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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 256

वैष्णव यज्ञ का प्रस्ताव

कर्ण दुर्योधन से कहता है कि अब पृथ्वी शत्रुहीन होकर उसकी है, और दुर्योधन उससे वैसा ही राजसूय करवाने को कहता है जैसा उसने युधिष्ठिर के यहाँ देखा था। उसका पुरोहित और एकत्र ब्राह्मण बताते हैं कि युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र के जीवित रहते उसके कुल में राजसूय नहीं हो सकता, और उसके स्थान पर राजसूय के समान वैष्णव यज्ञ का सुझाव देते हैं, जिसकी यज्ञभूमि राजाओं से मिले कर के सोने से बने हल से जोती जानी है। दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और भाई सहमत होते हैं और शिल्पी काम में लग जाते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.256.1)

जित्वा तु पृथिवीं राजन्सूतपुत्रो जनाधिप । अब्रवीत्परवीरघ्नो दुर्योधनमिदं वचः ॥

jitvā tu pṛthivīṃ rājansūtaputro janādhipa | abravītparavīraghno duryodhanamidaṃ vacaḥ

वैशम्पायन बोले — हे जनाधिप राजन्! पृथ्वी को जीतकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले सूतपुत्र ने दुर्योधन से यह बात कही —

कर्ण उवाच

श्लोक 2 (3.256.2)

दुर्योधन निबोधेदं यत्त्वां वक्ष्यामि कौरव । श्रुत्वा वाचं तथा सर्वं कर्तुमर्हस्यरिंदम ॥

duryodhana nibodhedaṃ yattvāṃ vakṣyāmi kaurava | śrutvā vācaṃ tathā sarvaṃ kartumarhasyariṃdama

"हे कुरुनन्दन दुर्योधन! मैं जो कहता हूँ उसे ध्यान से सुनो; हे शत्रुदमन, मेरी बात सुनकर तुम्हें वह सब पूरा करना चाहिए।

श्लोक 3 (3.256.3)

तवाद्य पृथिवी वीर निःसपत्ना नृपोत्तम । तां पालय यथा शक्रो हतशत्रुर्महामनाः ॥

tavādya pṛthivī vīra niḥsapatnā nṛpottama | tāṃ pālaya yathā śakro hataśatrurmahāmanāḥ

हे वीर नृपश्रेष्ठ! आज यह पृथ्वी शत्रुहीन होकर तुम्हारी है। हे महामना, जैसे शत्रुओं के मारे जाने पर इन्द्र राज्य करते हैं, वैसे ही तुम इसका पालन करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (3.256.4)

एवमुक्तस्तु कर्णेन कर्णं राजाऽब्रवीत्पुनः । न किंचिद्दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ ॥

evamuktastu karṇena karṇaṃ rājā'bravītpunaḥ | na kiṃciddurlabhaṃ tasya yasya tvaṃ puruṣarṣabha

वैशम्पायन बोले — कर्ण के ऐसा कहने पर राजा ने कर्ण से कहा — "हे पुरुषश्रेष्ठ! जिसके पास तुम हो, उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है,

दुर्योधन उवाच

श्लोक 5 (3.256.5)

सहायश्चानुरक्तश्च मदर्थं च समुद्यतः । अभिप्रायस्तु मे कश्चित्तं वै शृणु यथातथम् ॥

sahāyaścānuraktaśca madarthaṃ ca samudyataḥ | abhiprāyastu me kaścittaṃ vai śṛṇu yathātatham

तुम मेरे सहायक हो, मुझसे अनुराग रखते हो और मेरे लिए सदा तत्पर रहते हो। पर मेरी एक अभिलाषा है; उसे ठीक-ठीक सुनो।

श्लोक 6 (3.256.6)

राजसूयं पाण्डवस्य दृष्ट्वा क्रतुवरं तदा । मम स्पृहा समुत्पन्ना तां संपादय सूतज ॥

rājasūyaṃ pāṇḍavasya dṛṣṭvā kratuvaraṃ tadā | mama spṛhā samutpannā tāṃ saṃpādaya sūtaja

पाण्डव का श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय देखकर मेरे मन में भी उसकी लालसा जागी है। हे सूतपुत्र, उसे पूरा करो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (3.256.7)

एवमुक्तस्ततः कर्णो राजानमिदमब्रवीत् । तवाद्य पृथिवीपाला वश्याः सर्वे नृपोत्तम ॥

evamuktastataḥ karṇo rājānamidamabravīt | tavādya pṛthivīpālā vaśyāḥ sarve nṛpottama

ऐसा कहे जाने पर कर्ण ने राजा से कहा — "हे नृपश्रेष्ठ! आज पृथ्वी के सभी राजा तुम्हारे अधीन हैं।

कर्ण उवाच

श्लोक 8 (3.256.8)

आहूयन्तां द्विजवराः संभाराश्च यथाविधि । संभ्रियन्तां कुरुश्रेष्ठ यज्ञोपकरणानि च ॥

āhūyantāṃ dvijavarāḥ saṃbhārāśca yathāvidhi | saṃbhriyantāṃ kuruśreṣṭha yajñopakaraṇāni ca

