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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 247

युधिष्ठिर द्वारा दुर्योधन की मुक्ति

अर्जुन चित्रसेन से पूछते हैं कि उसने कौरवों को क्यों पकड़ा, और चित्रसेन बताता है कि दुर्योधन और कर्ण वनवासी पाण्डवों तथा द्रौपदी का उपहास करने आए थे, इसलिए इन्द्र ने उसे भेजा। अर्जुन के अनुरोध पर बात युधिष्ठिर के सामने रखी जाती है; वे दुर्योधन और उसके परिवार को छुड़वाते हैं, गन्धर्वों का आभार मानकर उन्हें विदा करते हैं, और इन्द्र युद्ध में मारे गए गन्धर्वों को जीवित कर देते हैं। युधिष्ठिर स्नेह से दुर्योधन को ऐसे दुस्साहस से बचने की सीख देकर घर भेजते हैं; दुर्योधन लज्जा से टूटा हुआ नगर की ओर जाता है और पाण्डव द्वैतवन में आनन्द से रहते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.247.1)

ततोऽर्जुनश्चित्रसेनं प्रहसन्निदमब्रवीत् । मध्ये गन्धर्वसैन्यानां महेष्वासो महाद्युतिः ॥

tato'rjunaścitrasenaṃ prahasannidamabravīt | madhye gandharvasainyānāṃ maheṣvāso mahādyutiḥ

तब महातेजस्वी महाधनुर्धर अर्जुन ने गन्धर्व-सेना के बीच हँसते हुए चित्रसेन से यह कहा —

श्लोक 2 (3.247.2)

किं ते व्यवसितं वीर कौरवाणां विनिग्रहे । किमर्थं च सदारोऽयं निगृहीतः सुयोधनः ॥

kiṃ te vyavasitaṃ vīra kauravāṇāṃ vinigrahe | kimarthaṃ ca sadāro'yaṃ nigṛhītaḥ suyodhanaḥ

"हे वीर, कौरवों को पकड़ने में तुम्हारा क्या उद्देश्य है? और सुयोधन को उसकी पत्नियों सहित क्यों बन्दी बनाया गया है?"

चित्रसेन उवाच

श्लोक 3 (3.247.3)

विदितोऽयमभिप्रायस्तत्रस्थेन दुरात्मनः । इन्द्रेण धार्तराष्ट्रस्य सकर्णस्य धनंजय ॥

vidito'yamabhiprāyastatrasthena durātmanaḥ | indreṇa dhārtarāṣṭrasya sakarṇasya dhanaṃjaya

हे धनंजय, वहीं रहते हुए इन्द्र ने दुष्टात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र और कर्ण का अभिप्राय जान लिया था।

श्लोक 4 (3.247.4)

वनस्थान्भवतो ज्ञात्वा क्लिश्यमानाननर्हवत् । समस्थो विषमस्थांस्तान्द्रक्ष्यामीत्यनवस्थितान् ॥

vanasthānbhavato jñātvā kliśyamānānanarhavat | samastho viṣamasthāṃstāndrakṣyāmītyanavasthitān

यह जानकर कि तुम लोग वन में रहते हुए अनुचित कष्ट भोग रहे हो, इन चंचल-चित्त लोगों ने सोचा — "हम सुख में रहकर उन्हें दुर्दशा में देखेंगे।"

श्लोक 5 (3.247.5)

इमेऽवहसितुं प्राप्ता द्रौपदीं च यशस्विनीम् । ज्ञात्वा चिकीर्षितं चैषां मामुवाच सुरेश्वरः ॥

ime'vahasituṃ prāptā draupadīṃ ca yaśasvinīm | jñātvā cikīrṣitaṃ caiṣāṃ māmuvāca sureśvaraḥ

ये लोग तुम्हारा और यशस्विनी द्रौपदी का उपहास करने आए थे। इनकी मंशा जानकर देवराज ने मुझसे कहा —

श्लोक 6 (3.247.6)

गच्छ दुर्योधनं बद्ध्वा सहामात्यमिहानय । धनंजयश्च ते रक्ष्यः सह भ्रातृभिराहवे ॥

gaccha duryodhanaṃ baddhvā sahāmātyamihānaya | dhanaṃjayaśca te rakṣyaḥ saha bhrātṛbhirāhave

"जाओ, दुर्योधन को बाँधकर उसके मन्त्रियों सहित यहाँ ले आओ। और युद्ध में तुम्हें धनंजय की उसके भाइयों सहित रक्षा करनी है।

श्लोक 7 (3.247.7)

