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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 248

लज्जित दुर्योधन से कर्ण की भेंट

जनमेजय पूछते हैं कि शत्रुओं से पराजित और बँधे, फिर पाण्डवों द्वारा छुड़ाए गए अभिमानी दुर्योधन ने हस्तिनापुर में कैसे प्रवेश किया। वैशम्पायन बताते हैं कि लज्जा में डूबा दुर्योधन अपने नगर की ओर चला और मार्ग में एक रमणीय स्थान पर सेना का पड़ाव डाला। वहाँ युद्ध से भागा हुआ कर्ण उसके पास आया और वास्तविकता न जानते हुए गन्धर्वों पर विजय तथा भाइयों को छुड़ाने के लिए उसे बधाई देने लगा; तब दुर्योधन सिर झुकाकर आँसुओं से रुँधे कण्ठ से उत्तर देने लगा।

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जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.248.1)

शत्रुभिर्जितबद्धस्य पाण्डवैश्च महात्मभिः । मोक्षितस्य युधा पश्चान्मानिनः सुदुरात्मनः ॥

śatrubhirjitabaddhasya pāṇḍavaiśca mahātmabhiḥ | mokṣitasya yudhā paścānmāninaḥ sudurātmanaḥ

जो शत्रुओं से पराजित होकर बाँधा गया, फिर महात्मा पाण्डवों ने युद्ध करके जिसे छुड़ाया — वह अभिमानी, अत्यन्त दुष्टात्मा,

श्लोक 2 (3.248.2)

कत्थनस्यावलिप्तस्य गर्वितस्य च नित्यशः । सदा च पौरुषौदार्यैः पाण्डवानवमन्यतः ॥

katthanasyāvaliptasya garvitasya ca nityaśaḥ | sadā ca pauruṣaudāryaiḥ pāṇḍavānavamanyataḥ

डींग मारने वाला, घमण्डी, सदा अहंकार से फूला हुआ, जो पाण्डवों के पौरुष और उदारता के होते हुए भी सदा उनका तिरस्कार करता था —

श्लोक 3 (3.248.3)

दुर्योधनस्य पापस्य नित्याहंकारवादिनः । प्रवेशो हास्तिनपुरे दुष्करः प्रतिभाति मे ॥

duryodhanasya pāpasya nityāhaṃkāravādinaḥ | praveśo hāstinapure duṣkaraḥ pratibhāti me

ऐसे पापी, सदा अहंकार भरी बातें करने वाले दुर्योधन का हस्तिनापुर में प्रवेश करना मुझे कठिन प्रतीत होता है।

श्लोक 4 (3.248.4)

तस्य लज्जान्वितस्यैव शोकव्याकुलचेतसः । प्रवेशं विस्तरेण त्वं वैशंपायन कीर्तय ॥

tasya lajjānvitasyaiva śokavyākulacetasaḥ | praveśaṃ vistareṇa tvaṃ vaiśaṃpāyana kīrtaya

हे वैशम्पायन, लज्जा से भरे और शोक से व्याकुल चित्त वाले उस दुर्योधन के नगर-प्रवेश का वृत्तान्त मुझे विस्तार से सुनाइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (3.248.5)

धर्मराजनिसृष्टस्तु धार्तराष्ट्रः सुयोधनः । लज्जयाऽधोमुखः सीदन्नुपासर्पत्सुदुःखितः ॥

dharmarājanisṛṣṭastu dhārtarāṣṭraḥ suyodhanaḥ | lajjayā'dhomukhaḥ sīdannupāsarpatsuduḥkhitaḥ

धर्मराज से विदा पाकर धृतराष्ट्र-पुत्र सुयोधन लज्जा से मुँह नीचा किए, भीतर ही भीतर टूटता हुआ, अत्यन्त दुःखी होकर वहाँ से चला।

श्लोक 6 (3.248.6)

स्वपुरं प्रययौ राजा चतुरङ्गबलानुगः । शोकोपहतया बुद्ध्या चिन्तयानः पराभवम् ॥

svapuraṃ prayayau rājā caturaṅgabalānugaḥ | śokopahatayā buddhyā cintayānaḥ parābhavam

राजा अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ अपने नगर की ओर चल पड़ा; शोक से आहत बुद्धि से वह अपनी पराजय के विषय में सोचता जाता था।

श्लोक 7 (3.248.7)

विमुच्य पथि यानानि देशे सुयवसोदके । सन्निविष्टः शुभे रम्ये भूमिभागे यथेप्सितम् । हस्त्यश्वरथपादातं यथास्थानं न्यवेशयत् ॥

vimucya pathi yānāni deśe suyavasodake | sanniviṣṭaḥ śubhe ramye bhūmibhāge yathepsitam | hastyaśvarathapādātaṃ yathāsthānaṃ nyaveśayat

