आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 252
दानवों द्वारा दुर्योधन का रसातल में आवाहन
शकुनि दुर्योधन से अनशन छोड़ने, अपने रक्षक पाण्डवों का सत्कार करने और उनका पैतृक राज्य लौटाने का आग्रह करता है। दुर्योधन शोकाकुल दुःशासन को गले लगाता है, पर लज्जा से भरकर अपने सुहृदों को लौटा देता है और दर्भ का आसन बिछाकर मौन आमरण अनशन पर बैठ जाता है। अपने सहायक के नाश की आशंका से पाताल के दैत्य-दानव अथर्ववेदीय मन्त्रों से अग्नि-अनुष्ठान करते हैं; उससे एक कृत्या प्रकट होती है जो दुर्योधन को रसातल ले जाती है, जहाँ दानव उसका स्वागत करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.252.1)
प्रायोपविष्टं राजानं दुर्योधनममर्षणम् । उवाच सान्त्वयन्राजञ्शकुनिः सौबलस्तदा ॥
prāyopaviṣṭaṃ rājānaṃ duryodhanamamarṣaṇam | uvāca sāntvayanrājañśakuniḥ saubalastadā
हे राजन्, तब सुबलपुत्र शकुनि ने आमरण अनशन पर बैठे हुए क्रोधी राजा दुर्योधन को सान्त्वना देते हुए कहा।
शकुनिरुवाच
श्लोक 2 (3.252.2)
सम्यगुक्तं हि कर्णेन तच्छ्रुतं कौरव त्वया । मया हृतां श्रियं स्फीतां तां मोहादपहासि किम् ॥
samyaguktaṃ hi karṇena tacchrutaṃ kaurava tvayā | mayā hṛtāṃ śriyaṃ sphītāṃ tāṃ mohādapahāsi kim
हे कौरव, कर्ण ने ठीक ही कहा है और तुमने उसकी बात सुन ली है। मैंने जो समृद्ध राजलक्ष्मी तुम्हारे लिए छीनी थी, उसे तुम मोहवश क्यों त्याग रहे हो?
श्लोक 3 (3.252.3)
त्वमबुद्ध्या नृपवर प्राणानुत्स्रष्टुमिच्छसि । अद्य वाऽप्यवगच्छामि न वृद्धाः सेवितास्त्वया ॥
tvamabuddhyā nṛpavara prāṇānutsraṣṭumicchasi | adya vā'pyavagacchāmi na vṛddhāḥ sevitāstvayā
हे नृपश्रेष्ठ, तुम मूर्खतावश अपने प्राण त्याग देना चाहते हो। आज मैं यह भी समझ रहा हूँ कि तुमने कभी वृद्धजनों की सेवा नहीं की।
श्लोक 4 (3.252.4)
यः समुत्पतितं हर्षं दैन्यं वा न नियच्छति । स नश्यति श्रियं प्राप्य पात्रमाममिवाम्भसि ॥
yaḥ samutpatitaṃ harṣaṃ dainyaṃ vā na niyacchati | sa naśyati śriyaṃ prāpya pātramāmamivāmbhasi
जो व्यक्ति अचानक उमड़े हर्ष या दीनता को वश में नहीं रखता, वह प्राप्त हुई लक्ष्मी को भी वैसे ही खो देता है, जैसे कच्चा घड़ा पानी में गल जाता है।
श्लोक 5 (3.252.5)
अतिभीरुं मृदुं क्लीबं दीर्घसूत्रं प्रमादिनम् । व्यसनाद्विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं श्रिताः ॥
atibhīruṃ mṛduṃ klībaṃ dīrghasūtraṃ pramādinam | vyasanādviṣayākrāntaṃ na bhajanti nṛpaṃ śritāḥ
जो राजा अत्यन्त डरपोक, कोमल, निर्बल, दीर्घसूत्री और असावधान हो, तथा व्यसनों के कारण विषयों में डूबा हो, उसके आश्रित लोग उसका साथ नहीं देते।
श्लोक 6 (3.252.6)