हे कुरुश्रेष्ठ! श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाया जाए, विधिपूर्वक सामग्री जुटाई जाए और यज्ञ के उपकरण एकत्र किए जाएँ।

श्लोक 9 (3.256.9)

ऋत्विजश्च समाहूता यथोक्तं वेदपारगाः । क्रियां कुर्वन्तु ते राजन्यथाशास्त्रमरिंदम ॥

ṛtvijaśca samāhūtā yathoktaṃ vedapāragāḥ | kriyāṃ kurvantu te rājanyathāśāstramariṃdama

हे शत्रुदमन राजन्! वेदों में पारंगत ऋत्विजों को विधि के अनुसार बुलाया जाए और वे शास्त्र के अनुसार कर्म करें।

श्लोक 10 (3.256.10)

बह्वन्नपानसंयुक्तः सुसमृद्धगुणान्वितः । प्रवर्ततां महायज्ञस्तवापि भरतर्षभ ॥

bahvannapānasaṃyuktaḥ susamṛddhaguṇānvitaḥ | pravartatāṃ mahāyajñastavāpi bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! प्रचुर अन्न-पान से युक्त और सब प्रकार की समृद्धि से सम्पन्न तुम्हारा भी महायज्ञ आरम्भ हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (3.256.11)

एवमुक्तस्तु कर्णेन धार्तराष्ट्रो विशांपते । पुरोहितं समानाय्य वचनं चेदमब्रवीत् ॥

evamuktastu karṇena dhārtarāṣṭro viśāṃpate | purohitaṃ samānāyya vacanaṃ cedamabravīt

हे प्रजानाथ! कर्ण के ऐसा कहने पर धृतराष्ट्रपुत्र ने अपने पुरोहित को बुलवाया और उससे यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 12 (3.256.12)

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं समाप्तवरदक्षिणम् । आहरस्व यथाशास्त्रं यथान्यायं यथाक्रमम् ॥

rājasūyaṃ kratuśreṣṭhaṃ samāptavaradakṣiṇam | āharasva yathāśāstraṃ yathānyāyaṃ yathākramam

"उत्तम दक्षिणाओं से पूर्ण होने वाले श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय को शास्त्र, न्याय और क्रम के अनुसार मेरे लिए सम्पन्न कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.256.13)

स एवमुक्तो नृपतिमुवाच द्विजसत्तमः ॥

sa evamukto nṛpatimuvāca dvijasattamaḥ

ऐसा कहे जाने पर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने राजा से कहा —

श्लोक 14 (3.256.14)

ब्राह्मणैः सहितो राजन्ये तत्रासन्समागताः । न स शक्यः क्रतुश्रेष्ठो जीवमाने युधिष्ठिरे । आहर्तुं कौरवश्रेष्ठ कुले तव नृपोत्तम ॥

brāhmaṇaiḥ sahito rājanye tatrāsansamāgatāḥ | na sa śakyaḥ kratuśreṣṭho jīvamāne yudhiṣṭhire | āhartuṃ kauravaśreṣṭha kule tava nṛpottama

हे राजन्! वहाँ एकत्र हुए ब्राह्मणों के साथ — "हे कौरवश्रेष्ठ, हे नृपोत्तम! युधिष्ठिर के जीवित रहते तुम्हारे कुल में वह श्रेष्ठ यज्ञ नहीं किया जा सकता।

पुरोहित उवाच

श्लोक 15 (3.256.15)

दीर्घायुर्जीवति च ते धृतराष्ट्रः पिता नृप । अतश्चापि विरुद्धस्ते क्रतुरेष नृपोत्तम ॥

dīrghāyurjīvati ca te dhṛtarāṣṭraḥ pitā nṛpa | ataścāpi viruddhaste kratureṣa nṛpottama

हे राजन्! तुम्हारे पिता धृतराष्ट्र भी दीर्घायु होकर अभी जीवित हैं; इस कारण भी, हे नृपश्रेष्ठ, यह यज्ञ तुम्हारे लिए उचित नहीं है।

श्लोक 16 (3.256.16)

अस्ति त्वन्यन्महत्सत्रं राजसूयसमं प्रभो । तेन त्वं यज राजेन्द्र शृणु चेदं वचो मम ॥

asti tvanyanmahatsatraṃ rājasūyasamaṃ prabho | tena tvaṃ yaja rājendra śṛṇu cedaṃ vaco mama

हे प्रभो! पर एक और महान यज्ञ है जो राजसूय के समान है। हे राजेन्द्र, तुम उसी से यजन करो और मेरी बात सुनो।

श्लोक 17 (3.256.17)

य इमे पृथिवीपालाः करदास्तव पार्थिव । ते करान्संप्रयच्छन्तु सुवर्णं च कृताकृतम् ॥

ya ime pṛthivīpālāḥ karadāstava pārthiva | te karānsaṃprayacchantu suvarṇaṃ ca kṛtākṛtam

