आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 250
दुर्योधन का प्रायोपवेशन का निश्चय
दुर्योधन कर्ण को आगे बताता है कि अर्जुन ने चित्रसेन से कौरवों को छोड़ने को कहा, गन्धर्व ने पाण्डवों का उपहास करने की उनकी योजना प्रकट कर दी, और उसे बँधी दशा में स्त्रियों के सामने युधिष्ठिर को सौंपा गया। शत्रुओं से प्राण-दान पाना सहन न कर पाने के कारण वह आमरण अनशन का निश्चय करता है, बाकी सबको घर भेजता है और दुःशासन से राजगद्दी स्वीकार करने को कहता है। दुःशासन रोते हुए उसके चरणों में गिरकर उसके बिना राज्य करने से इनकार करता है, और कर्ण दोनों को साधारण लोगों की तरह शोक करने के लिए फटकारते हुए याद दिलाता है कि पाण्डवों ने उसके राज्य के निवासी होने के नाते उसे छुड़ाकर केवल अपना कर्तव्य निभाया।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (3.250.1)
चित्रसेनं समागम्य प्रहसन्नर्जुनस्तदा । इदं वचनमक्लीवमब्रवीत्परवीरहा ॥
citrasenaṃ samāgamya prahasannarjunastadā | idaṃ vacanamaklīvamabravītparavīrahā
चित्रसेन से मिलकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले अर्जुन ने हँसते हुए यह पौरुषभरा वचन कहा —
श्लोक 2 (3.250.2)
भ्रातॄनर्हसि मे वीर मोक्तुं गन्धर्वसत्तम । अनर्हधर्षणा हीमे जीवमानेषु पाण्डुषु ॥
bhrātṝnarhasi me vīra moktuṃ gandharvasattama | anarhadharṣaṇā hīme jīvamāneṣu pāṇḍuṣu
"हे वीर, हे गन्धर्वश्रेष्ठ, तुम्हें मेरे भाइयों को छोड़ देना चाहिए; पाण्डवों के जीवित रहते ये अपमानित किए जाने योग्य नहीं हैं।"
श्लोक 3 (3.250.3)
एवमुक्तस्तु गन्धर्वः पाण्डवेन महात्मना । उवाच यत्कर्ण वयं मन्त्रयन्तो विनिर्गताः ॥
evamuktastu gandharvaḥ pāṇḍavena mahātmanā | uvāca yatkarṇa vayaṃ mantrayanto vinirgatāḥ
महात्मा पाण्डव के ऐसा कहने पर, हे कर्ण, गन्धर्व ने वह सब कह दिया जिसकी मन्त्रणा करते हुए हम निकले थे —
श्लोक 4 (3.250.4)
स्थितो राज्ये च्युतान्स्थानाच्छ्रिया हीनांश्रियावृतः । द्रष्टास्मि निःसुखान्वीरान्सदारान्पाण्डवानिति ॥
sthito rājye cyutānsthānācchriyā hīnāṃśriyāvṛtaḥ | draṣṭāsmi niḥsukhānvīrānsadārānpāṇḍavāniti
"मैं राज्य में प्रतिष्ठित और लक्ष्मी से सम्पन्न होकर अपने स्थान से गिरे, श्रीहीन, सुखरहित वीर पाण्डवों को उनकी पत्नी सहित देखूँगा।"
श्लोक 5 (3.250.5)
तस्मिन्नुच्चार्यमाणे तु गन्धर्वेण वचस्तथा । भूमेर्विवरमन्वैच्छं प्रवेष्टुं व्रीडयाऽन्वितः ॥
tasminnuccāryamāṇe tu gandharveṇa vacastathā | bhūmervivaramanvaicchaṃ praveṣṭuṃ vrīḍayā'nvitaḥ
गन्धर्व जब ये वचन कह रहा था, तब मैं लज्जा से ऐसा भर गया कि धरती में कोई दरार ढूँढ़कर उसमें समा जाना चाहता था।
श्लोक 6 (3.250.6)
युधिष्ठिरमथागम्य गन्धर्वाः सह पाण्डवैः । अस्मद्दुर्मन्त्रितं तस्मै बद्धांश्चास्मान्न्यवेदयन् ॥
yudhiṣṭhiramathāgamya gandharvāḥ saha pāṇḍavaiḥ | asmaddurmantritaṃ tasmai baddhāṃścāsmānnyavedayan
फिर गन्धर्व पाण्डवों के साथ युधिष्ठिर के पास गए और उन्हें हमारी दुष्ट मन्त्रणा तथा हमारे बँधे होने की बात बताई।
श्लोक 7 (3.250.7)
स्त्रीसमक्षमहं दीनो बद्धः शत्रुवशं गतः । युधिष्ठिरस्योपहृतः किंनु दुःखमतः परम् ॥
strīsamakṣamahaṃ dīno baddhaḥ śatruvaśaṃ gataḥ | yudhiṣṭhirasyopahṛtaḥ kiṃnu duḥkhamataḥ param
स्त्रियों की आँखों के सामने मुझ दीन, बँधे हुए, शत्रु के वश में पड़े को युधिष्ठिर के आगे लाया गया। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?