सत्कृतस्य हि ते शोको विपरीते कथं भवेत् । मा कृतं शोभनं पार्थैः शोकमालम्ब्य नाशय ॥
satkṛtasya hi te śoko viparīte kathaṃ bhavet | mā kṛtaṃ śobhanaṃ pārthaiḥ śokamālambya nāśaya
तुम्हारा तो सत्कार हुआ है, फिर तुम ऐसे शोक कैसे कर रहे हो मानो उलटा हुआ हो? पार्थों ने जो भलाई की है, उसे शोक का सहारा लेकर नष्ट मत करो।
श्लोक 7 (3.252.7)
यत्र हर्षस्त्वया कार्यः सत्कर्तव्याश्च पाण्डवाः । तत्र शोचसि राजेन्द्र विपरीतमिदं तव ॥
yatra harṣastvayā kāryaḥ satkartavyāśca pāṇḍavāḥ | tatra śocasi rājendra viparītamidaṃ tava
जहाँ तुम्हें हर्षित होना चाहिए और पाण्डवों का सत्कार करना चाहिए, वहाँ हे राजेन्द्र, तुम शोक कर रहे हो; यह तो तुम्हारा उलटा आचरण है।
श्लोक 8 (3.252.8)
प्रसीद मा त्यजात्मानं तुष्टश्च सुकृतं स्मर । प्रयच्छ राज्यं पार्थानां यशो धर्ममवाप्नुहि । क्रियामेतां समाज्ञाय कृतघ्नो न भविष्यसि ॥
prasīda mā tyajātmānaṃ tuṣṭaśca sukṛtaṃ smara | prayaccha rājyaṃ pārthānāṃ yaśo dharmamavāpnuhi | kriyāmetāṃ samājñāya kṛtaghno na bhaviṣyasi
प्रसन्न हो जाओ, अपने प्राण मत त्यागो, संतुष्ट रहकर उनके उपकार को याद करो। पार्थों को उनका राज्य लौटा दो और यश तथा धर्म प्राप्त करो। उनके इस कार्य को मान देकर तुम कृतघ्न नहीं कहलाओगे।
श्लोक 9 (3.252.9)
सौभ्रात्रं पाण्डवैः कृत्वा समवस्थाप्य चैव तान् । पित्र्यं राज्यं प्रयच्छैषां ततः सुखमवाप्स्यसि ॥
saubhrātraṃ pāṇḍavaiḥ kṛtvā samavasthāpya caiva tān | pitryaṃ rājyaṃ prayacchaiṣāṃ tataḥ sukhamavāpsyasi
पाण्डवों के साथ भाईचारा स्थापित करो, उन्हें उनके स्थान पर प्रतिष्ठित करो और उनका पैतृक राज्य उन्हें दे दो; तब तुम्हें सुख मिलेगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 10 (3.252.10)
शकुनेस्तु वचः श्रुत्वा दुःशासनमवेक्ष्य च । पादयोः पतितं वीरं विकृतं भ्रातृसौहृदात् ॥
śakunestu vacaḥ śrutvā duḥśāsanamavekṣya ca | pādayoḥ patitaṃ vīraṃ vikṛtaṃ bhrātṛsauhṛdāt
शकुनि की बात सुनकर और भाई के प्रेम से व्याकुल होकर अपने चरणों में पड़े वीर दुःशासन को देखकर,
श्लोक 11 (3.252.11)
बाहुभ्यां साधुजाताभ्यां दुःशासनमरिंदमम् । उत्थाप्य संपरिष्वज्य प्रीत्याऽजिघ्रत मूर्धनि ॥
bāhubhyāṃ sādhujātābhyāṃ duḥśāsanamariṃdamam | utthāpya saṃpariṣvajya prītyā'jighrata mūrdhani
उसने शत्रुदमन दुःशासन को अपनी सुन्दर भुजाओं से उठाया, गले लगाया और प्रेम से उसका माथा सूँघा।
श्लोक 12 (3.252.12)
कर्णसौबलयोश्चापि संश्रुत्य वचनान्यसौ । निर्वेदं परमं गत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । व्रीडयाऽभिपरीतात्मा नैराश्यमगमत्परम् ॥
karṇasaubalayoścāpi saṃśrutya vacanānyasau | nirvedaṃ paramaṃ gatvā rājā duryodhanastadā | vrīḍayā'bhiparītātmā nairāśyamagamatparam
