आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 253
दानवों का आश्वासन और दुर्योधन की वापसी
रसातल में दानव दुर्योधन को बताते हैं कि उन्होंने तपस्या करके उसे शिव से प्राप्त किया था; उसके शरीर का ऊपरी भाग वज्र से और निचला भाग देवी ने फूलों से बनाया है; पृथ्वी पर जन्मे असुर तथा भीष्म, द्रोण, कृप और कर्ण में प्रवेश करने वाले असुर उसके लिए लड़ेंगे; नरकासुर की आत्मा अब कर्ण में बसती है, और संशप्तक अर्जुन के वध के लिए नियुक्त हैं। कृत्या उसे अनशन के स्थान पर लौटा देती है और वह मानो स्वप्न से जागकर युद्ध का निश्चय कर लेता है। भोर में कर्ण तेरहवें वर्ष के बाद अर्जुन को मारने की प्रतिज्ञा करता है, और दुर्योधन उठकर अपनी शोभायमान सेना के साथ हस्तिनापुर लौट जाता है।
दानवा ऊचुः
श्लोक 1 (3.253.1)
भोः सुयोधन राजेन्द्र भरतानां कुलोद्वह । शूरैः परिवृतो नित्यं तथैव च महात्मभिः ॥
bhoḥ suyodhana rājendra bharatānāṃ kulodvaha | śūraiḥ parivṛto nityaṃ tathaiva ca mahātmabhiḥ
हे सुयोधन, हे राजेन्द्र, भरतवंश को आगे बढ़ाने वाले! तुम सदा शूरवीरों और महात्माओं से घिरे रहते हो।
श्लोक 2 (3.253.2)
अकार्षीः साहसमिदं कस्मात्प्रायोपवेशनम् । आत्मत्यागी ह्यधो याति वाच्यतां चायशस्करीम् ॥
akārṣīḥ sāhasamidaṃ kasmātprāyopaveśanam | ātmatyāgī hyadho yāti vācyatāṃ cāyaśaskarīm
फिर तुमने आमरण अनशन जैसा यह दुस्साहस क्यों किया? आत्मघात करने वाला अधोगति को जाता है और अपयश देने वाली निन्दा का भागी बनता है।
श्लोक 3 (3.253.3)
न हि कार्यविरुद्धेषु बहुपापेषु कर्मसु । मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥
na hi kāryaviruddheṣu bahupāpeṣu karmasu | mūlaghātiṣu sajjante buddhimanto bhavadvidhāḥ
तुम्हारे जैसे बुद्धिमान लोग ऐसे कर्मों में नहीं लगते जो अपने ही उद्देश्य के विरुद्ध हों, पापों से भरे हों और जड़ से ही नाश करने वाले हों।
श्लोक 4 (3.253.4)
नियच्छैनां मतिं राजन्धर्मार्थसुखनाशिनीम् । यशःप्रतापवीर्यघ्नीं शत्रूणां हर्षवर्धनीम् ॥
niyacchaināṃ matiṃ rājandharmārthasukhanāśinīm | yaśaḥpratāpavīryaghnīṃ śatrūṇāṃ harṣavardhanīm
हे राजन्, इस विचार को रोको; यह धर्म, अर्थ और सुख का नाश करने वाला, यश, प्रताप और पराक्रम को मिटाने वाला और शत्रुओं का हर्ष बढ़ाने वाला है।
श्लोक 5 (3.253.5)
श्रूयतां तु प्रभो तत्त्वं दिव्यतां चात्मनो नृप । निर्माणं च शरीरस्य ततो धैर्यमवाप्नुहि ॥
śrūyatāṃ tu prabho tattvaṃ divyatāṃ cātmano nṛpa | nirmāṇaṃ ca śarīrasya tato dhairyamavāpnuhi
हे प्रभो, हे नृप, अपने दिव्य स्वरूप और अपने शरीर की रचना का रहस्य सुनो, फिर धैर्य धारण करो।
श्लोक 6 (3.253.6)
