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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 237

वन में पाण्डवों के लिए धृतराष्ट्र का विलाप

जनमेजय पूछते हैं कि पाण्डवों ने आगे क्या किया, और वैशम्पायन बताते हैं कि वे द्वैतवन के सरोवर के आसपास विचरते रहे और आने वाले ऋषियों का सत्कार करते रहे। कथा कहने में कुशल एक ब्राह्मण उनके कष्टों का समाचार धृतराष्ट्र तक पहुँचाता है। धृतराष्ट्र विलाप करते हैं कि उनके पुत्रों के अन्याय से ही यह सब हुआ, भीम और अर्जुन के क्रोध का पूर्वानुमान करते हैं और कुरुओं के विनाश को अटल बताते हैं। शकुनि राजा के ये वचन दुर्योधन और कर्ण को सुनाता है, और दुर्योधन उदास हो जाता है।

अध्याय 236अध्याय-सूचीअध्याय 238

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.237.1)

एवं वने वर्तमाना नराग्र्याः । शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गाः । सरस्तदासाद्यवनं च पुण्यं । ततः परंकिमकुर्वन्त पार्थाः ॥

evaṃ vane vartamānā narāgryāḥ | śītoṣṇavātātapakarśitāṅgāḥ | sarastadāsādyavanaṃ ca puṇyaṃ | tataḥ paraṃkimakurvanta pārthāḥ

"जब वे नरश्रेष्ठ पृथापुत्र इस प्रकार वन में रह रहे थे और उनके शरीर सर्दी-गर्मी, हवा और धूप से क्षीण हो गए थे, तब उस सरोवर और पवित्र वन में पहुँचकर उन्होंने आगे क्या किया?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 2 (3.237.2)

सरस्तदासाद्य तु पाण्डुपुत्रा । जनं समुत्सृज्य विधाय चेष्टम् । वनानि रम्याण्यथ पर्वतांश्च । नदीप्रदेशांश्च तदा विचेरुः ॥

sarastadāsādya tu pāṇḍuputrā | janaṃ samutsṛjya vidhāya ceṣṭam | vanāni ramyāṇyatha parvatāṃśca | nadīpradeśāṃśca tadā viceruḥ

उस सरोवर पर पहुँचकर पाण्डुपुत्रों ने साथ आए जनसमूह को विदा कर दिया और अपनी इच्छा के अनुसार व्यवस्था करके रमणीय वनों, पर्वतों और नदियों के प्रदेशों में विचरने लगे।

श्लोक 3 (3.237.3)

तथा वने तान्वसतः प्रवीरान् । स्वाध्यायवन्तश्च तपोधनाश्च । अभ्याययुर्वेदविदः पुराणा- । स्तान्पूजयामासुरथो नराग्र्याः ॥

tathā vane tānvasataḥ pravīrān | svādhyāyavantaśca tapodhanāśca | abhyāyayurvedavidaḥ purāṇā- | stānpūjayāmāsuratho narāgryāḥ

जब वे वीर इस प्रकार वन में रह रहे थे, तब स्वाध्यायी, तपस्वी और वेदज्ञ प्राचीन ऋषि उनके पास आए, और उन नरश्रेष्ठों ने उनका पूजन किया।

श्लोक 4 (3.237.4)

ततः कदाचित्कुशलः कथासु । विप्रोऽभ्यगच्छद्भुवि कौरवेयान् । स तैः समेत्याथ यदृच्छयैव । वैचित्रवीर्यं नृपमभ्यगच्छत् ॥

tataḥ kadācitkuśalaḥ kathāsu | vipro'bhyagacchadbhuvi kauraveyān | sa taiḥ sametyātha yadṛcchayaiva | vaicitravīryaṃ nṛpamabhyagacchat

फिर एक दिन कथा कहने में कुशल एक ब्राह्मण वन में कुरुवंशी पाण्डवों के पास आया। उनसे मिलकर वह संयोगवश विचित्रवीर्य के पुत्र राजा धृतराष्ट्र के पास गया।

श्लोक 5 (3.237.5)