कर्ण और शकुनि की बातें सुनकर राजा दुर्योधन को गहरा वैराग्य हो गया; लज्जा से भरकर वह पूरी तरह निराश हो गया।
श्लोक 13 (3.252.13)
सुहृदां चैव तच्छ्रुत्वा समन्युरिदमब्रवीत् । न धर्मधनसौख्येन नैश्वर्येण न चाज्ञया ॥
suhṛdāṃ caiva tacchrutvā samanyuridamabravīt | na dharmadhanasaukhyena naiśvaryeṇa na cājñayā
अपने सुहृदों की बात सुनकर वह दुःख और रोष से भरकर बोला — "मुझे न धर्म, धन और सुख से कोई प्रयोजन है, न ऐश्वर्य से, न आज्ञा चलाने से,
दुर्योधन उवाच
श्लोक 14 (3.252.14)
नैव भोगैश्च मे कार्यं मा विहन्यत गच्छत । निश्चितेयं मम मतिः स्थिता प्रायोपवेशने ॥
naiva bhogaiśca me kāryaṃ mā vihanyata gacchata | niściteyaṃ mama matiḥ sthitā prāyopaveśane
और न भोगों से ही मुझे कोई काम है। मेरे संकल्प में बाधा मत डालो, चले जाओ। मेरी बुद्धि निश्चित है और आमरण अनशन पर स्थिर है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (3.252.15)
गच्छध्वं नगरं सर्वे पूज्याश्च गुरवो मम । त एवमुक्ताः प्रत्यूचू राजानमरिमर्दनम् ॥
gacchadhvaṃ nagaraṃ sarve pūjyāśca guravo mama | ta evamuktāḥ pratyūcū rājānamarimardanam
तुम सब नगर लौट जाओ और मेरे गुरुजनों का आदर करते रहना।" ऐसा कहे जाने पर उन्होंने शत्रुमर्दन राजा को उत्तर दिया —
सुहृद ऊचुः
श्लोक 16 (3.252.16)
या गतिस्तव राजेन्द्र साऽस्माकमपि भारत । कथं वा संप्रवेक्ष्यामस्त्वद्विहीनाः पुरं वयम् ॥
yā gatistava rājendra sā'smākamapi bhārata | kathaṃ vā saṃpravekṣyāmastvadvihīnāḥ puraṃ vayam
हे राजेन्द्र, हे भारत, जो गति तुम्हारी होगी वही हमारी भी होगी। तुम्हारे बिना हम नगर में कैसे प्रवेश करें?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (3.252.17)
स सुहृद्भिरमात्यैश्च भ्रातृभिः स्वजनेन च । बहुप्रकारमप्युक्तो निश्चयान्न व्यचाल्यत ॥
sa suhṛdbhiramātyaiśca bhrātṛbhiḥ svajanena ca | bahuprakāramapyukto niścayānna vyacālyata
सुहृदों, मन्त्रियों, भाइयों और स्वजनों ने उसे अनेक प्रकार से समझाया, फिर भी वह अपने निश्चय से नहीं डिगा।
श्लोक 18 (3.252.18)
दर्भास्तरणमास्तीर्य निश्चयाद्धृतराष्ट्रजः । संस्पृश्यापः शुचिर्भूत्वा भूतले समुपस्थितः ॥
darbhāstaraṇamāstīrya niścayāddhṛtarāṣṭrajaḥ | saṃspṛśyāpaḥ śucirbhūtvā bhūtale samupasthitaḥ
धृतराष्ट्रपुत्र ने दृढ़ निश्चय के साथ दर्भ का आसन बिछाया, जल का स्पर्श कर स्वयं को पवित्र किया और भूमि पर बैठ गया।
श्लोक 19 (3.252.19)
कुशचीराम्बरधरः परं नियममास्थितः । वाग्यतो राजशार्दूलः स स्वर्गगतिकाम्यया ॥
kuśacīrāmbaradharaḥ paraṃ niyamamāsthitaḥ | vāgyato rājaśārdūlaḥ sa svargagatikāmyayā