श्लोक 8 (3.250.8)
ये मे निराकृता नित्यं रिपुर्येषामहं सदा । तैर्मोक्षितोऽहं दुर्बुद्धिर्दत्तं तैरेव जीवितम् ॥
ye me nirākṛtā nityaṃ ripuryeṣāmahaṃ sadā | tairmokṣito'haṃ durbuddhirdattaṃ taireva jīvitam
जिनका मैंने सदा तिरस्कार किया, जिनका मैं सदा शत्रु रहा, उन्हीं ने मुझ दुर्बुद्धि को छुड़ाया; उन्हीं ने मुझे जीवन-दान दिया।
श्लोक 9 (3.250.9)
प्राप्तः स्यां यद्यहं वीर वधं तस्मिन्महारणे । श्रेयस्तद्भविता मह्यं नैवंभूतस्य जीवितम् ॥
prāptaḥ syāṃ yadyahaṃ vīra vadhaṃ tasminmahāraṇe | śreyastadbhavitā mahyaṃ naivaṃbhūtasya jīvitam
हे वीर, यदि मैं उस महायुद्ध में मारा जाता तो वह मेरे लिए कहीं अधिक श्रेयस्कर होता; ऐसी दशा में जीना श्रेयस्कर नहीं।
श्लोक 10 (3.250.10)
भवेद्यशः पृथिव्यां मे ख्यातं गन्धर्वतो वधात् । प्राप्ताश्च पुण्यलोकाः स्युर्महेन्द्रसदनेऽक्षयाः ॥
bhavedyaśaḥ pṛthivyāṃ me khyātaṃ gandharvato vadhāt | prāptāśca puṇyalokāḥ syurmahendrasadane'kṣayāḥ
गन्धर्व के हाथों मरने से पृथ्वी पर मेरा यश फैलता और महेन्द्र के धाम में मुझे अक्षय पुण्यलोक प्राप्त होते।
श्लोक 11 (3.250.11)
यत्त्वद्य मे व्यवसितं तच्छृणुध्वं नरर्षभाः । इह प्रायमुपासिष्ये यूयं व्रजत वै गृहान् । भ्रातरश्चैव मे सर्वे यान्त्वद्य स्वपुरं प्रति ॥
yattvadya me vyavasitaṃ tacchṛṇudhvaṃ nararṣabhāḥ | iha prāyamupāsiṣye yūyaṃ vrajata vai gṛhān | bhrātaraścaiva me sarve yāntvadya svapuraṃ prati
हे नरश्रेष्ठो, आज मैंने जो निश्चय किया है उसे सुनो — मैं यहीं आमरण अनशन करूँगा। तुम लोग घर जाओ, और मेरे सब भाई भी आज अपने नगर लौट जाएँ।
श्लोक 12 (3.250.12)
कर्णप्रभृतयश्चैव सुहृदो बान्धवाश्च ये । दुःशासनं पुरस्कृत्य प्रयान्त्वद्य पुरं प्रति ॥
karṇaprabhṛtayaścaiva suhṛdo bāndhavāśca ye | duḥśāsanaṃ puraskṛtya prayāntvadya puraṃ prati
कर्ण आदि मेरे मित्र और बन्धु भी दुःशासन को आगे करके आज ही नगर को लौट जाएँ।
श्लोक 13 (3.250.13)
न ह्यहं संप्रयास्यामि पुरं शत्रुनिराकृतः । शत्रुमानापहो भूत्वा सुहृदां मानकृत्तथा ॥
na hyahaṃ saṃprayāsyāmi puraṃ śatrunirākṛtaḥ | śatrumānāpaho bhūtvā suhṛdāṃ mānakṛttathā
शत्रुओं का मान मर्दन करने वाला और मित्रों को मान देने वाला मैं, आज शत्रुओं से तिरस्कृत होकर नगर नहीं लौटूँगा।
श्लोक 14 (3.250.14)
कामं रणशिरस्यद्य शत्रुभिर्वै विमानितः । स सुहृच्छोकदो जातः शत्रूणां हर्षवर्धनः । वारणाह्वयमासाद्य किं वक्ष्यामि जनाधिपम् ॥
kāmaṃ raṇaśirasyadya śatrubhirvai vimānitaḥ | sa suhṛcchokado jātaḥ śatrūṇāṃ harṣavardhanaḥ | vāraṇāhvayamāsādya kiṃ vakṣyāmi janādhipam
आज युद्ध के मुहाने पर शत्रुओं से अपमानित होकर, मित्रों को शोक और शत्रुओं को हर्ष देने वाला बनकर, हस्तिनापुर पहुँचकर मैं महाराज से क्या कहूँगा?