अथोपविष्टः प्रतिसत्कृतश्च । वृद्धेन राज्ञा कुरुसत्तमेन । प्रचोदितः संकथयांबभूव । धर्मानिलेन्द्रप्रभवान्यमौ च ॥

athopaviṣṭaḥ pratisatkṛtaśca | vṛddhena rājñā kurusattamena | pracoditaḥ saṃkathayāṃbabhūva | dharmānilendraprabhavānyamau ca

कुरुश्रेष्ठ वृद्ध राजा ने उसका सत्कार किया; आसन ग्रहण करके और राजा के आग्रह पर उसने धर्म, वायु और इन्द्र के पुत्रों तथा दोनों जुड़वाँ भाइयों का वृत्तान्त सुनाया —

श्लोक 6 (3.237.6)

कृशांश्च वातातपकर्शिताङ्गान् । दुःखस्य चोग्रस्य मुखे प्रपन्नान् । तां चाप्यनाथामिव वीरनाथां । कृष्णां परिक्लेशगुणेन युक्ताम् ॥

kṛśāṃśca vātātapakarśitāṅgān | duḥkhasya cograsya mukhe prapannān | tāṃ cāpyanāthāmiva vīranāthāṃ | kṛṣṇāṃ parikleśaguṇena yuktām

कि वे दुबले हो गए हैं, हवा और धूप से उनके शरीर क्षीण हो गए हैं और वे भयंकर दुःख के मुख में पड़े हैं; और यह कि वीरों की पत्नी कृष्णा भी अनाथ-सी होकर क्लेशों से घिरी है।

श्लोक 7 (3.237.7)

ततः कथास्तस्य निशम्य राजा । वैचित्रवीर्यः कृपयाऽभितप्तः । वने तथा पार्थिवपुत्रपौत्रा- । ञ्श्रुत्वा तथा दुःखनदींप्रपन्नान् ॥

tataḥ kathāstasya niśamya rājā | vaicitravīryaḥ kṛpayā'bhitaptaḥ | vane tathā pārthivaputrapautrā- | ñśrutvā tathā duḥkhanadīṃprapannān

उसकी कथाएँ सुनकर विचित्रवीर्यपुत्र राजा धृतराष्ट्र करुणा से संतप्त हो उठे, यह सुनकर कि राजा के पुत्र-पौत्र इस प्रकार वन में दुःख की नदी में पड़े हैं।

श्लोक 8 (3.237.8)

प्रोवाच दैन्याभिहतान्तरात्मा । निश्वासवातोपहतस्तदानीम् । वाचं कथंचित्स्थिरतामुपेत्य । तत्सर्वमात्मप्रभवं विचिन्त्य ॥

provāca dainyābhihatāntarātmā | niśvāsavātopahatastadānīm | vācaṃ kathaṃcitsthiratāmupetya | tatsarvamātmaprabhavaṃ vicintya

दीनता से उनका अन्तःकरण आहत हो गया, आहों से उनका गला रुँध गया; किसी प्रकार वाणी को स्थिर करके और यह सोचकर कि यह सब उन्हीं के कारण हुआ है, वे बोले —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 9 (3.237.9)

कथंनु सत्यः शुचिरार्यवृत्तः । श्रेष्ठः सुतानां मम धर्मराजः । अजातशत्रुः पृथिवीतले स्म । शेते पुरा राङ्कवकूटशायी ॥

kathaṃnu satyaḥ śucirāryavṛttaḥ | śreṣṭhaḥ sutānāṃ mama dharmarājaḥ | ajātaśatruḥ pṛthivītale sma | śete purā rāṅkavakūṭaśāyī

"मेरे पुत्रों में श्रेष्ठ, सत्यवादी, पवित्र और आर्य आचरण वाले धर्मराज अजातशत्रु, जो पहले रङ्कु मृग के रोम से बने कोमल बिछौने पर सोते थे, अब भूमि पर कैसे सोते होंगे?

