आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 261
दुर्वासा द्वारा मुद्गल की परीक्षा
व्यास युधिष्ठिर को कुरुक्षेत्र के मुद्गल की कथा सुनाते हैं, जो शिलोञ्छ-वृत्ति से पत्नी और पुत्र के साथ हर पखवाड़े एक द्रोण धान बटोरकर जीते थे, और अतिथियों को खिलाने पर वह अन्न बढ़ता जाता था। दिगम्बर, उन्मत्त-से दिखने वाले मुनि दुर्वासा लगातार छह पर्वों पर आकर सारा अन्न खा गए, फिर भी मुद्गल के मन में न क्रोध आया, न ईर्ष्या। प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उनके दान की प्रशंसा की और कहा कि वे सशरीर स्वर्ग जाएँगे; तभी एक देवदूत दिव्य विमान लेकर आया, और मुद्गल ने पहले उससे स्वर्ग के गुण और दोष बताने को कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (3.261.1)
व्रीहिद्रोणः परित्यक्तः कथं तेन महात्मना । कस्मै दत्तश्च भगवन्विधिना केन चात्थ मे ॥
vrīhidroṇaḥ parityaktaḥ kathaṃ tena mahātmanā | kasmai dattaśca bhagavanvidhinā kena cāttha me
"भगवन्, उन महात्मा ने एक द्रोण धान का त्याग कैसे किया? वह किसे दिया गया और किस विधि से? यह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (3.261.2)
प्रत्यक्षधर्मा भगवान्यस्य तुष्टो हि कर्मभिः । सफलं तस्य जन्माहं मन्ये सद्धर्मचारिणः ॥
pratyakṣadharmā bhagavānyasya tuṣṭo hi karmabhiḥ | saphalaṃ tasya janmāhaṃ manye saddharmacāriṇaḥ
जिस सद्धर्म का आचरण करने वाले के कर्मों से धर्म को प्रत्यक्ष देखने वाले भगवान् प्रसन्न होते हैं, मैं उसका जन्म सफल मानता हूँ।"
व्यास उवाच
श्लोक 3 (3.261.3)
शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा मुद्गलः संयतेन्द्रियः । आसीद्राजन्कुरुक्षेत्रे सत्यवागनसूयकः ॥
śiloñchavṛttirdharmātmā mudgalaḥ saṃyatendriyaḥ | āsīdrājankurukṣetre satyavāganasūyakaḥ
हे राजन्, कुरुक्षेत्र में मुद्गल नाम के एक धर्मात्मा रहते थे, जो खेतों में गिरे दाने और बालें बीनकर जीविका चलाते थे; वे जितेन्द्रिय, सत्यवादी और ईर्ष्या से रहित थे।
श्लोक 4 (3.261.4)
अतिथिव्रती क्रियावांश्च कापोतीं वृत्तिमास्थितः । सत्रमिष्टीकृतंनाम समुपास्ते महातपाः ॥
atithivratī kriyāvāṃśca kāpotīṃ vṛttimāsthitaḥ | satramiṣṭīkṛtaṃnāma samupāste mahātapāḥ
वे अतिथि-सेवा का व्रत लेने वाले और कर्मनिष्ठ थे, और कबूतर की भाँति संग्रह न करने की वृत्ति अपनाए हुए थे; वह महातपस्वी इष्टीकृत नामक सत्र का अनुष्ठान करते थे।
श्लोक 5 (3.261.5)
सपुत्रदारो हि मुनिः पक्षाहारो बभूव ह । कपोतवृत्त्या पक्षेण व्रीहिद्रोणमुपार्जयत् ॥
saputradāro hi muniḥ pakṣāhāro babhūva ha | kapotavṛttyā pakṣeṇa vrīhidroṇamupārjayat
वह मुनि पत्नी और पुत्र सहित पखवाड़े में एक बार भोजन करते थे; कबूतर की-सी वृत्ति से वे एक पखवाड़े में एक द्रोण धान इकट्ठा कर लेते थे।
