आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 245
पाण्डवों और गन्धर्वों का युद्ध
युधिष्ठिर के कहने पर भीम और उनके भाई कवच पहनकर कौरवों के रथों पर सवार होकर निकल पड़ते हैं, और विजय से उल्लसित गन्धर्व उनका सामना करने के लिए लौटते हैं। युधिष्ठिर के निर्देश के अनुसार पाण्डव कोमलता से आरम्भ करते हैं, और अर्जुन गन्धर्वों से धृतराष्ट्रपुत्रों और उनकी स्त्रियों को छोड़ देने के लिए कहते हैं; गन्धर्व हँसकर कहते हैं कि वे केवल देवराज की आज्ञा मानते हैं। तब अर्जुन बाण छोड़ते हैं, और गन्धर्वों तथा पाण्डवों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.245.1)
युधिष्ठिरवचः श्रुत्वा भीमसेनपुरोगमाः । प्रहृष्टवदनाः सर्वे समुत्तस्थुर्नरर्षभाः ॥
yudhiṣṭhiravacaḥ śrutvā bhīmasenapurogamāḥ | prahṛṣṭavadanāḥ sarve samuttasthurnararṣabhāḥ
युधिष्ठिर के वचन सुनकर भीमसेन आदि सब नरश्रेष्ठ प्रसन्नमुख होकर उठ खड़े हुए।
श्लोक 2 (3.245.2)
अभेद्यानि ततः सर्वे समनह्यन्त भारत । जाम्बूनदविचित्राणि कवचानि महारथाः । आयुधानि च दिव्यानि विविधानि समादधुः ॥
abhedyāni tataḥ sarve samanahyanta bhārata | jāmbūnadavicitrāṇi kavacāni mahārathāḥ | āyudhāni ca divyāni vividhāni samādadhuḥ
हे भारत, तब उन सब महारथियों ने स्वर्ण से चित्रित अभेद्य कवच धारण किए और अनेक प्रकार के दिव्य आयुध ग्रहण किए।
श्लोक 3 (3.245.3)
ते दंशिता रथैः सर्वे ध्वजिनः सशरासनाः । पाण्डवाः प्रत्यदृश्यन्त ज्वलिता इवपावकाः ॥
te daṃśitā rathaiḥ sarve dhvajinaḥ saśarāsanāḥ | pāṇḍavāḥ pratyadṛśyanta jvalitā ivapāvakāḥ
कवच पहने, ध्वजाओं और धनुषों से युक्त, रथों पर बैठे पाण्डव प्रज्वलित अग्नियों के समान दिखाई देने लगे।
श्लोक 4 (3.245.4)
तान्रथान्साधुसंपन्नान्संयुक्ताञ्जवनैर्हयैः । आस्थाय रथशार्दूलाः शीघ्रमेव ययुस्ततः ॥
tānrathānsādhusaṃpannānsaṃyuktāñjavanairhayaiḥ | āsthāya rathaśārdūlāḥ śīghrameva yayustataḥ
तेज़ घोड़ों से जुते, भली-भाँति सज्जित उन रथों पर सवार होकर रथियों में सिंह के समान वे वीर तुरन्त वहाँ से चल पड़े।
श्लोक 5 (3.245.5)
ततः कौरवसैन्यानां प्रादुरासीन्महास्वनः । प्रयातान्सहितान्दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रान्महारथान् ॥
tataḥ kauravasainyānāṃ prādurāsīnmahāsvanaḥ | prayātānsahitāndṛṣṭvā pāṇḍuputrānmahārathān
तब महारथी पाण्डुपुत्रों को एक साथ प्रस्थान करते देखकर कौरव-सेना में बड़ा कोलाहल उठा।
श्लोक 6 (3.245.6)
जितकाशिनश्च स्वचरास्त्वरिताश्च महारथाः । क्षणेनैव वने तस्मिन्समाजग्मुरभीतवत् ॥
jitakāśinaśca svacarāstvaritāśca mahārathāḥ | kṣaṇenaiva vane tasminsamājagmurabhītavat
विजय से उल्लसित, शीघ्रगामी महारथी आकाशचारी गन्धर्व भी क्षण भर में निर्भय होकर उस वन में एकत्र हो गए।