श्लोक 15 (3.250.15)
भीष्मद्रोणौ कृपद्रौणी विदुरः संजयस्तथा । बाह्लीकः सौमदत्तिश्च ये चान्ये वृद्धसंमताः ॥
bhīṣmadroṇau kṛpadrauṇī viduraḥ saṃjayastathā | bāhlīkaḥ saumadattiśca ye cānye vṛddhasaṃmatāḥ
भीष्म और द्रोण, कृप और द्रोणपुत्र, विदुर और संजय, बाह्लीक और सोमदत्त-पुत्र, तथा अन्य जो वृद्धजन आदरणीय हैं —
श्लोक 16 (3.250.16)
ब्राह्मणाः श्रेणिमुख्याश्च तथोदासीनवृत्तयः । किं मां वक्ष्यंति किं चापि प्रतिवक्ष्यामि तानहम् ॥
brāhmaṇāḥ śreṇimukhyāśca tathodāsīnavṛttayaḥ | kiṃ māṃ vakṣyaṃti kiṃ cāpi prativakṣyāmi tānaham
ब्राह्मण, श्रेणियों के मुखिया और उदासीन भाव से रहने वाले लोग — वे मुझसे क्या कहेंगे, और मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?
श्लोक 17 (3.250.17)
रिपूणां शिरसि स्थित्वा तथा विक्रम्य चोरसि । आत्मदोषात्परिभ्रष्टः कथं वक्ष्यामि तानहम् ॥
ripūṇāṃ śirasi sthitvā tathā vikramya corasi | ātmadoṣātparibhraṣṭaḥ kathaṃ vakṣyāmi tānaham
शत्रुओं के सिर पर खड़ा होकर और उनकी छाती पर पैर रखकर अब अपने ही दोष से गिरा हुआ मैं उनसे कैसे बात करूँगा?
श्लोक 18 (3.250.18)
दुर्विनीताः श्रियं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च । तिष्ठन्ति न चिरं भद्रे यथाऽहं मदगर्वितः ॥
durvinītāḥ śriyaṃ prāpya vidyāmaiśvaryameva ca | tiṣṭhanti na ciraṃ bhadre yathā'haṃ madagarvitaḥ
उद्दण्ड लोग लक्ष्मी, विद्या और ऐश्वर्य पाकर भी उस सौभाग्य में अधिक दिन नहीं टिकते, जैसे मद से गर्वित मैं नहीं टिक सका।
श्लोक 19 (3.250.19)
अहो वत यथेदं मे कष्टं दुश्चरितं कृतम् । स्वयं दुर्बुद्धिना मोहाद्येन प्राप्तोऽस्मि संशयम् ॥
aho vata yathedaṃ me kaṣṭaṃ duścaritaṃ kṛtam | svayaṃ durbuddhinā mohādyena prāpto'smi saṃśayam
हाय, मुझ दुर्बुद्धि ने स्वयं मोहवश कैसा कष्टदायक दुष्कर्म कर डाला, जिसके कारण मैं इस संकट में पड़ा हूँ।
श्लोक 20 (3.250.20)
तस्मात्प्रायमुपासिष्ये न हि शक्ष्यामि जीवितुम् । चेतयानो हि को जीवेत्कृच्छ्राच्छत्रुभिरुद्धृतः ॥
tasmātprāyamupāsiṣye na hi śakṣyāmi jīvitum | cetayāno hi ko jīvetkṛcchrācchatrubhiruddhṛtaḥ
इसलिए मैं आमरण अनशन करूँगा, क्योंकि अब मैं जी नहीं सकूँगा। कौन समझदार व्यक्ति शत्रुओं द्वारा संकट से उबारे जाने के बाद जीवित रहना चाहेगा —
श्लोक 21 (3.250.21)
शत्रुभिश्चावहसितो मानी पौरुषवर्जितः । पाण्डवैर्विक्रमाढ्यैश्च सावमानमवेक्षितः ॥
śatrubhiścāvahasito mānī pauruṣavarjitaḥ | pāṇḍavairvikramāḍhyaiśca sāvamānamavekṣitaḥ
शत्रुओं का उपहास-पात्र बनकर, अभिमानी होते हुए भी पौरुष से हीन, पराक्रमी पाण्डवों की तिरस्कार-भरी दृष्टि झेलते हुए?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 22 (3.250.22)
