)
न हि द्वैतवने किंचिद्विद्यतेऽन्यत्प्रयोजनम् । उन्माथनमृते तेषां वनस्थानामपि द्विषाम् ॥
na hi dvaitavane kiṃcidvidyate'nyatprayojanam | unmāthanamṛte teṣāṃ vanasthānāmapi dviṣām
क्योंकि द्वैतवन में वन में रहने वाले उन शत्रुओं को कुचलने के सिवा हमारा और कोई प्रयोजन नहीं है।
श्लोक 6 (3.239.6)
जानासिहि यथा क्षत्ता द्यूतकाल उपस्थिते । अब्रवीद्यच्च मां त्वां च सौबलं वचनं तदा ॥
jānāsihi yathā kṣattā dyūtakāla upasthite | abravīdyacca māṃ tvāṃ ca saubalaṃ vacanaṃ tadā
तुम तो जानते ही हो कि जब द्यूत का समय आया था, तब विदुर ने मुझसे, तुमसे और शकुनि से क्या कहा था।
श्लोक 7 (3.239.7)
तानिसर्वाणि वाक्यानि यच्चान्यत्परिदेवितम् । विचिन्त्य निश्चयं गच्छे गमनायेतराय वा ॥
tānisarvāṇi vākyāni yaccānyatparidevitam | vicintya niścayaṃ gacche gamanāyetarāya vā
उन सब बातों और उनके अन्य विलाप पर विचार करके मैं निश्चय करूँगा कि जाऊँ या यहीं रहूँ।
श्लोक 8 (3.239.8)
ममापि हिमहान्हर्षो यदहं भीमफल्गुनौ । क्लिष्टावरण्ये पश्येयं कृष्णया सहिताविति ॥
mamāpi himahānharṣo yadahaṃ bhīmaphalgunau | kliṣṭāvaraṇye paśyeyaṃ kṛṣṇayā sahitāviti
मुझे भी बड़ा हर्ष होगा यदि मैं भीम और अर्जुन को कृष्णा के साथ वन में क्लेश भोगते देख सकूँ।
श्लोक 9 (3.239.9)
न तथा ह्याप्नुयां प्रीतिमवाप्य वसुधामिमाम् । दृष्ट्वा यथा पाण्डुसुतान्वल्कलाजिनवाससः ॥
na tathā hyāpnuyāṃ prītimavāpya vasudhāmimām | dṛṣṭvā yathā pāṇḍusutānvalkalājinavāsasaḥ
इस पृथ्वी को पाकर भी मुझे वैसी प्रसन्नता नहीं होगी, जैसी पाण्डुपुत्रों को वल्कल और मृगचर्म पहने देखकर होगी।
श्लोक 10 (3.239.10)
किंनु स्यादधिकं तस्माद्यदहं द्रुपदात्मजाम् । द्रौपदीं कर्ण पश्येयं काषायवसनां वने ॥
kiṃnu syādadhikaṃ tasmādyadahaṃ drupadātmajām | draupadīṃ karṇa paśyeyaṃ kāṣāyavasanāṃ vane
कर्ण, इससे बढ़कर और क्या होगा कि मैं द्रुपदकुमारी द्रौपदी को वन में गेरुए वस्त्र पहने देखूँ?
श्लोक 11 (3.239.11)
यदि मां धर्मराजश्च भीमसेनश्च पाण्डवः । युक्तं परमया लक्ष्म्या पश्येतां जीवितं भवेत् ॥
yadi māṃ dharmarājaśca bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | yuktaṃ paramayā lakṣmyā paśyetāṃ jīvitaṃ bhavet
यदि धर्मराज और पाण्डुपुत्र भीमसेन मुझे परम लक्ष्मी से युक्त देखें, तभी मेरा जीवन सार्थक होगा।
श्लोक 12 (3.239.12)
उपायं न तु पश्यामि येन गच्छेम तद्वनम् । यथाचाभ्यनुजानीयाद्गच्छन्तं मां महीपतिः ॥
upāyaṃ na tu paśyāmi yena gacchema tadvanam | yathācābhyanujānīyādgacchantaṃ māṃ mahīpatiḥ
परन्तु मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं सूझता जिससे हम उस वन में जा सकें और महाराज मुझे जाने की अनुमति दे दें।
श्लोक 13 (3.239.13)
स सौबलेन सहितस्तथा दुःशासनेन च । उपायं पश्य निपुणं येन गच्छेम तद्वनम् ॥
sa saubalena sahitastathā duḥśāsanena ca | upāyaṃ paśya nipuṇaṃ yena gacchema tadvanam
तुम शकुनि और दुःशासन के साथ मिलकर कोई चतुर उपाय सोचो, जिससे हम उस वन में जा सकें।
श्लोक 14 (3.239.14)
अहमप्यनुगच्छामि गमनायेतराय च । कल्यमेव गमिष्यामि समीपं पार्थिवस्य ह ॥
ahamapyanugacchāmi gamanāyetarāya ca | kalyameva gamiṣyāmi samīpaṃ pārthivasya ha
जाने या न जाने का जो भी निर्णय हो, मैं भी उसमें साथ दूँगा। कल प्रातः ही मैं महाराज के पास जाऊँगा।
श्लोक 15 (3.239.15)
मयि तत्रोपविष्टे तु भीष्मे च कुरुसत्तमे । उपायो यो भवेद्दृष्टस्तं ब्रूयाः सहसौबलः ॥
mayi tatropaviṣṭe tu bhīṣme ca kurusattame | upāyo yo bhaveddṛṣṭastaṃ brūyāḥ sahasaubalaḥ
