आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 238
कर्ण और शकुनि द्वारा दुर्योधन को वैभव-प्रदर्शन के लिए उकसाना
धृतराष्ट्र का विलाप सुनने के बाद शकुनि और कर्ण दुर्योधन से कहते हैं कि सारी पृथ्वी और जो लक्ष्मी कभी युधिष्ठिर के पास दमकती थी, वह अब उसकी है, जबकि पाण्डव सब कुछ खोकर द्वैतवन सरोवर के पास रह रहे हैं। वे उसे पूरे ठाट-बाट के साथ वहाँ जाने को उकसाते हैं, ताकि वनवासी पाण्डव और विशेषकर वल्कल पहने द्रौपदी उसे और उसकी सजी-धजी पत्नियों को देखकर दुःखी हों। इतना कहकर दोनों चुप हो जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.238.1)
धृतराष्ट्रस्य तद्वाक्यं निशम्य शकुनिस्तदा । दुर्योधनमिदं काले कर्णेन सहितोऽब्रवीत् ॥
dhṛtarāṣṭrasya tadvākyaṃ niśamya śakunistadā | duryodhanamidaṃ kāle karṇena sahito'bravīt
धृतराष्ट्र की वह बात सुनकर तब शकुनि ने कर्ण के साथ मिलकर उपयुक्त अवसर देखकर दुर्योधन से यह कहा।
शकुनिरुवाच
श्लोक 2 (3.238.2)
प्रव्राज्य पाण्डवान्वीरान्स्वेन वीर्येण भारत । भुङ्क्ष्वेमां पृथिवीमेको दिवि शम्बरहायथा ॥
pravrājya pāṇḍavānvīrānsvena vīryeṇa bhārata | bhuṅkṣvemāṃ pṛthivīmeko divi śambarahāyathā
हे भारत, अपने ही पराक्रम से वीर पाण्डवों को वन में निकालकर तुम इस पृथ्वी का अकेले वैसे ही उपभोग करो, जैसे शम्बरासुर को मारने वाले इन्द्र स्वर्ग का उपभोग करते हैं।
श्लोक 3 (3.238.3)
तवाद्यपृथिवी राजन्नखिला सागराम्बरा । सपर्वतवनाकारा सहस्थावरजङ्गमा ॥
tavādyapṛthivī rājannakhilā sāgarāmbarā | saparvatavanākārā sahasthāvarajaṅgamā
हे राजन्, समुद्र को वस्त्र की भाँति धारण करने वाली यह सम्पूर्ण पृथ्वी आज पर्वतों, वनों और समस्त चर-अचर प्राणियों सहित तुम्हारी है।
श्लोक 4 (3.238.4)
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च प्रतीच्योदीच्यवासिनः । कृताः करप्रदाः सर्वे राजानस्ते नराधिप ॥
prācyāśca dākṣiṇātyāśca pratīcyodīcyavāsinaḥ | kṛtāḥ karapradāḥ sarve rājānaste narādhipa
हे नरेश्वर, पूर्व और दक्षिण के तथा पश्चिम और उत्तर में रहने वाले सभी राजाओं को तुमने कर देने वाला बना दिया है।
श्लोक 5 (3.238.5)
या हि सा दीप्यमानेव पाण्डवान्भजते पुरा । साऽद्यलक्ष्मीस्त्वया राजन्नवाप्ता भ्रातृभिः सह ॥
yā hi sā dīpyamāneva pāṇḍavānbhajate purā | sā'dyalakṣmīstvayā rājannavāptā bhrātṛbhiḥ saha
जो लक्ष्मी पहले दमकती हुई-सी पाण्डवों का साथ देती थी, हे राजन्, वही आज तुमने अपने भाइयों सहित प्राप्त कर ली है।
श्लोक 6 (3.238.6)
इन्द्रप्रस्थगते यां तां दीप्यमानां युधिष्ठिरे । अपश्याम श्रियं राजन्सुचिरं शोककर्शिताः ॥
