आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 259
स्वप्न में मृगों की प्रार्थना
जनमेजय पूछते हैं कि दुर्योधन को छुड़ाने के बाद पाण्डवों ने क्या किया। एक रात द्वैतवन के बचे हुए मृग स्वप्न में युधिष्ठिर के सामने आते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वे कहीं और चले जाएँ, क्योंकि भाइयों के शिकार से उनके कुल बीज-मात्र बचे हैं। दया से भरकर युधिष्ठिर भाइयों से कहते हैं कि वे एक वर्ष आठ महीने से इस वन के प्राणियों पर निर्भर रहे हैं, और पाण्डव अपने ब्राह्मणों और सेवकों के साथ काम्यक वन की ओर चल पड़ते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (3.259.1)
दुर्योधनं मोक्षयित्वा पाण्डुपुत्रा महाबलाः । किमकार्षुर्वने तस्मिंस्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥
duryodhanaṃ mokṣayitvā pāṇḍuputrā mahābalāḥ | kimakārṣurvane tasmiṃstanmamākhyātumarhasi
जनमेजय ने पूछा — दुर्योधन को छुड़ाने के बाद महाबली पाण्डुपुत्रों ने उस वन में क्या किया? यह मुझे बताने की कृपा करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (3.259.2)
ततः शयानं कौन्तेयं रात्रौ द्वैतवने मृगाः । स्वप्नान्ते दर्शयामासुर्बाष्पकण्ठा युधिष्ठिरम् ॥
tataḥ śayānaṃ kaunteyaṃ rātrau dvaitavane mṛgāḥ | svapnānte darśayāmāsurbāṣpakaṇṭhā yudhiṣṭhiram
वैशम्पायन बोले — तब एक रात जब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर सो रहे थे, द्वैतवन के मृग स्वप्न के अन्त में आँसुओं से रुँधे गले के साथ उनके सामने प्रकट हुए।
श्लोक 3 (3.259.3)
तानब्रवीत्स राजेन्द्रो वेपमानान्कृताञ्जलीन् । ब्रूत यद्वक्तुकामाः स्थ के भवन्तः किमिष्यते ॥
tānabravītsa rājendro vepamānānkṛtāñjalīn | brūta yadvaktukāmāḥ stha ke bhavantaḥ kimiṣyate
काँपते हुए, हाथ जोड़े खड़े उन मृगों से उस राजेन्द्र ने कहा — "जो कहना चाहते हो, कहो। तुम कौन हो और क्या चाहते हो?"
श्लोक 4 (3.259.4)
एवमुक्ताः पाण्डवेन कौन्तेयेन यशस्विना । प्रत्यब्रुवन्मृगास्तत्रहतशेषा युधिष्ठिरम् ॥
evamuktāḥ pāṇḍavena kaunteyena yaśasvinā | pratyabruvanmṛgāstatrahataśeṣā yudhiṣṭhiram
यशस्वी कुन्तीपुत्र पाण्डव के ऐसा पूछने पर, मारे जाने से बचे हुए वे मृग युधिष्ठिर से बोले —
मृगा ऊचुः
श्लोक 5 (3.259.5)
वयं मृगा द्वैतवने हतशिष्टास्तु भारत । नोत्सीदेम महाराज क्रियतां वासपर्ययः ॥
vayaṃ mṛgā dvaitavane hataśiṣṭāstu bhārata | notsīdema mahārāja kriyatāṃ vāsaparyayaḥ
"हे भारत! हम द्वैतवन के मृग हैं, जो शिकार से बचे रह गए हैं। हे महाराज, अपना निवास-स्थान बदल लीजिए, जिससे हमारा नाश न हो।
श्लोक 6 (3.259.6)
भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्व एवास्त्रकोविदाः । कुलान्यल्पावशिष्टानि कृतवन्तो वनौकसाम् ॥
bhavanto bhrātaraḥ śūrāḥ sarva evāstrakovidāḥ | kulānyalpāvaśiṣṭāni kṛtavanto vanaukasām
आप सब भाई शूरवीर और अस्त्रविद्या में निपुण हैं; आपने वनवासी प्राणियों के कुलों को थोड़ा-सा ही शेष रहने दिया है।
श्लोक 7 (3.259.7)
बीजभूता वयं केचिदवशिष्टा महामते । विवर्धेमहि राजेन्द्र प्रसादात्ते युधिष्ठिर ॥
bījabhūtā vayaṃ kecidavaśiṣṭā mahāmate | vivardhemahi rājendra prasādātte yudhiṣṭhira
हे महामति! हम कुछ ही बीज के रूप में बचे हैं। हे राजेन्द्र युधिष्ठिर, आपकी कृपा से हम फिर से बढ़ सकें।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (3.259.8)
तान्वेपमानान्वित्रस्तान्बीजमात्रावशेषितान् । मृगान्दृष्ट्वा सुदुःखार्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
