आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 258
कर्ण की अर्जुन-वध प्रतिज्ञा
दुर्योधन स्तुतियों के बीच हस्तिनापुर लौटता है; कुछ लोग कहते हैं कि उसका यज्ञ युधिष्ठिर के यज्ञ की सोलहवीं कला भी नहीं, पर उसके हितैषी उसकी तुलना ययाति, नहुष, मान्धाता और भरत के यज्ञों से करते हैं। कर्ण वचन देता है कि पाण्डवों के मारे जाने और राजसूय होने पर वह फिर अभिनन्दन करेगा, और प्रतिज्ञा करता है कि अर्जुन को मारे बिना वह न पैर धुलवाएगा, न मांस खाएगा, न मदिरा पिएगा, और किसी याचक को मना नहीं करेगा। गुप्तचरों से यह प्रतिज्ञा सुनकर युधिष्ठिर अत्यन्त चिन्तित होते हैं और द्वैतवन छोड़ने का निश्चय करते हैं, जबकि दुर्योधन कर्ण और शकुनि के साथ पृथ्वी पर शासन करता और बड़े-बड़े यज्ञ करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.258.1)
प्रविशन्तं महाराज सूतास्तुष्टुवुरच्युतम् । जनाश्चापि महेष्वासं तुष्टुवू राजसत्तमम् ॥
praviśantaṃ mahārāja sūtāstuṣṭuvuracyutam | janāścāpi maheṣvāsaṃ tuṣṭuvū rājasattamam
वैशम्पायन बोले — हे महाराज! जब वह नगर में प्रवेश कर रहा था, तब सूतों ने उस अच्युत राजा की स्तुति की, और प्रजा ने भी उस महाधनुर्धर नृपश्रेष्ठ का गुणगान किया।
श्लोक 2 (3.258.2)
लाजैश्चन्दनचूर्णैश्च विकीर्य च जनास्ततः । ऊचुर्दिष्ट्या नृपाविघ्नः समाप्तोऽयं क्रतुस्तव ॥
lājaiścandanacūrṇaiśca vikīrya ca janāstataḥ | ūcurdiṣṭyā nṛpāvighnaḥ samāpto'yaṃ kratustava
लावा और चन्दन का चूर्ण बरसाते हुए लोगों ने कहा — "हे राजन्! सौभाग्य से आपका यह यज्ञ बिना किसी विघ्न के सम्पन्न हो गया।"
श्लोक 3 (3.258.3)
अपरे त्वब्रुवंस्तत्रवादिकास्तं महीपतिम् । यौधिष्ठिरस्य यज्ञस्य न समो ह्येष ते क्रतुः ॥
apare tvabruvaṃstatravādikāstaṃ mahīpatim | yaudhiṣṭhirasya yajñasya na samo hyeṣa te kratuḥ
पर वहाँ कुछ दूसरे बकवादी लोगों ने उस पृथ्वीपति से कहा — "आपका यह यज्ञ युधिष्ठिर के यज्ञ के बराबर नहीं है;
श्लोक 4 (3.258.4)
नैव तस्य क्रतोरेष कलामर्हति षोडशीम् । एवं तत्राब्रुवन्केचिद्वातिकास्तं जनेश्वरम् ॥
naiva tasya kratoreṣa kalāmarhati ṣoḍaśīm | evaṃ tatrābruvankecidvātikāstaṃ janeśvaram
यह उस यज्ञ की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है।" इस प्रकार वहाँ कुछ बकवादियों ने उस जनेश्वर से कहा।
श्लोक 5 (3.258.5)
सुहृदस्त्वब्रुवंस्तत्र अति सर्वानयं क्रतुः । प्रवर्तितो ह्ययं राज्ञा धार्तराष्ट्रेण धीमता ॥
suhṛdastvabruvaṃstatra ati sarvānayaṃ kratuḥ | pravartito hyayaṃ rājñā dhārtarāṣṭreṇa dhīmatā
पर उसके हितैषियों ने वहाँ कहा — "यह यज्ञ सब यज्ञों से बढ़कर है, क्योंकि इसे बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्रपुत्र ने किया है।
सुहृद ऊचुः
श्लोक 6 (3.258.6)
ययातिर्नहुषश्चापि मान्धाता भरतस्तथा । क्रतुमेनं समाहृत्य पूताः सर्वे दिवं गताः ॥
yayātirnahuṣaścāpi māndhātā bharatastathā | kratumenaṃ samāhṛtya pūtāḥ sarve divaṃ gatāḥ
ययाति, नहुष, मान्धाता और भरत — ये सब इस यज्ञ को करके पवित्र हुए और स्वर्ग को गए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (3.258.7)
एता वाचः शुभाः शृण्वन्सुहृदां भरतर्षभ । प्रविवेश पुरं हृष्टः स्ववेश्म च नराधिपः ॥