indraprasthagate yāṃ tāṃ dīpyamānāṃ yudhiṣṭhire | apaśyāma śriyaṃ rājansuciraṃ śokakarśitāḥ
हे राजन्, इन्द्रप्रस्थ जाने पर जिस दमकती हुई राजलक्ष्मी को हमने युधिष्ठिर के पास देखा था, उसके कारण हम बहुत समय तक शोक से घुलते रहे।
श्लोक 7 (3.238.7)
सा तु बुद्धिबलेनेयं राज्ञस्तस्मात्तथाविधात् । त्वयाक्षिप्ता महाबाहो दीप्यमानेव दृश्यते ॥
sā tu buddhibaleneyaṃ rājñastasmāttathāvidhāt | tvayākṣiptā mahābāho dīpyamāneva dṛśyate
किन्तु हे महाबाहो, बुद्धि के बल से तुमने उसे उस वैसे प्रतापी राजा से छीन लिया है, और अब वह तुम्हारे पास दमकती हुई दिखाई देती है।
श्लोक 8 (3.238.8)
तथैव तव राजेन्द्रराजानः परवीरहन् । शासनेऽधिष्ठिताः सर्वेकिं कुर्म इति वादिनः ॥
tathaiva tava rājendrarājānaḥ paravīrahan | śāsane'dhiṣṭhitāḥ sarvekiṃ kurma iti vādinaḥ
इसी प्रकार हे राजेन्द्र, हे शत्रुवीरों के संहारक, सभी राजा तुम्हारी आज्ञा में स्थित हैं और कहते हैं — "हम क्या करें?"
श्लोक 9 (3.238.9)
तवेयं पृथिवी राजन्निखिला सागराम्बरा । सपर्वतवना देवी सग्रामनगराकरा ॥
taveyaṃ pṛthivī rājannikhilā sāgarāmbarā | saparvatavanā devī sagrāmanagarākarā
हे राजन्, समुद्र से घिरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी तुम्हारी है — पर्वतों और वनों से युक्त, गाँवों, नगरों और खानों से भरी यह देवी,
श्लोक 10 (3.238.10)
नानावनोद्देशवती पत्तनैरुपशोभिता । नानाजनपदाकीर्णा स्फीतराष्ट्रा महाहला ॥
nānāvanoddeśavatī pattanairupaśobhitā | nānājanapadākīrṇā sphītarāṣṭrā mahāhalā
अनेक वन-प्रदेशों वाली, नगरों से सुशोभित, अनेक जनपदों से भरी, समृद्ध राज्यों और विस्तृत खेतों वाली।
श्लोक 11 (3.238.11)
नन्द्यमानो द्विजै राजन्पूज्यमानश्च राजभिः । पौरुषाद्दिवि देवेषु भ्राजसे रश्मिवानिव ॥
nandyamāno dvijai rājanpūjyamānaśca rājabhiḥ | pauruṣāddivi deveṣu bhrājase raśmivāniva
हे राजन्, ब्राह्मणों से अभिनन्दित और राजाओं से पूजित होकर तुम अपने पौरुष से स्वर्ग में देवताओं के बीच सूर्य के समान दमकते हो।
श्लोक 12 (3.238.12)
रुद्रैरिव यमो राजा मरुद्भिरिव वासवः । कुरुभिस्त्वं वृतो राजन्भासि नक्षत्रराडिव ॥
rudrairiva yamo rājā marudbhiriva vāsavaḥ | kurubhistvaṃ vṛto rājanbhāsi nakṣatrarāḍiva
जैसे रुद्रों से घिरे यमराज और मरुद्गणों से घिरे इन्द्र शोभा पाते हैं, वैसे ही हे राजन्, कुरुओं से घिरे हुए तुम नक्षत्रराज चन्द्रमा के समान शोभित हो।
श्लोक 13 (3.238.13)
यैः स्म ते नाद्रियेताज्ञा न च ये शासने स्थिताः । पश्यामस्ताञ्श्रिया हीनान्पाण्डवान्वनवासिनः ॥
