आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 254
भीष्म की फटकार और कर्ण का दिग्विजय-संकल्प
जनमेजय के यह पूछने पर कि आगे कौरवों ने क्या किया, वैशम्पायन बताते हैं कि हस्तिनापुर लौटने पर भीष्म ने दुर्योधन को फटकारा: वह शत्रुओं द्वारा पकड़ा गया और पाण्डवों ने उसे छुड़ाया, जबकि कर्ण गन्धर्वों से डरकर भाग गया; कर्ण पाण्डवों के चौथाई के बराबर भी नहीं, इसलिए उनसे सन्धि कर लेनी चाहिए। दुर्योधन हँसकर अपने साथियों के साथ चला जाता है। आगे के अंश में, जो केवल प्रचलित पाठ में मिलता है, भीष्म की निन्दा से आहत कर्ण अकेले सारी पृथ्वी जीतने का प्रस्ताव रखता है; प्रसन्न दुर्योधन उसे विदा करता है और कर्ण शुभ मुहूर्त में प्रस्थान करता है।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (3.254.1)
एवं गतेषु पार्थेषु वने तस्मिन्महात्मसु । धार्तराष्ट्रा महेष्वासाः किमकुर्वत सत्तमाः ॥
evaṃ gateṣu pārtheṣu vane tasminmahātmasu | dhārtarāṣṭrā maheṣvāsāḥ kimakurvata sattamāḥ
जब महात्मा पार्थ इस प्रकार उस वन में रह रहे थे, तब उन श्रेष्ठ महाधनुर्धर धृतराष्ट्रपुत्रों ने क्या किया?
श्लोक 2 (3.254.2)
कर्णो वैकर्तनश्चैव शकुनिश्च महाबलः । भीष्मद्रोणकृपाश्चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
karṇo vaikartanaścaiva śakuniśca mahābalaḥ | bhīṣmadroṇakṛpāścaiva tanme śaṃsitumarhasi
वैकर्तन कर्ण, महाबली शकुनि, तथा भीष्म, द्रोण और कृप ने क्या किया, यह मुझे बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (3.254.3)
एवं गतेषु पार्थेषु विसृष्टे च सुयोधने । आगते हास्तिनपुरं मोक्षिते पाण्डुनन्दनैः । भीष्मोऽब्रवीन्महाराज धार्तराष्ट्रमिदं वचः ॥
evaṃ gateṣu pārtheṣu visṛṣṭe ca suyodhane | āgate hāstinapuraṃ mokṣite pāṇḍunandanaiḥ | bhīṣmo'bravīnmahārāja dhārtarāṣṭramidaṃ vacaḥ
हे महाराज, जब पार्थ इस प्रकार चले गए और पाण्डुपुत्रों द्वारा छुड़ाया और विदा किया गया सुयोधन हस्तिनापुर लौट आया, तब भीष्म ने धृतराष्ट्रपुत्र से यह वचन कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (3.254.4)
उक्तं तात मया पूर्वं गच्छतस्ते तपोवनम् । वचनं ते न रुचितं मम तन्न कृतं च ते ॥
uktaṃ tāta mayā pūrvaṃ gacchataste tapovanam | vacanaṃ te na rucitaṃ mama tanna kṛtaṃ ca te
तात, जब तुम तपोवन जा रहे थे, तब मैंने तुमसे पहले ही कहा था; पर मेरी बात तुम्हें अच्छी नहीं लगी और तुमने उसे माना नहीं।
श्लोक 5 (3.254.5)
ततः प्राप्तं त्वया वीर ग्रहणं शत्रुभिर्बलात् । मोक्षितश्चासि धर्मज्ञैः पाण्डवैर्न च लज्जसे ॥
tataḥ prāptaṃ tvayā vīra grahaṇaṃ śatrubhirbalāt | mokṣitaścāsi dharmajñaiḥ pāṇḍavairna ca lajjase
उसी का फल है कि हे वीर, शत्रुओं ने तुम्हें बलपूर्वक पकड़ लिया और धर्मज्ञ पाण्डवों ने तुम्हें छुड़ाया; फिर भी तुम्हें लज्जा नहीं आती।
श्लोक 6 (3.254.6)
प्रत्यक्षं तव गान्धारे ससैन्यस्य विशांपते । सूतपुत्रोऽपयाद्भीतो गन्धर्वाणां तदा रणात् ॥