पुरा त्वं तपसाऽस्माभिर्लब्धो राजन्महेश्वरात् । पूर्वकायश्च ते सर्वो निर्मितो वज्रसंचयैः ॥
purā tvaṃ tapasā'smābhirlabdho rājanmaheśvarāt | pūrvakāyaśca te sarvo nirmito vajrasaṃcayaiḥ
हे राजन्, बहुत पहले हमने तपस्या करके महेश्वर से तुम्हें प्राप्त किया था। तुम्हारे शरीर का पूरा ऊपरी भाग वज्र के समूहों से बनाया गया है,
श्लोक 7 (3.253.7)
अस्त्रैरभेद्यः शस्त्रैश्चाप्यधःकायश्च तेऽनघ । कृतः पुष्पमयो देव्या रूपतस्त्रीमनोहरः ॥
astrairabhedyaḥ śastraiścāpyadhaḥkāyaśca te'nagha | kṛtaḥ puṣpamayo devyā rūpatastrīmanoharaḥ
इसलिए कोई अस्त्र-शस्त्र उसे भेद नहीं सकता। और हे निष्पाप, तुम्हारे शरीर का निचला भाग देवी ने फूलों से बनाया है, जो रूप में स्त्रियों का मन हरने वाला है।
श्लोक 8 (3.253.8)
एवमीश्वरसंयुक्तस्तव देहो नृपोत्तम । देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुषः ॥
evamīśvarasaṃyuktastava deho nṛpottama | devyā ca rājaśārdūla divyastvaṃ hi na mānuṣaḥ
हे नृपश्रेष्ठ, हे राजसिंह, इस प्रकार तुम्हारा शरीर ईश्वर (शिव) और देवी ने रचा है; तुम दिव्य हो, मनुष्य नहीं।
श्लोक 9 (3.253.9)
क्षत्रियाश्च महावीर्या भगदत्तपुरोगमाः । दिव्यास्त्रविदुषः शूराः क्षपयिष्यन्ति ते रिपून् ॥
kṣatriyāśca mahāvīryā bhagadattapurogamāḥ | divyāstraviduṣaḥ śūrāḥ kṣapayiṣyanti te ripūn
भगदत्त आदि महापराक्रमी क्षत्रिय, जो दिव्यास्त्रों के ज्ञाता शूरवीर हैं, तुम्हारे शत्रुओं का नाश करेंगे।
श्लोक 10 (3.253.10)
तदलं ते विषादेन भयं तव न विद्यते । सहायार्थं च ते वीराः संभूता भुवि दानवाः ॥
tadalaṃ te viṣādena bhayaṃ tava na vidyate | sahāyārthaṃ ca te vīrāḥ saṃbhūtā bhuvi dānavāḥ
इसलिए विषाद करना छोड़ो; तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम्हारी सहायता के लिए वीर दानव पृथ्वी पर जन्म ले चुके हैं।
श्लोक 11 (3.253.11)
भीष्मद्रोणकृपादींश्च प्रवेक्ष्यन्त्यपरेऽसुराः । यैराविष्टा घृणां त्यक्त्वा योत्स्यन्ते तव वैरिभिः ॥
bhīṣmadroṇakṛpādīṃśca pravekṣyantyapare'surāḥ | yairāviṣṭā ghṛṇāṃ tyaktvā yotsyante tava vairibhiḥ
दूसरे असुर भीष्म, द्रोण, कृप आदि में प्रवेश करेंगे; उनसे आविष्ट होकर वे दया त्यागकर तुम्हारे वैरियों से युद्ध करेंगे।
श्लोक 12 (3.253.12)
नैव पुत्रान्न च भ्रातॄन्न पितॄन्न च बान्धवान् । नैव शिष्यान्न च ज्ञातीन्न बालान्स्थविरान्न च । युधि संप्रहरिष्यन्तो मोक्ष्यन्ति कुरुसत्तम ॥
naiva putrānna ca bhrātṝnna pitṝnna ca bāndhavān | naiva śiṣyānna ca jñātīnna bālānsthavirānna ca | yudhi saṃprahariṣyanto mokṣyanti kurusattama