श्लोक 10 (3.237.10)

प्रबोध्यते मागधसूतपुत्रै- । र्नित्यं स्तुवद्भिः स्वयमिन्द्रकल्पः । पतत्रिसङ्घैः स जघन्यरात्रे । प्रबोध्यते नूनमिलातलस्थः ॥

prabodhyate māgadhasūtaputrai- | rnityaṃ stuvadbhiḥ svayamindrakalpaḥ | patatrisaṅghaiḥ sa jaghanyarātre | prabodhyate nūnamilātalasthaḥ

जो इन्द्र के समान राजा प्रतिदिन स्तुति करते मागधों और सूतपुत्रों द्वारा जगाए जाते थे, वे अब भूमि पर लेटे हुए निश्चय ही रात के अन्तिम पहर में पक्षियों के झुंडों द्वारा जगाए जाते होंगे।

श्लोक 11 (3.237.11)

कथंनु वातातपकर्शिताङ्गो । वृकोदरः कोपपरिप्लुताङ्गः । शेते पृथिव्यामतथोचिताङ्गः । कृष्णासमक्षं वसुधातलस्थः ॥

kathaṃnu vātātapakarśitāṅgo | vṛkodaraḥ kopapariplutāṅgaḥ | śete pṛthivyāmatathocitāṅgaḥ | kṛṣṇāsamakṣaṃ vasudhātalasthaḥ

वृकोदर भीम, जिनका शरीर हवा और धूप से क्षीण हो गया है और जिनके अंग-अंग में क्रोध भरा है, ऐसे बिछौने के अनभ्यस्त अंगों वाले होकर कृष्णा के सामने नंगी धरती पर कैसे सोते होंगे?

श्लोक 12 (3.237.12)

तथाऽर्जुनः सुकुमारो मनस्वी । वशे स्थितो धर्मसुतस्य राज्ञः । विदूयमानैरिव सर्वगात्रै- । र्ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥

tathā'rjunaḥ sukumāro manasvī | vaśe sthito dharmasutasya rājñaḥ | vidūyamānairiva sarvagātrai- | rdhruvaṃ na śete vasatīramarṣāt

और सुकुमार, मनस्वी अर्जुन, जो धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के वश में हैं, निश्चय ही क्रोध के कारण रातों को सो नहीं पाते होंगे, मानो उनके सारे अंग जल रहे हों।

श्लोक 13 (3.237.13)

यमौ च कृष्णां च युधिष्ठिरं च । भीमं च दृष्ट्वा सुखविप्रयुक्तान् । विनिःश्वसन्सर्प इवोग्रतेजा । ध्रुवं न शेते वसतीरमर्षात् ॥

yamau ca kṛṣṇāṃ ca yudhiṣṭhiraṃ ca | bhīmaṃ ca dṛṣṭvā sukhaviprayuktān | viniḥśvasansarpa ivogratejā | dhruvaṃ na śete vasatīramarṣāt

जुड़वाँ भाइयों, कृष्णा, युधिष्ठिर और भीम को सुखों से वञ्चित देखकर वह उग्र तेज वाला (अर्जुन) सर्प की भाँति फुफकारता हुआ निश्चय ही क्रोध के कारण रातों को सो नहीं पाता होगा।

श्लोक 14 (3.237.14)

तथा यमौ चाप्यसुखौ सुखार्हौ । समृद्धरूपावमरौ दिवीव । प्रजागरस्थौ ध्रुवमप्रशान्तौ । क्रोधेन सत्येन च वार्यमाणौ ॥

tathā yamau cāpyasukhau sukhārhau | samṛddharūpāvamarau divīva | prajāgarasthau dhruvamapraśāntau | krodhena satyena ca vāryamāṇau

और दोनों जुड़वाँ भाई भी, जो सुख के योग्य होकर दुःखी हैं और स्वर्ग में देवताओं के समान रूपवान हैं, निश्चय ही अशान्त होकर जागते रहते होंगे — क्रोध उन्हें जगाए रखता होगा और सत्य उन्हें रोके रखता होगा।

श्लोक 15 (3.237.15)

समीरणेनाथ समो बलेन । समीरणस्यैवसुतो बलीयान् । स धर्मपाशेन सितोऽग्रजेन । ध्रुवं विनिःश्वस्य सहत्यमर्षम् ॥

samīraṇenātha samo balena | samīraṇasyaivasuto balīyān | sa dharmapāśena sito'grajena | dhruvaṃ viniḥśvasya sahatyamarṣam