एवं चिन्तापरिगतो दुःशासनमथाब्रवीत् । दुःशासन निबोधेदं वचनं मम भारत ॥
evaṃ cintāparigato duḥśāsanamathābravīt | duḥśāsana nibodhedaṃ vacanaṃ mama bhārata
इस प्रकार चिन्ता में डूबे दुर्योधन ने तब दुःशासन से कहा — "हे दुःशासन, हे भारत, मेरी यह बात सुनो।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 23 (3.250.23)
प्रतीच्छ त्वं मया दत्तमभिषेकं नृपो भव । प्रशाधि पृथिवीं स्फीतां कर्णसौबलपालिताम् ॥
pratīccha tvaṃ mayā dattamabhiṣekaṃ nṛpo bhava | praśādhi pṛthivīṃ sphītāṃ karṇasaubalapālitām
मेरे द्वारा दिया जा रहा अभिषेक स्वीकार करो और राजा बनो। कर्ण और सौबल से सुरक्षित इस समृद्ध पृथ्वी का शासन करो।
श्लोक 24 (3.250.24)
भ्रातॄन्पालय विस्रब्धं मरुतो वृत्रहा यथा । बान्धवाश्चोपजीवन्तु देवा इव शतक्रतुम् ॥
bhrātṝnpālaya visrabdhaṃ maruto vṛtrahā yathā | bāndhavāścopajīvantu devā iva śatakratum
जैसे वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र मरुद्गणों की रक्षा करते हैं, वैसे ही विश्वासपूर्वक अपने भाइयों का पालन करो; और जैसे देवता शतक्रतु के आश्रय में रहते हैं, वैसे ही तुम्हारे बन्धु तुम्हारे सहारे जीवन बिताएँ।
श्लोक 25 (3.250.25)
ब्राह्मणेषु सदा वृत्तिं कुर्वीथाश्चाप्रमादतः । बन्धूनां सुहृदां चैव भवेथास्त्वं गतिः सदा ॥
brāhmaṇeṣu sadā vṛttiṃ kurvīthāścāpramādataḥ | bandhūnāṃ suhṛdāṃ caiva bhavethāstvaṃ gatiḥ sadā
ब्राह्मणों की जीविका का प्रबन्ध सदा सावधानी से करना, और अपने बन्धुओं तथा मित्रों के लिए सदा आश्रय बने रहना।
श्लोक 26 (3.250.26)
ज्ञातींश्चाप्यनुपश्येथा विष्णुर्देवगणान्यथा । गुरवः पालनीयास्ते गच्छ पालय मेदिनीम् ॥
jñātīṃścāpyanupaśyethā viṣṇurdevagaṇānyathā | guravaḥ pālanīyāste gaccha pālaya medinīm
जैसे विष्णु देवगणों की देखभाल करते हैं, वैसे ही अपने जाति-बन्धुओं की देखभाल करना; गुरुजनों का पालन तुम्हारा कर्तव्य है। जाओ, पृथ्वी का पालन करो,
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (3.250.27)
नन्दयन्सुहृदः सर्वाञ्शात्रवांश्चावभर्त्सयन् । कण्ठे चैनं परिष्वज्य गम्यतामित्युवाच ह ॥
nandayansuhṛdaḥ sarvāñśātravāṃścāvabhartsayan | kaṇṭhe cainaṃ pariṣvajya gamyatāmityuvāca ha
सब मित्रों को आनन्दित करते हुए और शत्रुओं को फटकारते हुए।" फिर उसे गले लगाकर उसने कहा — "जाओ।"
श्लोक 28 (3.250.28)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दीनो दुःशासनोऽब्रवीत् । अश्रुकण्ठः सुदुःखार्तः प्राञ्जलिः प्रणिपत्य च ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā dīno duḥśāsano'bravīt | aśrukaṇṭhaḥ suduḥkhārtaḥ prāñjaliḥ praṇipatya ca
