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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 251

कर्ण का दुर्योधन से उठने का आग्रह

गन्धर्वों से पाण्डवों द्वारा छुड़ाए जाने के बाद आमरण अनशन पर बैठे दुर्योधन को कर्ण फटकारता है। वह कहता है कि इसमें लज्जा की कोई बात नहीं: पाण्डव दुर्योधन के राज्य में रहते हैं, और प्रजा तथा सैनिकों का धर्म ही है कि वे राजा का प्रिय करें, इसलिए उन्होंने केवल अपना कर्तव्य निभाया। कर्ण प्रतिज्ञा करता है कि वह भी उसके साथ यहीं रहकर प्राण दे देगा, और चेताता है कि इस अनशन से वह राजाओं में हँसी का पात्र बनेगा; पर स्वर्ग जाने का निश्चय कर चुका दुर्योधन उठने से मना कर देता है।

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कर्ण उवाच

श्लोक 1 (3.251.1)

राजन्नद्यावगच्छामि तवैव लघुसत्वताम् । अल्पत्वं च तथा बुद्धेः कार्याणामविवेकिताम् ॥

rājannadyāvagacchāmi tavaiva laghusatvatām | alpatvaṃ ca tathā buddheḥ kāryāṇāmavivekitām

हे राजन्, आज मुझे तुम्हारे मन की दुर्बलता, बुद्धि की संकीर्णता और कर्तव्य-अकर्तव्य के विवेक की कमी साफ़ दिखाई दे रही है।

श्लोक 2 (3.251.2)

किमत्र चित्रं धर्मज्ञ मोक्षितः पाण्डवैरसि । सद्यो वशं समापन्नः शत्रूणां शत्रुकर्शन ॥

kimatra citraṃ dharmajña mokṣitaḥ pāṇḍavairasi | sadyo vaśaṃ samāpannaḥ śatrūṇāṃ śatrukarśana

हे धर्मज्ञ, हे शत्रुओं को सताने वाले, जब तुम अचानक शत्रुओं के वश में पड़ गए थे, तब यदि पाण्डवों ने तुम्हें छुड़ा लिया तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?

श्लोक 3 (3.251.3)

सेनाजीवैश्च कौरव्य तथा विषयवासिभिः । अज्ञातैर्यदि वा ज्ञातैः कर्तव्यं नृपतेः प्रियम् ॥

senājīvaiśca kauravya tathā viṣayavāsibhiḥ | ajñātairyadi vā jñātaiḥ kartavyaṃ nṛpateḥ priyam

हे कौरव्य, सेना से जीविका चलाने वाले और राज्य में बसने वाले लोग — चाहे राजा उन्हें जानता हो या न जानता हो — सबको राजा का प्रिय करना ही चाहिए।

श्लोक 4 (3.251.4)

प्रायः प्रधानाः पुरुषाः क्षोभयित्वाऽरिवाहिनीम् । निगृह्यन्ते च युद्धेषु मोक्ष्यन्ते च स्वसैनिकैः ॥

prāyaḥ pradhānāḥ puruṣāḥ kṣobhayitvā'rivāhinīm | nigṛhyante ca yuddheṣu mokṣyante ca svasainikaiḥ

युद्धों में प्रायः ऐसा होता है कि प्रमुख योद्धा शत्रु-सेना में खलबली मचाकर पकड़ लिए जाते हैं और फिर उनके अपने ही सैनिक उन्हें छुड़ा लेते हैं।

श्लोक 5 (3.251.5)

सेनाजीवाश्च ये राज्ञां विषये सन्ति मानवाः । तैः संगम्य नृपार्थाय यतितव्यं यथातथम् ॥

senājīvāśca ye rājñāṃ viṣaye santi mānavāḥ | taiḥ saṃgamya nṛpārthāya yatitavyaṃ yathātatham

राजा के राज्य में जो लोग सेना से जीविका पाते हैं, उन्हें मिलकर यथाशक्ति राजा के हित के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

श्लोक 6 (3.251.6)

यद्येवं पाण्डवै राजन्भवद्विषयवासिभिः । यदृच्छया मोक्षितोऽसि तत्र का परिदेवना ॥

yadyevaṃ pāṇḍavai rājanbhavadviṣayavāsibhiḥ | yadṛcchayā mokṣito'si tatra kā paridevanā

हे राजन्, यदि इसी प्रकार तुम्हारे राज्य में रहने वाले पाण्डवों ने संयोगवश तुम्हें छुड़ा लिया, तो इसमें विलाप की क्या बात है?

