आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 244
युधिष्ठिर का दुर्योधन को छुड़ाने का आदेश
युधिष्ठिर भीम को डाँटते हैं: बन्धु आपस में भले ही झगड़ें, पर किसी बाहरी द्वारा कुल और उसकी स्त्रियों पर आक्रमण सहन नहीं किया जा सकता, और शरणागत की रक्षा करनी ही चाहिए। भीम दुर्योधन के पुराने अपराधों — लाक्षागृह, विष देने और द्रौपदी के अपमान — का स्मरण कराकर गन्धर्व को उपकारी बताते हैं; पर दुर्योधन की सहायता की पुकार सुनाई देती है, और करुणा से भरे युधिष्ठिर भाइयों से कहते हैं कि उसे छुड़ाओ — हो सके तो कोमल उपायों से, नहीं तो बल से — क्योंकि वे स्वयं आरम्भ हो चुके यज्ञ से बँधे हैं। अर्जुन कौरवों को छुड़ाने की प्रतिज्ञा करते हैं, और उनके मन में फिर आशा जाग उठती है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (3.244.1)
अस्मानभिगतांस्तात भयार्ताञ्छरणैषिणः । कौरवान्विषमप्राप्तान्कथं ब्रूयास्त्वमीदृशम् ॥
asmānabhigatāṃstāta bhayārtāñcharaṇaiṣiṇaḥ | kauravānviṣamaprāptānkathaṃ brūyāstvamīdṛśam
"तात, भय से पीड़ित होकर शरण की इच्छा से हमारे पास आए, विपत्ति में पड़े कौरवों के विषय में तुम ऐसी बात कैसे कह सकते हो?"
श्लोक 2 (3.244.2)
भवन्ति भेदा ज्ञातीनां कलहाश्च वृकोदर । प्रसक्तानि च वैराणि ज्ञातिधर्मो न नश्यति ॥
bhavanti bhedā jñātīnāṃ kalahāśca vṛkodara | prasaktāni ca vairāṇi jñātidharmo na naśyati
"हे वृकोदर, बन्धु-बान्धवों में फूट पड़ती है, कलह भी होते हैं और वैर भी चलते रहते हैं, पर बन्धुत्व का धर्म नष्ट नहीं होता।"
श्लोक 3 (3.244.3)
यदा तु कश्चिज्ज्ञातीनां बाह्यः प्रार्थयते कुलम् । न मर्षयन्ति तत्सन्तो बाह्येनाभिप्रधर्षणम् ॥
yadā tu kaścijjñātīnāṃ bāhyaḥ prārthayate kulam | na marṣayanti tatsanto bāhyenābhipradharṣaṇam
"किन्तु जब कोई बाहरी व्यक्ति कुल पर आक्रमण करना चाहता है, तब सज्जन बाहरी व्यक्ति के उस आक्रमण को सहन नहीं करते।"
श्लोक 4 (3.244.4)
जानात्येष हि दुर्बुद्धिरस्मानिह चिरोषितान् । स एवं परिभूयास्मानकार्षीदिदमप्रियम् ॥
jānātyeṣa hi durbuddhirasmāniha ciroṣitān | sa evaṃ paribhūyāsmānakārṣīdidamapriyam
"यह दुर्बुद्धि (गन्धर्व) जानता है कि हम यहाँ बहुत समय से रह रहे हैं; फिर भी हमारी अवहेलना करके इसने यह अप्रिय कार्य किया है।"
श्लोक 5 (3.244.5)
दुर्योधनस्य ग्रहणाद्गन्धर्वेण बलाद्रणे । स्त्रीणां बाह्याभिमर्शाच्च हतं भवति नः कुलम् ॥
duryodhanasya grahaṇādgandharveṇa balādraṇe | strīṇāṃ bāhyābhimarśācca hataṃ bhavati naḥ kulam
