आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 236
सत्यभामा द्वारा द्रौपदी को सान्त्वना और श्रीकृष्ण के साथ प्रस्थान
जब श्रीकृष्ण पाण्डवों से विदा लेने लगते हैं, तब सत्यभामा द्रौपदी को गले लगाकर सान्त्वना देती हैं — उनके पति पृथ्वी को फिर जीत लेंगे, उनके शत्रु मारे जाएँगे और उनका उपहास करने वाली कुरु-स्त्रियाँ नीचा देखेंगी। वे बताती हैं कि द्रौपदी के पाँचों पुत्र द्वारका में कुशल से हैं और सुभद्रा, श्रीकृष्ण तथा वृष्णिवंशी उनका बड़े स्नेह से पालन करते हैं। फिर सत्यभामा द्रौपदी की प्रदक्षिणा करके श्रीकृष्ण के रथ पर चढ़ती हैं और श्रीकृष्ण प्रस्थान करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.236.1)
मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैः पाण्डवैश्च महात्मभिः । कथाभिरनुकूलाभिः सह स्थित्वा जनार्दनः ॥
mārkaṇḍeyādibhirvipraiḥ pāṇḍavaiśca mahātmabhiḥ | kathābhiranukūlābhiḥ saha sthitvā janārdanaḥ
जनार्दन (श्रीकृष्ण) मार्कण्डेय आदि ब्राह्मणों और महात्मा पाण्डवों के साथ सुखद चर्चाएँ करते हुए वहाँ ठहरे रहे।
श्लोक 2 (3.236.2)
ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः । आरुरुक्षू रथं सत्यामाह्वयामास भारत ॥
tatastaiḥ saṃvidaṃ kṛtvā yathāvanmadhusūdanaḥ | ārurukṣū rathaṃ satyāmāhvayāmāsa bhārata
हे भारत, फिर उन सबसे यथोचित विदा लेकर रथ पर चढ़ने को उद्यत मधुसूदन ने सत्यभामा को बुलाया।
श्लोक 3 (3.236.3)
सत्यभामा ततस्तत्र स्वजित्वा द्रुपदात्मजाम् । उवाच वचनं हृद्यं यथाभावं समाहितम् ॥
satyabhāmā tatastatra svajitvā drupadātmajām | uvāca vacanaṃ hṛdyaṃ yathābhāvaṃ samāhitam
तब सत्यभामा ने वहाँ द्रुपदकुमारी को गले लगाकर हृदय से निकले, सच्चे भाव से भरे और संयत वचन कहे —
सत्यभामोवाच
श्लोक 4 (3.236.4)
कृष्णे माभूत्तवोत्कण्ठा मा व्यथा मा प्रजागरः । भर्तृभिर्देवसंकाशैर्जितां प्राप्स्यसि मेदिनीम् ॥
kṛṣṇe mābhūttavotkaṇṭhā mā vyathā mā prajāgaraḥ | bhartṛbhirdevasaṃkāśairjitāṃ prāpsyasi medinīm
"कृष्णे, तुम्हें न कोई उत्कण्ठा हो, न व्यथा, न रातों का जागरण। अपने देवतुल्य पतियों के द्वारा जीती गई पृथ्वी तुम्हें प्राप्त होगी।
श्लोक 5 (3.236.5)
न ह्येवं शीलसंपन्ना नैवं पूजितलक्षणाः । प्राप्नुवन्ति चिरं क्लेशं यथा त्वमसितेक्षणे ॥
na hyevaṃ śīlasaṃpannā naivaṃ pūjitalakṣaṇāḥ | prāpnuvanti ciraṃ kleśaṃ yathā tvamasitekṣaṇe
हे श्यामनयनी, ऐसे शील से सम्पन्न और ऐसे शुभ लक्षणों वाली स्त्रियाँ बहुत समय तक क्लेश नहीं पातीं, जैसा तुमने पाया है।