कुश और वल्कल के वस्त्र धारण कर उसने कठोर नियम अपनाया; वह राजसिंह स्वर्ग जाने की इच्छा से मौन हो गया।
श्लोक 20 (3.252.20)
मनसोपचितिं कृत्वा निरस्य च बहिःक्रियाः । तस्थौ प्रायोपवेशेऽथ मतिं कृत्वा सुनिश्चयाम् ॥
manasopacitiṃ kṛtvā nirasya ca bahiḥkriyāḥ | tasthau prāyopaveśe'tha matiṃ kṛtvā suniścayām
मन ही मन अपनी चिता का संकल्प करके और सारी बाहरी क्रियाएँ त्यागकर वह दृढ़ निश्चय के साथ आमरण अनशन में स्थित हो गया।
श्लोक 21 (3.252.21)
अथ तं निश्चयं तस्य बुद्ध्वा दैतेयदानवाः । पातालवासिनो रौद्राः पूर्वं देवैर्विनिर्जिताः ॥
atha taṃ niścayaṃ tasya buddhvā daiteyadānavāḥ | pātālavāsino raudrāḥ pūrvaṃ devairvinirjitāḥ
तब पाताल में रहने वाले भयंकर दैत्य और दानव, जिन्हें पूर्वकाल में देवताओं ने पराजित किया था, उसके इस निश्चय को जान गए।
श्लोक 22 (3.252.22)
ते स्वपक्षक्षयं तं तु ज्ञात्वा दुर्योधनस्य वै । आह्वानाय तदा चक्रुः कर्म वैतानसंभवम् ॥
te svapakṣakṣayaṃ taṃ tu jñātvā duryodhanasya vai | āhvānāya tadā cakruḥ karma vaitānasaṃbhavam
यह जानकर कि दुर्योधन के इस निश्चय से उनके अपने पक्ष का नाश हो जाएगा, उन्होंने उसे बुलाने के लिए वैतान अग्नियों से सम्पन्न होने वाला एक अनुष्ठान किया।
श्लोक 23 (3.252.23)
बृहस्पत्युशनोक्तैश्च मन्त्रैर्मन्त्रविशारदाः । अथर्ववेदप्रोक्तैश्च याश्चौपनिषदाः क्रियाः । मन्त्रजप्यसमायुक्तास्तास्तदा समवर्तयन् ॥
bṛhaspatyuśanoktaiśca mantrairmantraviśāradāḥ | atharvavedaproktaiśca yāścaupaniṣadāḥ kriyāḥ | mantrajapyasamāyuktāstāstadā samavartayan
मन्त्रों के जानकार उन दैत्यों ने बृहस्पति और शुक्राचार्य के कहे मन्त्रों से तथा अथर्ववेद के मन्त्रों से, जप-सहित वे क्रियाएँ सम्पन्न कीं जो उपनिषदों में बताई गई हैं।
श्लोक 24 (3.252.24)
जुह्वत्यग्नौ हविः क्षीरं मन्त्रवत्सुसमाहिताः । ब्राह्मणा वेदवेदाङ्गपारगाः सुदृढव्रताः ॥
juhvatyagnau haviḥ kṣīraṃ mantravatsusamāhitāḥ | brāhmaṇā vedavedāṅgapāragāḥ sudṛḍhavratāḥ
वेद-वेदांगों में पारंगत, दृढ़ व्रत वाले ब्राह्मण एकाग्र होकर मन्त्रों के साथ अग्नि में दूध की आहुति देने लगे।
श्लोक 25 (3.252.25)
अध्वर्यवो दानवानां कर्म प्रावर्तयंस्ततः ॥
adhvaryavo dānavānāṃ karma prāvartayaṃstataḥ
तब दानवों के अध्वर्यु पुरोहितों ने कर्म आरम्भ किया।
श्लोक 26 (3.252.26)
कर्मसिद्धौ तदा तत्र जृम्भमाणा महाद्भुता । कृत्या समुत्थिता राजन्किं करोमीति चाब्रवीत् ॥
karmasiddhau tadā tatra jṛmbhamāṇā mahādbhutā | kṛtyā samutthitā rājankiṃ karomīti cābravīt
हे राजन्, अनुष्ठान पूरा होने पर वहाँ जँभाई लेती हुई एक अत्यन्त अद्भुत कृत्या प्रकट हुई और बोली — "मैं क्या करूँ?"