श्लोक 6 (3.261.6)
दर्शं च पौर्णमासं च कुर्वन्विगतमत्सरः । देवतातिथिशेषेण कुरुते देहयापनम् ॥
darśaṃ ca paurṇamāsaṃ ca kurvanvigatamatsaraḥ | devatātithiśeṣeṇa kurute dehayāpanam
ईर्ष्या से रहित होकर वे अमावस्या और पूर्णिमा के यज्ञ करते थे, और देवताओं तथा अतिथियों को देने के बाद जो बचता, उसी से अपने शरीर का निर्वाह करते थे।
श्लोक 7 (3.261.7)
तत्रेन्द्रः सहितो देवैः साक्षात्त्रिभुवनेश्वरः । प्रत्यगृह्णान्महाराज भागं पर्वणिपर्वणि ॥
tatrendraḥ sahito devaiḥ sākṣāttribhuvaneśvaraḥ | pratyagṛhṇānmahārāja bhāgaṃ parvaṇiparvaṇi
हे महाराज, वहाँ स्वयं त्रिलोकी के स्वामी इन्द्र देवताओं के साथ प्रत्येक पर्व पर अपना भाग ग्रहण करते थे।
श्लोक 8 (3.261.8)
स पर्वकाल्यं कृत्वा तु मुनिवृत्त्या समन्वितः । अतिथिभ्यो ददावन्नं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥
sa parvakālyaṃ kṛtvā tu munivṛttyā samanvitaḥ | atithibhyo dadāvannaṃ prahṛṣṭenāntarātmanā
पर्व का कर्म पूरा करके, मुनि-वृत्ति में स्थित रहते हुए, वे प्रसन्न मन से अतिथियों को अन्न देते थे।
श्लोक 9 (3.261.9)
व्रीहिद्रोणस्य तत्प्रीत्या ददतोऽन्नं महात्मनः । ऋषेर्मात्सर्यहीनस्य वर्धत्यतिथिदर्शनात् ॥
vrīhidroṇasya tatprītyā dadato'nnaṃ mahātmanaḥ | ṛṣermātsaryahīnasya vardhatyatithidarśanāt
ईर्ष्या से रहित वे महात्मा ऋषि जब प्रेमपूर्वक उस द्रोण-भर धान से अन्न देते, तो अतिथियों को देखते ही वह बढ़ जाता था।
श्लोक 10 (3.261.10)
तच्छतान्यपि भुञ्जन्ति ब्राह्मणानां मनीषिणाम् । मुनेस्त्यागविशुद्ध्या तु तदन्नं वृद्धिमृच्छति ॥
tacchatānyapi bhuñjanti brāhmaṇānāṃ manīṣiṇām | munestyāgaviśuddhyā tu tadannaṃ vṛddhimṛcchati
उसमें से सैकड़ों विद्वान ब्राह्मण भी भोजन करते थे, और मुनि के त्याग की शुद्धता से वह अन्न बढ़ता ही जाता था।
श्लोक 11 (3.261.11)
तं तु शुश्राव धर्मिष्ठं मुद्गलं संशितव्रतम् । दुर्वासा नृप दिग्वासास्तमथाभ्याजगाम ह ॥
taṃ tu śuśrāva dharmiṣṭhaṃ mudgalaṃ saṃśitavratam | durvāsā nṛpa digvāsāstamathābhyājagāma ha
हे राजन्, दिगम्बर मुनि दुर्वासा ने कठोर व्रत वाले धर्मनिष्ठ मुद्गल के विषय में सुना और उनके पास आए।
श्लोक 12 (3.261.12)
बिभ्रच्चानियतं वेषमुन्मत्त इव पाण्डव । विकचः परुषा वाचो व्याहरन्विविधा मुनिः ॥
bibhraccāniyataṃ veṣamunmatta iva pāṇḍava | vikacaḥ paruṣā vāco vyāharanvividhā muniḥ
हे पाण्डव, वह मुनि पागल की भाँति कोई नियत वेश धारण किए बिना, मुँडे सिर, तरह-तरह के कठोर वचन बोलते हुए आए।
श्लोक 13 (3.261.13)
अभिगम्याथ तं विप्रमुवाच मुनिसत्तमः । अन्नार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां मुनिसत्तम ॥