उसकी बात सुनकर दीन दुःशासन, जिसका गला आँसुओं से रुँधा था और जो अत्यन्त दुःख से पीड़ित था, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए,
श्लोक 29 (3.250.29)
सगद्गदमिदं वाक्यं भ्रातरं ज्येष्ठमात्मनः । प्रसीदेत्यपतद्भूमौ दूयमानेन चेतसा ॥
sagadgadamidaṃ vākyaṃ bhrātaraṃ jyeṣṭhamātmanaḥ | prasīdetyapatadbhūmau dūyamānena cetasā
अपने बड़े भाई से गद्गद वाणी में यह बोला — "प्रसन्न हो जाइए!" और व्यथित हृदय से भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 30 (3.250.30)
दुःखितः पादयोस्तस्य नेत्रजं जलमुत्सृजन् । उक्तवांश्च नरव्याघ्रो नैतदेवं भविष्यति ॥
duḥkhitaḥ pādayostasya netrajaṃ jalamutsṛjan | uktavāṃśca naravyāghro naitadevaṃ bhaviṣyati
दुःख से भरकर भाई के चरणों पर आँसू बहाते हुए उस नरश्रेष्ठ ने कहा — "ऐसा नहीं होगा!
दुःशासन उवाच
श्लोक 31 (3.250.31)
विदीर्येत्सकला भूमिर्द्यौश्चापि शकलीभवेत् । रविरात्मप्रभां जह्यात्सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ॥
vidīryetsakalā bhūmirdyauścāpi śakalībhavet | ravirātmaprabhāṃ jahyātsomaḥ śītāṃśutāṃ tyajet
चाहे सारी पृथ्वी फट जाए और आकाश टुकड़े-टुकड़े हो जाए, सूर्य अपनी प्रभा छोड़ दे और चन्द्रमा अपनी शीतलता त्याग दे;
श्लोक 32 (3.250.32)
वायुः शैघ्र्यमथो जह्याद्धिमवांश्च हिमं त्यजेत् । शुष्येत्तोयं समुद्रेषु वह्निरप्युष्णतां त्यजेत् ॥
vāyuḥ śaighryamatho jahyāddhimavāṃśca himaṃ tyajet | śuṣyettoyaṃ samudreṣu vahnirapyuṣṇatāṃ tyajet
चाहे वायु अपना वेग छोड़ दे और हिमालय अपना हिम त्याग दे, समुद्रों का जल सूख जाए और अग्नि अपनी उष्णता छोड़ दे —
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (3.250.33)
न चाहं त्वदृते राजन्प्रशासेयं वसुंधराम् । पुनःपुनः प्रसीदेति वाक्यं चेदमुवाच ह ॥
na cāhaṃ tvadṛte rājanpraśāseyaṃ vasuṃdharām | punaḥpunaḥ prasīdeti vākyaṃ cedamuvāca ha
पर हे राजन्, आपके बिना मैं पृथ्वी का शासन नहीं करूँगा।" वह बार-बार "प्रसन्न हो जाइए" कहता रहा, और उसने यह भी कहा —
दुःशासन उवाच
श्लोक 34 (3.250.34)
शत्रूणां शोककृद्राजन्सुहृदां शोकनाशनः । त्वमेव नः कुले राजा भविष्यसि शतं समाः ॥
śatrūṇāṃ śokakṛdrājansuhṛdāṃ śokanāśanaḥ | tvameva naḥ kule rājā bhaviṣyasi śataṃ samāḥ
हे राजन्, शत्रुओं को शोक देने वाले और मित्रों का शोक मिटाने वाले, आप ही सौ वर्षों तक हमारे कुल के राजा रहेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (3.250.35)
एवमुक्त्वा स राजानं सस्वनं प्ररुरोद ह । पादौ संस्पृश्य मानार्हौ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ॥
evamuktvā sa rājānaṃ sasvanaṃ praruroda ha | pādau saṃspṛśya mānārhau bhrāturjyeṣṭhasya bhārata
