आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 260
व्यास का पाण्डवों के पास आगमन और दान की प्रशंसा
वनवास के ग्यारहवें वर्ष में युधिष्ठिर द्यूत और भाइयों के कष्ट को सोचकर रातों को सो नहीं पाते। तब व्यास काम्यक वन में पाण्डवों के पास आते हैं और समझाते हैं कि सुख और दुःख बारी-बारी से आते हैं, तप से सब कुछ सिद्ध होता है, और सत्य, संयम तथा दान अपने-अपने फल देते हैं। दान और तप में कौन कठिन है, यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि परिश्रम से कमाया धन देने से बढ़कर कुछ भी कठिन नहीं; वे श्रद्धा की महिमा बताते हैं और मुद्गल के द्रोण-भर धान के दान की कथा आरम्भ करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.260.1)
वने निवसतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम् । वर्षाण्येकादशातीयुः कृच्छ्रेण भरतर्षभ ॥
vane nivasatāṃ teṣāṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | varṣāṇyekādaśātīyuḥ kṛcchreṇa bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! वन में रहते हुए उन महात्मा पाण्डवों के ग्यारह वर्ष बड़े कष्ट में बीत गए।
श्लोक 2 (3.260.2)
फलमूलाशनास्ते हि सुखार्हा दुःखमुत्तमम् । प्राप्तकालमनुध्यान्तः सेहिरे वरपूरुषाः ॥
phalamūlāśanāste hi sukhārhā duḥkhamuttamam | prāptakālamanudhyāntaḥ sehire varapūruṣāḥ
सुख भोगने के योग्य होते हुए भी वे श्रेष्ठ पुरुष फल-मूल खाकर रहते थे और आने वाले समय का ध्यान करते हुए घोर दुःख सहते रहे।
श्लोक 3 (3.260.3)
युधिष्ठिरस्तु राजर्षिरात्मकर्मापराधजम् । चिन्तयन्स महाबाहुर्भ्रातॄणां दुःखमुत्तमम् ॥
yudhiṣṭhirastu rājarṣirātmakarmāparādhajam | cintayansa mahābāhurbhrātṝṇāṃ duḥkhamuttamam
किन्तु महाबाहु राजर्षि युधिष्ठिर अपने भाइयों के उस भारी दुःख के विषय में सोचते रहते थे, जो उनके अपने ही कर्म के दोष से उत्पन्न हुआ था।
श्लोक 4 (3.260.4)
न सुष्वाप सुखं राजा हृदि शल्यैरिवार्पितैः । दौरात्म्यमनुपश्यंस्तत्काले द्यूतोद्भवस्य हि ॥
na suṣvāpa sukhaṃ rājā hṛdi śalyairivārpitaiḥ | daurātmyamanupaśyaṃstatkāle dyūtodbhavasya hi
राजा चैन से सो नहीं पाते थे; मानो उनके हृदय में काँटे गड़े हों, क्योंकि उस समय द्यूत से जो दुष्टता उपजी थी, वह उनकी आँखों के सामने घूमती रहती थी।
श्लोक 5 (3.260.5)
संस्मरन्परुषा वाचः सूतपुत्रस्य पाण्डवः । निःश्वासपरमो दीनो दध्रे कोपविषं महत् ॥
saṃsmaranparuṣā vācaḥ sūtaputrasya pāṇḍavaḥ | niḥśvāsaparamo dīno dadhre kopaviṣaṃ mahat
सूतपुत्र के कठोर वचनों को याद करके वे पाण्डव लम्बी साँसें लेते हुए दीन बने रहते और अपने भीतर क्रोध का भारी विष धारण किए रहते थे।
श्लोक 6 (3.260.6)
अर्जुनोयमजौ चोभौ द्रौपदी च यशस्विनी । स च भीमो महातेजाः सर्वेषामुत्तमो बले ॥
arjunoyamajau cobhau draupadī ca yaśasvinī | sa ca bhīmo mahātejāḥ sarveṣāmuttamo bale
अर्जुन, दोनों जुड़वाँ भाई, यशस्विनी द्रौपदी और सबसे अधिक बलवान महातेजस्वी भीम—
श्लोक 7 (3.260.7)
चिरस्य जातं धर्मज्ञं सासूयमिव ते तदा । युधिष्ठिरमुदीक्षन्तः सेहुर्दुःखमनुत्तमम् ॥
cirasya jātaṃ dharmajñaṃ sāsūyamiva te tadā | yudhiṣṭhiramudīkṣantaḥ sehurduḥkhamanuttamam