etā vācaḥ śubhāḥ śṛṇvansuhṛdāṃ bharatarṣabha | praviveśa puraṃ hṛṣṭaḥ svaveśma ca narādhipaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! अपने हितैषियों के ये शुभ वचन सुनते हुए राजा ने प्रसन्न होकर नगर में और फिर अपने भवन में प्रवेश किया।
श्लोक 8 (3.258.8)
अभिवाद्य ततः पादान्मातापित्रोर्विशांपते । भीष्मद्रोणकृपादीनां विदुरस्य च धीमतः ॥
abhivādya tataḥ pādānmātāpitrorviśāṃpate | bhīṣmadroṇakṛpādīnāṃ vidurasya ca dhīmataḥ
हे प्रजानाथ! फिर उसने माता-पिता के, भीष्म, द्रोण, कृप आदि के और बुद्धिमान विदुर के चरणों में प्रणाम किया।
श्लोक 9 (3.258.9)
अभिवादितः कनीयोभिर्भ्रातृभिर्भ्रातृनन्दनः । निषसादासने मुख्ये भ्रातृभिः परिवारितः ॥
abhivāditaḥ kanīyobhirbhrātṛbhirbhrātṛnandanaḥ | niṣasādāsane mukhye bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ
छोटे भाइयों ने उसे प्रणाम किया, और भाइयों को आनन्द देने वाला वह भाइयों से घिरा हुआ प्रमुख आसन पर बैठ गया।
श्लोक 10 (3.258.10)
तमुत्थाय महाराजं सूतपुत्रोऽब्रवीद्वचः । दिष्ट्या ते भरतश्रेष्ठ समाप्तोऽयं महाक्रतुः ॥
tamutthāya mahārājaṃ sūtaputro'bravīdvacaḥ | diṣṭyā te bharataśreṣṭha samāpto'yaṃ mahākratuḥ
सूतपुत्र ने उठकर महाराज से कहा — "हे भरतश्रेष्ठ! सौभाग्य से आपका यह महायज्ञ सम्पन्न हो गया।
कर्ण उवाच
श्लोक 11 (3.258.11)
हतेषु युधि पार्थेषु राजसूये तथा त्वया । आहृतेऽहं नरश्रेष्ठ त्वां सभाजयिता पुनः ॥
hateṣu yudhi pārtheṣu rājasūye tathā tvayā | āhṛte'haṃ naraśreṣṭha tvāṃ sabhājayitā punaḥ
हे नरश्रेष्ठ! जब युद्ध में कुन्तीपुत्र मारे जाएँगे और आप राजसूय यज्ञ भी कर लेंगे, तब मैं फिर से आपका अभिनन्दन करूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (3.258.12)
तमब्रवीन्महाराजो धार्तराष्ट्रो महायशाः ॥
tamabravīnmahārājo dhārtarāṣṭro mahāyaśāḥ
तब महायशस्वी महाराज धृतराष्ट्रपुत्र ने उससे कहा —
दुर्योधन उवाच
श्लोक 13 (3.258.13)
सत्यमेतत्त्वयोक्तं हि पाण्डवेषु दुरात्मसु । निहतेषु नरश्रेष्ठ प्राप्ते चापि महाक्रतौ । राजसूये पुनर्वीर त्वमेवं वर्धयिष्यसि ॥
satyametattvayoktaṃ hi pāṇḍaveṣu durātmasu | nihateṣu naraśreṣṭha prāpte cāpi mahākratau | rājasūye punarvīra tvamevaṃ vardhayiṣyasi
"तुमने जो कहा वह सत्य है। हे नरश्रेष्ठ, जब दुष्ट पाण्डव मारे जाएँगे और राजसूय महायज्ञ भी हो जाएगा, तब, हे वीर, तुम फिर इसी प्रकार मेरा अभ्युदय करोगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (3.258.14)
एवमुक्त्वा महाराज कर्णमाश्लिष्य भारत । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास कौरवः ॥
evamuktvā mahārāja karṇamāśliṣya bhārata | rājasūyaṃ kratuśreṣṭhaṃ cintayāmāsa kauravaḥ
हे महाराज, हे भारत! ऐसा कहकर कौरव ने कर्ण को गले लगाया और श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय के विषय में सोचने लगा।
श्लोक 15 (3.258.15)
सोऽब्रवीत्कौरवांश्चापि पार्श्वस्थान्नृपसत्तमः । राधेयसौबलादीन्वै धार्तराष्ट्रो महीपतिः ॥
so'bravītkauravāṃścāpi pārśvasthānnṛpasattamaḥ | rādheyasaubalādīnvai dhārtarāṣṭro mahīpatiḥ