pratyakṣaṃ tava gāndhāre sasainyasya viśāṃpate | sūtaputro'payādbhīto gandharvāṇāṃ tadā raṇāt
हे गान्धारीनन्दन, हे प्रजापालक, तुम्हारे और तुम्हारी सेना के देखते-देखते सूतपुत्र उस समय भयभीत होकर गन्धर्वों के साथ युद्ध से भाग गया,
श्लोक 7 (3.254.7)
क्रोशतस्तव राजेन्द्र ससैन्यस्य नृपात्मज । व्यपायात्पृष्ठतस्तस्मात्प्रेक्षमाणः पुनःपुनः ॥
krośatastava rājendra sasainyasya nṛpātmaja | vyapāyātpṛṣṭhatastasmātprekṣamāṇaḥ punaḥpunaḥ
हे राजेन्द्र, हे राजकुमार, तुम और तुम्हारी सेना पुकारते ही रह गए, और वह बार-बार पीछे मुड़कर देखता हुआ वहाँ से भाग निकला।
श्लोक 8 (3.254.8)
दृष्टस्ते विक्रमश्चैव पाण्डवानां महात्मनाम् । कर्णस्य च महाबाहो सूतपुत्रस्य दुर्मते ॥
dṛṣṭaste vikramaścaiva pāṇḍavānāṃ mahātmanām | karṇasya ca mahābāho sūtaputrasya durmate
हे महाबाहो, हे दुर्बुद्धि, तुमने महात्मा पाण्डवों का पराक्रम भी देख लिया और सूतपुत्र कर्ण का भी।
श्लोक 9 (3.254.9)
न चापि पादभाक्कर्णः पाण्डवानां महात्मनाम् । धनुर्वेदे च शौर्ये च धर्मे वा धर्मवत्सल ॥
na cāpi pādabhākkarṇaḥ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | dhanurvede ca śaurye ca dharme vā dharmavatsala
हे धर्मप्रेमी, धनुर्वेद में, शौर्य में या धर्म में कर्ण महात्मा पाण्डवों के चौथाई के बराबर भी नहीं है।
श्लोक 10 (3.254.10)
तस्मादहं क्षमं मन्ये पाण्डवैस्तैर्महात्मभिः । सन्धिं सन्धिविदां श्रेष्ठ कुलस्यास्य विवृद्धये ॥
tasmādahaṃ kṣamaṃ manye pāṇḍavaistairmahātmabhiḥ | sandhiṃ sandhividāṃ śreṣṭha kulasyāsya vivṛddhaye
इसलिए हे सन्धि जानने वालों में श्रेष्ठ, मैं इस कुल की वृद्धि के लिए उन महात्मा पाण्डवों के साथ सन्धि कर लेना ही उचित समझता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (3.254.11)
एवमुक्तश्च भीष्मेण धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः । प्रहस्य सहसा राजन्विप्रतस्थे ससौबलः ॥
evamuktaśca bhīṣmeṇa dhārtarāṣṭro janeśvaraḥ | prahasya sahasā rājanvipratasthe sasaubalaḥ
हे राजन्, भीष्म के ऐसा कहने पर धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सहसा हँस पड़ा और शकुनि के साथ वहाँ से चला गया।
श्लोक 12 (3.254.12)
तं तु प्रस्थितमाज्ञाय कर्णदुःशासनादयः । अनुजग्मुर्महेष्वासा धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥
taṃ tu prasthitamājñāya karṇaduḥśāsanādayaḥ | anujagmurmaheṣvāsā dhārtarāṣṭraṃ mahābalam
उसे जाते देखकर कर्ण, दुःशासन आदि महाधनुर्धर भी उस महाबली धृतराष्ट्रपुत्र के पीछे चल दिए।
श्लोक 13 (3.254.13)
तांस्तु संप्रस्थितान्दृष्ट्वा भीष्मः कुरुपितामहः । लज्जया व्रीडितो राजञ्जगाम स्वं निवेशनम् ॥
tāṃstu saṃprasthitāndṛṣṭvā bhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ | lajjayā vrīḍito rājañjagāma svaṃ niveśanam
हे राजन्, उन्हें जाते देखकर कुरुओं के पितामह भीष्म लज्जा और संकोच से भरकर अपने भवन को चले गए।
श्लोक 14 (3.254.14)