उस समय मानो कुछ रोष के साथ अपने ज्येष्ठ, धर्मज्ञ युधिष्ठिर की ओर देखते हुए वह अनुपम दुःख सहते रहे।
श्लोक 8 (3.260.8)
अवशिष्टं त्वल्पकालं मन्वानाः पुरुषर्षभाः । वपुरन्यदिवाकार्षुरुत्साहामर्षचेष्टितैः ॥
avaśiṣṭaṃ tvalpakālaṃ manvānāḥ puruṣarṣabhāḥ | vapuranyadivākārṣurutsāhāmarṣaceṣṭitaiḥ
यह सोचकर कि अब थोड़ा ही समय शेष है, वे पुरुषश्रेष्ठ उत्साह, अमर्ष और उद्यम से भरकर मानो दूसरा ही रूप धारण कर बैठे।
श्लोक 9 (3.260.9)
कस्यचित्त्वथ कालस्य व्यासः सत्यवतीसुतः । आजगाम महायोगी पाण्डवानवलोककः ॥
kasyacittvatha kālasya vyāsaḥ satyavatīsutaḥ | ājagāma mahāyogī pāṇḍavānavalokakaḥ
कुछ समय बाद सत्यवती के पुत्र महायोगी व्यास पाण्डवों से मिलने के लिए वहाँ आए।
श्लोक 10 (3.260.10)
तमागतमभिप्रेक्ष्यकुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । प्रत्युद्गम्य महात्मानं प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि ॥
tamāgatamabhiprekṣyakuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | pratyudgamya mahātmānaṃ pratyagṛhṇādyathāvidhi
उन्हें आया देखकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर उन महात्मा की अगवानी के लिए आगे बढ़े और विधिपूर्वक उनका स्वागत किया।
श्लोक 11 (3.260.11)
तमासीनमुपासीनः शुश्रूषुर्नियतेन्द्रियः । तोषयामास शौचेन व्यासं पाण्डवनन्दनः ॥
tamāsīnamupāsīnaḥ śuśrūṣurniyatendriyaḥ | toṣayāmāsa śaucena vyāsaṃ pāṇḍavanandanaḥ
जब व्यास आसन पर बैठ गए, तब पाण्डवों को आनन्द देने वाले युधिष्ठिर सेवा की इच्छा से, इन्द्रियों को वश में रखकर उनके पास बैठे और अपनी पवित्रता से उन्हें प्रसन्न किया।
श्लोक 12 (3.260.12)
तानवेक्ष्यकृशान्पौत्रान्वने वन्येन जीवतः । महर्षिरनुकम्पार्थमब्रवीद्बाष्पगद्गदम् ॥
tānavekṣyakṛśānpautrānvane vanyena jīvataḥ | maharṣiranukampārthamabravīdbāṣpagadgadam
वन में वन की उपज पर जीते हुए अपने पौत्रों को दुबला हुआ देखकर महर्षि करुणा से भर गए और आँसुओं से रुँधे कण्ठ से बोले—
व्यास उवाच
श्लोक 13 (3.260.13)
युधिष्ठिर महाबाहो शृणु धर्मभृतांवर । नातप्ततपसो लोके प्राप्नुवन्ति महत्सुखम् । सुखदुःखे हि पुरुषः पर्यायेणोपसेवते ॥
yudhiṣṭhira mahābāho śṛṇu dharmabhṛtāṃvara | nātaptatapaso loke prāpnuvanti mahatsukham | sukhaduḥkhe hi puruṣaḥ paryāyeṇopasevate
"हे महाबाहु युधिष्ठिर, धर्मधारियों में श्रेष्ठ, सुनो। इस संसार में जिन्होंने तप नहीं किया, वे महान सुख नहीं पाते। मनुष्य बारी-बारी से सुख और दुःख भोगता है।
श्लोक 14 (3.260.14)
नात्यन्तमसुखं कश्चित्प्राप्नोति पुरुषर्षभ । प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुषः संयुक्तः परया धिया ॥
nātyantamasukhaṃ kaścitprāpnoti puruṣarṣabha | prajñāvāṃstveva puruṣaḥ saṃyuktaḥ parayā dhiyā
हे पुरुषश्रेष्ठ, किसी को भी अनन्त दुःख नहीं मिलता। बुद्धिमान पुरुष, जो उत्तम विवेक से युक्त होता है,
श्लोक 15 (3.260.15)
उदयास्तमयज्ञो हि न हृष्यति न शोचति । सुखमापतितं विन्दन्दुःखमापतितं सहन् ॥
udayāstamayajño hi na hṛṣyati na śocati | sukhamāpatitaṃ vindanduḥkhamāpatitaṃ sahan
