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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 257

दुर्योधन का वैष्णव यज्ञ

सोने का हल तैयार होने पर वैष्णव यज्ञ आरम्भ होता है और दुर्योधन दीक्षा लेता है। दूत राजाओं और ब्राह्मणों को निमन्त्रण देने जाते हैं, और दुःशासन के कहने पर एक दूत द्वैतवन में पाण्डवों के पास भी जाता है। युधिष्ठिर तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा के कारण विनम्रता से मना कर देते हैं, जबकि भीम कहला भेजते हैं कि वे रणयज्ञ में आएँगे। राजा और ब्राह्मण एकत्र होते हैं, धृतराष्ट्र की आज्ञा से विदुर सबका सत्कार करते हैं, और समापन-कर्म के बाद दुर्योधन अतिथियों को विदा कर हस्तिनापुर लौटता है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.257.1)

ततस्तु शिल्पिनः सर्वं कृतमूचुर्नराधिपम् । विदुरश्च महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रे न्यवेदयत् ॥

tatastu śilpinaḥ sarvaṃ kṛtamūcurnarādhipam | viduraśca mahāprājño dhṛtarāṣṭre nyavedayat

वैशम्पायन बोले — तब सब शिल्पियों ने राजा को बताया कि सारा काम हो गया है, और परम बुद्धिमान विदुर ने धृतराष्ट्र को सूचना दी —

श्लोक 2 (3.257.2)

सज्जं क्रतुवरं राजन्कालप्राप्तं च भारत । सौवर्णं च कृतं सर्वं लाङ्गलं च महाधनम् ॥

sajjaṃ kratuvaraṃ rājankālaprāptaṃ ca bhārata | sauvarṇaṃ ca kṛtaṃ sarvaṃ lāṅgalaṃ ca mahādhanam

"हे राजन्, हे भारत! वह श्रेष्ठ यज्ञ तैयार है और उसका समय भी आ गया है; सोने की सारी वस्तुएँ बन चुकी हैं और बहुमूल्य हल भी।"

श्लोक 3 (3.257.3)

एतच्छ्रुत्वा नृपश्रेष्ठो धृतराष्ट्रो विशांपते । आज्ञापयामास नृपः क्रतुराजप्रवर्तनम् ॥

etacchrutvā nṛpaśreṣṭho dhṛtarāṣṭro viśāṃpate | ājñāpayāmāsa nṛpaḥ kraturājapravartanam

हे प्रजानाथ! यह सुनकर नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्र ने उस श्रेष्ठ यज्ञ को आरम्भ करने की आज्ञा दी।

श्लोक 4 (3.257.4)

ततः प्रववृते यज्ञः प्रभूतार्थः सुसंस्कृतः । दीक्षितश्चापि गान्धारिर्यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ॥

tataḥ pravavṛte yajñaḥ prabhūtārthaḥ susaṃskṛtaḥ | dīkṣitaścāpi gāndhāriryathāśāstraṃ yathākramam

तब धन-सम्पन्न और भली-भाँति सजाया हुआ यज्ञ आरम्भ हुआ, और गान्धारीपुत्र दुर्योधन ने शास्त्र और क्रम के अनुसार यज्ञ की दीक्षा ली।

श्लोक 5 (3.257.5)

प्रहृष्टो धृतराष्ट्रश्च विदुरश्च महायशाः । भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णो गान्धारी च यशस्विनी ॥

prahṛṣṭo dhṛtarāṣṭraśca viduraśca mahāyaśāḥ | bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ karṇo gāndhārī ca yaśasvinī

धृतराष्ट्र प्रसन्न हुए, और यशस्वी विदुर, भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण तथा यशस्विनी गान्धारी भी।

श्लोक 6 (3.257.6)

निमन्त्रणार्थं दूतांश्च प्रेषयामास शीघ्रगान् । पार्थिवानां च राजेन्द्र ब्राह्मणानां तथैव च ॥

nimantraṇārthaṃ dūtāṃśca preṣayāmāsa śīghragān | pārthivānāṃ ca rājendra brāhmaṇānāṃ tathaiva ca

हे राजेन्द्र! उसने पृथ्वी के राजाओं और ब्राह्मणों को निमन्त्रण देने के लिए शीघ्रगामी दूत भेजे।

श्लोक 7 (3.257.7)

ते प्रयाता यथोद्दिष्टा दूतास्त्वरितवाहनाः । तत्र कंचित्प्रयान्तं तु दूतं दुःशासनोऽब्रवीत् ॥

te prayātā yathoddiṣṭā dūtāstvaritavāhanāḥ | tatra kaṃcitprayāntaṃ tu dūtaṃ duḥśāsano'bravīt

दूत आदेश के अनुसार तेज़ वाहनों पर चल पड़े। तब जाते हुए एक दूत से दुःशासन ने कहा —

श्लोक 8 (3.257.8)

गच्छ द्वैतवनं शीघ्रं पाण्डवान्पापपूरुषान् । निमन्त्रय यथान्यायं विप्रांस्तस्मिन्वने तदा ॥

gaccha dvaitavanaṃ śīghraṃ pāṇḍavānpāpapūruṣān | nimantraya yathānyāyaṃ viprāṃstasminvane tadā