हे कुरुश्रेष्ठ, युद्ध में प्रहार करते समय वे न पुत्रों को छोड़ेंगे, न भाइयों को, न पिताओं को, न बन्धु-बान्धवों को, न शिष्यों को, न जाति वालों को, न बालकों को और न वृद्धों को।
श्लोक 13 (3.253.13)
निःस्नेहा दानवाविष्टाः समाक्रान्तेऽन्तरात्मनि । प्रहरिष्यन्ति बन्धुभ्यः स्नेहमुत्सृज्य दूरतः ॥
niḥsnehā dānavāviṣṭāḥ samākrānte'ntarātmani | prahariṣyanti bandhubhyaḥ snehamutsṛjya dūrataḥ
दानवों से आविष्ट होकर, अन्तरात्मा के दब जाने से स्नेहहीन बने वे ममता को दूर फेंककर अपने ही बन्धुओं पर प्रहार करेंगे।
श्लोक 14 (3.253.14)
हृष्टाः पुरुषशार्दूलाः कलुषीकृतमानसाः । अनभिज्ञातमूलाश्च दैवाच्च विधिनिर्मितात् । व्याभाषमाणाश्चान्योन्यं न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ॥
hṛṣṭāḥ puruṣaśārdūlāḥ kaluṣīkṛtamānasāḥ | anabhijñātamūlāśca daivācca vidhinirmitāt | vyābhāṣamāṇāścānyonyaṃ na me jīvanvimokṣyase
वे पुरुषसिंह हर्षित होंगे, उनके मन कलुषित हो जाएँगे; इसके मूल कारण को न जानते हुए, विधाता के रचे दैव से प्रेरित होकर वे एक-दूसरे से कहेंगे — "तू मुझसे जीवित नहीं बचेगा!"
श्लोक 15 (3.253.15)
सर्वे शस्त्रास्त्रमोक्षेण पौरुषे समवस्थिताः । श्लाघमानाः कुरुश्रेष्ठ करिष्यन्ति जनक्षयम् ॥
sarve śastrāstramokṣeṇa pauruṣe samavasthitāḥ | ślāghamānāḥ kuruśreṣṭha kariṣyanti janakṣayam
हे कुरुश्रेष्ठ, वे सब पौरुष में डटे रहकर, सब प्रकार के शस्त्र-अस्त्र छोड़ते हुए और अपनी बड़ाई करते हुए जनसंहार करेंगे।
श्लोक 16 (3.253.16)
तेऽपि पञ्च महात्मानः प्रतियोत्स्यन्ति पाण्डवाः । वधं चैषां करिष्यन्ति दैवयुक्ता महाबलाः ॥
te'pi pañca mahātmānaḥ pratiyotsyanti pāṇḍavāḥ | vadhaṃ caiṣāṃ kariṣyanti daivayuktā mahābalāḥ
वे पाँचों महात्मा पाण्डव भी उनसे लड़ेंगे, और दैव की सहायता पाकर वे महाबली इन योद्धाओं का वध करेंगे।
श्लोक 17 (3.253.17)
दैत्यरक्षोगणाश्चैव संभूताः क्षत्रयोनिषु । योत्स्यन्ति युधि विक्रम्य शत्रुभिस्तव पार्थिव ॥
daityarakṣogaṇāścaiva saṃbhūtāḥ kṣatrayoniṣu | yotsyanti yudhi vikramya śatrubhistava pārthiva
हे राजन्, क्षत्रिय-कुलों में जन्मे दैत्यों और राक्षसों के समूह पराक्रमपूर्वक युद्ध में तुम्हारे शत्रुओं से लड़ेंगे।
श्लोक 18 (3.253.18)
गदाभिर्मुसलैः शूलैः शस्त्रैरुच्चावचैस्तथा । प्रहरिष्यन्ति ते वीरास्तवारिषु महाबलाः ॥
gadābhirmusalaiḥ śūlaiḥ śastrairuccāvacaistathā | prahariṣyanti te vīrāstavāriṣu mahābalāḥ
वे महाबली वीर गदाओं, मूसलों, शूलों और नाना प्रकार के शस्त्रों से तुम्हारे शत्रुओं पर प्रहार करेंगे।
श्लोक 19 (3.253.19)
यच्च तेऽन्तर्गतं वीर भयमर्जुनसंभवम् । तत्रापि विहितोऽस्माभिर्वधोपायोऽर्जुनस्य वै ॥