पवन के समान बलवान, स्वयं पवन का बलशाली पुत्र भीम, जिसे बड़े भाई ने धर्म के पाश से बाँध रखा है, निश्चय ही आहें भरता हुआ अपने क्रोध को सहता होगा।

श्लोक 16 (3.237.16)

स चापिभूमौ परिवर्तमानो । वधं सुतानां मम काङ्क्षमाणः । सत्येन धर्मेण च वार्यमाणः । कालंप्रतीक्षत्यधिको रणेऽन्यैः ॥

sa cāpibhūmau parivartamāno | vadhaṃ sutānāṃ mama kāṅkṣamāṇaḥ | satyena dharmeṇa ca vāryamāṇaḥ | kālaṃpratīkṣatyadhiko raṇe'nyaiḥ

वह भी भूमि पर करवटें बदलता हुआ, मेरे पुत्रों के वध की कामना करता हुआ, सत्य और धर्म से रोका गया, युद्ध में दूसरों से बढ़कर होकर भी उचित समय की प्रतीक्षा कर रहा है।

श्लोक 17 (3.237.17)

अजातशत्रौ तु जिते निकृत्या । दुःशासनो यत्परुषाण्यवोचत् । तानि प्रविष्टानि वृकोदराङ्गं । दहन्ति कक्षाग्निरिवेन्धनानि ॥

ajātaśatrau tu jite nikṛtyā | duḥśāsano yatparuṣāṇyavocat | tāni praviṣṭāni vṛkodarāṅgaṃ | dahanti kakṣāgnirivendhanāni

छल से अजातशत्रु के हार जाने पर दुःशासन ने जो कठोर वचन कहे थे, वे वृकोदर के शरीर में प्रवेश करके उसे वैसे ही जला रहे हैं जैसे सूखी झाड़ियों की आग ईंधन को।

श्लोक 18 (3.237.18)

न पापकं ध्यास्यति धर्मपुत्रो । धनंजयश्चाप्यनुवर्त्स्यते तम् । अरण्यवासेन विवर्धते तु । भीमस्य कोपोऽग्निरिवानिलेन ॥

na pāpakaṃ dhyāsyati dharmaputro | dhanaṃjayaścāpyanuvartsyate tam | araṇyavāsena vivardhate tu | bhīmasya kopo'gnirivānilena

धर्मपुत्र तो कोई पाप नहीं सोचेगा और धनंजय भी उसी का अनुसरण करेगा; किन्तु वनवास से भीम का क्रोध वैसे ही बढ़ता जा रहा है जैसे वायु से आग।

श्लोक 19 (3.237.19)

स तेन कोपेन विदीर्यमाणः । करं करेणाभिनिपीड्यवीरः । विनिःश्वसत्युष्णमतीव घोरं । दहन्निवेमां मम पुत्रसेनाम् ॥

sa tena kopena vidīryamāṇaḥ | karaṃ kareṇābhinipīḍyavīraḥ | viniḥśvasatyuṣṇamatīva ghoraṃ | dahannivemāṃ mama putrasenām

उस क्रोध से विदीर्ण होता हुआ वह वीर हाथ से हाथ मलता है और अत्यन्त गर्म, भयानक आहें भरता है, मानो मेरे पुत्रों की इस सेना को जला डालेगा।

श्लोक 20 (3.237.20)

गाण्डीवधन्वा च वृकोदरश्च । संरम्भिणावन्तककालकल्पौ । न शेषयेतां युधि शत्रुसेनां । शरान्किरन्तावशनिप्रकाशान् ॥

gāṇḍīvadhanvā ca vṛkodaraśca | saṃrambhiṇāvantakakālakalpau | na śeṣayetāṃ yudhi śatrusenāṃ | śarānkirantāvaśaniprakāśān

गाण्डीवधारी अर्जुन और वृकोदर, क्रोध से भरे और प्रलयकाल के यमराज के समान, वज्र-से बाण बरसाते हुए युद्ध में शत्रु-सेना का कुछ भी शेष नहीं छोड़ेंगे।

श्लोक 21 (3.237.21)

दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रो । दुःशासनश्चापि सुमन्दचेताः । मधु प्रपश्यन्ति न तु प्रपातं । वृकोदरं चैव धनंजयं च ॥

duryodhanaḥ śakuniḥ sūtaputro | duḥśāsanaścāpi sumandacetāḥ | madhu prapaśyanti na tu prapātaṃ | vṛkodaraṃ caiva dhanaṃjayaṃ ca

दुर्योधन, शकुनि, सूतपुत्र कर्ण और मन्दबुद्धि दुःशासन मधु तो देखते हैं, पर नीचे का गड्ढा नहीं देखते — वे वृकोदर और धनंजय को नहीं देखते।

श्लोक 22 (3.237.22)

शुभाशुभं कर्म नरोहि कृत्वा । प्रतीक्षतेचेत्स फलंविपाके । सतेन युज्यत्यवशः फलेन । मोक्षः कथं स्यात्पुरुषस्य तस्मात् ॥

śubhāśubhaṃ karma narohi kṛtvā | pratīkṣatecetsa phalaṃvipāke | satena yujyatyavaśaḥ phalena | mokṣaḥ kathaṃ syātpuruṣasya tasmāt

मनुष्य जब कोई शुभ या अशुभ कर्म करके उसके पकने पर फल की प्रतीक्षा करता है, तो वह विवश होकर उस फल से बँध जाता है; फिर उससे मनुष्य का छुटकारा कैसे हो?

श्लोक 23 (3.237.23)

क्षेत्रे सुकृष्टे ह्युपिते च बीजे । देवेच वर्षत्यृतुकालयुक्तम् । न स्यात्फलंतस्य कुतः प्रसिद्धि- । रन्यत्रदैवादिति नास्ति हेतुः ॥

kṣetre sukṛṣṭe hyupite ca bīje | deveca varṣatyṛtukālayuktam | na syātphalaṃtasya kutaḥ prasiddhi- | ranyatradaivāditi nāsti hetuḥ

खेत भली-भाँति जोता गया हो, बीज बोया गया हो और ऋतु के समय पर देवता वर्षा भी करें, फिर भी यदि फल न मिले तो सफलता कहाँ से हो? इसमें दैव के सिवा कोई कारण नहीं।

श्लोक 24 (3.237.24)

कृतं मताक्षेण यथा न साधु । साधुप्रवृत्तेन च पाण्डवेन । मया च दुष्पुत्रवशानुगेन । कृतः कुरूणामयमन्तकालः ॥

kṛtaṃ matākṣeṇa yathā na sādhu | sādhupravṛttena ca pāṇḍavena | mayā ca duṣputravaśānugena | kṛtaḥ kurūṇāmayamantakālaḥ

पासों के जानकार शकुनि ने जो किया वह उचित नहीं था, जबकि पाण्डव ने सज्जनता से आचरण किया; और मैंने अपने दुष्ट पुत्र के वश में होकर कुरुओं का यह अन्तकाल ला दिया है।

श्लोक 25 (3.237.25)

ध्रुवं प्रशाम्यत्यसमीरितोऽग्नि- । र्ध्रुवं प्रजास्यत्युत गर्भिणी या । ध्रुवं दिनादौ रजनीप्रणाश- । स्तथा क्षपादौ च दिनप्रणाशः ॥

dhruvaṃ praśāmyatyasamīrito'gni- | rdhruvaṃ prajāsyatyuta garbhiṇī yā | dhruvaṃ dinādau rajanīpraṇāśa- | stathā kṣapādau ca dinapraṇāśaḥ

निश्चय ही बिना हवा दिए आग बुझ जाती है, निश्चय ही गर्भवती स्त्री संतान को जन्म देती है, निश्चय ही दिन के आरम्भ में रात का अन्त होता है और रात्रि के आरम्भ में दिन का।

श्लोक 26 (3.237.26)

कृतेच कस्मान्न परेच कुर्यु- । र्दत्ते च दद्युः पुरुषाः कथंस्वित् । प्राप्यार्थकालं च भवेदनर्थः । कथंचन स्यादितितत्कुतः स्यात् ॥

kṛteca kasmānna pareca kuryu- | rdatte ca dadyuḥ puruṣāḥ kathaṃsvit | prāpyārthakālaṃ ca bhavedanarthaḥ | kathaṃcana syādititatkutaḥ syāt

जब कोई कर्म किया गया हो तो दूसरे भी बदले में वैसा क्यों न करें? जब कुछ दिया गया हो तो लोग बदले में क्यों न दें? लाभ का समय पाकर भी अनर्थ हो सकता है; लोग पूछते हैं, 'ऐसा कैसे हुआ?' — पर वह और कहाँ से आता?