गते भीष्मे महाराज धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः । पुनरागम्य तं देशममन्त्रयत मन्त्रिभिः ॥
gate bhīṣme mahārāja dhārtarāṣṭro janeśvaraḥ | punarāgamya taṃ deśamamantrayata mantribhiḥ
हे महाराज, भीष्म के चले जाने पर राजा दुर्योधन फिर उसी स्थान पर लौट आया और मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करने लगा —
श्लोक 15 (3.254.15)
किमस्माकं भवेच्छ्रेयः किं कार्यमवशिष्यते । कथं च सुकृतं तत्स्यान्मन्त्रयामास भारत ॥
kimasmākaṃ bhavecchreyaḥ kiṃ kāryamavaśiṣyate | kathaṃ ca sukṛtaṃ tatsyānmantrayāmāsa bhārata
"हमारे लिए क्या श्रेयस्कर होगा? अब क्या करना शेष है? वह भली-भाँति कैसे हो?" — हे भारत, इस प्रकार उसने विचार-विमर्श किया।
कर्ण उवाच
श्लोक 16 (3.254.16)
दुर्योधन निबोधेदं यत्त्वां वक्ष्यामि कौरव । भीष्मोऽस्मान्निन्दति सदा पाण्डवांश्च प्रशंसति ॥
duryodhana nibodhedaṃ yattvāṃ vakṣyāmi kaurava | bhīṣmo'smānnindati sadā pāṇḍavāṃśca praśaṃsati
हे दुर्योधन, हे कौरव, मैं तुमसे जो कहने जा रहा हूँ उसे सुनो। भीष्म सदा हमारी निन्दा करते हैं और पाण्डवों की प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 17 (3.254.17)
त्वद्वेषाच्च महाबाहो मामपि द्वेष्टुमर्हति । विगर्हते च मां नित्यं त्वत्समीपे नरेश्वर ॥
tvadveṣācca mahābāho māmapi dveṣṭumarhati | vigarhate ca māṃ nityaṃ tvatsamīpe nareśvara
हे महाबाहो, तुमसे द्वेष के कारण वे मुझसे भी द्वेष करते हैं, और हे नरेश्वर, तुम्हारे सामने ही सदा मेरी निन्दा करते हैं।
श्लोक 18 (3.254.18)
सोऽहं भीष्मवचस्तद्वै न मृष्यामीह भारत । त्वत्समक्षं यदुक्तं च भीष्मेणामित्रकर्शन ॥
so'haṃ bhīṣmavacastadvai na mṛṣyāmīha bhārata | tvatsamakṣaṃ yaduktaṃ ca bhīṣmeṇāmitrakarśana
हे भारत, हे शत्रुसंहारक, भीष्म ने तुम्हारे सामने जो कहा, उनके उस वचन को मैं सहन नहीं कर सकता —
श्लोक 19 (3.254.19)
पाण्डवानां यशो राजंस्तव निन्दां च भारत । अनुजानीहि मां राजन्सभृत्यबलवाहनम् ॥
pāṇḍavānāṃ yaśo rājaṃstava nindāṃ ca bhārata | anujānīhi māṃ rājansabhṛtyabalavāhanam
पाण्डवों के यश का गुणगान और तुम्हारी निन्दा। हे राजन्, मुझे सेवकों, सेना और वाहनों सहित आज्ञा दो;
श्लोक 20 (3.254.20)
जेष्यामि पृथिवीं राजन्सशैलवनकाननाम् । जिता च पाण्डवैर्भूमिश्चतुर्भिर्बलशालिभिः ॥
jeṣyāmi pṛthivīṃ rājansaśailavanakānanām | jitā ca pāṇḍavairbhūmiścaturbhirbalaśālibhiḥ
हे राजन्, मैं पर्वतों, वनों और काननों सहित सारी पृथ्वी जीत लूँगा। पृथ्वी को चार बलशाली पाण्डवों ने जीता था;
श्लोक 21 (3.254.21)
तामहं ते विजेष्यामि एक एव न संशयः । संपश्यतु सुदुर्बुद्धिर्भीष्मः कुरुकुलाधमः ॥
tāmahaṃ te vijeṣyāmi eka eva na saṃśayaḥ | saṃpaśyatu sudurbuddhirbhīṣmaḥ kurukulādhamaḥ
मैं अकेला ही उसे तुम्हारे लिए जीतूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं। कुरुकुल के अधम, अत्यन्त दुर्बुद्धि भीष्म यह देख लें!