उदय और अस्त के तत्त्व को जानता है, इसलिए न हर्षित होता है न शोक करता है। जो सुख आ पड़े उसे स्वीकारते हुए और जो दुःख आ पड़े उसे सहते हुए,
श्लोक 16 (3.260.16)
कालप्राप्तमुपासीत सस्यानामिव कर्षकः । तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥
kālaprāptamupāsīta sasyānāmiva karṣakaḥ | tapaso hi paraṃ nāsti tapasā vindate mahat
उसे समय से जो प्राप्त हो उसकी वैसे ही प्रतीक्षा करनी चाहिए जैसे किसान अपनी फसल की करता है। तप से बढ़कर कुछ नहीं है; तप से ही महान पद प्राप्त होता है।
श्लोक 17 (3.260.17)
नासाध्यं तपसः किंचिदिति बुध्यस्व भारत । सत्यमार्जवमक्रोधः संविभागो दमः शमः ॥
nāsādhyaṃ tapasaḥ kiṃciditi budhyasva bhārata | satyamārjavamakrodhaḥ saṃvibhāgo damaḥ śamaḥ
हे भारत, यह जान लो कि तप के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। सत्य, सरलता, क्रोध का अभाव, बाँटकर भोगना, इन्द्रिय-दमन, मन की शान्ति,
श्लोक 18 (3.260.18)
अनसूयाऽविहिंसा च शौचमिन्द्रियसंयमः । साधनानि महाराज नराणां पुण्यकर्मणाम् ॥
anasūyā'vihiṃsā ca śaucamindriyasaṃyamaḥ | sādhanāni mahārāja narāṇāṃ puṇyakarmaṇām
ईर्ष्या का अभाव, अहिंसा, पवित्रता और इन्द्रियों पर संयम—हे महाराज, ये पुण्यकर्म करने वाले मनुष्यों के साधन हैं।
श्लोक 19 (3.260.19)
अधर्मरुचयो मूढास्तिर्यग्गतिपरायणाः । कृच्छ्रां योनिमनुप्राप्ता न सुखं विन्दते जनाः ॥
adharmarucayo mūḍhāstiryaggatiparāyaṇāḥ | kṛcchrāṃ yonimanuprāptā na sukhaṃ vindate janāḥ
अधर्म में रुचि रखने वाले और पशु-योनि की ओर बढ़ते मूढ़ लोग कष्टमय योनियों में जा पड़ते हैं; ऐसे लोग सुख नहीं पाते।
श्लोक 20 (3.260.20)
इह यत्क्रियते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते । मूलसिक्तस्य वृक्षस्य फलं शाखासु दृश्यते । तस्माच्छरीरं युञ्जीत तपसा नियमेन च ॥
iha yatkriyate karma tatparatropabhujyate | mūlasiktasya vṛkṣasya phalaṃ śākhāsu dṛśyate | tasmāccharīraṃ yuñjīta tapasā niyamena ca
यहाँ जो कर्म किया जाता है, उसका फल परलोक में भोगा जाता है। जड़ में सींचे गए वृक्ष का फल उसकी शाखाओं पर दिखाई देता है। इसलिए शरीर को तप और नियम में लगाना चाहिए।
श्लोक 21 (3.260.21)
यथाशक्ति प्रयच्छेत संपूज्याभिप्रणम्य च । काले प्राप्ते च हृष्टात्मा राजन्विगतमत्सरः ॥
yathāśakti prayaccheta saṃpūjyābhipraṇamya ca | kāle prāpte ca hṛṣṭātmā rājanvigatamatsaraḥ
हे राजन्, अपनी शक्ति के अनुसार, पात्र का सत्कार करके और उसे प्रणाम करके, उचित समय आने पर प्रसन्न मन से और ईर्ष्या से रहित होकर दान देना चाहिए।
श्लोक 22 (3.260.22)
सत्यवादी लभेतायुरनायासमथार्जवम् । अक्रोधनोऽनसूयश्च निर्वृतिं लभते पराम् ॥
satyavādī labhetāyuranāyāsamathārjavam | akrodhano'nasūyaśca nirvṛtiṃ labhate parām
सत्य बोलने वाला दीर्घ आयु, क्लेश से मुक्ति और सरलता पाता है; क्रोध और ईर्ष्या से रहित मनुष्य परम शान्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 23 (3.260.23)
दान्तः शमपरः शश्वत्परिक्लेशं न विन्दति । न च तप्यति दान्तात्मा दृष्ट्वा परगतां श्रियम् ॥
dāntaḥ śamaparaḥ śaśvatparikleśaṃ na vindati | na ca tapyati dāntātmā dṛṣṭvā paragatāṃ śriyam