स च प्रियः सखा तुभ्यं शिष्यश्च तव पाण्डवः । वचनाद्देवराजस्य ततोऽस्मीहागतो द्रुतम् ॥

sa ca priyaḥ sakhā tubhyaṃ śiṣyaśca tava pāṇḍavaḥ | vacanāddevarājasya tato'smīhāgato drutam

क्योंकि वह पाण्डव तुम्हारा प्रिय सखा और शिष्य है।" देवराज के कहने पर मैं शीघ्रता से यहाँ आया हूँ।

श्लोक 8 (3.247.8)

अयं दुरात्मा बद्धश्च गमिष्यामि सुरालयम् । नेष्याम्येनं दुरात्मानं पाकशासनशासनात् ॥

ayaṃ durātmā baddhaśca gamiṣyāmi surālayam | neṣyāmyenaṃ durātmānaṃ pākaśāsanaśāsanāt

यह दुष्टात्मा बाँध लिया गया है और मैं देवलोक जाऊँगा; पाकशासन इन्द्र की आज्ञा से इस दुरात्मा को वहीं ले जाऊँगा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 9 (3.247.9)

उत्सृज्यतां चित्रसेन भ्राताऽस्माकं सुयोधनः । धर्मराजस्य संदेशान्मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥

utsṛjyatāṃ citrasena bhrātā'smākaṃ suyodhanaḥ | dharmarājasya saṃdeśānmama cedicchasi priyam

हे चित्रसेन, यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो धर्मराज के सन्देश के अनुसार हमारे भाई सुयोधन को छोड़ दो।

चित्रसेन उवाच

श्लोक 10 (3.247.10)

पापोऽयं नित्यसंदुष्टो न विमोक्षणमर्हति । प्रलब्धा धर्मराजस्य कृष्णायाश्च धनंजय ॥

pāpo'yaṃ nityasaṃduṣṭo na vimokṣaṇamarhati | pralabdhā dharmarājasya kṛṣṇāyāśca dhanaṃjaya

यह पापी सदा दुष्टता में लगा रहता है, छोड़े जाने योग्य नहीं है। हे धनंजय, इसने धर्मराज और कृष्णा को छला है।

श्लोक 11 (3.247.11)

नेदं चिकीर्षितं तस्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । जानाति धर्मराजो हि श्रुत्वा कुरु यथेच्छसि ॥

nedaṃ cikīrṣitaṃ tasya kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | jānāti dharmarājo hi śrutvā kuru yathecchasi

कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर नहीं जानते कि यह क्या करना चाहता था। उन्हें यह सुन लेने दो, फिर जैसा चाहो वैसा करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (3.247.12)

ते सर्व एव राजानमभिजग्मुर्युधिष्ठिरम् । अभिगम्य च तत्सर्वं शशंसुस्तस्य चेष्टितम् ॥

te sarva eva rājānamabhijagmuryudhiṣṭhiram | abhigamya ca tatsarvaṃ śaśaṃsustasya ceṣṭitam

वे सब राजा युधिष्ठिर के पास गए और उनके सामने पहुँचकर दुर्योधन की सारी करतूत कह सुनाई।

श्लोक 13 (3.247.13)

अजातशत्रुस्तच्छ्रुत्वा गन्धर्वस्य वचस्तदा । मोक्षयामास तान्सर्वान्गन्धर्वान्प्रशशंस च ॥

ajātaśatrustacchrutvā gandharvasya vacastadā | mokṣayāmāsa tānsarvāngandharvānpraśaśaṃsa ca

गन्धर्व की बात सुनकर अजातशत्रु ने उन सबको छुड़वाया और गन्धर्वों की प्रशंसा की।

श्लोक 14 (3.247.14)

चित्रसेनस्तदा वाक्यमुवाच प्रौढया गिरा । मुञ्चध्वं सानुजामात्यं सदारं च सुयोधनम् ॥

citrasenastadā vākyamuvāca prauḍhayā girā | muñcadhvaṃ sānujāmātyaṃ sadāraṃ ca suyodhanam

तब चित्रसेन ने दृढ़ वाणी में कहा — "सुयोधन को उसके भाइयों, मन्त्रियों और पत्नियों सहित छोड़ दो।"

श्लोक 15 (3.247.15)

गन्धर्वास्तु वचः श्रुत्वा चित्रसेनस्य वै द्रुतम् । राजानं मोचयामासुर्बद्धं निगडबन्धनैः ॥

gandharvāstu vacaḥ śrutvā citrasenasya vai drutam | rājānaṃ mocayāmāsurbaddhaṃ nigaḍabandhanaiḥ

चित्रसेन की बात सुनकर गन्धर्वों ने बेड़ियों में बँधे राजा को तुरन्त छोड़ दिया,

श्लोक 16 (3.247.16)

सदारं सानुगामात्यं बाणजालमये वने । लुठन्तश्चापि ते सर्वे युधिष्ठिरसमीपतः ॥

sadāraṃ sānugāmātyaṃ bāṇajālamaye vane | luṭhantaścāpi te sarve yudhiṣṭhirasamīpataḥ

उसकी पत्नियों, अनुचरों और मन्त्रियों सहित, उस बाणजाल से भरे वन में; और वे सब युधिष्ठिर के सामने भूमि पर लोटते हुए

श्लोक 17 (3.247.17)

पतिता लज्जिताश्चैव तस्थुश्चाधोमुखास्तदा । युधिष्ठिरोऽपि दयया तान्समीक्ष्य तथागतान् ॥

patitā lajjitāścaiva tasthuścādhomukhāstadā | yudhiṣṭhiro'pi dayayā tānsamīkṣya tathāgatān

गिर पड़े और फिर लज्जित होकर सिर झुकाए खड़े रहे। युधिष्ठिर ने उन्हें उस दशा में दया से देखकर गन्धर्वों से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 18 (3.247.18)

दिष्ट्या भवद्भिर्बलिभिः शक्तैः सर्वैर्न हिंसितः । दुर्वृत्तो धार्तराष्ट्रोऽयं सामात्यज्ञातिबान्धवः ॥

diṣṭyā bhavadbhirbalibhiḥ śaktaiḥ sarvairna hiṃsitaḥ | durvṛtto dhārtarāṣṭro'yaṃ sāmātyajñātibāndhavaḥ

सौभाग्य है कि तुम सब बलवान् और समर्थ होकर भी इस दुराचारी धृतराष्ट्र-पुत्र को उसके मन्त्रियों, जाति-भाइयों और बन्धुओं सहित नहीं मार डाला।

श्लोक 19 (3.247.19)

उपकारो महांस्तात कृतोऽयं मम खेचर । कुलं न परिभूतं मे मोक्षेणास्य दुरात्मनः ॥

upakāro mahāṃstāta kṛto'yaṃ mama khecara | kulaṃ na paribhūtaṃ me mokṣeṇāsya durātmanaḥ

हे तात, हे आकाशचारी, तुमने मुझ पर बड़ा उपकार किया है; इस दुरात्मा के छूट जाने से मेरे कुल का अपमान नहीं हुआ।

श्लोक 20 (3.247.20)

आज्ञापयध्वमिष्टानि प्रीतं मां दर्शनेन वः । प्राप्य सर्वानभिप्रायांस्ततो व्रजत मा चिरम् ॥

ājñāpayadhvamiṣṭāni prītaṃ māṃ darśanena vaḥ | prāpya sarvānabhiprāyāṃstato vrajata mā ciram

जो चाहो, आज्ञा करो; तुम्हारे दर्शन से मैं प्रसन्न हूँ। अपनी सब इच्छाएँ पाकर फिर बिना विलम्ब के जाओ।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (3.247.21)

अनुज्ञातास्तु गन्धर्वाः पाण्डुपुत्रेण धीमता । सहाप्सरोभिः संहृष्टाश्चित्रसेनमुखा ययुः ॥

anujñātāstu gandharvāḥ pāṇḍuputreṇa dhīmatā | sahāpsarobhiḥ saṃhṛṣṭāścitrasenamukhā yayuḥ

बुद्धिमान् पाण्डुपुत्र से अनुमति पाकर चित्रसेन आदि गन्धर्व अप्सराओं के साथ प्रसन्न होकर चले गए।

श्लोक 22 (3.247.22)

देवलोकं ततो गत्वा गन्धर्वैः सहितस्तदा । न्यवेदयच्च तत्सर्वं चित्रसेनः शतक्रतोः ॥

devalokaṃ tato gatvā gandharvaiḥ sahitastadā | nyavedayacca tatsarvaṃ citrasenaḥ śatakratoḥ

तब चित्रसेन ने गन्धर्वों के साथ देवलोक जाकर वह सारा वृत्तान्त शतक्रतु इन्द्र को सुनाया।

श्लोक 23 (3.247.23)

देवराडपि गन्धर्वान्मृतांस्तान्समजीवयत् । दिव्येनामृतवर्षेण ये हताः कौरवैर्युधि ॥

devarāḍapi gandharvānmṛtāṃstānsamajīvayat | divyenāmṛtavarṣeṇa ye hatāḥ kauravairyudhi