श्लोक 7 (3.245.7)
न्यवर्तन्त ततः सर्वे गन्धर्वा जितकाशिनः । दृष्ट्वा रथगतान्वीरान्पाण्डवांश्चतुरो रणे ॥
nyavartanta tataḥ sarve gandharvā jitakāśinaḥ | dṛṣṭvā rathagatānvīrānpāṇḍavāṃścaturo raṇe
रणभूमि में रथों पर सवार चारों वीर पाण्डवों को देखकर विजय से उल्लसित सब गन्धर्व लौट पड़े।
श्लोक 8 (3.245.8)
तांस्तु विभ्राजितान्दृष्ट्वा लोकपालानिवोद्यतान् । व्यूढानीका व्यतिष्ठन्त गन्धमादनवासिनः ॥
tāṃstu vibhrājitāndṛṣṭvā lokapālānivodyatān | vyūḍhānīkā vyatiṣṭhanta gandhamādanavāsinaḥ
लोकपालों के समान तेजस्वी और उद्यत उन पाण्डवों को देखकर गन्धमादन के निवासी गन्धर्व व्यूह बनाकर खड़े हो गए।
श्लोक 9 (3.245.9)
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धर्मपुत्रस्य धीमतः । क्रमेण मृदुना युद्धमुपक्रान्तं च भारत ॥
rājñastu vacanaṃ śrutvā dharmaputrasya dhīmataḥ | krameṇa mṛdunā yuddhamupakrāntaṃ ca bhārata
हे भारत, बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर की बात मानकर उन्होंने धीरे-धीरे कोमलता से युद्ध आरम्भ किया।
श्लोक 10 (3.245.10)
न तु गन्धर्वराजस्य सैनिका मन्दचेतसः । शक्यन्ते मृदुना श्रेयः प्रतिपादयितुं तदा ॥
na tu gandharvarājasya sainikā mandacetasaḥ | śakyante mṛdunā śreyaḥ pratipādayituṃ tadā
पर गन्धर्वराज के मन्दबुद्धि सैनिकों को उस समय कोमलता से कल्याण के मार्ग पर नहीं लाया जा सका।
श्लोक 11 (3.245.11)
ततस्तान्युधि दुर्धर्षान्सव्यसाची परंतपः । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच खचरान्रणे ॥
tatastānyudhi durdharṣānsavyasācī paraṃtapaḥ | sāntvapūrvamidaṃ vākyamuvāca khacarānraṇe
तब शत्रुओं को तपाने वाले सव्यसाची अर्जुन ने युद्ध में दुर्जय उन आकाशचारियों से रणभूमि में शान्तिपूर्वक यह कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 12 (3.245.12)
नैतद्गन्धर्वराजस्य युक्तं कर्म जुगुप्सितम् । परदाराभिमर्शश्च मानुषैश्च समागमः ॥
naitadgandharvarājasya yuktaṃ karma jugupsitam | paradārābhimarśaśca mānuṣaiśca samāgamaḥ
"गन्धर्वराज के लिए यह निन्दनीय कर्म उचित नहीं है — पराई स्त्रियों को छूना और मनुष्यों से इस प्रकार उलझना।"
श्लोक 13 (3.245.13)
उत्सृजध्वं महावीर्यान्धृतराष्ट्रसुतानिमान् । दारांश्चैषां प्रमुञ्चध्वं धर्मराजस्य शासनात् ॥
utsṛjadhvaṃ mahāvīryāndhṛtarāṣṭrasutānimān | dārāṃścaiṣāṃ pramuñcadhvaṃ dharmarājasya śāsanāt
"धर्मराज की आज्ञा से धृतराष्ट्र के इन पराक्रमी पुत्रों को छोड़ दो और इनकी स्त्रियों को भी मुक्त कर दो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (3.245.14)
त एवमुक्ता गन्धर्वाः पाण्डवेन यशस्विना । उत्स्मयन्तस्तदा पार्थमिदं वचनमब्रुवन् ॥