मार्ग में अच्छी घास और जल वाले स्थान पर उसने वाहन खुलवा दिए, एक सुन्दर, रमणीय भूभाग पर इच्छानुसार डेरा डाला और हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकों को यथास्थान ठहराया।

श्लोक 8 (3.248.8)

अथोपविष्टं राजानं पर्यङ्के ज्वलनप्रभे । उपप्लुतं यथा सोमं राहुणा रात्रिसंक्षये । उपागम्याब्रवीत्कर्णो दुर्योधनमिदं तदा ॥

athopaviṣṭaṃ rājānaṃ paryaṅke jvalanaprabhe | upaplutaṃ yathā somaṃ rāhuṇā rātrisaṃkṣaye | upāgamyābravītkarṇo duryodhanamidaṃ tadā

अग्नि-सी चमकती शय्या पर बैठे राजा के पास, जो रात्रि के अन्त में राहु से ग्रस्त चन्द्रमा-सा लग रहा था, कर्ण आया और दुर्योधन से यह बोला —

कर्ण उवाच

श्लोक 9 (3.248.9)

दिष्ट्या जीवसि गान्धारे दिष्ट्या नः संगमः पुनः । दिष्ट्या त्वया जिताश्चैव गन्धर्वाः कामरूपिणः ॥

diṣṭyā jīvasi gāndhāre diṣṭyā naḥ saṃgamaḥ punaḥ | diṣṭyā tvayā jitāścaiva gandharvāḥ kāmarūpiṇaḥ

हे गान्धारीनन्दन, सौभाग्य से तुम जीवित हो, सौभाग्य से हमारा फिर मिलन हुआ, और सौभाग्य से तुमने इच्छानुसार रूप धारण करने वाले गन्धर्वों को जीत लिया।

श्लोक 10 (3.248.10)

दिष्ट्या समग्रान्पश्यामि भ्रातॄंस्ते कुरुनन्दन । विजिगीषून्रणे युक्तान्निर्जितारीन्महारथान् ॥

diṣṭyā samagrānpaśyāmi bhrātṝṃste kurunandana | vijigīṣūnraṇe yuktānnirjitārīnmahārathān

हे कुरुनन्दन, सौभाग्य से मैं तुम्हारे सब भाइयों को सकुशल देख रहा हूँ — विजय के इच्छुक, युद्ध में जुटे हुए, शत्रुओं को जीत चुके वे महारथी।

श्लोक 11 (3.248.11)

अहं त्वभिद्रुतः सर्वैर्गन्धर्वैः पश्यतस्तव । नाशक्नुवं स्थापयितुं दीर्यमाणां च वाहिनीम् । शरक्षताङ्गश्च भृशं व्यपयातोऽभिपीडितः ॥

ahaṃ tvabhidrutaḥ sarvairgandharvaiḥ paśyatastava | nāśaknuvaṃ sthāpayituṃ dīryamāṇāṃ ca vāhinīm | śarakṣatāṅgaśca bhṛśaṃ vyapayāto'bhipīḍitaḥ

मुझ पर तो तुम्हारे देखते-देखते सब गन्धर्व टूट पड़े; बिखरती हुई सेना को मैं रोक न सका, और बाणों से घायल शरीर लिए, अत्यन्त पीड़ित होकर पीछे हट गया।

श्लोक 12 (3.248.12)

इदं त्वत्यद्भुतं मन्ये यद्युष्मानिह भारत । अरिष्टानक्षतांश्चापि सदारबलवाहनान् । विमुक्तान्संप्रपश्यामि युद्धात्तस्मादमानुषात् ॥

idaṃ tvatyadbhutaṃ manye yadyuṣmāniha bhārata | ariṣṭānakṣatāṃścāpi sadārabalavāhanān | vimuktānsaṃprapaśyāmi yuddhāttasmādamānuṣāt

हे भारत, मैं इसे बड़ा आश्चर्य मानता हूँ कि तुम सबको मैं यहाँ उस अमानुषी युद्ध से छूटकर, बिना चोट और बिना घाव के, पत्नियों, सेना और वाहनों सहित देख रहा हूँ।

श्लोक 13 (3.248.13)

नैतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन्पुमान्विद्येत भारत । यत्कृतं ते महाराज सह भ्रातृभिराहवे ॥

naitasya kartā loke'sminpumānvidyeta bhārata | yatkṛtaṃ te mahārāja saha bhrātṛbhirāhave

हे भारत, हे महाराज, तुमने भाइयों के साथ युद्ध में जो कर दिखाया, वैसा करने वाला इस लोक में कोई पुरुष नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (3.248.14)

एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा । उवाचावाक्शिरा राजन्बाष्पगद्गदया गिरा ॥

evamuktastu karṇena rājā duryodhanastadā | uvācāvākśirā rājanbāṣpagadgadayā girā

हे राजन्, कर्ण के ऐसा कहने पर राजा दुर्योधन ने सिर झुकाए, आँसुओं से रुँधे कण्ठ से उत्तर दिया।

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