श्लोक 27 (3.252.27)
आहुर्दैत्याश्च तां तत्र सुप्रीतेनान्तरात्मना । प्रायोपविष्टं राजानं धार्तराष्ट्रमिहानय ॥
āhurdaityāśca tāṃ tatra suprītenāntarātmanā | prāyopaviṣṭaṃ rājānaṃ dhārtarāṣṭramihānaya
दैत्यों ने अत्यन्त प्रसन्न मन से उससे कहा — "आमरण अनशन पर बैठे धृतराष्ट्रपुत्र राजा को यहाँ ले आओ।"
श्लोक 28 (3.252.28)
तथेति च प्रतिश्रुत्य सा कृत्या प्रययौ तदा । निमेषादगमच्चापि यत्र राजा सुयोधनः ॥
tatheti ca pratiśrutya sā kṛtyā prayayau tadā | nimeṣādagamaccāpi yatra rājā suyodhanaḥ
"ऐसा ही होगा" कहकर वह कृत्या चल पड़ी और पलक झपकते ही वहाँ पहुँच गई जहाँ राजा सुयोधन था।
श्लोक 29 (3.252.29)
समादाय च राजानं प्रविवेश रसातलम् । दानवानां मुहूर्ताच्च पुरतस्तं न्यवेदयत् ॥
samādāya ca rājānaṃ praviveśa rasātalam | dānavānāṃ muhūrtācca puratastaṃ nyavedayat
राजा को उठाकर वह रसातल में प्रविष्ट हुई और क्षण भर में उसे दानवों के सामने उपस्थित कर दिया।
श्लोक 30 (3.252.30)
तमानीतं नृपं दृष्ट्वा रात्रौ संगत्य दानवाः । प्रहृष्टमनसः सर्वे किंचिदुत्फुल्ललोचनाः ॥
tamānītaṃ nṛpaṃ dṛṣṭvā rātrau saṃgatya dānavāḥ | prahṛṣṭamanasaḥ sarve kiṃcidutphullalocanāḥ
राजा को लाया गया देखकर दानव रात में एकत्र हो गए; वे सब मन में अत्यन्त प्रसन्न थे और उनकी आँखें कुछ खिल उठी थीं।
श्लोक 31 (3.252.31)
दृढमेनं परिष्वज्य दृष्ट्वा च कुशलं तदा । साभिमानमिदं वाक्यं दुर्योधनमथाब्रुवन् ॥
dṛḍhamenaṃ pariṣvajya dṛṣṭvā ca kuśalaṃ tadā | sābhimānamidaṃ vākyaṃ duryodhanamathābruvan
उन्होंने उसे कसकर गले लगाया और उसे सकुशल देखकर फिर दुर्योधन से गर्व के साथ यह वचन कहा।