"गन्धर्व द्वारा युद्ध में बलपूर्वक दुर्योधन को पकड़ लेने से और बाहरी लोगों द्वारा हमारी स्त्रियों को छूने से हमारा कुल ही आहत होता है।"
श्लोक 6 (3.244.6)
शरणं च प्रपन्नानां त्राणार्थं च कुलस्य च । उत्तिष्ठध्वं नरव्याघ्राः सज्जीभवत मा चिरम् ॥
śaraṇaṃ ca prapannānāṃ trāṇārthaṃ ca kulasya ca | uttiṣṭhadhvaṃ naravyāghrāḥ sajjībhavata mā ciram
"शरणागतों की रक्षा के लिए और कुल की रक्षा के लिए उठो, हे नरश्रेष्ठो! बिना देर किए तैयार हो जाओ।"
श्लोक 7 (3.244.7)
अर्जुनश्च यमौ चैव त्वं च भीमापराजितः । मोक्षयध्वं नरव्याघ्रा ह्रियमाणं सुयोधनम् ॥
arjunaśca yamau caiva tvaṃ ca bhīmāparājitaḥ | mokṣayadhvaṃ naravyāghrā hriyamāṇaṃ suyodhanam
"अर्जुन, दोनों माद्रीपुत्र और तुम अपराजित भीम — हे नरव्याघ्रो, हरकर ले जाए जा रहे सुयोधन को छुड़ाओ।"
श्लोक 8 (3.244.8)
एते रथा नरव्याघ्राः सर्वशस्त्रसमन्विताः । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां विमलाः काञ्चनध्वजाः ॥
ete rathā naravyāghrāḥ sarvaśastrasamanvitāḥ | dhṛtarāṣṭrasya putrāṇāṃ vimalāḥ kāñcanadhvajāḥ
"हे नरव्याघ्रो, ये रहे सब प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित, सुनहरी ध्वजाओं वाले धृतराष्ट्रपुत्रों के निर्मल रथ।"
श्लोक 9 (3.244.9)
सस्वनानधिरोहध्वं नित्यसज्जानिमान्रथान् । इन्द्रसेनादिभिः सूतैः कृतशस्त्रैरधिष्ठितान् ॥
sasvanānadhirohadhvaṃ nityasajjānimānrathān | indrasenādibhiḥ sūtaiḥ kṛtaśastrairadhiṣṭhitān
"सदा तैयार रहने वाले, घरघराते इन रथों पर चढ़ो, जिन पर इन्द्रसेन आदि शस्त्रकुशल सारथि बैठे हैं।"
श्लोक 10 (3.244.10)
एतानास्थाय वै यत्ता गन्धर्वान्योद्धुमाहवे । सुयोधनस्य मोक्षाय प्रयतध्वमतन्द्रिताः ॥
etānāsthāya vai yattā gandharvānyoddhumāhave | suyodhanasya mokṣāya prayatadhvamatandritāḥ
"इन पर सवार होकर सावधानी से युद्ध में गन्धर्वों से लड़ो और आलस्य छोड़कर सुयोधन को छुड़ाने का प्रयत्न करो।"
श्लोक 11 (3.244.11)
परैः परिभवे प्राप्ते वयं पञ्चोत्तरं शतम् । परस्परविरोधे तु वयं पञ्चैव ते शतम् ॥
paraiḥ paribhave prāpte vayaṃ pañcottaraṃ śatam | parasparavirodhe tu vayaṃ pañcaiva te śatam
"जब बाहर के लोग अपमान करें तब हम एक सौ पाँच हैं; आपस के विरोध में ही हम पाँच हैं और वे सौ।"
श्लोक 12 (3.244.12)
य एव कश्चिद्राजन्यः शरणार्थमिहागतम् । परं शक्त्याभिरक्षेत किं पुनस्त्वं वृकोदर ॥
ya eva kaścidrājanyaḥ śaraṇārthamihāgatam | paraṃ śaktyābhirakṣeta kiṃ punastvaṃ vṛkodara
"कोई भी क्षत्रिय यहाँ शरण के लिए आए पराए व्यक्ति की भी पूरी शक्ति से रक्षा करेगा; फिर तुम्हारा तो कहना ही क्या, वृकोदर!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (3.244.13)
एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पुनर्वाक्यमभाषत । कोपसंरक्तनयनः पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥
evamuktastu kaunteyaḥ punarvākyamabhāṣata | kopasaṃraktanayanaḥ pūrvavairamanusmaran
ऐसा कहे जाने पर कुन्तीपुत्र भीम ने पुराने वैर का स्मरण करते हुए, क्रोध से लाल आँखें करके फिर कहा —
भीम उवाच
श्लोक 14 (3.244.14)
पुरा जतुगृहेऽनेन दग्धुमस्मान्युधिष्ठिर । दुर्बुद्धिर्हि कृता वीर तदा दैवेन रक्षिताः ॥
purā jatugṛhe'nena dagdhumasmānyudhiṣṭhira | durbuddhirhi kṛtā vīra tadā daivena rakṣitāḥ
"हे युधिष्ठिर, पहले इसने हमें लाक्षागृह में जला डालने की दुष्ट योजना बनाई थी; हे वीर, तब दैव ने ही हमारी रक्षा की थी।"
श्लोक 15 (3.244.15)
कालकूटविषं तीक्ष्णं भोजने मम भारत । उप्त्वा गङ्गां लतापाशैर्बद्ध्वा च प्राक्षिपत्प्रभो ॥
kālakūṭaviṣaṃ tīkṣṇaṃ bhojane mama bhārata | uptvā gaṅgāṃ latāpāśairbaddhvā ca prākṣipatprabho
"हे भारत, उसने मेरे भोजन में तीक्ष्ण कालकूट विष मिला दिया और हे प्रभो, मुझे लताओं के फन्दों से बाँधकर गंगा में फेंक दिया।"
श्लोक 16 (3.244.16)
रसातलं च संप्राप्य तदा वासुकिमञ्जसा । तत्र दृष्ट्वा तु राजेन्द्रपुनः प्राप्तो महीतलम् ॥
rasātalaṃ ca saṃprāpya tadā vāsukimañjasā | tatra dṛṣṭvā tu rājendrapunaḥ prāpto mahītalam
"तब मैं रसातल पहुँचा और शीघ्र ही वासुकि के पास गया; हे राजेन्द्र, वहाँ उनसे भेंट करके मैं फिर पृथ्वी पर लौट आया।"
श्लोक 17 (3.244.17)
द्यूतकालेऽपिकौन्तेय वृजिनानि कृतानि वै । द्रौपद्याश्च परामर्शः केशग्रहणमेव च । वस्त्रापहरणं चैव सभामध्ये कृतानि वै ॥
dyūtakāle'pikaunteya vṛjināni kṛtāni vai | draupadyāśca parāmarśaḥ keśagrahaṇameva ca | vastrāpaharaṇaṃ caiva sabhāmadhye kṛtāni vai
"हे कुन्तीनन्दन, द्यूत के समय भी अन्याय किए गए — द्रौपदी के साथ दुर्व्यवहार हुआ, उसके केश पकड़े गए और भरी सभा में उसका वस्त्र खींचा गया। ये सब कर्म किए गए।"
श्लोक 18 (3.244.18)
राज्यं चाच्छिद्य राजेन्द्र उक्तवान्परुषाणि नः । पुरा कृतानां पापानां फलं भुङ्क्ते सुयोधनः ॥
rājyaṃ cācchidya rājendra uktavānparuṣāṇi naḥ | purā kṛtānāṃ pāpānāṃ phalaṃ bhuṅkte suyodhanaḥ
"हे राजेन्द्र, हमारा राज्य छीनकर उसने हमसे कठोर वचन कहे थे। सुयोधन अपने पहले किए पापों का ही फल भोग रहा है।"
श्लोक 19 (3.244.19)
अस्माभिरेवकर्तव्यं धार्तराष्ट्रस्य निग्रहम् । अन्येन तु कृतं तद्वै मैत्र्यमस्माकमिच्छता । उपकारी तु गन्धर्वो मा राजन्विमना भव ॥