संयमी और सदा शान्ति में लगा रहने वाला मनुष्य क्लेश नहीं पाता; जिसने मन को वश में कर लिया है, वह दूसरे की समृद्धि देखकर नहीं जलता।
श्लोक 24 (3.260.24)
संविभक्ता च दाता च भोगवान्सुखवान्नरः । भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्नुते ॥
saṃvibhaktā ca dātā ca bhogavānsukhavānnaraḥ | bhavatyahiṃsakaścaiva paramārogyamaśnute
जो मनुष्य बाँटकर खाता है और दान देता है, वह भोग और सुख से सम्पन्न होता है; और जो हिंसा नहीं करता, वह उत्तम आरोग्य पाता है।
श्लोक 25 (3.260.25)
मान्यं मानयिता जन्म कुले महति विन्दति । विन्दते सुखमत्यर्थमिह लोके परत्र च । व्यसनैर्न तुसंयोगं प्राप्नोति विजितेन्द्रियः ॥
mānyaṃ mānayitā janma kule mahati vindati | vindate sukhamatyarthamiha loke paratra ca | vyasanairna tusaṃyogaṃ prāpnoti vijitendriyaḥ
आदरणीय लोगों का आदर करने वाला महान कुल में जन्म पाता है और इस लोक तथा परलोक में अत्यधिक सुख पाता है; और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, उस पर विपत्तियाँ नहीं आतीं।
श्लोक 26 (3.260.26)
शुभानुशयबुद्धिर्हि संयुक्तः कालधर्मणा । प्रादुर्भवति तद्योगात्कल्याणमतिरेव सः ॥
śubhānuśayabuddhirhi saṃyuktaḥ kāladharmaṇā | prādurbhavati tadyogātkalyāṇamatireva saḥ
जिसकी बुद्धि शुभ की ओर झुकी रहती है, वह मृत्यु को प्राप्त होकर उसी संस्कार के योग से फिर कल्याणमयी बुद्धि वाला होकर जन्म लेता है।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 27 (3.260.27)
भगवन्दानधर्माणां तपसो वा महामुने । किंस्विद्बहुगुणं प्रेत्य किं वा दुष्करमुच्यते ॥
bhagavandānadharmāṇāṃ tapaso vā mahāmune | kiṃsvidbahuguṇaṃ pretya kiṃ vā duṣkaramucyate
"भगवन्, हे महामुने! दान-धर्म और तप में से मृत्यु के बाद किसका फल अधिक होता है, और कौन अधिक कठिन कहा जाता है?"
व्यास उवाच
श्लोक 28 (3.260.28)
दानान्न दुष्करं तात पृथिव्यामस्ति किंचन । अर्थे च महती तृष्णा स च दुःखेन लभ्यते ॥
dānānna duṣkaraṃ tāta pṛthivyāmasti kiṃcana | arthe ca mahatī tṛṣṇā sa ca duḥkhena labhyate
"हे तात, पृथ्वी पर दान से अधिक कठिन कुछ भी नहीं है। धन के प्रति मनुष्य की तृष्णा बड़ी होती है, और धन बड़े कष्ट से मिलता है।
श्लोक 29 (3.260.29)
राजन्प्रत्यक्षमेवैतद्दृश्यते लोकसाक्षिकम् । परित्यज्य प्रियान्प्राणान्प्रविशन्ति रणाजिरम् । तथैव प्रतिपद्यन्ते समुद्रमटवीं तथा ॥
rājanpratyakṣamevaitaddṛśyate lokasākṣikam | parityajya priyānprāṇānpraviśanti raṇājiram | tathaiva pratipadyante samudramaṭavīṃ tathā
हे राजन्, यह तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, सारा संसार इसका साक्षी है: लोग अपने प्यारे प्राणों की परवाह छोड़कर रणभूमि में उतर पड़ते हैं, और इसी प्रकार समुद्र और वन में भी जा घुसते हैं।
श्लोक 30 (3.260.30)
कृषिगोरक्ष्यमित्येके प्रतिपद्यन्ति मानवाः । पुरुषाः प्रेष्यतामेके निर्गच्छन्ति धनार्थिनः ॥
kṛṣigorakṣyamityeke pratipadyanti mānavāḥ | puruṣāḥ preṣyatāmeke nirgacchanti dhanārthinaḥ
कुछ लोग खेती और पशुपालन अपनाते हैं, और कुछ धन की चाह में घर से निकलकर दूसरों की सेवा करते हैं।