yacca te'ntargataṃ vīra bhayamarjunasaṃbhavam | tatrāpi vihito'smābhirvadhopāyo'rjunasya vai
हे वीर, तुम्हारे मन में अर्जुन का जो भय है, उसके लिए भी हमने अर्जुन के वध का उपाय कर रखा है।
श्लोक 20 (3.253.20)
हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रितः । तद्वैरं संस्मरन्वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ ॥
hatasya narakasyātmā karṇamūrtimupāśritaḥ | tadvairaṃ saṃsmaranvīra yotsyate keśavārjunau
मारे गए नरकासुर की आत्मा कर्ण के शरीर में आ बसी है। हे वीर, उस पुराने वैर को याद करते हुए वह केशव और अर्जुन से युद्ध करेगा।
श्लोक 21 (3.253.21)
स ते विक्रमशौण्डीरो रणे पार्थं विजेष्यति । कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः सर्वांश्चारीन्महारथः ॥
sa te vikramaśauṇḍīro raṇe pārthaṃ vijeṣyati | karṇaḥ praharatāṃ śreṣṭhaḥ sarvāṃścārīnmahārathaḥ
पराक्रम में समर्थ, प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ वह महारथी कर्ण तुम्हारे लिए युद्ध में पार्थ को और तुम्हारे सभी शत्रुओं को जीत लेगा।
श्लोक 22 (3.253.22)
ज्ञात्वैतच्छद्मना वज्री रक्षार्थं सव्यसाचिनः । कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति ॥
jñātvaitacchadmanā vajrī rakṣārthaṃ savyasācinaḥ | kuṇḍale kavacaṃ caiva karṇasyāpahariṣyati
यह जानकर वज्रधारी इन्द्र सव्यसाची अर्जुन की रक्षा के लिए छल से कर्ण के कुण्डल और कवच हर लेंगे।
श्लोक 23 (3.253.23)
तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्याः शतसहस्रशः । नियुक्ता राक्षसाश्चैव ये ते संशप्तका इति । प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं युधि हिंस्यन्ति मा शुचः ॥
tasmādasmābhirapyatra daityāḥ śatasahasraśaḥ | niyuktā rākṣasāścaiva ye te saṃśaptakā iti | prakhyātāste'rjunaṃ vīraṃ yudhi hiṃsyanti mā śucaḥ
इसलिए हमने भी लाखों दैत्यों और राक्षसों को इस काम पर लगा दिया है, जो संशप्तक नाम से प्रसिद्ध हैं; वे युद्ध में वीर अर्जुन को मार डालेंगे। शोक मत करो।
श्लोक 24 (3.253.24)
असपत्ना त्वया हीयं भोक्तव्या वसुधा नृप । मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥
asapatnā tvayā hīyaṃ bhoktavyā vasudhā nṛpa | mā viṣādaṃ gamastasmānnaitattvayyupapadyate
हे राजन्, तुम्हें यह पृथ्वी बिना किसी प्रतिद्वन्द्वी के भोगनी है। इसलिए विषाद मत करो; यह तुम्हें शोभा नहीं देता।
श्लोक 25 (3.253.25)
विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव । गच्छ वीर न ते बुद्धिरन्या कार्या कथंचन । त्वमस्माकं गतिर्नित्यं देवतानां च पाण्डवाः ॥