श्लोक 7 (3.251.7)

न चैतत्साधु यद्राजन्पाण्डवास्त्वां नृपोत्तमम् । स्वसेनया संप्रयान्तं नानुयान्ति स्म पृष्ठतः ॥

na caitatsādhu yadrājanpāṇḍavāstvāṃ nṛpottamam | svasenayā saṃprayāntaṃ nānuyānti sma pṛṣṭhataḥ

हे राजन्, यह भी उचित नहीं था कि जब तुम जैसे श्रेष्ठ राजा अपनी सेना के साथ निकले, तब पाण्डव तुम्हारे पीछे-पीछे नहीं चले।

श्लोक 8 (3.251.8)

शूराश्च बलवन्तश्च संयुगेष्वपलायिनः । भवतस्ते सभायां वै प्रेष्यतां पूर्वमागताः ॥

śūrāśca balavantaśca saṃyugeṣvapalāyinaḥ | bhavataste sabhāyāṃ vai preṣyatāṃ pūrvamāgatāḥ

वे वीर, बलवान और युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले हैं, पर सभा में वे पहले ही तुम्हारे दास बन चुके थे।

श्लोक 9 (3.251.9)

पाण्डवेयानि रत्नानि त्वमद्याप्युपभुञ्जसे । सत्वस्थान्पाण्डवान्पश्य न ते प्रायमुपाविशन् ॥

pāṇḍaveyāni ratnāni tvamadyāpyupabhuñjase | satvasthānpāṇḍavānpaśya na te prāyamupāviśan

पाण्डवों के रत्नों का उपभोग तुम आज भी कर रहे हो। उन पाण्डवों को देखो, वे कितने धैर्यवान हैं — उन्होंने तो आमरण अनशन नहीं किया।

श्लोक 10 (3.251.10)

तदलं ते महाबाहो विषादं कर्तुमीदृशम् । उत्तिष्ठ राजन्भद्रं ते न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥

tadalaṃ te mahābāho viṣādaṃ kartumīdṛśam | uttiṣṭha rājanbhadraṃ te na cintāṃ kartumarhasi

इसलिए हे महाबाहो, ऐसा विषाद करना छोड़ दो। हे राजन्, उठो, तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 11 (3.251.11)

अवश्यमेव नृपते राज्ञो विषयवासिभिः । प्रियाण्याचरितव्यानि तत्र का परिदेवना ॥

avaśyameva nṛpate rājño viṣayavāsibhiḥ | priyāṇyācaritavyāni tatra kā paridevanā

राजा के राज्य में रहने वालों को अवश्य ही राजा का प्रिय करना चाहिए; इसमें शोक की क्या बात है?

श्लोक 12 (3.251.12)

मद्वाक्यमेतद्राजेन्द्र यद्येवं न करिष्यसि । स्थास्यामीह भवत्पादौ शुश्रूषन्नरिमर्दन ॥

madvākyametadrājendra yadyevaṃ na kariṣyasi | sthāsyāmīha bhavatpādau śuśrūṣannarimardana

हे राजेन्द्र, यह मेरा वचन है — यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो हे शत्रुमर्दन, मैं भी तुम्हारे चरणों की सेवा करता हुआ यहीं रहूँगा।

श्लोक 13 (3.251.13)

नोत्सहे जीवितुमहं त्वद्विहीनो नरर्षभ । प्रायोपविष्टस्तु तथा राज्ञां हास्यो भविष्यसि ॥

notsahe jīvitumahaṃ tvadvihīno nararṣabha | prāyopaviṣṭastu tathā rājñāṃ hāsyo bhaviṣyasi

हे नरश्रेष्ठ, तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। और इस तरह आमरण अनशन पर बैठकर तुम राजाओं के बीच हँसी के पात्र बन जाओगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (3.251.14)

एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा । नैवोत्थातुं मनश्चक्रे स्वर्गाय कृतनिश्चयः ॥

evamuktastu karṇena rājā duryodhanastadā | naivotthātuṃ manaścakre svargāya kṛtaniścayaḥ

कर्ण के ऐसा कहने पर भी राजा दुर्योधन ने उठने का मन नहीं बनाया; वह स्वर्ग जाने का निश्चय कर चुका था।

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