उस नृपश्रेष्ठ पृथ्वीपति धृतराष्ट्रपुत्र ने पास बैठे कौरवों से — राधानन्दन कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि आदि से — कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 16 (3.258.16)
कदा तु तं क्रतुवरं राजसूयं महाधनम् । निहत्य पाण्डवान्सर्वानाहरिष्यामि कौरवाः ॥
kadā tu taṃ kratuvaraṃ rājasūyaṃ mahādhanam | nihatya pāṇḍavānsarvānāhariṣyāmi kauravāḥ
"हे कौरवो! कब मैं सब पाण्डवों को मारकर वह बहुत धन वाला श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय करूँगा?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (3.258.17)
तमब्रवीत्तदा कर्णः शृणु मे राजकुञ्जर । पादौ न धावये तावद्यावन्न निहतोऽर्जुनः ॥
tamabravīttadā karṇaḥ śṛṇu me rājakuñjara | pādau na dhāvaye tāvadyāvanna nihato'rjunaḥ
तब कर्ण ने उससे कहा — "हे राजाओं में गजराज! मेरी बात सुनिए। जब तक अर्जुन मारा नहीं जाता, तब तक मैं अपने पैर नहीं धुलवाऊँगा;
कर्ण उवाच
श्लोक 18 (3.258.18)
कीलालजं न खादेयं करिष्ये चासुरव्रतम् । नास्तीति नैव वक्ष्यामि याचितो येन केनचित् ॥
kīlālajaṃ na khādeyaṃ kariṣye cāsuravratam | nāstīti naiva vakṣyāmi yācito yena kenacit
मैं मांस नहीं खाऊँगा, मदिरा-त्याग का असुरव्रत रखूँगा, और जो कोई भी मुझसे कुछ माँगेगा उससे कभी 'नहीं है' नहीं कहूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (3.258.19)
अथोत्क्रुष्टं महेष्वासैर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः । प्रतिज्ञाते फल्गुनस्य वधे कर्णेन संयुगे ॥
athotkruṣṭaṃ maheṣvāsairdhārtarāṣṭrairmahārathaiḥ | pratijñāte phalgunasya vadhe karṇena saṃyuge
तब कर्ण द्वारा युद्ध में फाल्गुन (अर्जुन) के वध की प्रतिज्ञा किए जाने पर महाधनुर्धर महारथी धृतराष्ट्रपुत्रों ने जयघोष किया;
श्लोक 20 (3.258.20)
विजितांश्चाप्यमन्यन्त पाण्डवान्धृतराष्ट्रजाः । तदा प्रतिज्ञामारुह्य सूतपुत्रेण भाषिते ॥
vijitāṃścāpyamanyanta pāṇḍavāndhṛtarāṣṭrajāḥ | tadā pratijñāmāruhya sūtaputreṇa bhāṣite
और सूतपुत्र के यह प्रतिज्ञा करके बोलने पर धृतराष्ट्र के पुत्रों ने पाण्डवों को पराजित हुआ ही मान लिया।
श्लोक 21 (3.258.21)
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र विसृज्यनरपुङ्गवान् । प्रविवेश गृहंश्रीमान्यथा चैत्ररथं प्रभुः ॥
duryodhano'pi rājendra visṛjyanarapuṅgavān | praviveśa gṛhaṃśrīmānyathā caitrarathaṃ prabhuḥ
हे राजेन्द्र! दुर्योधन ने भी उन श्रेष्ठ पुरुषों को विदा किया और वह श्रीमान अपने भवन में ऐसे प्रविष्ट हुआ जैसे प्रभु कुबेर चैत्ररथ वन में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 22 (3.258.22)
तेऽपिसर्वे महेष्वासा जग्मुर्वेश्मानि भारत । स्वानि स्वानि महाराज भीष्मद्रोणादयो नृपाः ॥
te'pisarve maheṣvāsā jagmurveśmāni bhārata | svāni svāni mahārāja bhīṣmadroṇādayo nṛpāḥ
हे भारत! वे सब महाधनुर्धर भी अपने-अपने घर चले गए — हे महाराज, भीष्म, द्रोण आदि राजा अपने-अपने भवनों को।
श्लोक 23 (3.258.23)
पाण्डवाश्च महेष्वासा दूतवाक्यप्रचोदिताः । चिन्तयन्तस्तमेवार्थं नालभन्त सुखं क्वचित् ॥
pāṇḍavāśca maheṣvāsā dūtavākyapracoditāḥ | cintayantastamevārthaṃ nālabhanta sukhaṃ kvacit