yaiḥ sma te nādriyetājñā na ca ye śāsane sthitāḥ | paśyāmastāñśriyā hīnānpāṇḍavānvanavāsinaḥ
जिन्होंने तुम्हारी आज्ञा का आदर नहीं किया और जो तुम्हारे शासन में नहीं रहे, उन पाण्डवों को आज हम श्रीहीन होकर वन में रहते देख रहे हैं।
श्लोक 14 (3.238.14)
श्रूयते हि महाराजसरो द्वैतवनं प्रति । वसन्तः पाण्डवाः सार्धं ब्राह्मणैर्वनवासिभिः ॥
śrūyate hi mahārājasaro dvaitavanaṃ prati | vasantaḥ pāṇḍavāḥ sārdhaṃ brāhmaṇairvanavāsibhiḥ
हे महाराज, सुना जाता है कि पाण्डव वनवासी ब्राह्मणों के साथ द्वैतवन सरोवर के पास रह रहे हैं।
श्लोक 15 (3.238.15)
सप्रयाहि महाराज श्रिया परमया युतः । तापयन्पाण्डुपुत्रांस्त्वं रश्मिवानिव तेजसा ॥
saprayāhi mahārāja śriyā paramayā yutaḥ | tāpayanpāṇḍuputrāṃstvaṃ raśmivāniva tejasā
हे महाराज, परम ऐश्वर्य से युक्त होकर वहाँ जाओ, और जैसे सूर्य अपनी किरणों के तेज से तपाता है, वैसे ही तुम पाण्डुपुत्रों को संतप्त करो।
श्लोक 16 (3.238.16)
स्थितो राज्ये च्युतान्राज्याच्छ्रियाहीनाञ्छ्रियावृतः । असमृद्धान्समृद्धार्थः पश्य पाण्डुसुतान्नृप ॥
sthito rājye cyutānrājyācchriyāhīnāñchriyāvṛtaḥ | asamṛddhānsamṛddhārthaḥ paśya pāṇḍusutānnṛpa
हे नृप, तुम राज्य पर स्थित हो और वे राज्य से च्युत हैं; तुम लक्ष्मी से घिरे हो और वे श्रीहीन हैं; तुम समृद्ध हो और वे दरिद्र हैं — ऐसे पाण्डुपुत्रों को जाकर देखो।
श्लोक 17 (3.238.17)
महाभिजनसंपन्नं भद्रे महति संस्थितम् । पाण्डवास्त्वाऽभिवीक्षन्तु ययातिमिव नाहुषम् ॥
mahābhijanasaṃpannaṃ bhadre mahati saṃsthitam | pāṇḍavāstvā'bhivīkṣantu yayātimiva nāhuṣam
उच्च कुल से सम्पन्न और महान् कल्याण में प्रतिष्ठित तुमको पाण्डव वैसे ही देखें, जैसे लोग नहुषपुत्र ययाति को देखते थे।
श्लोक 18 (3.238.18)
यां श्रियं सुहृदश्चैव दुर्हृदश्च विशांपते । पश्यन्ति पौरुषैर्दीप्तां सा समर्था भवत्युत ॥
yāṃ śriyaṃ suhṛdaścaiva durhṛdaśca viśāṃpate | paśyanti pauruṣairdīptāṃ sā samarthā bhavatyuta
हे प्रजानाथ, जिस लक्ष्मी को मित्र और शत्रु दोनों पुरुषार्थ से दमकती हुई देखते हैं, वही लक्ष्मी सचमुच सार्थक होती है।
श्लोक 19 (3.238.19)
समस्थो विषमस्थान्हि दुर्हृदो योऽभिवीक्षते । जगतीस्थानिवाद्रिस्थः किमतः परमं सुखम् ॥
samastho viṣamasthānhi durhṛdo yo'bhivīkṣate | jagatīsthānivādristhaḥ kimataḥ paramaṃ sukham
जो स्वयं सुख की स्थिति में रहते हुए विपत्ति में पड़े शत्रुओं को वैसे देखता है जैसे पर्वत पर खड़ा व्यक्ति नीचे धरती पर खड़े लोगों को देखता है — उसके लिए इससे बढ़कर सुख और क्या है?