श्लोक 27 (3.237.27)

कथं न भिद्येत न च स्रवेत । न च प्रसिच्येदितिरक्षितव्यम् । अरक्ष्यमाणं शतधा प्रकीर्ये- । द्ध्रुवं न नाशोऽस्ति कृतस्य लोके ॥

kathaṃ na bhidyeta na ca sraveta | na ca prasicyeditirakṣitavyam | arakṣyamāṇaṃ śatadhā prakīrye- | ddhruvaṃ na nāśo'sti kṛtasya loke

किसी वस्तु की ऐसी रक्षा करनी चाहिए कि वह न टूटे, न रिसे और न छलके; रक्षा न करने पर वह सौ टुकड़ों में बिखर जाएगी। निश्चय ही इस संसार में किए हुए कर्म का नाश नहीं होता।

श्लोक 28 (3.237.28)

गतो ह्यरण्यादपिशक्रलोकं । धनंजयः पश्यत वीर्यमस्य । अस्त्राणि दिव्यानि चतुर्विधानि । ज्ञात्वा पुनर्लोकमिमं प्रपन्नः ॥

gato hyaraṇyādapiśakralokaṃ | dhanaṃjayaḥ paśyata vīryamasya | astrāṇi divyāni caturvidhāni | jñātvā punarlokamimaṃ prapannaḥ

धनंजय तो वन से इन्द्रलोक तक गया — उसका पराक्रम देखो! चारों प्रकार के दिव्य अस्त्रों को सीखकर वह फिर इस लोक में लौट आया है।

श्लोक 29 (3.237.29)

स्वर्गं हि गत्वा सशरीर एव । को मानुषः पुनरागन्तुमिच्छेत् । अन्यत्रकालोपहताननेका- । न्समीक्षमाणस्तुकुरून्मुमूर्षून् ॥

svargaṃ hi gatvā saśarīra eva | ko mānuṣaḥ punarāgantumicchet | anyatrakālopahatānanekā- | nsamīkṣamāṇastukurūnmumūrṣūn

भला कौन मनुष्य सशरीर स्वर्ग जाकर फिर लौटना चाहेगा — जब तक कि वह काल से मारे गए और मरने को तैयार अनेक कौरवों को न देख रहा हो?

श्लोक 30 (3.237.30)

धनुर्ग्राहश्चार्जुनः सव्यसाची । धनुश्च तद्गाण्डिवं भीमवेगम् । अस्त्राणि दिव्यानि च तानि तस्य । त्रयस्य तेजः प्रसहेत कोऽत्र ॥

dhanurgrāhaścārjunaḥ savyasācī | dhanuśca tadgāṇḍivaṃ bhīmavegam | astrāṇi divyāni ca tāni tasya | trayasya tejaḥ prasaheta ko'tra

धनुर्धर सव्यसाची अर्जुन, भयंकर वेग वाला वह गाण्डीव धनुष और उसके वे दिव्य अस्त्र — इन तीनों के तेज को यहाँ कौन सह सकता है?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (3.237.31)

निशम्य तद्वचनं पार्थिवस्य । दुर्योधनं रहिते सौबलोऽथ । अबोधयत्कर्णमुपेत्य सर्वं । स चाप्यहृष्टोऽभवदल्पचेताः ॥

niśamya tadvacanaṃ pārthivasya | duryodhanaṃ rahite saubalo'tha | abodhayatkarṇamupetya sarvaṃ | sa cāpyahṛṣṭo'bhavadalpacetāḥ

राजा के ये वचन सुनकर सुबलपुत्र शकुनि ने एकान्त में दुर्योधन को, और कर्ण के पास जाकर उसे भी, सब कुछ बता दिया; और वह अल्पबुद्धि दुर्योधन उदास हो गया।

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