abhigamyātha taṃ vipramuvāca munisattamaḥ | annārthinamanuprāptaṃ viddhi māṃ munisattama
उस ब्राह्मण के पास जाकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा बोले—"हे मुनिश्रेष्ठ, जान लो कि मैं अन्न की इच्छा से यहाँ आया हूँ।"
श्लोक 14 (3.261.14)
स्वागतं तेऽस्त्विति मुनिं मुद्गलः प्रत्यभाषत । पाद्यमाचमनीयं च प्रतिवेद्यान्नमुत्तमम् ॥
svāgataṃ te'stviti muniṃ mudgalaḥ pratyabhāṣata | pādyamācamanīyaṃ ca prativedyānnamuttamam
"आपका स्वागत है," मुद्गल ने मुनि से कहा; और पैर धोने तथा आचमन के लिए जल देकर तथा उत्तम भोजन निवेदित करके,
श्लोक 15 (3.261.15)
प्रादात्स तपसोपात्तं क्षुधितायातिथिप्रियः । उन्मत्ताय परां श्रद्धामास्थाय स धृतव्रतः ॥
prādātsa tapasopāttaṃ kṣudhitāyātithipriyaḥ | unmattāya parāṃ śraddhāmāsthāya sa dhṛtavrataḥ
अतिथियों से प्रेम करने वाले उस दृढ़व्रती ने तप से अर्जित वह अन्न परम श्रद्धा के साथ उस भूखे उन्मत्त को दे दिया।
श्लोक 16 (3.261.16)
ततस्तदन्नं रसवत्स एव क्षुधयाऽन्वितः । बुभुजे कृत्स्नमुन्मत्तः प्रादात्तस्मै च मुद्गलः ॥
tatastadannaṃ rasavatsa eva kṣudhayā'nvitaḥ | bubhuje kṛtsnamunmattaḥ prādāttasmai ca mudgalaḥ
तब भूख से व्याकुल उस उन्मत्त ने वह सारा स्वादिष्ट अन्न खा डाला, और मुद्गल उसे परोसते रहे।
श्लोक 17 (3.261.17)
भुक्त्वा चान्नं ततः सर्वमुच्छिष्टेनात्मनस्ततः । अथाङ्गं लिलिपेऽन्नेन यथागतमगाच्च सः ॥
bhuktvā cānnaṃ tataḥ sarvamucchiṣṭenātmanastataḥ | athāṅgaṃ lilipe'nnena yathāgatamagācca saḥ
सारा अन्न खा लेने के बाद उसने अपने जूठे अन्न से अपने अंगों पर लेप किया और जैसे आया था वैसे ही चला गया।
श्लोक 18 (3.261.18)
तेनैवात्मानमालिप्य हसन्गायन्प्रधावति । नृत्यते धावते चैव बुद्ध्या तत्क्रोशते तथा ॥
tenaivātmānamālipya hasangāyanpradhāvati | nṛtyate dhāvate caiva buddhyā tatkrośate tathā
उसी से अपने शरीर पर लेप करके वह हँसता-गाता दौड़ता फिरा; वह नाचता, दौड़ता और जान-बूझकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता था।
श्लोक 19 (3.261.19)
एवं द्वितीये संप्राप्ते पर्वकाले मनीषिणः । आगम्य बुभुजे सर्वमन्नमुञ्छोपजीविनः ॥
evaṃ dvitīye saṃprāpte parvakāle manīṣiṇaḥ | āgamya bubhuje sarvamannamuñchopajīvinaḥ
इसी प्रकार जब अगला पर्व आया, तब वह फिर आया और शिलोञ्छ से जीने वाले उस मनीषी का सारा अन्न खा गया।
श्लोक 20 (3.261.20)
निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जयते पुनः । न चैनं विक्रियां नेतुमशकन्मुद्गलं क्षुधा ॥
nirāhārastu sa muniruñchamārjayate punaḥ | na cainaṃ vikriyāṃ netumaśakanmudgalaṃ kṣudhā
मुनि बिना भोजन किए फिर से दाने बीनने लगे; भूख मुद्गल को विचलित नहीं कर सकी।
श्लोक 21 (3.261.21)