हे भारत, राजा से ऐसा कहकर वह अपने बड़े भाई के पूजनीय चरणों को छूकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।
श्लोक 36 (3.250.36)
तथा तौ दुःखितौ दृष्ट्वा दुःशासनसुयोधनौ । अभिगम्य व्यथाविष्टः कर्णस्तौ प्रत्यभाषत ॥
tathā tau duḥkhitau dṛṣṭvā duḥśāsanasuyodhanau | abhigamya vyathāviṣṭaḥ karṇastau pratyabhāṣata
दुःशासन और सुयोधन — दोनों को इस प्रकार दुःखी देखकर व्यथित कर्ण उनके पास आया और बोला —
कर्ण उवाच
श्लोक 37 (3.250.37)
विषीदथः किं कौरव्यौ बालिश्यात्प्राकृताविव । न शोकः शोचमानस्य विनिवर्तेत कर्हिचित् ॥
viṣīdathaḥ kiṃ kauravyau bāliśyātprākṛtāviva | na śokaḥ śocamānasya vinivarteta karhicit
हे कौरवो, तुम दोनों साधारण लोगों की तरह नासमझी से क्यों विषाद कर रहे हो? शोक करने वाले का शोक कभी दूर नहीं होता।
श्लोक 38 (3.250.38)
यदा च शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति । सामर्थ्यं किं ततः शोके शोचमानौ प्रपश्यथः ॥
yadā ca śocataḥ śoko vyasanaṃ nāpakarṣati | sāmarthyaṃ kiṃ tataḥ śoke śocamānau prapaśyathaḥ
जब शोक करने वाले का शोक उसकी विपत्ति को दूर नहीं करता, तब तुम दोनों शोक करते हुए उसमें क्या सामर्थ्य देखते हो?
श्लोक 39 (3.250.39)
धृतिं गृह्णीतं मा शत्रूञ्शोचन्तौ नन्दयिष्यथः । कर्तव्यं हि कृतं राजन्पाण्डवैस्तव मोक्षणम् ॥
dhṛtiṃ gṛhṇītaṃ mā śatrūñśocantau nandayiṣyathaḥ | kartavyaṃ hi kṛtaṃ rājanpāṇḍavaistava mokṣaṇam
धैर्य धारण करो; शोक करके शत्रुओं को प्रसन्न मत करो। हे राजन्, तुम्हें छुड़ाकर पाण्डवों ने अपना कर्तव्य ही निभाया है।
श्लोक 40 (3.250.40)
नित्यमेव प्रियं कार्यं राज्ञो विषयवासिभिः । पाल्यमानास्त्वया ते हि निवसन्ति गतज्वराः ॥
nityameva priyaṃ kāryaṃ rājño viṣayavāsibhiḥ | pālyamānāstvayā te hi nivasanti gatajvarāḥ
राजा के राज्य में रहने वालों को सदा उसका प्रिय करना चाहिए; और वे तुम्हारे संरक्षण में ही निश्चिन्त होकर रहते हैं।
श्लोक 41 (3.250.41)
नार्हस्येवंगते मन्युं कर्तुं प्राकृतवत्स्वयम् । विषण्णास्तव सोदर्यास्त्वयि प्रायं समास्थिते ॥
nārhasyevaṃgate manyuṃ kartuṃ prākṛtavatsvayam | viṣaṇṇāstava sodaryāstvayi prāyaṃ samāsthite
ऐसी स्थिति में तुम्हें स्वयं साधारण मनुष्य की तरह क्रोध नहीं करना चाहिए। तुम्हारे आमरण अनशन का निश्चय करने से तुम्हारे सगे भाई विषाद में डूबे हैं।
श्लोक 42 (3.250.42)
तदलं दुःखितानेतान्कर्तुं सर्वान्नराधिप । उत्तिष्ठ व्रज भद्रं ते समाश्वासय सोदरान् ॥
tadalaṃ duḥkhitānetānkartuṃ sarvānnarādhipa | uttiṣṭha vraja bhadraṃ te samāśvāsaya sodarān
इसलिए हे नराधिप, इन सबको और दुःखी मत करो। उठो, चलो, तुम्हारा कल्याण हो; अपने भाइयों को सान्त्वना दो।