vinaṣṭe tvayi cāsmākaṃ pakṣo hīyeta kaurava | gaccha vīra na te buddhiranyā kāryā kathaṃcana | tvamasmākaṃ gatirnityaṃ devatānāṃ ca pāṇḍavāḥ
हे कौरव, यदि तुम नष्ट हो गए तो हमारा पक्ष क्षीण हो जाएगा। हे वीर, जाओ; तुम्हें कभी कोई दूसरा विचार नहीं करना चाहिए। तुम सदा हमारे आश्रय हो, जैसे पाण्डव देवताओं के।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (3.253.26)
एवमुक्त्वा परिष्वज्य दैत्यास्तं राजकुञ्जरम् । समाश्वास्य च दुर्धर्षं पुत्रवद्दानवर्षभाः ॥
evamuktvā pariṣvajya daityāstaṃ rājakuñjaram | samāśvāsya ca durdharṣaṃ putravaddānavarṣabhāḥ
ऐसा कहकर दानवश्रेष्ठ दैत्यों ने उस राजश्रेष्ठ को गले लगाया और उस दुर्धर्ष को पुत्र की भाँति सान्त्वना दी।
श्लोक 27 (3.253.27)
स्थिरां कृत्वा बुद्धिमस्य प्रियाण्युक्त्वा च भारत । गम्यतामित्यनुज्ञाय जयमाप्नुहि चेत्यथ ॥
sthirāṃ kṛtvā buddhimasya priyāṇyuktvā ca bhārata | gamyatāmityanujñāya jayamāpnuhi cetyatha
हे भारत, उसकी बुद्धि को स्थिर करके और उससे प्रिय वचन कहकर उन्होंने उसे विदा किया — "जाओ और विजय प्राप्त करो।"
श्लोक 28 (3.253.28)
तैर्विसृष्टं महाबाहुं कृत्या सैवानयत्पुरः । तमेव देशं यत्रासौ तदा प्रायमुपाविशत् ॥
tairvisṛṣṭaṃ mahābāhuṃ kṛtyā saivānayatpuraḥ | tameva deśaṃ yatrāsau tadā prāyamupāviśat
उनके विदा करने पर वही कृत्या उस महाबाहु को उसी स्थान पर ले आई जहाँ वह आमरण अनशन के लिए बैठा था।
श्लोक 29 (3.253.29)
प्रतिनिक्षिप्य तं वीरं कृत्या समभिपूज्य च । अनुज्ञाता च राज्ञा सा तत्रैवान्तरधीयत ॥
pratinikṣipya taṃ vīraṃ kṛtyā samabhipūjya ca | anujñātā ca rājñā sā tatraivāntaradhīyata
उस वीर को वहाँ वापस रखकर और उसका सम्मान करके, राजा से अनुमति लेकर वह कृत्या वहीं अन्तर्धान हो गई।
श्लोक 30 (3.253.30)
गतायामथ तस्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा । स्वप्नभूतमिदं सर्वमचिन्तयत भारत ॥
gatāyāmatha tasyāṃ tu rājā duryodhanastadā | svapnabhūtamidaṃ sarvamacintayata bhārata
हे भारत, उसके चले जाने पर राजा दुर्योधन को लगा कि यह सब एक स्वप्न था।
श्लोक 31 (3.253.31)
संमृश्य तानि वाक्यानि दानवोक्तानि दुर्मतेः । विजेष्यामि रणे पाण्डूनिति चास्याभवन्मतिः ॥
saṃmṛśya tāni vākyāni dānavoktāni durmateḥ | vijeṣyāmi raṇe pāṇḍūniti cāsyābhavanmatiḥ
दानवों की कही उन बातों पर विचार करते हुए उस दुर्बुद्धि के मन में यह निश्चय हुआ कि "मैं युद्ध में पाण्डवों को जीत लूँगा।"
श्लोक 32 (3.253.32)
कर्णं संशप्तकांश्चैव पार्थस्यामित्रघातिनः । अमन्यत वधे युक्तान्समर्थांश्च सुयोधनः ॥