न क्रोधो न च मात्सर्यं नावमानो न संभ्रमः । सपुत्रदारमुञ्छन्तमाविवेश द्विजोत्तमम् ॥
na krodho na ca mātsaryaṃ nāvamāno na saṃbhramaḥ | saputradāramuñchantamāviveśa dvijottamam
पत्नी और पुत्र के साथ दाने बीनते उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के मन में न क्रोध आया, न ईर्ष्या, न अपमान का भाव, न घबराहट।
श्लोक 22 (3.261.22)
तथा तमुञ्छधर्माणं दुर्वासा मुनिसत्तमम् । उपतस्थे यथाकालं षट्कृत्वः कृतनिश्चयः ॥
tathā tamuñchadharmāṇaṃ durvāsā munisattamam | upatasthe yathākālaṃ ṣaṭkṛtvaḥ kṛtaniścayaḥ
इस प्रकार दृढ़ निश्चय वाले दुर्वासा शिलोञ्छ-धर्म का पालन करने वाले उस मुनिश्रेष्ठ के पास ठीक समय पर छह बार पहुँचे।
श्लोक 23 (3.261.23)
न चास्य मनसः कश्चिद्विकारो दृश्यते मुनेः । शुद्धसत्वस्य शुद्धं स ददृशे निर्मलं मनः ॥
na cāsya manasaḥ kaścidvikāro dṛśyate muneḥ | śuddhasatvasya śuddhaṃ sa dadṛśe nirmalaṃ manaḥ
उस मुनि के मन में कोई विकार दिखाई नहीं दिया; दुर्वासा ने उस शुद्ध स्वभाव वाले का शुद्ध और निर्मल मन देखा।
श्लोक 24 (3.261.24)
तमुवाच ततः प्रीतः स मुनिर्मुद्गलं तदा । त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन्दाता मात्सर्यवर्जितः ॥
tamuvāca tataḥ prītaḥ sa munirmudgalaṃ tadā | tvatsamo nāsti loke'smindātā mātsaryavarjitaḥ
तब प्रसन्न होकर वह मुनि मुद्गल से बोले—"इस संसार में तुम्हारे समान ईर्ष्या से रहित कोई दाता नहीं है।
दुर्वासा उवाच
श्लोक 25 (3.261.25)
क्षुद्धर्मसंज्ञां प्रणुदत्यादत्ते धैर्यमेव च । विषयानुसारिणी जिह्वा कर्षत्येव रसान्प्रति ॥
kṣuddharmasaṃjñāṃ praṇudatyādatte dhairyameva ca | viṣayānusāriṇī jihvā karṣatyeva rasānprati
भूख धर्म की चेतना को दूर कर देती है और धैर्य को हर लेती है; विषयों के पीछे दौड़ने वाली जीभ मनुष्य को स्वादों की ओर खींचती है।
श्लोक 26 (3.261.26)
आहारप्रभवाः प्राणा मनो दुर्निग्रहं चलम् । मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्र्यं निश्चितं तपः ॥
āhāraprabhavāḥ prāṇā mano durnigrahaṃ calam | manasaścendriyāṇāṃ cāpyaikāgryaṃ niścitaṃ tapaḥ
प्राण आहार से ही चलते हैं, और मन चंचल तथा कठिनाई से वश में होने वाला है; मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही निश्चित रूप से तप है।
श्लोक 27 (3.261.27)
श्रमेणोपार्जितं त्यक्तं न च दुःखेन चेतसा । तत्सर्वं भवता साधो यथावदुपपादितम् ॥
śrameṇopārjitaṃ tyaktaṃ na ca duḥkhena cetasā | tatsarvaṃ bhavatā sādho yathāvadupapāditam
परिश्रम से कमाई वस्तु का त्याग करना, और वह भी दुःखी मन से नहीं—हे साधु, यह सब तुमने ठीक-ठीक कर दिखाया है।
श्लोक 28 (3.261.28)
प्रीताः स्मोऽनुगृहीताश्च समेत्य भवता सह । इन्द्रियाभिजयो धैर्यं संविभागो दमः शमः । दया सत्यं च धर्मश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