tānvepamānānvitrastānbījamātrāvaśeṣitān | mṛgāndṛṣṭvā suduḥkhārto dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
काँपते, डरे हुए और केवल बीज-मात्र बचे उन मृगों को देखकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हुए।
श्लोक 9 (3.259.9)
तांस्तथेत्यब्रवीद्राजा सर्वभूतहिते रतः । यथा भवन्तो ब्रुवते करिष्यामि च तत्तथा ॥
tāṃstathetyabravīdrājā sarvabhūtahite rataḥ | yathā bhavanto bruvate kariṣyāmi ca tattathā
सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले राजा ने उनसे कहा — "ऐसा ही हो। जैसा तुम कहते हो, मैं वैसा ही करूँगा।"
श्लोक 10 (3.259.10)
इत्येवं प्रतिबुद्धः स रात्र्यन्ते राजसत्तमः । अब्रवीत्सहितान्भ्रातॄन्दयापन्नो मृगान्प्रति ॥
ityevaṃ pratibuddhaḥ sa rātryante rājasattamaḥ | abravītsahitānbhrātṝndayāpanno mṛgānprati
इस प्रकार रात के अन्त में जागकर, मृगों के प्रति दया से भरे उस राजश्रेष्ठ ने एकत्र भाइयों से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 11 (3.259.11)
उक्तो रात्रौ मृगैरस्मि स्वप्नान्ते हतशेषितैः । तनुभूताः स्म भद्रं ते दया नः क्रियतामिति ॥
ukto rātrau mṛgairasmi svapnānte hataśeṣitaiḥ | tanubhūtāḥ sma bhadraṃ te dayā naḥ kriyatāmiti
"रात में स्वप्न के अन्त में शिकार से बचे मृगों ने मुझसे कहा — 'हम बहुत थोड़े रह गए हैं; आपका कल्याण हो, हम पर दया कीजिए।'
श्लोक 12 (3.259.12)
ते सत्यमाहुः कर्तव्या दयाऽस्माभिर्वनौकसाम् । साष्टमासं हि नो वर्षं यदेनानुपयुञ्ज्महे ॥
te satyamāhuḥ kartavyā dayā'smābhirvanaukasām | sāṣṭamāsaṃ hi no varṣaṃ yadenānupayuñjmahe
उन्होंने सच कहा है; हमें वनवासी प्राणियों पर दया करनी चाहिए। एक वर्ष और आठ महीने से हम इन्हीं पर निर्भर रहे हैं।
श्लोक 13 (3.259.13)
पुनर्बहुमृगं रम्यं काम्यकं काननोत्तमम् । तत्रेमां वसतिं शिष्टां विहरन्तो रमेमहि ॥
punarbahumṛgaṃ ramyaṃ kāmyakaṃ kānanottamam | tatremāṃ vasatiṃ śiṣṭāṃ viharanto ramemahi
चलो, हम फिर से बहुत-से मृगों वाले सुन्दर, श्रेष्ठ काम्यक वन में चलें; वहीं शेष वनवास का समय आनन्द से बिताएँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (3.259.14)
ततस्ते पाण्डवाः शीघ्रं प्रययुर्धर्मकोविदाः ॥
tataste pāṇḍavāḥ śīghraṃ prayayurdharmakovidāḥ
वैशम्पायन बोले — तब धर्म को जानने वाले पाण्डव शीघ्र चल पड़े,
श्लोक 15 (3.259.15)
ब्राह्मणैः सहिता राजन्ये च तत्रसहोषिताः । इन्द्रसेनादिभिश्चैव प्रेष्यैरनुगतास्तदा ॥
brāhmaṇaiḥ sahitā rājanye ca tatrasahoṣitāḥ | indrasenādibhiścaiva preṣyairanugatāstadā
हे राजन्! उन ब्राह्मणों के साथ जो वहाँ उनके साथ रहते थे, और इन्द्रसेन आदि सेवक उनके पीछे-पीछे चले।
श्लोक 16 (3.259.16)
ते यात्वा सुसुखैर्मार्गैः स्वन्नैः शुचिजलान्वितैः । ददृशुः काम्यकं पुण्यमाश्रमं तापसान्वितम् ॥
te yātvā susukhairmārgaiḥ svannaiḥ śucijalānvitaiḥ | dadṛśuḥ kāmyakaṃ puṇyamāśramaṃ tāpasānvitam
उत्तम अन्न और स्वच्छ जल से युक्त सुखद मार्गों से यात्रा करते हुए उन्होंने तपस्वियों से भरा पवित्र काम्यक आश्रम देखा।
श्लोक 17 (3.259.17)
विविशुस्ते स्म कौरव्या वृता विप्रर्षभैस्तदा । तद्वनं भरतश्रेष्ठाः स्वर्गं सुकृतिनो यथा ॥
viviśuste sma kauravyā vṛtā viprarṣabhaistadā | tadvanaṃ bharataśreṣṭhāḥ svargaṃ sukṛtino yathā
श्रेष्ठ ब्राह्मणों से घिरे हुए वे भरतश्रेष्ठ कुरुवंशी उस वन में ऐसे प्रविष्ट हुए जैसे पुण्यात्मा स्वर्ग में प्रवेश करते हैं।