karṇaṃ saṃśaptakāṃścaiva pārthasyāmitraghātinaḥ | amanyata vadhe yuktānsamarthāṃśca suyodhanaḥ
सुयोधन ने मान लिया कि कर्ण और संशप्तक शत्रुनाशक पार्थ के वध में लगे हैं और ऐसा करने में समर्थ भी हैं।
श्लोक 33 (3.253.33)
एवमाशा दृढा तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । विनिर्जये पाण्डवानामभवद्भरतर्षभ ॥
evamāśā dṛḍhā tasya dhārtarāṣṭrasya durmateḥ | vinirjaye pāṇḍavānāmabhavadbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार उस दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र के मन में पाण्डवों को जीतने की आशा दृढ़ हो गई।
श्लोक 34 (3.253.34)
कर्णोऽप्याविष्टचित्तात्मा नरकस्यान्तरात्मना । अर्जुनस्य वधे क्रूरां करोति स्म तदा मतिम् ॥
karṇo'pyāviṣṭacittātmā narakasyāntarātmanā | arjunasya vadhe krūrāṃ karoti sma tadā matim
कर्ण का चित्त भी नरकासुर की अन्तरात्मा से आविष्ट हो गया था; उसने अर्जुन के वध का क्रूर निश्चय कर लिया।
श्लोक 35 (3.253.35)
संशप्तकाश्च ते वीरा राक्षसाविष्टचेतसः । रजस्तमोभ्यामाक्रान्ताः फाल्गुनस्य वधैषिणः ॥
saṃśaptakāśca te vīrā rākṣasāviṣṭacetasaḥ | rajastamobhyāmākrāntāḥ phālgunasya vadhaiṣiṇaḥ
और वे वीर संशप्तक भी, जिनके चित्त राक्षसों से आविष्ट थे और जो रजोगुण-तमोगुण से घिरे थे, फाल्गुन (अर्जुन) के वध की इच्छा करने लगे।
श्लोक 36 (3.253.36)
भीष्मद्रोणकृपाद्याश्च दानवाक्रान्तचेतसः । न तथा पाण्डुपुत्राणां स्नेहवन्तोऽभवंस्तदा ॥
bhīṣmadroṇakṛpādyāśca dānavākrāntacetasaḥ | na tathā pāṇḍuputrāṇāṃ snehavanto'bhavaṃstadā
भीष्म, द्रोण, कृप आदि के चित्त भी दानवों के अधीन हो गए, और उनमें पाण्डुपुत्रों के प्रति पहले जैसा स्नेह नहीं रहा।
श्लोक 37 (3.253.37)
न चाचचक्षे कस्मैचिदेतद्राजा सुयोधनः । कृत्ययाऽऽनाय्य कथितं यदस्य निशि दानवैः ॥
na cācacakṣe kasmaicidetadrājā suyodhanaḥ | kṛtyayā''nāyya kathitaṃ yadasya niśi dānavaiḥ
रात में कृत्या द्वारा ले जाए जाने पर दानवों ने उससे जो कहा था, वह बात राजा सुयोधन ने किसी को नहीं बताई।
श्लोक 38 (3.253.38)
दुर्योधनं निशान्ते च कर्णो वैकर्तनोऽब्रवीत् । स्मयन्निवाञ्जलिं कृत्वा पार्थिवं हेतुमद्वचः ॥
duryodhanaṃ niśānte ca karṇo vaikartano'bravīt | smayannivāñjaliṃ kṛtvā pārthivaṃ hetumadvacaḥ
रात बीतने पर वैकर्तन कर्ण ने हाथ जोड़कर, मानो मुस्कराते हुए, राजा से युक्तिपूर्ण वचन कहे —
कर्ण उवाच
श्लोक 39 (3.253.39)
न मृतो जयते शत्रूञ्जीवन्भद्राणि पश्यति । मृतस्य भद्राणि कुतः कौरवेय कुतो जयः ॥
na mṛto jayate śatrūñjīvanbhadrāṇi paśyati | mṛtasya bhadrāṇi kutaḥ kauraveya kuto jayaḥ