"शीघ्र द्वैतवन जाओ और उन पापी पाण्डवों को तथा उस वन में रहने वाले ब्राह्मणों को भी यथोचित रूप से निमन्त्रण दो।"

श्लोक 9 (3.257.9)

स गत्वा पाण्डवान्सर्वानुवाचाभिप्रणम्य च । दुर्योधनो महाराज यजते नृपसत्तमः ॥

sa gatvā pāṇḍavānsarvānuvācābhipraṇamya ca | duryodhano mahārāja yajate nṛpasattamaḥ

वह सब पाण्डवों के पास गया और प्रणाम करके बोला — "हे महाराज! नृपश्रेष्ठ दुर्योधन यज्ञ कर रहे हैं;

दूत उवाच

श्लोक 10 (3.257.10)

स्ववीर्यार्जितमर्थौघमवाप्य कुरुसत्तमः । तत्र गच्छन्ति राजानो ब्राह्मणाश्च ततस्ततः ॥

svavīryārjitamarthaughamavāpya kurusattamaḥ | tatra gacchanti rājāno brāhmaṇāśca tatastataḥ

उस कुरुश्रेष्ठ ने अपने पराक्रम से धन का भण्डार पाया है। वहाँ जगह-जगह से राजा और ब्राह्मण जा रहे हैं।

श्लोक 11 (3.257.11)

अहं तु प्रेषितो राजन्कौरवेण महात्मना । आमन्त्रयति वो राजा धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः । मनोभिलषितं राज्ञस्तं क्रतुं द्रष्टुमर्हथ ॥

ahaṃ tu preṣito rājankauraveṇa mahātmanā | āmantrayati vo rājā dhārtarāṣṭro janeśvaraḥ | manobhilaṣitaṃ rājñastaṃ kratuṃ draṣṭumarhatha

हे राजन्! मुझे महात्मा कौरव ने भेजा है। धृतराष्ट्रपुत्र राजा, जनेश्वर दुर्योधन आप लोगों को आमन्त्रित करते हैं — राजा के मन को प्रिय उस यज्ञ को आप आकर देखें।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (3.257.12)

ततो युधिष्ठिरो राजा तच्छ्रुत्वा दूतभाषितम् । अब्रवीन्नृपशार्दूलो दिष्ट्या राजा सुयोधनः । यजते क्रतुमुख्येन पूर्वेषां कीर्तिवर्धनः ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā tacchrutvā dūtabhāṣitam | abravīnnṛpaśārdūlo diṣṭyā rājā suyodhanaḥ | yajate kratumukhyena pūrveṣāṃ kīrtivardhanaḥ

दूत की बात सुनकर राजाओं में सिंह के समान राजा युधिष्ठिर ने कहा — "सौभाग्य की बात है कि राजा सुयोधन पूर्वजों की कीर्ति बढ़ाते हुए श्रेष्ठ यज्ञ कर रहे हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 13 (3.257.13)

वयमप्युपयास्यामो न त्विदानीं कथंचन । समयः परिपाल्यो नो यावद्वर्षं त्रयोदशम् ॥

vayamapyupayāsyāmo na tvidānīṃ kathaṃcana | samayaḥ paripālyo no yāvadvarṣaṃ trayodaśam

हम भी आते, पर अभी किसी भी तरह नहीं; तेरहवाँ वर्ष पूरा होने तक हमें अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (3.257.14)

श्रुत्वैतद्धर्मराजस्य भीमो वचनमब्रवीत् । तदा तु नृपतिर्गन्ता धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

śrutvaitaddharmarājasya bhīmo vacanamabravīt | tadā tu nṛpatirgantā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

धर्मराज की यह बात सुनकर भीम बोले — "धर्मराज राजा युधिष्ठिर तब जाएँगे,

भीम उवाच

श्लोक 15 (3.257.15)

अस्त्रशस्त्रप्रदीप्तेऽग्नौ यदा तं पातयिष्यति । वर्षात्रयोदशादूर्ध्वं रणसत्रे नराधिपः ॥

astraśastrapradīpte'gnau yadā taṃ pātayiṣyati | varṣātrayodaśādūrdhvaṃ raṇasatre narādhipaḥ

जब तेरहवें वर्ष के बाद रणयज्ञ में वे उस राजा को अस्त्र-शस्त्रों से धधकती आग में झोंक देंगे।

श्लोक 16 (3.257.16)

यदा क्रोधहविर्मोक्ता धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः । आगन्तारस्तदा स्मेति वाच्यस्ते स सुयोधनः ॥

yadā krodhahavirmoktā dhārtarāṣṭreṣu pāṇḍavaḥ | āgantārastadā smeti vācyaste sa suyodhanaḥ

जब पाण्डव धृतराष्ट्र के पुत्रों पर अपने क्रोध की आहुति डालेंगे, तब हम आएँगे — यही बात तुम सुयोधन से कहना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (3.257.17)

शेषास्तु पाण्डवा राजन्नैवोचुः किंचिदप्रियम् । दूतश्चापि यथावृत्तं धार्तराष्ट्रे न्यवेदयत् ॥