श्लोक 31 (3.260.31)
तस्माद्दुःखार्जितस्यैव परित्यागः सुदुष्करः । सुदुष्करतरं दानं तस्माद्दानं मतं मम ॥
tasmādduḥkhārjitasyaiva parityāgaḥ suduṣkaraḥ | suduṣkarataraṃ dānaṃ tasmāddānaṃ mataṃ mama
इसलिए दुःख से कमाए धन का त्याग अत्यन्त कठिन है। दान सबसे कठिन से भी कठिन है; इसीलिए मैं दान को श्रेष्ठ मानता हूँ।
श्लोक 32 (3.260.32)
विशेषस्त्वत्र विज्ञेयो न्यायेनोपार्जितं धनम् । पात्रे काले च देशे च प्रयतः प्रतिपादयेत् ॥
viśeṣastvatra vijñeyo nyāyenopārjitaṃ dhanam | pātre kāle ca deśe ca prayataḥ pratipādayet
किन्तु यहाँ एक विशेष बात जाननी चाहिए: न्याय से कमाया हुआ धन ही सावधानी के साथ योग्य पात्र को, उचित समय और उचित स्थान पर देना चाहिए।
श्लोक 33 (3.260.33)
अन्यायात्समुपात्तेन दानधर्मौ धनेन यः । कुरुते न स कर्तारं त्रायते महतो भयात् ॥
anyāyātsamupāttena dānadharmau dhanena yaḥ | kurute na sa kartāraṃ trāyate mahato bhayāt
जो अन्याय से प्राप्त धन से दान और धर्म करता है, वह (धर्म) उस कर्ता को बड़े भय से नहीं बचाता।
श्लोक 34 (3.260.34)
पात्रे दानं स्वल्पमपि काले दत्तं युधिष्ठिर । मनसा हि विशुद्धेन प्रेत्यानन्तफलं स्मृतम् ॥
pātre dānaṃ svalpamapi kāle dattaṃ yudhiṣṭhira | manasā hi viśuddhena pretyānantaphalaṃ smṛtam
हे युधिष्ठिर, योग्य पात्र को उचित समय पर शुद्ध मन से दिया गया दान थोड़ा-सा भी हो, तो मृत्यु के बाद उसका अनन्त फल बताया गया है।
श्लोक 35 (3.260.35)
श्रद्धा धर्मानुगा देवी पावनी विश्वधारिणी । सवित्री प्रसवित्री च संसारार्णवतारिणी ॥
śraddhā dharmānugā devī pāvanī viśvadhāriṇī | savitrī prasavitrī ca saṃsārārṇavatāriṇī
श्रद्धा धर्म का अनुसरण करने वाली देवी है; वह पवित्र करने वाली और विश्व को धारण करने वाली है। वही जननी और उत्पन्न करने वाली है और संसार-सागर से पार उतारती है।
श्लोक 36 (3.260.36)
श्रद्धया धार्यते धर्मो महद्भिर्नार्थदर्शिभिः । सधना अपिराजानो निःश्रद्धा नरकं गताः ॥
śraddhayā dhāryate dharmo mahadbhirnārthadarśibhiḥ | sadhanā apirājāno niḥśraddhā narakaṃ gatāḥ
धर्म श्रद्धा से धारण किया जाता है—महान लोगों द्वारा, धन पर दृष्टि रखने वालों द्वारा नहीं। धनवान होकर भी श्रद्धाहीन राजा नरक में गए हैं,
श्लोक 37 (3.260.37)
निष्किंचनाश्च मुनयः श्रद्धावन्तो दिवं गताः । देशे काले च पात्रे च मुद्गलः श्रद्धयाऽन्वितः । व्रीहिद्रोणं प्रदायाथ परं पदमवाप्तवान् ॥
niṣkiṃcanāśca munayaḥ śraddhāvanto divaṃ gatāḥ | deśe kāle ca pātre ca mudgalaḥ śraddhayā'nvitaḥ | vrīhidroṇaṃ pradāyātha paraṃ padamavāptavān
जबकि अकिंचन मुनि श्रद्धावान होने के कारण स्वर्ग गए हैं। श्रद्धा से युक्त मुद्गल ने उचित देश, काल और पात्र में एक द्रोण धान का दान करके परम पद प्राप्त किया।
श्लोक 38 (3.260.38)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । व्रीहिद्रोणपरित्यागाद्यत्फलं प्राप मुद्गलः ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | vrīhidroṇaparityāgādyatphalaṃ prāpa mudgalaḥ
इस विषय में यह प्राचीन इतिहास सुनाया जाता है कि एक द्रोण धान का त्याग करके मुद्गल ने कौन-सा फल पाया।"