मरा हुआ मनुष्य शत्रुओं को नहीं जीतता; जीवित ही कल्याण देखता है। हे कौरवेय, मरे हुए को कहाँ कल्याण और कहाँ विजय?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (3.253.40)
न कालोऽद्य विषादस्य भयस्य मरणस्य वा । परिष्वज्याब्रवीच्चैनं भुजाभ्यां स महाभुजः ॥
na kālo'dya viṣādasya bhayasya maraṇasya vā | pariṣvajyābravīccainaṃ bhujābhyāṃ sa mahābhujaḥ
"आज विषाद, भय या मृत्यु का समय नहीं है।" फिर उस महाबाहु कर्ण ने दोनों भुजाओं से उसे गले लगाकर कहा —
कर्ण उवाच
श्लोक 41 (3.253.41)
उत्तिष्ठ राजन्किं शेषे कस्माच्छोचसि शत्रुहन् । शत्रून्प्रताप्य वीर्येण स कथं मर्तुमर्हसि ॥
uttiṣṭha rājankiṃ śeṣe kasmācchocasi śatruhan | śatrūnpratāpya vīryeṇa sa kathaṃ martumarhasi
हे राजन्, उठो। क्यों पड़े हो? हे शत्रुनाशक, क्यों शोक करते हो? अपने पराक्रम से शत्रुओं को संतप्त करने वाले तुम मरना कैसे चाह सकते हो?
श्लोक 42 (3.253.42)
अथवा ते भयं जातं दृष्ट्वाऽर्जुनपराक्रमम् । सत्यं ते प्रतिजानामि वधिष्यामि रणेऽर्जुनम् ॥
athavā te bhayaṃ jātaṃ dṛṣṭvā'rjunaparākramam | satyaṃ te pratijānāmi vadhiṣyāmi raṇe'rjunam
अथवा यदि अर्जुन का पराक्रम देखकर तुम्हें भय हो गया है, तो मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ — मैं युद्ध में अर्जुन का वध करूँगा।
श्लोक 43 (3.253.43)
गते त्रयोदशे वर्षे सत्येनायुधमालभे । आनयिष्याम्यहं पार्थान्वशं तव जनाधिप ॥
gate trayodaśe varṣe satyenāyudhamālabhe | ānayiṣyāmyahaṃ pārthānvaśaṃ tava janādhipa
तेरहवाँ वर्ष बीतने पर — मैं सत्य की शपथ लेकर अपना आयुध छूता हूँ — हे जनाधिप, मैं पार्थों को तुम्हारे वश में ला दूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 44 (3.253.44)
एवमुक्तस्तु कर्णेन दैत्यानां वचनात्तथा । प्रणिपातेन चाप्येषामुदतिष्ठत्सुयोधनः ॥
evamuktastu karṇena daityānāṃ vacanāttathā | praṇipātena cāpyeṣāmudatiṣṭhatsuyodhanaḥ
कर्ण के ऐसा कहने पर, और दैत्यों के वचनों तथा भाइयों की विनयपूर्ण प्रार्थना से प्रेरित होकर सुयोधन उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 45 (3.253.45)
दैत्यानां तद्वचः श्रुत्वा हृदि कृत्वा स्थिरां मतिम् । ततो मनुजशार्दूलो योजयामास वाहिनीम् । रथनागाश्वकलिलां पदातिजनसंकुलाम् ॥
daityānāṃ tadvacaḥ śrutvā hṛdi kṛtvā sthirāṃ matim | tato manujaśārdūlo yojayāmāsa vāhinīm | rathanāgāśvakalilāṃ padātijanasaṃkulām
दैत्यों की बात सुनकर और हृदय में दृढ़ निश्चय करके उस नरश्रेष्ठ ने अपनी सेना सजाई, जो रथों, हाथियों और घोड़ों से भरी तथा पैदल सैनिकों से खचाखच थी।
श्लोक 46 (3.253.46)
गङ्गौघप्रतिमा चास्य प्रयाणे शुशुभे चमूः ॥
