आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 246
अर्जुन और चित्रसेन का युद्ध
गन्धर्व चारों पाण्डवों को घेर लेते हैं, पर पाण्डव उन्हें सैकड़ों की संख्या में मार गिराते हैं। जब गन्धर्व धृतराष्ट्र के पुत्रों को लेकर आकाश में उड़ने लगते हैं, तो अर्जुन बाणों के जाल से उन्हें घेरकर दिव्यास्त्र चलाते हैं। चित्रसेन गदा लेकर दौड़ता है; अर्जुन के गदा को काट देने पर वह माया से अदृश्य होकर लड़ता है, और अर्जुन शब्दवेध से उस पर प्रहार करने लगते हैं। तब चित्रसेन स्वयं को अर्जुन का सखा बताकर प्रकट होता है, अस्त्र लौटा लिए जाते हैं और सब योद्धा रथों पर ही एक-दूसरे का कुशल पूछते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.246.1)
ततो दिव्यास्त्रसंपन्ना गन्धर्वा हेममालिनः । विसृजन्तः शरान्दीप्तान्समन्तात्पर्यवारयन् ॥
tato divyāstrasaṃpannā gandharvā hemamālinaḥ | visṛjantaḥ śarāndīptānsamantātparyavārayan
तब दिव्यास्त्रों से सम्पन्न, सोने की मालाएँ पहने गन्धर्वों ने जलते हुए बाण छोड़ते हुए उन्हें चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 2 (3.246.2)
चतुरः पाण्डवान्वीरान्गन्धर्वाश्च सहस्रशः । रणे संन्यपतन्राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
caturaḥ pāṇḍavānvīrāngandharvāśca sahasraśaḥ | raṇe saṃnyapatanrājaṃstadadbhutamivābhavat
हे राजन्, हज़ारों गन्धर्व युद्ध में उन चार वीर पाण्डवों पर टूट पड़े; वह दृश्य अद्भुत-सा था।
श्लोक 3 (3.246.3)
यथा कर्णस्य च रथो धार्तराष्ट्रस्य चोभयोः । गन्धर्वैः शतशश्छिन्नौ तथा तेषां प्रचक्रिरे ॥
yathā karṇasya ca ratho dhārtarāṣṭrasya cobhayoḥ | gandharvaiḥ śataśaśchinnau tathā teṣāṃ pracakrire
जैसे गन्धर्वों ने कर्ण और धृतराष्ट्र-पुत्र — दोनों के रथ सैकड़ों प्रहारों से तोड़ डाले थे, वैसा ही वे इन चारों के रथों के साथ करने लगे।
श्लोक 4 (3.246.4)
तान्समापततो राजन्गन्धर्वाञ्छतशो रणे । प्रत्यगृह्णन्नरव्याघ्राः शरवर्षैरनेकशः ॥
tānsamāpatato rājangandharvāñchataśo raṇe | pratyagṛhṇannaravyāghrāḥ śaravarṣairanekaśaḥ
हे राजन्, जब सैकड़ों गन्धर्व युद्ध में उन पर झपटे, तब उन नरश्रेष्ठों ने बार-बार बाणों की वर्षा से उनका सामना किया।
श्लोक 5 (3.246.5)
ते कीर्यमाणाः खगमाः शरवर्षैः समन्ततः । न शेकुः पाण्डुपुत्राणां समीपे परिवर्तितुम् ॥
te kīryamāṇāḥ khagamāḥ śaravarṣaiḥ samantataḥ | na śekuḥ pāṇḍuputrāṇāṃ samīpe parivartitum
चारों ओर से बाणों की वर्षा से ढँके हुए वे आकाशचारी गन्धर्व पाण्डुपुत्रों के पास तक नहीं पहुँच सके।
श्लोक 6 (3.246.6)
अभिक्रुद्धानभिक्रुद्धो गन्धर्वानर्जुनस्तदा । लक्षयित्वाऽथ दिव्यानि महास्त्राण्युपचक्रमे ॥
abhikruddhānabhikruddho gandharvānarjunastadā | lakṣayitvā'tha divyāni mahāstrāṇyupacakrame
तब क्रोधित गन्धर्वों पर क्रुद्ध होकर अर्जुन ने लक्ष्य साधा और अपने महान् दिव्यास्त्र चलाने आरम्भ किए।
श्लोक 7 (3.246.7)