ta evamuktā gandharvāḥ pāṇḍavena yaśasvinā | utsmayantastadā pārthamidaṃ vacanamabruvan
यशस्वी पाण्डव के ऐसा कहने पर गन्धर्व मुस्कराए और पार्थ से यह बोले —
गन्धर्वा ऊचुः
श्लोक 15 (3.245.15)
एकस्यैव वयं तात कुर्याम वचनं भुवि । यस्य शासनमाज्ञाय चरामो विगतज्वराः ॥
ekasyaiva vayaṃ tāta kuryāma vacanaṃ bhuvi | yasya śāsanamājñāya carāmo vigatajvarāḥ
"तात, पृथ्वी पर हम केवल एक की ही बात मान सकते हैं, जिसकी आज्ञा मानकर हम निश्चिन्त विचरते हैं।"
श्लोक 16 (3.245.16)
तेनैकेन यथादिष्टं तथा वर्ताम भारत । न शास्ता विद्यतेऽस्माकमन्यस्तस्मात्सुरेश्वरात् ॥
tenaikena yathādiṣṭaṃ tathā vartāma bhārata | na śāstā vidyate'smākamanyastasmātsureśvarāt
"हे भारत, वही एक जैसा आदेश देता है, हम वैसा ही करते हैं; उस देवराज के सिवा हमारा कोई शासक नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (3.245.17)
एवमुक्तः स गन्धर्वैः कुन्तीपुत्रो धनंजयः । गन्धर्वान्पुनरेवैतान्वचनं प्रत्यभाषत ॥
evamuktaḥ sa gandharvaiḥ kuntīputro dhanaṃjayaḥ | gandharvānpunarevaitānvacanaṃ pratyabhāṣata
गन्धर्वों के ऐसा कहने पर कुन्तीपुत्र धनंजय ने उन गन्धर्वों से फिर कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 18 (3.245.18)
यदि साम्ना न मुञ्चध्वं गन्धर्वा धृतराष्ट्रजान् । मोक्षयिष्यामि विक्रम्य स्वयमेव सुयोधनम् ॥
yadi sāmnā na muñcadhvaṃ gandharvā dhṛtarāṣṭrajān | mokṣayiṣyāmi vikramya svayameva suyodhanam
"हे गन्धर्वो, यदि तुम शान्ति से धृतराष्ट्रपुत्रों को नहीं छोड़ते, तो मैं स्वयं पराक्रम करके सुयोधन को छुड़ा लूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (3.245.19)
एवमुक्त्वा ततः पार्थः सव्यसाची धनंजयः । ससर्ज निशितान्बाणान्खचरान्खचरान्प्रति ॥
evamuktvā tataḥ pārthaḥ savyasācī dhanaṃjayaḥ | sasarja niśitānbāṇānkhacarānkhacarānprati
ऐसा कहकर सव्यसाची धनंजय पार्थ ने आकाश में विचरते गन्धर्वों पर तीखे बाण छोड़े।
श्लोक 20 (3.245.20)
तथैव शरवर्षेण गन्धर्वास्ते बलोत्कटाः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त पाण्डवाश्च दिवौकसः ॥
tathaiva śaravarṣeṇa gandharvāste balotkaṭāḥ | pāṇḍavānabhyavartanta pāṇḍavāśca divaukasaḥ
उसी प्रकार बल से उन्मत्त गन्धर्वों ने बाणों की वर्षा करते हुए पाण्डवों पर आक्रमण किया, और पाण्डवों ने उन स्वर्गवासियों पर।
श्लोक 21 (3.245.21)
ततः सुतुमुलं युद्धं गन्धर्वाणां तरस्विनाम् । बभूव भीमवेगानां पाण्डवानां च भारत ॥
tataḥ sutumulaṃ yuddhaṃ gandharvāṇāṃ tarasvinām | babhūva bhīmavegānāṃ pāṇḍavānāṃ ca bhārata
हे भारत, तब वेगवान गन्धर्वों और भयंकर वेग वाले पाण्डवों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया।