आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 249
दुर्योधन द्वारा कर्ण को सच्चा वृत्तान्त
दुर्योधन कर्ण को बताता है कि उसने गन्धर्वों को नहीं जीता। वह और उसके भाई देर तक उनसे लड़े, पर जब गन्धर्व आकाश में जाकर माया से लड़ने लगे तो वे हार गए, बाँध लिए गए और पत्नियों तथा सेवकों सहित ले जाए गए। उसके कुछ सैनिक और मन्त्री सहायता के लिए पाण्डवों के पास दौड़े; युधिष्ठिर ने भाइयों को भेजा, जिन्होंने पहले बन्दियों को छोड़ने का अनुरोध किया और मना करने पर आक्रमण किया। जब अर्जुन ने आकाश को बाणों से ढक दिया, तब चित्रसेन ने स्वयं को उनका सखा बताकर प्रकट किया और गन्धर्व तथा पाण्डव मित्रभाव से मिले।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (3.249.1)
अजानतस्ते राधेय नाभ्यसूयाम्यहं वचः । जानासि त्वं जिताञ्शत्रून्गन्धर्वांस्तेजसा मया ॥
ajānataste rādheya nābhyasūyāmyahaṃ vacaḥ | jānāsi tvaṃ jitāñśatrūngandharvāṃstejasā mayā
हे राधेय, तुम वास्तविकता नहीं जानते, इसलिए मैं तुम्हारी बात का बुरा नहीं मानता। तुम समझते हो कि मैंने अपने तेज से शत्रु गन्धर्वों को जीत लिया।
श्लोक 2 (3.249.2)
आयोधितास्तु गन्धर्वाः सुचिरं सोदरैर्मम । मया सह महाबाहो कृतश्चोभयतः क्षयः ॥
āyodhitāstu gandharvāḥ suciraṃ sodarairmama | mayā saha mahābāho kṛtaścobhayataḥ kṣayaḥ
हे महाबाहो, मेरे भाइयों ने मेरे साथ मिलकर गन्धर्वों से देर तक युद्ध किया, और दोनों ओर संहार हुआ।
श्लोक 3 (3.249.3)
मायाधिकास्त्वयुध्यन्त यदा शूरा वियद्गताः । तदा नो न समं युद्धमभवत्खेचरैः सह ॥
māyādhikāstvayudhyanta yadā śūrā viyadgatāḥ | tadā no na samaṃ yuddhamabhavatkhecaraiḥ saha
पर जब वे माया में बढ़े-चढ़े शूरवीर आकाश में जाकर लड़ने लगे, तब आकाशचारियों के साथ हमारा युद्ध बराबरी का नहीं रहा।
श्लोक 4 (3.249.4)
पराजयं च प्राप्ताः स्मो रणे बन्धनमेव च । सभृत्यामात्यपुत्राश्च सदारबलवाहनाः । उच्चैराकाशमार्गेण ह्रियमाणाः सुदुःखिताः ॥
parājayaṃ ca prāptāḥ smo raṇe bandhanameva ca | sabhṛtyāmātyaputrāśca sadārabalavāhanāḥ | uccairākāśamārgeṇa hriyamāṇāḥ suduḥkhitāḥ
हमें युद्ध में पराजय मिली और बन्धन भी; अपने सेवकों, मन्त्रियों और पुत्रों सहित, पत्नियों, सेना और वाहनों समेत हम अत्यन्त दुःखी होकर ऊँचे आकाश-मार्ग से ले जाए जा रहे थे।
श्लोक 5 (3.249.5)
अथ नः सैनिकाः केचिदमात्याश्च महारथाः । उपगम्याब्रुवन्दीनाः पाण्डवाञ्शरणप्रदान् ॥
atha naḥ sainikāḥ kecidamātyāśca mahārathāḥ | upagamyābruvandīnāḥ pāṇḍavāñśaraṇapradān
तब हमारे कुछ सैनिक और महारथी मन्त्री दीन होकर शरण देने वाले पाण्डवों के पास गए और बोले —
श्लोक 6 (3.249.6)
एष दुर्योधनो राजा धार्तराष्ट्रः सहानुजः । सामात्यदारो ह्रियते गन्धर्वैर्दिवमाश्रितैः ॥
eṣa duryodhano rājā dhārtarāṣṭraḥ sahānujaḥ | sāmātyadāro hriyate gandharvairdivamāśritaiḥ
"यह धृतराष्ट्र-पुत्र राजा दुर्योधन अपने छोटे भाइयों, मन्त्रियों और पत्नियों सहित आकाश में स्थित गन्धर्वों द्वारा हरा जा रहा है।
श्लोक 7 (3.249.7)
तं मोक्षयत भद्रं वः सहदारं नराधिपम् । परामर्शो मा भविष्यत्कुरुदारेषु सर्वशः । इत्यब्रुवन्रणान्मुक्ता धर्मराजमुपागताः ॥
taṃ mokṣayata bhadraṃ vaḥ sahadāraṃ narādhipam | parāmarśo mā bhaviṣyatkurudāreṣu sarvaśaḥ | ityabruvanraṇānmuktā dharmarājamupāgatāḥ
तुम्हारा कल्याण हो, पत्नियों सहित इस नरेश को छुड़ाओ, जिससे कुरुकुल की स्त्रियों का कहीं भी अपमान न हो।" युद्ध से बचकर धर्मराज के पास पहुँचे उन लोगों ने ऐसा कहा।