asmābhirevakartavyaṃ dhārtarāṣṭrasya nigraham | anyena tu kṛtaṃ tadvai maitryamasmākamicchatā | upakārī tu gandharvo mā rājanvimanā bhava
"धृतराष्ट्रपुत्र को दण्ड देना तो हमारा ही काम था; पर हमारी मित्रता चाहने वाले किसी और ने वह कर दिया है। गन्धर्व ने हमारा उपकार ही किया है; हे राजन्, आप उदास न हों।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (3.244.20)
एतस्मिन्नन्तरे राजंश्चित्रसेनेन वै हृतः । विललाप सुदुःखार्तो नीयमानः सुयोधनः ॥
etasminnantare rājaṃścitrasenena vai hṛtaḥ | vilalāpa suduḥkhārto nīyamānaḥ suyodhanaḥ
हे राजन्, इसी बीच चित्रसेन द्वारा हरकर ले जाया जाता हुआ सुयोधन अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगा —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 21 (3.244.21)
युधिष्ठिर महाबाहो सर्वधर्मभृतांवर । सपुत्रान्सहदारांश्च गन्धर्वेण हृतान्बलात् ॥
yudhiṣṭhira mahābāho sarvadharmabhṛtāṃvara | saputrānsahadārāṃśca gandharveṇa hṛtānbalāt
"हे महाबाहु युधिष्ठिर, सब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ! हमें पुत्रों और स्त्रियों सहित गन्धर्व बलपूर्वक हर ले गया है।"
श्लोक 22 (3.244.22)
पाण्डुपुत्र महाबाहो कौरवाणां यशस्कर । सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठ गन्धर्वेण हृतं बलात् । रक्षस्व पुरुषव्याघ्र युधिष्ठिर महायशः ॥
pāṇḍuputra mahābāho kauravāṇāṃ yaśaskara | sarvadharmabhṛtāṃ śreṣṭha gandharveṇa hṛtaṃ balāt | rakṣasva puruṣavyāghra yudhiṣṭhira mahāyaśaḥ
"हे पाण्डुपुत्र, हे महाबाहु, कौरवों का यश बढ़ाने वाले, सब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ! गन्धर्व मुझे बलपूर्वक हर ले जा रहा है। हे पुरुषसिंह, महायशस्वी युधिष्ठिर, मेरी रक्षा करो!"
श्लोक 23 (3.244.23)
भ्रातरं ते महाबाहो बद्ध्वा नयति मामयम् । दुश्शासनं दुर्विषहं दुर्मुखं दुर्जयं तथा ॥
bhrātaraṃ te mahābāho baddhvā nayati māmayam | duśśāsanaṃ durviṣahaṃ durmukhaṃ durjayaṃ tathā
"हे महाबाहु, यह मुझ तुम्हारे भाई को बाँधकर ले जा रहा है, और दुःशासन, दुर्विषह, दुर्मुख तथा दुर्जय को भी।"
श्लोक 24 (3.244.24)
बद्ध्वा हरन्ति गन्धर्वा अस्मान्दारांश्च सर्वशः । अनुधावत मां क्षिप्रं रक्षध्वं पुरुषोत्तमाः ॥
baddhvā haranti gandharvā asmāndārāṃśca sarvaśaḥ | anudhāvata māṃ kṣipraṃ rakṣadhvaṃ puruṣottamāḥ
"गन्धर्व हमें और हमारी सब स्त्रियों को बाँधकर ले जा रहे हैं। हे पुरुषोत्तमो, शीघ्र मेरे पीछे दौड़ो और हमारी रक्षा करो!"