श्लोक 6 (3.236.6)
अवश्यं च त्वया भूमिरियं निहतकण्टका । भर्तृभिः सहभोक्तव्या निर्द्वन्द्वेति श्रुतं मया ॥
avaśyaṃ ca tvayā bhūmiriyaṃ nihatakaṇṭakā | bhartṛbhiḥ sahabhoktavyā nirdvandveti śrutaṃ mayā
निश्चय ही तुम अपने पतियों के साथ इस पृथ्वी का भोग करोगी, जिसके काँटे मिट चुके होंगे और जिसका कोई प्रतिद्वन्द्वी न होगा — ऐसा मैंने सुना है।
श्लोक 7 (3.236.7)
धार्तराष्ट्रवधं कृत्वावैराणि प्रतियात्य च । युधिष्ठिरस्थां पृथिवीं द्रष्टासि द्रुपदात्मजे ॥
dhārtarāṣṭravadhaṃ kṛtvāvairāṇi pratiyātya ca | yudhiṣṭhirasthāṃ pṛthivīṃ draṣṭāsi drupadātmaje
हे द्रुपदकुमारी, धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करके और वैर का बदला चुकाकर तुम पृथ्वी को युधिष्ठिर के अधिकार में देखोगी।
श्लोक 8 (3.236.8)
यास्ताः प्रव्राजमानां त्वां प्राहसन्दर्पमोहिताः । ताः क्षिप्रं हतसंकल्पा द्रक्ष्यसि त्वं कुरुस्त्रियः ॥
yāstāḥ pravrājamānāṃ tvāṃ prāhasandarpamohitāḥ | tāḥ kṣipraṃ hatasaṃkalpā drakṣyasi tvaṃ kurustriyaḥ
जो कुरुवंश की स्त्रियाँ अहंकार और मोह में डूबकर तुम्हारे वनवास जाते समय तुम पर हँसी थीं, उन्हें तुम शीघ्र ही हताश देखोगी।
श्लोक 9 (3.236.9)
तव दुःखोपपन्नाया यैराचरितमप्रियम् । विद्धि संप्रस्थितान्सर्वांस्तान्कृष्णे यमसादनम् ॥
tava duḥkhopapannāyā yairācaritamapriyam | viddhi saṃprasthitānsarvāṃstānkṛṣṇe yamasādanam
कृष्णे, जिन्होंने तुम्हारे दुःख के समय तुम्हारा अप्रिय किया, उन सबको यमलोक की ओर प्रस्थान कर चुका समझो।
श्लोक 10 (3.236.10)
पुत्रस्ते प्रतिविन्ध्यश्च सुतसोमस्तथाविधः । श्रुतकर्माऽर्जुनिश्चैव शतानीकश्च नाकुलिः ॥
putraste prativindhyaśca sutasomastathāvidhaḥ | śrutakarmā'rjuniścaiva śatānīkaśca nākuliḥ
तुम्हारा पुत्र प्रतिविन्ध्य, वैसा ही सुतसोम, अर्जुन का पुत्र श्रुतकर्मा, नकुल का पुत्र शतानीक,
श्लोक 11 (3.236.11)
सहदेवाच्च यो जातः श्रुतसेनस्तवात्मजः । सर्वेकुशलिनो वीराः कृतास्त्राश्च सुतास्तव ॥
sahadevācca yo jātaḥ śrutasenastavātmajaḥ | sarvekuśalino vīrāḥ kṛtāstrāśca sutāstava
और सहदेव से उत्पन्न तुम्हारा पुत्र श्रुतसेन — तुम्हारे ये सभी पुत्र कुशल से हैं, वीर हैं और अस्त्रविद्या में निपुण हैं।
श्लोक 12 (3.236.12)
अभिमन्युरिव प्रीता द्वारवत्यां रता भृशम् । त्वमिवैषां सुभद्रा च प्रीत्या सर्वात्मना स्थिता ॥
abhimanyuriva prītā dvāravatyāṃ ratā bhṛśam | tvamivaiṣāṃ subhadrā ca prītyā sarvātmanā sthitā