सहस्राणां सहस्राणि प्राहिणोद्यमसादनम् । अजेयानर्जुनः सङ्ख्ये गन्धर्वाणां बलोत्कटः ॥
sahasrāṇāṃ sahasrāṇi prāhiṇodyamasādanam | ajeyānarjunaḥ saṅkhye gandharvāṇāṃ balotkaṭaḥ
उस युद्ध में प्रचण्ड बलशाली अर्जुन ने अजेय गन्धर्वों में से हज़ारों-हज़ार को यमलोक भेज दिया।
श्लोक 8 (3.246.8)
तथा भीमो महेष्वासः संयुगे बलिनां वरः । गन्धर्वाञ्शतशो राजञ्जघान निशितैः शरैः ॥
tathā bhīmo maheṣvāsaḥ saṃyuge balināṃ varaḥ | gandharvāñśataśo rājañjaghāna niśitaiḥ śaraiḥ
हे राजन्, इसी प्रकार बलवानों में श्रेष्ठ महाधनुर्धर भीम ने युद्ध में तीखे बाणों से सैकड़ों गन्धर्वों को मार डाला।
श्लोक 9 (3.246.9)
माद्रीपुत्रावपि तथा युध्यमानौ बलोत्कटौ । परिगृह्याग्रतो राजञ्जघ्नतुः शतशः परान् ॥
mādrīputrāvapi tathā yudhyamānau balotkaṭau | parigṛhyāgrato rājañjaghnatuḥ śataśaḥ parān
हे राजन्, वैसे ही प्रबल पराक्रमी माद्री के दोनों पुत्रों ने आगे बढ़कर लड़ते हुए सैकड़ों शत्रुओं को मार गिराया।
श्लोक 10 (3.246.10)
ते वध्यमाना गन्धर्वा दिव्यैरस्त्रैर्महारथैः । उत्पेतुः खमुपादाय धृतराष्ट्रसुतांस्ततः ॥
te vadhyamānā gandharvā divyairastrairmahārathaiḥ | utpetuḥ khamupādāya dhṛtarāṣṭrasutāṃstataḥ
उन महारथियों के दिव्यास्त्रों से मारे जाते हुए गन्धर्व धृतराष्ट्र के पुत्रों को साथ लेकर आकाश में उड़ गए।
श्लोक 11 (3.246.11)
स तानुत्पतितान्दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः । महता शरजालेन समन्तात्पर्यवारयत् ॥
sa tānutpatitāndṛṣṭvā kuntīputro dhanaṃjayaḥ | mahatā śarajālena samantātparyavārayat
उन्हें ऊपर उड़ते देखकर कुन्तीपुत्र धनंजय ने बाणों के विशाल जाल से उन्हें चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 12 (3.246.12)
ते बद्धाः शरजालेन शकुन्ता इव पञ्जरे । ववर्षुरर्जुनं क्रोधाद्गदाशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः ॥
te baddhāḥ śarajālena śakuntā iva pañjare | vavarṣurarjunaṃ krodhādgadāśaktyṛṣṭivṛṣṭibhiḥ
पिंजरे में बँधे पक्षियों की भाँति बाणजाल में फँसे वे क्रोध में भरकर अर्जुन पर गदाओं, शक्तियों और ऋष्टियों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 13 (3.246.13)
गदाशक्त्यृष्टिवृष्टीस्ता निहत्य परमास्त्रवित् । गात्राणि चाहनद्भल्लैर्गन्धर्वाणां धनंजयः ॥
gadāśaktyṛṣṭivṛṣṭīstā nihatya paramāstravit | gātrāṇi cāhanadbhallairgandharvāṇāṃ dhanaṃjayaḥ
परम अस्त्रवेत्ता धनंजय ने गदा, शक्ति और ऋष्टि की उस वर्षा को नष्ट करके भल्ल बाणों से गन्धर्वों के अंग काट डाले।
श्लोक 14 (3.246.14)
शिरोभिः प्रपतद्भिश्च चरणैर्बाहुभिस्तथा । अश्मवृष्टिरिवाभाति परेषामभवद्भयम् ॥
śirobhiḥ prapatadbhiśca caraṇairbāhubhistathā | aśmavṛṣṭirivābhāti pareṣāmabhavadbhayam
गिरते हुए सिरों, पैरों और भुजाओं से वह दृश्य पत्थरों की वर्षा-सा प्रतीत होता था, और शत्रुओं में भय छा गया।
श्लोक 15 (3.246.15)