हे पार्थिव! जो राजा तुम्हें कर देते हैं, वे अपना कर और गढ़ा हुआ तथा बिना गढ़ा सोना दें।

श्लोक 18 (3.256.18)

तेन ते क्रियतामद्यलाङ्गलं नृपसत्तम । यज्ञवाटस्य ते भूमिः कृष्यतां तेन भारत ॥

tena te kriyatāmadyalāṅgalaṃ nṛpasattama | yajñavāṭasya te bhūmiḥ kṛṣyatāṃ tena bhārata

हे नृपश्रेष्ठ! उसी सोने से आज तुम्हारे लिए एक हल बनवाया जाए, और हे भारत, उसी से तुम्हारी यज्ञशाला की भूमि जोती जाए।

श्लोक 19 (3.256.19)

तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः । प्रवर्ततां यथान्यायं सर्वतो ह्यनिवारितः ॥

tatra yajño nṛpaśreṣṭha prabhūtānnaḥ susaṃskṛtaḥ | pravartatāṃ yathānyāyaṃ sarvato hyanivāritaḥ

हे नृपश्रेष्ठ! वहाँ प्रचुर अन्न से युक्त, भली-भाँति सजाया हुआ यज्ञ विधिपूर्वक, बिना किसी रोक-टोक के चले।

श्लोक 20 (3.256.20)

एष ते वैष्णवो नाम यज्ञः सत्पुरुषोचितः । एतेन नेष्टवान्कश्चिदृतेविष्णुं पुरातनम् ॥

eṣa te vaiṣṇavo nāma yajñaḥ satpuruṣocitaḥ | etena neṣṭavānkaścidṛteviṣṇuṃ purātanam

यह वैष्णव नामक यज्ञ सत्पुरुषों के योग्य है; पुरातन विष्णु के सिवा किसी ने इसे नहीं किया है।

श्लोक 21 (3.256.21)

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं स्पर्धत्येष महाक्रतुः । अस्माकं रोचते चैव श्रेयश्च तव भारत ॥

rājasūyaṃ kratuśreṣṭhaṃ spardhatyeṣa mahākratuḥ | asmākaṃ rocate caiva śreyaśca tava bhārata

यह महायज्ञ श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय की बराबरी करता है। हे भारत, यह हमें भी अच्छा लगता है और तुम्हारे लिए भी कल्याणकारी है।

श्लोक 22 (3.256.22)

निर्विघ्नश्च भवत्येष सफला स्यात्स्पृहा तव । तस्मादेष महाबाहो तव यज्ञः प्रवर्तताम् ॥

nirvighnaśca bhavatyeṣa saphalā syātspṛhā tava | tasmādeṣa mahābāho tava yajñaḥ pravartatām

यह निर्विघ्न सम्पन्न होगा और तुम्हारी लालसा भी पूरी होगी। इसलिए, हे महाबाहु, तुम्हारा यह यज्ञ आरम्भ हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (3.256.23)

एवमुक्तस्तु तैर्विप्रैर्धार्तराष्ट्रो महीपतिः । कर्णं च सौबलं चैव भ्रातॄश्चैवेदमब्रवीत् ॥

evamuktastu tairviprairdhārtarāṣṭro mahīpatiḥ | karṇaṃ ca saubalaṃ caiva bhrātṝścaivedamabravīt

उन ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर पृथ्वीपति धृतराष्ट्रपुत्र ने कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और अपने भाइयों से यह कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 24 (3.256.24)

रोचते मे वचः कृत्स्नं ब्राह्मणानां न संशयः । रोचते यदि युष्माकं तस्मात्प्रब्रूत माचिरम् ॥

rocate me vacaḥ kṛtsnaṃ brāhmaṇānāṃ na saṃśayaḥ | rocate yadi yuṣmākaṃ tasmātprabrūta māciram

"ब्राह्मणों की पूरी बात मुझे निःसन्देह अच्छी लगती है। यदि तुम लोगों को भी यह अच्छी लगे तो बिना देर किए बताओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (3.256.25)

एवमुक्तास्तु ते सर्वे तथेत्यूचुर्नराधिपम् । संदिदेश ततोराजाव्यापारस्थान्यथाक्रमम् ॥

evamuktāstu te sarve tathetyūcurnarādhipam | saṃdideśa tatorājāvyāpārasthānyathākramam

ऐसा कहे जाने पर सबने राजा से कहा — "ऐसा ही हो।" तब राजा ने काम पर नियुक्त लोगों को क्रम से आदेश दिए।

श्लोक 26 (3.256.26)

हलस्य करणे चापि व्यादिष्टाः सर्वशिल्पिनः । यथोक्तं च नृपश्रेष्ठ कृतं सर्वं यथाक्रमम् ॥

halasya karaṇe cāpi vyādiṣṭāḥ sarvaśilpinaḥ | yathoktaṃ ca nṛpaśreṣṭha kṛtaṃ sarvaṃ yathākramam

हल बनाने के काम में सभी शिल्पी लगा दिए गए, और हे नृपश्रेष्ठ, जैसा कहा गया था वैसा ही सब कुछ क्रम से किया गया।

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