श्लोक 20 (3.238.20)
न पुत्रधनलाभेन न राज्येनापि विन्दति । प्रीतिं नृपतिशार्दूल याममित्राघदर्शनात् ॥
na putradhanalābhena na rājyenāpi vindati | prītiṃ nṛpatiśārdūla yāmamitrāghadarśanāt
हे नृपश्रेष्ठ, मनुष्य को पुत्र और धन की प्राप्ति से, यहाँ तक कि राज्य से भी, वह प्रसन्नता नहीं मिलती, जो शत्रुओं का दुःख देखने से मिलती है।
श्लोक 21 (3.238.21)
किंनु तस्य सुखं न स्यादाश्रमे यो धनंजयम् । अभिवीक्षेत सिद्धार्थो वल्कलाजिनवाससम् ॥
kiṃnu tasya sukhaṃ na syādāśrame yo dhanaṃjayam | abhivīkṣeta siddhārtho valkalājinavāsasam
जो सफल-मनोरथ होकर आश्रम में वल्कल और मृगचर्म पहने हुए धनंजय को देखे, उसे भला कौन-सा सुख न मिलेगा?
श्लोक 22 (3.238.22)
सुवाससो हि ते भार्या वल्कलाजिनसंवृताम् । पश्यन्तु दुःखितां कृष्णां सा च निर्विद्यतां पुनः ॥
suvāsaso hi te bhāryā valkalājinasaṃvṛtām | paśyantu duḥkhitāṃ kṛṣṇāṃ sā ca nirvidyatāṃ punaḥ
सुन्दर वस्त्र पहने तुम्हारी पत्नियाँ वल्कल और मृगचर्म से ढकी दुःखी कृष्णा को देखें, और वह फिर से जीवन से विरक्त हो जाए।
श्लोक 23 (3.238.23)
विनिन्दतां तथाऽत्मानं जीवितं च धनच्युतम् । दाराणां ते श्रियं दृष्ट्वा दीप्तामद्य जनाधिप ॥
vinindatāṃ tathā'tmānaṃ jīvitaṃ ca dhanacyutam | dārāṇāṃ te śriyaṃ dṛṣṭvā dīptāmadya janādhipa
हे जनाधिप, आज तुम्हारी पत्नियों की दमकती हुई शोभा देखकर वह अपनी और अपने धनहीन जीवन की निन्दा करे।
श्लोक 24 (3.238.24)
न तथा हि सभामध्ये तस्या भवितुमर्हति । वैमनस्यं यथा दृष्ट्वा तव भार्याः स्वलंकृताः ॥
na tathā hi sabhāmadhye tasyā bhavitumarhati | vaimanasyaṃ yathā dṛṣṭvā tava bhāryāḥ svalaṃkṛtāḥ
क्योंकि सभा के बीच भी उसके मन को उतना दुःख नहीं हुआ होगा, जितना तुम्हारी सजी-धजी पत्नियों को देखकर होगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (3.238.25)
एवमुक्त्वा तु राजानं कर्णः शकुनिना सह । तूष्णीं बभूवतुरुभौ वाक्यान्ते जनमेजय ॥
evamuktvā tu rājānaṃ karṇaḥ śakuninā saha | tūṣṇīṃ babhūvaturubhau vākyānte janamejaya
हे जनमेजय, राजा से ऐसा कहकर कर्ण और शकुनि दोनों अपनी बात पूरी करके चुप हो गए।