श्लोक 22 (3.254.22)
अनिन्द्यं निन्दते यो हि अप्रशंस्यं प्रशंसति । स पश्यतु बलं मेऽद्य आत्मानं तु विगर्हतु ॥
anindyaṃ nindate yo hi apraśaṃsyaṃ praśaṃsati | sa paśyatu balaṃ me'dya ātmānaṃ tu vigarhatu
जो निन्दा के अयोग्य की निन्दा करता है और प्रशंसा के अयोग्य की प्रशंसा करता है, वह आज मेरा बल देखे और स्वयं को धिक्कारे।
श्लोक 23 (3.254.23)
अनुजानीहि मां राजन्ध्रुवो हि विजयस्तव । प्रतिजानामि ते सत्यं राजन्नायुधमालभे ॥
anujānīhi māṃ rājandhruvo hi vijayastava | pratijānāmi te satyaṃ rājannāyudhamālabhe
हे राजन्, मुझे आज्ञा दो; तुम्हारी विजय निश्चित है। हे राजन्, मैं अपना आयुध छूकर तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (3.254.24)
तच्छ्रुत्वा तु वचो राजन्कर्णस्य भरतर्षभ । प्रीत्या परमया युक्तः कर्णमाह नराधिपः ॥
tacchrutvā tu vaco rājankarṇasya bharatarṣabha | prītyā paramayā yuktaḥ karṇamāha narādhipaḥ
हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, कर्ण की यह बात सुनकर राजा दुर्योधन परम प्रसन्न हुआ और कर्ण से बोला —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 25 (3.254.25)
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे त्वं महाबलः । हितेषु वर्तसे नित्यं सफलं जन्म चाद्य मे ॥
dhanyo'smyanugṛhīto'smi yasya me tvaṃ mahābalaḥ | hiteṣu vartase nityaṃ saphalaṃ janma cādya me
मैं धन्य हूँ, मुझ पर अनुग्रह हुआ है, क्योंकि तुम जैसे महाबली सदा मेरे हित में लगे रहते हो। आज मेरा जन्म सफल हो गया।
श्लोक 26 (3.254.26)
यदा च मन्यसे वीर सर्वशत्रुनिबर्हणम् । तदा निर्गच्छ भद्रं ते ह्यनुशाधि च मामिति ॥
yadā ca manyase vīra sarvaśatrunibarhaṇam | tadā nirgaccha bhadraṃ te hyanuśādhi ca māmiti
हे वीर, जब तुम सब शत्रुओं के संहार का समय उचित समझो, तब निकल पड़ो; तुम्हारा कल्याण हो, और मुझे भी बताते रहना कि क्या करना है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (3.254.27)
एवमुक्तस्तदा कर्णो धार्तराष्ट्रेण धीमता । सर्वमाज्ञापयामास प्रायात्रिकमरिंदम ॥
evamuktastadā karṇo dhārtarāṣṭreṇa dhīmatā | sarvamājñāpayāmāsa prāyātrikamariṃdama
हे शत्रुदमन, बुद्धिमान धृतराष्ट्रपुत्र के ऐसा कहने पर कर्ण ने प्रस्थान के लिए आवश्यक सारी सामग्री जुटाने की आज्ञा दे दी।
श्लोक 28 (3.254.28)
प्रययौ च महेष्वासो नक्षत्रे शुभदैवते । शुभे तिथौ मुहूर्ते च पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥
prayayau ca maheṣvāso nakṣatre śubhadaivate | śubhe tithau muhūrte ca pūjyamāno dvijātibhiḥ
शुभ देवता वाले नक्षत्र में, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्त में, द्विजों से पूजित होकर वह महाधनुर्धर चल पड़ा।
श्लोक 29 (3.254.29)
मङ्गलैश्च शुभैः स्नातो वाग्भिश्चापि प्रपूजितः । नादयन्रथघोषेण त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥
maṅgalaiśca śubhaiḥ snāto vāgbhiścāpi prapūjitaḥ | nādayanrathaghoṣeṇa trailokyaṃ sacarācaram
मांगलिक द्रव्यों से स्नान करके और शुभ वचनों से सम्मानित होकर वह अपने रथ के घोष से चराचर सहित तीनों लोकों को गुँजाता हुआ चल पड़ा।