अभिमन्यु की भाँति वे भी द्वारका में प्रसन्न हैं और बड़े आनन्द से रहते हैं। सुभद्रा तुम्हारी ही तरह पूरे मन और प्रेम से उनकी देखभाल करती हैं।
श्लोक 13 (3.236.13)
प्रीयते तव निर्द्वन्द्वा तेभ्यश्च विगतज्वरा । दुःखिता तेन दुःखेन सुखेन सुखिता तथा ॥
prīyate tava nirdvandvā tebhyaśca vigatajvarā | duḥkhitā tena duḥkhena sukhena sukhitā tathā
वह तुम्हारी ही भाँति बिना किसी भेदभाव के उनसे स्नेह करती हैं और उनकी ओर से निश्चिन्त रहती हैं; उनके दुःख में दुःखी और उनके सुख में सुखी होती हैं।
श्लोक 14 (3.236.14)
भजेत्सर्वात्मना चैव प्रद्युम्नजननी तथा । भानुप्रभृतिभिश्चैनान्विशिनष्टि च केशवः ॥
bhajetsarvātmanā caiva pradyumnajananī tathā | bhānuprabhṛtibhiścainānviśinaṣṭi ca keśavaḥ
प्रद्युम्न की माता भी पूरे मन से उनका ध्यान रखती हैं, और केशव उन्हें भानु आदि अपने पुत्रों से भी बढ़कर मानते हैं।
श्लोक 15 (3.236.15)
भोजनाच्छादने चैषां नित्यं मे श्वशुरः स्थितः । रामप्रभृतयः सर्वे भजन्त्यन्धकवृष्णयः ॥
bhojanācchādane caiṣāṃ nityaṃ me śvaśuraḥ sthitaḥ | rāmaprabhṛtayaḥ sarve bhajantyandhakavṛṣṇayaḥ
मेरे ससुर प्रतिदिन उनके भोजन और वस्त्र की व्यवस्था करते हैं, और बलराम आदि सभी अन्धक और वृष्णि उनसे स्नेह रखते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (3.236.16)
तुल्यो हिप्रणयस्तेषां प्रद्युम्नस्य च भामिनि । एवमादि प्रियं सत्यंहृद्यमुक्त्वा मनोनुगम् ॥
tulyo hipraṇayasteṣāṃ pradyumnasya ca bhāmini | evamādi priyaṃ satyaṃhṛdyamuktvā manonugam
"हे भामिनी, उनका इन पर वैसा ही स्नेह है जैसा प्रद्युम्न पर।" — ऐसे ही प्रिय, सच्चे, हृदयस्पर्शी और मन को भाने वाले वचन कहकर
श्लोक 17 (3.236.17)
गमनाय मनश्चक्रेवासुदेवरथं प्रति । तां कृष्णां कृष्णमहिषी चकाराभिप्रदक्षिणम् ॥
gamanāya manaścakrevāsudevarathaṃ prati | tāṃ kṛṣṇāṃ kṛṣṇamahiṣī cakārābhipradakṣiṇam
सत्यभामा ने वासुदेव के रथ की ओर जाने का मन बनाया। श्रीकृष्ण की पटरानी ने कृष्णा (द्रौपदी) की प्रदक्षिणा की,
श्लोक 18 (3.236.18)
आरुरोह रथं शौरेः सत्यभामाऽथ भामिनी । स्मयित्वातु यदुश्रेष्ठो द्रौपदीं परिसान्त्व्य च । उपावर्त्य ततः शीघ्रैर्हयैः प्रायात्परंतपः ॥
āruroha rathaṃ śaureḥ satyabhāmā'tha bhāminī | smayitvātu yaduśreṣṭho draupadīṃ parisāntvya ca | upāvartya tataḥ śīghrairhayaiḥ prāyātparaṃtapaḥ
और फिर सुन्दरी सत्यभामा शौरि (श्रीकृष्ण) के रथ पर चढ़ गईं। यदुश्रेष्ठ ने मुस्कराकर द्रौपदी को सान्त्वना दी, और पाण्डवों को लौटाकर वे शत्रुतापन शीघ्रगामी घोड़ों के साथ चल पड़े।