ते वध्यमाना गन्धर्वाः पाण्डवेन महात्मना । भूमिष्ठमन्तरिक्षस्थाः शरवर्षैरवाकिरन् ॥
te vadhyamānā gandharvāḥ pāṇḍavena mahātmanā | bhūmiṣṭhamantarikṣasthāḥ śaravarṣairavākiran
महात्मा पाण्डव से मारे जाते हुए गन्धर्व आकाश में स्थित होकर भूमि पर खड़े अर्जुन पर बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 16 (3.246.16)
तेषां तु शरवर्षाणि सव्यसाची परंतपः । अस्त्रैः संवार्य तेजस्वी गन्धर्वान्प्रत्यविध्यत ॥
teṣāṃ tu śaravarṣāṇi savyasācī paraṃtapaḥ | astraiḥ saṃvārya tejasvī gandharvānpratyavidhyata
किन्तु तेजस्वी, शत्रुओं को तपाने वाले सव्यसाची ने अपने अस्त्रों से उनकी बाण-वर्षा को रोककर उलटे गन्धर्वों को बींध डाला।
श्लोक 17 (3.246.17)
स्थूणाकर्णेन्द्रजालं च सौरं चापि तथाऽर्जुनः । आग्नेयं चापि सौम्यं च ससर्ज कुरुनन्दनः ॥
sthūṇākarṇendrajālaṃ ca sauraṃ cāpi tathā'rjunaḥ | āgneyaṃ cāpi saumyaṃ ca sasarja kurunandanaḥ
कुरुनन्दन अर्जुन ने स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल, सौर, आग्नेय और सौम्य अस्त्र छोड़े।
श्लोक 18 (3.246.18)
ते दह्यमाना गन्धर्वाः कुन्तीपुत्रस्य सायकैः । दैतेया इव शक्रेण विषादमगमन्परम् ॥
te dahyamānā gandharvāḥ kuntīputrasya sāyakaiḥ | daiteyā iva śakreṇa viṣādamagamanparam
कुन्तीपुत्र के बाणों से जलते हुए गन्धर्व इन्द्र के सामने दैत्यों की भाँति घोर विषाद में डूब गए।
श्लोक 19 (3.246.19)
ऊर्ध्वमाक्रममाणाश्च शरजालेन वारिताः । विसर्पमाणा भल्लैश्च वार्यन्ते सव्यसाचिना ॥
ūrdhvamākramamāṇāśca śarajālena vāritāḥ | visarpamāṇā bhallaiśca vāryante savyasācinā
ऊपर चढ़ने का प्रयत्न करते तो बाणजाल उन्हें रोक देता, और इधर-उधर खिसकते तो सव्यसाची भल्ल बाणों से उन्हें रोक लेते।
श्लोक 20 (3.246.20)
गन्धर्वांस्त्रासितान्दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रेण भारत । चित्रसेनो गदां गृह्य सव्यसाचिनमाद्रवत् ॥
gandharvāṃstrāsitāndṛṣṭvā kuntīputreṇa bhārata | citraseno gadāṃ gṛhya savyasācinamādravat
हे भारत, गन्धर्वों को कुन्तीपुत्र से त्रस्त देखकर चित्रसेन गदा उठाकर सव्यसाची की ओर दौड़ा।
श्लोक 21 (3.246.21)
तस्याभिपततस्तूर्णं गदाहस्तस्य संयुगे । गदां सर्वायसीं पार्थः शरैश्चिच्छेद सप्तधा ॥
tasyābhipatatastūrṇaṃ gadāhastasya saṃyuge | gadāṃ sarvāyasīṃ pārthaḥ śaraiściccheda saptadhā
जब वह गदा हाथ में लिए युद्ध में तेज़ी से झपटा, तब पार्थ ने बाणों से उसकी पूरी लोहे की गदा के सात टुकड़े कर दिए।
श्लोक 22 (3.246.22)
स गदां बहुधा दृष्ट्वा कृत्तां बाणैस्तरस्विना । संवृत्य विद्ययाऽऽत्मानं योधयामास पाण्डवम् ॥
sa gadāṃ bahudhā dṛṣṭvā kṛttāṃ bāṇaistarasvinā | saṃvṛtya vidyayā''tmānaṃ yodhayāmāsa pāṇḍavam
वेगवान् अर्जुन के बाणों से अपनी गदा को अनेक टुकड़ों में कटी देखकर चित्रसेन अपनी विद्या से स्वयं को छिपाकर पाण्डव से युद्ध करने लगा।
श्लोक 23 (3.246.23)