श्लोक 8 (3.249.8)
एवमुक्ते तु धर्मात्मा ज्येष्ठः पाण्डुसुतस्तदा । प्रसाद्य सोदरान्सर्वानाज्ञापयत मोक्षणे ॥
evamukte tu dharmātmā jyeṣṭhaḥ pāṇḍusutastadā | prasādya sodarānsarvānājñāpayata mokṣaṇe
यह सुनकर धर्मात्मा ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र ने अपने सब भाइयों को मनाकर हमें छुड़ाने की आज्ञा दी।
श्लोक 9 (3.249.9)
अथागम्य तमुद्देशं पाण्डवाः पुरुषर्षभाः । सान्त्वपूर्वमयाचन्त शक्ताः सन्तो महारथाः ॥
athāgamya tamuddeśaṃ pāṇḍavāḥ puruṣarṣabhāḥ | sāntvapūrvamayācanta śaktāḥ santo mahārathāḥ
तब पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव उस स्थान पर आए और समर्थ होते हुए भी उन महारथियों ने पहले मीठे वचनों से याचना की।
श्लोक 10 (3.249.10)
यदा चास्मान्न मुमुचुर्गन्धर्वाः सान्त्विता अपि । आकाशचारिणो वीरा नदन्तो जलदा इव ॥
yadā cāsmānna mumucurgandharvāḥ sāntvitā api | ākāśacāriṇo vīrā nadanto jaladā iva
और जब मीठे वचनों से कहने पर भी आकाश में विचरने वाले, बादलों की तरह गरजते वे वीर गन्धर्व हमें नहीं छोड़ रहे थे,
श्लोक 11 (3.249.11)
ततोऽर्जुनश्च भीमश्च यमजौ च बलोत्कटौ । मुमुचुः शरवर्षाणि गन्धर्वान्प्रत्यनेकशः ॥
tato'rjunaśca bhīmaśca yamajau ca balotkaṭau | mumucuḥ śaravarṣāṇi gandharvānpratyanekaśaḥ
तब अर्जुन, भीम और प्रबल पराक्रमी दोनों जुड़वाँ भाइयों ने गन्धर्वों पर बार-बार बाणों की वर्षा की।
श्लोक 12 (3.249.12)
अथ सर्वे रणं मुक्त्वा प्रयाताः खेचरा दिवम् । अस्मानेवाभिकर्षन्तो दीनान्मुदितमानसाः ॥
atha sarve raṇaṃ muktvā prayātāḥ khecarā divam | asmānevābhikarṣanto dīnānmuditamānasāḥ
तब सारे आकाशचारी युद्धभूमि छोड़कर प्रसन्न मन से हम दीनों को घसीटते हुए स्वर्ग की ओर चल पड़े।
श्लोक 13 (3.249.13)
ततः समन्तात्पश्यामः शरजालेन वेष्टितम् । अमानुषाणि चास्त्राणि प्रयुञ्जानं धनंजयम् ॥
tataḥ samantātpaśyāmaḥ śarajālena veṣṭitam | amānuṣāṇi cāstrāṇi prayuñjānaṃ dhanaṃjayam
तब हमने देखा कि चारों ओर बाणों का जाल बिछा है और धनंजय अमानुषी अस्त्रों का प्रयोग कर रहे हैं।
श्लोक 14 (3.249.14)
समावृता दिशो दृष्ट्वा पाण्डवेन शितैः शरैः । धनंजयसखाऽऽत्मानं दर्शयामास वै तदा ॥
samāvṛtā diśo dṛṣṭvā pāṇḍavena śitaiḥ śaraiḥ | dhanaṃjayasakhā''tmānaṃ darśayāmāsa vai tadā
पाण्डव के तीखे बाणों से दिशाओं को ढकी देखकर धनंजय के सखा ने तब स्वयं को प्रकट कर दिया।
श्लोक 15 (3.249.15)
चित्रसेनः पाण्डवेन समाश्लिष्य परस्परम् । कुशलं परिपप्रच्छ तैः पृष्टश्चाप्यनामयम् ॥
citrasenaḥ pāṇḍavena samāśliṣya parasparam | kuśalaṃ paripapraccha taiḥ pṛṣṭaścāpyanāmayam
चित्रसेन और पाण्डव ने एक-दूसरे को गले लगाया; उसने उनका कुशल पूछा और उन्होंने भी उसका कुशल-क्षेम पूछा।
श्लोक 16 (3.249.16)
ते समेत्य तथाऽन्योन्यं सन्नाहान्विप्रमुच्य च । एकीभूतास्ततो वीरा गन्धर्वाः सह पाण्डवैः ॥
te sametya tathā'nyonyaṃ sannāhānvipramucya ca | ekībhūtāstato vīrā gandharvāḥ saha pāṇḍavaiḥ
फिर एक-दूसरे से मिलकर और कवच उतारकर वीर गन्धर्व और पाण्डव एक हो गए।
श्लोक 17 (3.249.17)
परस्परं समागम्य प्रीत्या परमया युतौ । अपूजयेतामन्योन्यं चित्रसेनधनंजयौ ॥
parasparaṃ samāgamya prītyā paramayā yutau | apūjayetāmanyonyaṃ citrasenadhanaṃjayau
परम प्रेम से परस्पर मिलकर चित्रसेन और धनंजय ने एक-दूसरे का सत्कार किया।