śeṣāstu pāṇḍavā rājannaivocuḥ kiṃcidapriyam | dūtaścāpi yathāvṛttaṃ dhārtarāṣṭre nyavedayat

हे राजन्! शेष पाण्डवों ने कोई अप्रिय बात नहीं कही, और दूत ने जो कुछ हुआ था वह ज्यों-का-त्यों धृतराष्ट्रपुत्र को बता दिया।

श्लोक 18 (3.257.18)

अथाजग्मुर्नरश्रेष्ठा नानाजनपदेश्वराः । ब्राह्मणाश्च महाभाग धार्तराष्ट्रपुरं प्रति ॥

athājagmurnaraśreṣṭhā nānājanapadeśvarāḥ | brāhmaṇāśca mahābhāga dhārtarāṣṭrapuraṃ prati

हे महाभाग! तब अनेक जनपदों के स्वामी श्रेष्ठ नरेश और ब्राह्मण भी धृतराष्ट्रपुत्र के नगर में आए।

श्लोक 19 (3.257.19)

ते त्वर्चिता यथाशास्त्रं यथाविधि यथाक्रमम् । मुदा परमया युक्ताः प्रीताश्चापि नरेश्वराः ॥

te tvarcitā yathāśāstraṃ yathāvidhi yathākramam | mudā paramayā yuktāḥ prītāścāpi nareśvarāḥ

शास्त्र, विधि और क्रम के अनुसार सत्कार पाकर वे नरेश अत्यन्त आनन्दित और सन्तुष्ट हुए।

श्लोक 20 (3.257.20)

धृतराष्ट्रोऽपि राजेन्द्र संवृतः सर्वकौरवैः । हर्षेण महता युक्तो विदुरं प्रत्यभाषत ॥

dhṛtarāṣṭro'pi rājendra saṃvṛtaḥ sarvakauravaiḥ | harṣeṇa mahatā yukto viduraṃ pratyabhāṣata

हे राजेन्द्र! धृतराष्ट्र ने भी सब कौरवों से घिरे हुए, बड़े हर्ष के साथ विदुर से कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 21 (3.257.21)

यथा सुखी जनः सर्वः क्षत्तः स्यादन्नसंयुतः । तुष्येत्तु यज्ञसदने तथा नीतिर्विधीयताम् ॥

yathā sukhī janaḥ sarvaḥ kṣattaḥ syādannasaṃyutaḥ | tuṣyettu yajñasadane tathā nītirvidhīyatām

"हे क्षत्ता! ऐसी व्यवस्था करो कि यज्ञमण्डप में सब लोग सुखी, भरपेट भोजन पाए हुए और सन्तुष्ट रहें।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (3.257.22)

विदुरस्तु तदाज्ञाय सर्ववर्णानरिंदम । यथा प्रमाणतो विद्वान्पूजयामास धर्मवित् ॥

vidurastu tadājñāya sarvavarṇānariṃdama | yathā pramāṇato vidvānpūjayāmāsa dharmavit

हे शत्रुदमन! यह समझकर धर्मज्ञ और विद्वान विदुर ने सभी वर्णों के लोगों का उनकी योग्यता के अनुसार सम्मान किया,

श्लोक 23 (3.257.23)

भक्ष्यपेयान्नपानेन माल्यैश्चापि सुगन्धिभिः । वासोभिर्विविधैश्चैव योजयामास हृष्टवत् ॥

bhakṣyapeyānnapānena mālyaiścāpi sugandhibhiḥ | vāsobhirvividhaiścaiva yojayāmāsa hṛṣṭavat

और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें खाने-पीने की वस्तुएँ, सुगन्धित मालाएँ और अनेक प्रकार के वस्त्र दिए।

श्लोक 24 (3.257.24)

कृत्वा ह्यवभृथं वीरो यथाशास्त्रं यथाक्रमम् । सान्त्वयित्वा च राजेन्द्रो दत्त्वा च विविधं वसु । विसर्जयामास नृपान्ब्राह्मणांश्च सहस्रशः ॥

kṛtvā hyavabhṛthaṃ vīro yathāśāstraṃ yathākramam | sāntvayitvā ca rājendro dattvā ca vividhaṃ vasu | visarjayāmāsa nṛpānbrāhmaṇāṃśca sahasraśaḥ

उस वीर ने शास्त्र और क्रम के अनुसार अवभृथ स्नान किया; फिर उस राजेन्द्र ने मधुर वचनों से सान्त्वना देकर और अनेक प्रकार का धन देकर हज़ारों राजाओं और ब्राह्मणों को विदा किया।

श्लोक 25 (3.257.25)

विसृज्यच नृपान्सर्वान्भ्रातृभिः परिवारितः । विवेश हास्तिनपुरं सहितः कर्णसौबलैः ॥

visṛjyaca nṛpānsarvānbhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | viveśa hāstinapuraṃ sahitaḥ karṇasaubalaiḥ

सब राजाओं को विदा करके, भाइयों से घिरा हुआ वह कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि के साथ हस्तिनापुर में प्रविष्ट हुआ।

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