अस्त्राणि तस्य दिव्यानि संप्रयुक्तानि सर्वशः । दिव्यैरस्त्रैस्तदा वीरः पर्यवारयदर्जुनः ॥
astrāṇi tasya divyāni saṃprayuktāni sarvaśaḥ | divyairastraistadā vīraḥ paryavārayadarjunaḥ
उसके द्वारा चारों ओर से चलाए गए दिव्यास्त्रों को वीर अर्जुन ने तब अपने दिव्यास्त्रों से रोक दिया।
श्लोक 24 (3.246.24)
स वार्यमाणस्तैरस्त्रैरर्जुनेन महात्मना । गन्धर्वराजो बलवान्माययाऽन्तर्हितस्तदा ॥
sa vāryamāṇastairastrairarjunena mahātmanā | gandharvarājo balavānmāyayā'ntarhitastadā
महात्मा अर्जुन के उन अस्त्रों से रोका जाता हुआ बलवान् गन्धर्वराज तब माया से अदृश्य हो गया।
श्लोक 25 (3.246.25)
अन्तर्हितं तमालक्ष्य प्रहरन्तमथार्जुनः । ताडयामास खचरैर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥
antarhitaṃ tamālakṣya praharantamathārjunaḥ | tāḍayāmāsa khacarairdivyāstrapratimantritaiḥ
उसे अदृश्य होकर भी प्रहार करते देख अर्जुन ने दिव्यास्त्र-मन्त्रों से अभिमन्त्रित आकाशगामी बाणों से उस पर चोट की।
श्लोक 26 (3.246.26)
अन्तर्धानवधं चास्य चक्रे क्रुद्धोऽर्जुनस्तदा । शब्दवेधं समाश्रित्य बहुरूपो धनंजयः ॥
antardhānavadhaṃ cāsya cakre kruddho'rjunastadā | śabdavedhaṃ samāśritya bahurūpo dhanaṃjayaḥ
तब क्रुद्ध, अनेक रूप धारण करने वाले धनंजय अर्जुन ने शब्दवेध का आश्रय लेकर उस अदृश्य का भी वध करने का उपक्रम किया।
श्लोक 27 (3.246.27)
स वध्यमानस्तैरस्त्रैरर्जुनेन महात्मना । ततोऽस्य दर्शयामास तदाऽऽत्मानं प्रियः सखा ॥
sa vadhyamānastairastrairarjunena mahātmanā | tato'sya darśayāmāsa tadā''tmānaṃ priyaḥ sakhā
महात्मा अर्जुन के उन अस्त्रों की मार खाते हुए उसके प्रिय सखा ने तब स्वयं को उनके सामने प्रकट कर दिया।
श्लोक 28 (3.246.28)
चित्रसेनस्तथोवाच सखायं युधि विद्धि माम् । चित्रसेनमथालक्ष्य सखायमिति विस्मितः ॥
citrasenastathovāca sakhāyaṃ yudhi viddhi mām | citrasenamathālakṣya sakhāyamiti vismitaḥ
चित्रसेन ने कहा — "युद्ध में मुझे अपना सखा जानो।" चित्रसेन को अपना सखा पहचानकर विस्मित हुए पाण्डवश्रेष्ठ ने
श्लोक 29 (3.246.29)
संजहारास्त्रमथ तत्प्रसृष्टं पाण्डवर्षभः ॥
saṃjahārāstramatha tatprasṛṣṭaṃ pāṇḍavarṣabhaḥ
अपना छोड़ा हुआ अस्त्र लौटा लिया।
श्लोक 30 (3.246.30)
दृष्ट्वा तु पाण्डवाः सर्वे संहृतास्त्रं धनंजयम् । संजह्रुः प्रद्रुतानश्वाञ्शरवेगान्धनूंषि च ॥
dṛṣṭvā tu pāṇḍavāḥ sarve saṃhṛtāstraṃ dhanaṃjayam | saṃjahruḥ pradrutānaśvāñśaravegāndhanūṃṣi ca
धनंजय को अस्त्र लौटाते देख सभी पाण्डवों ने अपने दौड़ते घोड़ों को रोक लिया और बाणों के वेग तथा धनुषों को भी थाम लिया।
श्लोक 31 (3.246.31)
चित्रसेनश्च भीमश्च सव्यसाची यमावपि । पृष्ट्वा कौशलमन्योन्यं रथेष्वेवावतस्थिरे ॥
citrasenaśca bhīmaśca savyasācī yamāvapi | pṛṣṭvā kauśalamanyonyaṃ ratheṣvevāvatasthire
चित्रसेन, भीम, सव्यसाची और दोनों जुड़वाँ भाइयों ने एक-दूसरे का कुशल-समाचार पूछा और अपने-अपने रथों पर ही खड़े रहे।