देवराज ने दिव्य अमृत-वर्षा से उन गन्धर्वों को फिर जीवित कर दिया जो युद्ध में कौरवों के हाथों मारे गए थे।

श्लोक 24 (3.247.24)

ज्ञातींस्तानवमुच्याथ राजदारांश्च सर्वशः । कृत्वा च दुष्करं कर्म प्रीतियुक्ताश्च पाण्डवाः ॥

jñātīṃstānavamucyātha rājadārāṃśca sarvaśaḥ | kṛtvā ca duṣkaraṃ karma prītiyuktāśca pāṇḍavāḥ

अपने जाति-बन्धुओं और सब राजमहिलाओं को छुड़ाकर तथा यह कठिन कार्य करके पाण्डव प्रसन्न हुए।

श्लोक 25 (3.247.25)

सस्त्रीकुमारैः कुरुभिः पूज्यमाना महारथाः । बभ्राजिरे महात्मानः क्रतुमध्ये यथाऽग्नयः ॥

sastrīkumāraiḥ kurubhiḥ pūjyamānā mahārathāḥ | babhrājire mahātmānaḥ kratumadhye yathā'gnayaḥ

स्त्रियों और बालकों सहित कुरुवंशियों से पूजित वे महात्मा महारथी यज्ञ के बीच प्रज्वलित अग्नियों की भाँति शोभा पाने लगे।

श्लोक 26 (3.247.26)

ततो दुर्योधनं मुक्तं भ्रातृभिः सहितस्तदा । युधिष्ठिरस्तु प्रणयादिदं वचनमब्रवीत् ॥

tato duryodhanaṃ muktaṃ bhrātṛbhiḥ sahitastadā | yudhiṣṭhirastu praṇayādidaṃ vacanamabravīt

तब भाइयों सहित युधिष्ठिर ने छूटे हुए दुर्योधन से स्नेहपूर्वक यह कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 27 (3.247.27)

मा स्म तात पुनः कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित् । न हि साहसकर्तारः सुखमेधन्ति भारत ॥

mā sma tāta punaḥ kārṣīrīdṛśaṃ sāhasaṃ kvacit | na hi sāhasakartāraḥ sukhamedhanti bhārata

हे तात, फिर कभी ऐसा दुस्साहस मत करना; हे भारत, दुस्साहस करने वाले कभी सुखी नहीं होते।

श्लोक 28 (3.247.28)

स्वस्तिमान्सहितः सर्वैर्भ्रातृभिः कुरुनन्दन । गृहान्व्रज यथाकामं वैमनस्यं च मा कृथाः ॥

svastimānsahitaḥ sarvairbhrātṛbhiḥ kurunandana | gṛhānvraja yathākāmaṃ vaimanasyaṃ ca mā kṛthāḥ

हे कुरुनन्दन, अपने सब भाइयों के साथ कुशलपूर्वक जैसे चाहो घर जाओ, और मन में खेद मत करना।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (3.247.29)

पाण्डवेनाभ्यनुज्ञातो राजा दुर्योधनस्तदा । अभिवाद्य धर्मपुत्रं गतेन्द्रिय इवातुरः । विदीर्यमाणो व्रीडावाञ्जगाम नगरं प्रति ॥

pāṇḍavenābhyanujñāto rājā duryodhanastadā | abhivādya dharmaputraṃ gatendriya ivāturaḥ | vidīryamāṇo vrīḍāvāñjagāma nagaraṃ prati

पाण्डव की अनुमति पाकर राजा दुर्योधन ने धर्मपुत्र को प्रणाम किया और इन्द्रियाँ खो बैठे रोगी की भाँति, लज्जा से विदीर्ण होता हुआ नगर की ओर चल पड़ा।

श्लोक 30 (3.247.30)

तस्मिन्गते कौरवेये कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितो वीरः पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥

tasmingate kauraveye kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṛbhiḥ sahito vīraḥ pūjyamāno dvijātibhiḥ

उस कौरव के चले जाने पर वीर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर भाइयों सहित, ब्राह्मणों से सम्मानित होते हुए

श्लोक 31 (3.247.31)

तपोधनैश्च तैः सर्वैर्वृतः शक्र इवामरैः । तथा द्वैतवने तस्मिन्विजहार मुदा युतः ॥

tapodhanaiśca taiḥ sarvairvṛtaḥ śakra ivāmaraiḥ | tathā dvaitavane tasminvijahāra mudā yutaḥ

और उन सब तपस्वियों से वैसे ही घिरे हुए जैसे देवताओं से इन्द्र, उस द्वैतवन में आनन्दपूर्वक विहार करने लगे।

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