श्लोक 25 (3.244.25)
यमौ मामनुधावेतां रक्षार्थं मम सायुधौ । कुरुवंशस्य सुमहदयशः प्राप्तमीदृशम् । व्यपोहयध्वं गन्धर्वाञ्जित्वा वीर्येण पाण्डवाः ॥
yamau māmanudhāvetāṃ rakṣārthaṃ mama sāyudhau | kuruvaṃśasya sumahadayaśaḥ prāptamīdṛśam | vyapohayadhvaṃ gandharvāñjitvā vīryeṇa pāṇḍavāḥ
"दोनों माद्रीपुत्र शस्त्र लेकर मेरी रक्षा के लिए मेरे पीछे दौड़ें। कुरुवंश पर ऐसा भारी अपयश आ पड़ा है; हे पाण्डवो, अपने पराक्रम से गन्धर्वों को जीतकर उन्हें खदेड़ दो!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (3.244.26)
एवं विलपमानस्य कौरवस्यार्तया गिरा । श्रुत्वा विलापं संभ्रान्तो घृणयाऽभिपरिप्लुतः ॥
evaṃ vilapamānasya kauravasyārtayā girā | śrutvā vilāpaṃ saṃbhrānto ghṛṇayā'bhipariplutaḥ
कौरव को इस प्रकार आर्त वाणी में विलाप करते सुनकर युधिष्ठिर व्याकुल हो उठे और करुणा से भर गए;
श्लोक 27 (3.244.27)
युधिष्ठिरः पुनर्वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् । सुयोधनस्य मोक्षाय प्रयतध्वमतन्द्रिताः ॥
yudhiṣṭhiraḥ punarvākyaṃ bhīmasenamathābravīt | suyodhanasya mokṣāya prayatadhvamatandritāḥ
उन्होंने फिर भीमसेन से कहा — "आलस्य छोड़कर सुयोधन को छुड़ाने का प्रयत्न करो।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 28 (3.244.28)
क इवार्यो दयेत्प्राणानभिधावेति चोदितः । प्राञ्जलिं शरणापन्नं दृष्ट्वा शत्रुमपि ध्रुवम् ॥
ka ivāryo dayetprāṇānabhidhāveti coditaḥ | prāñjaliṃ śaraṇāpannaṃ dṛṣṭvā śatrumapi dhruvam
"'दौड़ो, बचाओ!' — ऐसी पुकार सुनकर, हाथ जोड़कर शरण में आए शत्रु को भी देखकर, कौन श्रेष्ठ पुरुष अपने प्राणों का मोह करेगा?"
श्लोक 29 (3.244.29)
वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च पाण्डवाः । शत्रोश्च मोक्षणं क्लेशात्त्रीणि चैकं च तत्समम् ॥
varapradānaṃ rājyaṃ ca putrajanma ca pāṇḍavāḥ | śatrośca mokṣaṇaṃ kleśāttrīṇi caikaṃ ca tatsamam
"हे पाण्डवो, वरदान देना, राज्य पाना और पुत्र का जन्म — ये तीन हैं; और शत्रु को संकट से छुड़ाना अकेला इन तीनों के बराबर है।"
श्लोक 30 (3.244.30)
न ह्यस्त्यधिकमेतस्माद्यदापन्नः सुयोधनः । त्वद्बाहुबलमाश्रित्य जीवितं परिमार्गते ॥
na hyastyadhikametasmādyadāpannaḥ suyodhanaḥ | tvadbāhubalamāśritya jīvitaṃ parimārgate
"इससे बड़ी बात कुछ नहीं कि विपत्ति में पड़ा सुयोधन तुम्हारे बाहुबल का सहारा लेकर अपने प्राण बचाना चाहता है।"
श्लोक 31 (3.244.31)
स्वयमेव प्रधावेयं यदि न स्याद्वृकोदर । विततो मे क्रतुर्वीर न हि मेऽत्र विचारणा ॥
svayameva pradhāveyaṃ yadi na syādvṛkodara | vitato me kraturvīra na hi me'tra vicāraṇā