जब मैं और कुरुश्रेष्ठ भीष्म वहाँ बैठे हों, तब तुम शकुनि के साथ जो उपाय सूझा हो, उसे कहना।
श्लोक 16 (3.239.16)
ततो भीष्मस्य राज्ञश्च निशम्य गमनं प्रति । व्यवसायं करिष्येऽहमनुनीय पितामहम् ॥
tato bhīṣmasya rājñaśca niśamya gamanaṃ prati | vyavasāyaṃ kariṣye'hamanunīya pitāmaham
तब जाने के विषय में भीष्म और महाराज की बात सुनकर, पितामह को मनाकर मैं निश्चय करूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (3.239.17)
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे जग्मुरावसथान्प्रति । व्युषितायां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् ॥
tathetyuktvā tu te sarve jagmurāvasathānprati | vyuṣitāyāṃ rajanyāṃ tu karṇo rājānamabhyayāt
"ऐसा ही हो" कहकर वे सब अपने-अपने निवास को चले गए। रात बीतने पर कर्ण राजा दुर्योधन के पास आया।
श्लोक 18 (3.239.18)
ततो दुर्योधनं कर्णः प्रहसन्निदमब्रवीत् । उपायः परिदृष्टोऽयं तं निबोधजनेश्वर ॥
tato duryodhanaṃ karṇaḥ prahasannidamabravīt | upāyaḥ paridṛṣṭo'yaṃ taṃ nibodhajaneśvara
तब कर्ण ने हँसते हुए दुर्योधन से कहा — "उपाय मिल गया है; हे जनेश्वर, उसे सुनो।
कर्ण उवाच
श्लोक 19 (3.239.19)
घोषा द्वैतवने सर्वेत्वत्प्रतीक्षा नराधिप । घोषयात्रापदेशेन गमिष्यामो न संशयः ॥
ghoṣā dvaitavane sarvetvatpratīkṣā narādhipa | ghoṣayātrāpadeśena gamiṣyāmo na saṃśayaḥ
हे नराधिप, द्वैतवन के सारे गोष्ठ तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं। घोषयात्रा अर्थात् गोष्ठों के निरीक्षण के बहाने हम वहाँ जाएँगे, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 20 (3.239.20)
उचितं हि सदा गन्तुं घोषयात्रां विशांपते । एवं चेत्त्वां पिता राजन्समनुज्ञातुमर्हति ॥
ucitaṃ hi sadā gantuṃ ghoṣayātrāṃ viśāṃpate | evaṃ cettvāṃ pitā rājansamanujñātumarhati
हे प्रजानाथ, घोषयात्रा पर जाना तो सदा से उचित रहा है। ऐसा कहा जाए तो हे राजन्, तुम्हारे पिता तुम्हें अवश्य अनुमति दे देंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (3.239.21)
तथा कथयमानौ तु घोषयात्राविनिश्चयम् । गान्धारराजः शकुनिरित्युवाच हसन्निव ॥
tathā kathayamānau tu ghoṣayātrāviniścayam | gāndhārarājaḥ śakunirityuvāca hasanniva
जब वे दोनों इस प्रकार घोषयात्रा के निश्चय की चर्चा कर रहे थे, तब गान्धारराज शकुनि मानो हँसते हुए बोला —
शकुनिरुवाच
श्लोक 22 (3.239.22)
उपायोऽयंमया दृष्टो गमनाय निरामयः । अनुज्ञास्यतिनो राजा चोदयिष्यति चाप्युत ॥
upāyo'yaṃmayā dṛṣṭo gamanāya nirāmayaḥ | anujñāsyatino rājā codayiṣyati cāpyuta
जाने का यही निर्विघ्न उपाय मैंने भी देखा है। महाराज हमें अनुमति देंगे और जाने के लिए प्रेरित भी करेंगे।
श्लोक 23 (3.239.23)
घोषा द्वैतवने सर्वेत्वत्प्रतीक्षा नराधिप । घोषयात्रापदेशेन गमिष्यामः सरः प्रति ॥
ghoṣā dvaitavane sarvetvatpratīkṣā narādhipa | ghoṣayātrāpadeśena gamiṣyāmaḥ saraḥ prati
हे नराधिप, द्वैतवन के सारे गोष्ठ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। घोषयात्रा के बहाने हम उस सरोवर तक जाएँगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (3.239.24)
ततः प्रहसिताः सर्वे तेऽन्योन्यस्य तलान्ददुः । तदेव च विनिश्चित्य ददृशुः कुरुसत्तमम् ॥
tataḥ prahasitāḥ sarve te'nyonyasya talāndaduḥ | tadeva ca viniścitya dadṛśuḥ kurusattamam
तब वे सब हँसते हुए एक-दूसरे के हाथ पर ताली देने लगे, और यही निश्चय करके कुरुश्रेष्ठ धृतराष्ट्र से मिलने गए।