दूत के वचनों से उद्वेलित महाधनुर्धर पाण्डव उसी बात को सोचते रहे और उन्हें कहीं चैन न मिला।
श्लोक 24 (3.258.24)
भूयश्च चारै राजेन्द्र प्रवृत्तिरुपपादिता । प्रतिज्ञा सूतपुत्रस्य विजयस्य वधं प्रति ॥
bhūyaśca cārai rājendra pravṛttirupapāditā | pratijñā sūtaputrasya vijayasya vadhaṃ prati
हे राजेन्द्र! फिर गुप्तचरों ने समाचार दिया कि सूतपुत्र ने विजय (अर्जुन) के वध की प्रतिज्ञा की है।
श्लोक 25 (3.258.25)
एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतः समुद्विग्नो नराधिप । अधोमुखश्चिरं तस्थौ किं कार्यमिति चिन्तयन् ॥
etacchrutvā dharmasutaḥ samudvigno narādhipa | adhomukhaściraṃ tasthau kiṃ kāryamiti cintayan
हे नरेश्वर! यह सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर अत्यन्त व्याकुल हो गए; 'क्या करना चाहिए' यह सोचते हुए वे बहुत देर तक सिर झुकाए खड़े रहे।
श्लोक 26 (3.258.26)
अभेद्यकवचं मत्वा कर्णमद्भुतविक्रमम् । अनुस्मरंश्च संक्लेशान्न शान्तिमुपजग्मिवान् ॥
abhedyakavacaṃ matvā karṇamadbhutavikramam | anusmaraṃśca saṃkleśānna śāntimupajagmivān
अद्भुत पराक्रमी कर्ण को अभेद्य कवच वाला मानकर और अपने कष्टों को याद करते हुए उन्हें शान्ति नहीं मिली।
श्लोक 27 (3.258.27)
तस्य चिन्तापरीतस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मनः । बहुव्यालमृगाकीर्णं त्यक्तुं द्वैतवनं वनम् ॥
tasya cintāparītasya buddhirjajñe mahātmanaḥ | bahuvyālamṛgākīrṇaṃ tyaktuṃ dvaitavanaṃ vanam
चिन्ता से घिरे उस महात्मा ने हिंसक पशुओं से भरे द्वैतवन को छोड़ने का निश्चय किया।
श्लोक 28 (3.258.28)
धार्तराष्ट्रोऽपि नृपतिः प्रशशास वसुंधराम् । भ्रातृभिः सहितो वीरैर्भीष्मद्रोणकृपैस्तथा ॥
dhārtarāṣṭro'pi nṛpatiḥ praśaśāsa vasuṃdharām | bhrātṛbhiḥ sahito vīrairbhīṣmadroṇakṛpaistathā
इधर धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन अपने वीर भाइयों तथा भीष्म, द्रोण और कृप के साथ पृथ्वी का शासन करने लगा,
श्लोक 29 (3.258.29)
संगम्य सूतपुत्रेण कर्णेनाहवशोभिना । सततं प्रीयमाणो वै देविना सौबलेन च ॥
saṃgamya sūtaputreṇa karṇenāhavaśobhinā | satataṃ prīyamāṇo vai devinā saubalena ca
युद्ध में शोभा पाने वाले सूतपुत्र कर्ण के साथ मिलकर, और जुआरी सुबलपुत्र शकुनि के साथ सदा प्रसन्न रहते हुए।
श्लोक 30 (3.258.30)
दुर्योधनः प्रिये नित्यं वर्तमानो महीभृताम् । पूजयामास विप्रेन्द्रान्क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥
duryodhanaḥ priye nityaṃ vartamāno mahībhṛtām | pūjayāmāsa viprendrānkratubhirbhūridakṣiṇaiḥ
राजाओं का प्रिय करने में सदा लगे रहने वाले दुर्योधन ने भरपूर दक्षिणा वाले यज्ञों से श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सम्मान किया।
श्लोक 31 (3.258.31)
भ्रातॄणां च प्रियं राजन्स चकार परंतपः । निश्चित्य मनसा वीरो दत्तभुक्तफलं धनम् ॥
bhrātṝṇāṃ ca priyaṃ rājansa cakāra paraṃtapaḥ | niścitya manasā vīro dattabhuktaphalaṃ dhanam
हे राजन्! उस शत्रुतापन वीर ने अपने भाइयों का भी प्रिय किया, क्योंकि उसने मन में निश्चय कर लिया था कि धन का फल दान और उपभोग ही है।