"हे वृकोदर, यदि मेरा यज्ञ आरम्भ न हुआ होता तो मैं स्वयं ही दौड़ पड़ता; हे वीर, इसमें मुझे कोई संशय नहीं।"
श्लोक 32 (3.244.32)
साम्नैव तु यथा भीम मोक्षयेथाः सुयोधनम् । तथा सर्वैरुपायैस्त्वं यतेथाः कुरुनन्दन ॥
sāmnaiva tu yathā bhīma mokṣayethāḥ suyodhanam | tathā sarvairupāyaistvaṃ yatethāḥ kurunandana
"हे भीम, हे कुरुनन्दन, सब उपायों से ऐसा यत्न करना कि सुयोधन को समझा-बुझाकर ही छुड़ा सको।"
श्लोक 33 (3.244.33)
न साम्ना प्रतिपद्येत यदि गन्धर्वराडसौ । पराक्रमेण मृदुना मोक्षयेथाः सुयोधनम् ॥
na sāmnā pratipadyeta yadi gandharvarāḍasau | parākrameṇa mṛdunā mokṣayethāḥ suyodhanam
"यदि वह गन्धर्वराज समझाने से न माने, तो कोमल पराक्रम से सुयोधन को छुड़ाना।"
श्लोक 34 (3.244.34)
अथासौ मृदुयुद्धेन न मुञ्चेद्भीम कौरवान् । सर्वोपायैर्विमोच्यास्ते निगृह्य परिपन्थिनः ॥
athāsau mṛduyuddhena na muñcedbhīma kauravān | sarvopāyairvimocyāste nigṛhya paripanthinaḥ
"और हे भीम, यदि वह कोमल युद्ध से भी कौरवों को न छोड़े, तो शत्रुओं का दमन करके हर उपाय से उन्हें छुड़ाना।"
श्लोक 35 (3.244.35)
एतावद्धि मया शक्यं संदेष्टुं वै वृकोदर । वैताने कर्मणि तते वर्तमाने च भारत । वरप्रदानं सुमहद्याचकस्य प्रकीर्तितम् ॥
etāvaddhi mayā śakyaṃ saṃdeṣṭuṃ vai vṛkodara | vaitāne karmaṇi tate vartamāne ca bhārata | varapradānaṃ sumahadyācakasya prakīrtitam
"हे वृकोदर, हे भारत, वैतान यज्ञ के आरम्भ होकर चलते रहने के कारण मैं तुम्हें इतना ही आदेश दे सकता हूँ। याचक को वर देना बहुत बड़ा पुण्य कहा गया है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 36 (3.244.36)
अजातशत्रोर्वचनं तच्छ्रुत्वा तु धनंजयः । प्रतिजज्ञे गुरोर्वाक्यं कौरवाणां विमोक्षणम् ॥
ajātaśatrorvacanaṃ tacchrutvā tu dhanaṃjayaḥ | pratijajñe gurorvākyaṃ kauravāṇāṃ vimokṣaṇam
अजातशत्रु के वे वचन सुनकर धनंजय (अर्जुन) ने बड़े भाई की आज्ञा मानकर कौरवों को छुड़ाने की प्रतिज्ञा की।
अर्जुन उवाच
श्लोक 37 (3.244.37)
यदि साम्ना न मोक्ष्यन्ति गन्धर्वा धृतराष्ट्रजान् । अद्य गन्धर्वराजस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ॥
yadi sāmnā na mokṣyanti gandharvā dhṛtarāṣṭrajān | adya gandharvarājasya bhūmiḥ pāsyati śoṇitam
"यदि गन्धर्व समझाने से धृतराष्ट्रपुत्रों को नहीं छोड़ेंगे, तो आज पृथ्वी गन्धर्वराज का रक्त पिएगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (3.244.38)
अर्जुनस्य तु तां श्रुत्वा प्रतिज्ञां सत्यवादिनः । कौरवाणां तदा राजन्पुनः प्रत्यागतं मनः ॥
arjunasya tu tāṃ śrutvā pratijñāṃ satyavādinaḥ | kauravāṇāṃ tadā rājanpunaḥ pratyāgataṃ manaḥ
हे राजन्, सत्यवादी अर्जुन की वह प्रतिज्ञा सुनकर कौरवों के मन में फिर से धीरज लौट आया।