gaṅgaughapratimā cāsya prayāṇe śuśubhe camūḥ
प्रस्थान के समय उसकी सेना गंगा के प्रवाह के समान शोभा पा रही थी।
श्लोक 47 (3.253.47)
श्वेतच्छत्रैः पताकाभिश्चामरैश्च सुपाण्डुरैः । रथैर्नागैः पदातैश्च शुशुभेऽतीव संकुला ॥
śvetacchatraiḥ patākābhiścāmaraiśca supāṇḍuraiḥ | rathairnāgaiḥ padātaiśca śuśubhe'tīva saṃkulā
सफ़ेद छत्रों, पताकाओं, उजले चँवरों, और रथों, हाथियों तथा पैदलों से भरी वह सेना अत्यन्त शोभा पा रही थी,
श्लोक 48 (3.253.48)
व्यपेताभ्रघने काले द्यौरिवासीत्तु शारदी । हंसपङ्क्तिसमाकीर्णा भ्रमत्सारसशोभिता ॥
vyapetābhraghane kāle dyaurivāsīttu śāradī | haṃsapaṅktisamākīrṇā bhramatsārasaśobhitā
मानो घने बादल छँट जाने पर शरद ऋतु का आकाश हो, जिसमें हंसों की पंक्तियाँ फैली हों और उड़ते सारस शोभा बढ़ा रहे हों।
श्लोक 49 (3.253.49)
जयाशीर्भिर्द्विजेन्द्रैः स स्तूयमानोऽधिराजवत् । गृह्णन्नञ्जलिमालाश्च धार्तराष्ट्रो जनाधिपः ॥
jayāśīrbhirdvijendraiḥ sa stūyamāno'dhirājavat | gṛhṇannañjalimālāśca dhārtarāṣṭro janādhipaḥ
श्रेष्ठ ब्राह्मण विजय के आशीर्वादों के साथ सम्राट् की भाँति उसकी स्तुति कर रहे थे, और लोग हाथ जोड़कर उसे प्रणाम कर रहे थे; वह धृतराष्ट्रपुत्र जनाधिप —
श्लोक 50 (3.253.50)
सुयोधनो ययावग्रे श्रिया परमया ज्वलन् । कर्णेन सार्धं राजेन्द्र सौबलेन च देविना ॥
suyodhano yayāvagre śriyā paramayā jvalan | karṇena sārdhaṃ rājendra saubalena ca devinā
सुयोधन परम शोभा से दमकता हुआ सबसे आगे चला; हे राजेन्द्र, उसके साथ कर्ण और जुआरी शकुनि थे।
श्लोक 51 (3.253.51)
दुःशासनादयश्चास्य भ्रातरः सर्व एव ते । भूरिश्रवाः सोमदत्तो महाराजश्च बाह्लिकः ॥
duḥśāsanādayaścāsya bhrātaraḥ sarva eva te | bhūriśravāḥ somadatto mahārājaśca bāhlikaḥ
दुःशासन आदि उसके सभी भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त और महाराज बाह्लीक —
श्लोक 52 (3.253.52)
रथैर्नानाविधाकारैर्हयैर्गजवरैस्तथा । प्रयान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मुः कुरूद्वहाः ॥
rathairnānāvidhākārairhayairgajavaraistathā | prayāntaṃ nṛpasiṃhaṃ tamanujagmuḥ kurūdvahāḥ
नाना प्रकार के रथों, घोड़ों और श्रेष्ठ हाथियों के साथ वे कुरुश्रेष्ठ उस राजसिंह के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 53 (3.253.53)
प्रहृष्टमनसः सर्वे दुर्योधनपुरोगमाः । कालेनाल्पेन राजेन्द्र स्वपुरं विविशुस्तदा ॥
prahṛṣṭamanasaḥ sarve duryodhanapurogamāḥ | kālenālpena rājendra svapuraṃ viviśustadā
हे राजेन्द्र, दुर्योधन को आगे करके वे सब प्रसन्न मन से थोड़े ही समय में अपने नगर में प्रविष्ट हुए।