prītāḥ smo'nugṛhītāśca sametya bhavatā saha | indriyābhijayo dhairyaṃ saṃvibhāgo damaḥ śamaḥ | dayā satyaṃ ca dharmaśca tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam
तुमसे मिलकर हम प्रसन्न और अनुगृहीत हुए हैं। इन्द्रियों पर विजय, धैर्य, बाँटकर भोगना, दम, शम, दया, सत्य और धर्म—ये सब तुम में प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 29 (3.261.29)
लोकाः समस्ता धर्मेण धार्यन्ते सचराचराः । धर्मोपि धार्यते येन धृतियुक्त त्वयाऽऽत्मना ॥
lokāḥ samastā dharmeṇa dhāryante sacarācarāḥ | dharmopi dhāryate yena dhṛtiyukta tvayā''tmanā
चर-अचर सहित समस्त लोक धर्म से धारण किए जाते हैं, और हे धैर्यवान, धर्म को भी तुम अपने आत्मबल से धारण किए हुए हो।
श्लोक 30 (3.261.30)
विशुद्धसत्वसंपन्नो न त्वदन्योस्ति कश्चन । जितास्ते कर्मभिर्लोकाः प्राप्तोसि परमां गतिम् ॥
viśuddhasatvasaṃpanno na tvadanyosti kaścana | jitāste karmabhirlokāḥ prāptosi paramāṃ gatim
विशुद्ध सत्त्व से सम्पन्न तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है। तुमने अपने कर्मों से लोकों को जीत लिया है और परम गति पा ली है।
श्लोक 31 (3.261.31)
अहो दानं विघुष्टं ते सुमहत्स्वर्गवासिभिः । सशरीरो भवान्गन्ता स्वर्गं सुचरितव्रत ॥
aho dānaṃ vighuṣṭaṃ te sumahatsvargavāsibhiḥ | saśarīro bhavāngantā svargaṃ sucaritavrata
अहा! स्वर्गवासियों ने तुम्हारे दान की बड़ी घोषणा की है। हे उत्तम व्रत वाले, तुम सशरीर स्वर्ग जाओगे।"
व्यास उवाच
श्लोक 32 (3.261.32)
इत्येवं वदतस्तस्य तदा दुर्वाससो मुनेः । देवदूतो विमानेन मुद्गलं प्रत्युपस्थितः ॥
ityevaṃ vadatastasya tadā durvāsaso muneḥ | devadūto vimānena mudgalaṃ pratyupasthitaḥ
मुनि दुर्वासा अभी ऐसा कह ही रहे थे कि एक देवदूत विमान लेकर मुद्गल के पास आ पहुँचा।
श्लोक 33 (3.261.33)
हंससारसयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना । कामगेन विचित्रेण दिव्यगन्धवता तथा ॥
haṃsasārasayuktena kiṅkiṇījālamālinā | kāmagena vicitreṇa divyagandhavatā tathā
वह विमान हंसों और सारसों से जुता हुआ, घुँघरुओं की जालियों से सजा, इच्छानुसार चलने वाला, विचित्र और दिव्य सुगन्ध से युक्त था।
श्लोक 34 (3.261.34)
उवाच चैनं विप्रर्षिं विमानं कर्मभिर्जितम् । समुपारोह संसिद्धिं प्राप्तोसि परमां मुने ॥
uvāca cainaṃ viprarṣiṃ vimānaṃ karmabhirjitam | samupāroha saṃsiddhiṃ prāptosi paramāṃ mune
देवदूत ने उस ब्रह्मर्षि से कहा—"अपने कर्मों से जीते हुए इस विमान पर चढ़िए। हे मुने, आपने परम सिद्धि प्राप्त कर ली है।"
श्लोक 35 (3.261.35)
तमेवंवादिनमृषिर्देवदूतमुवाच ह । इच्छामि भवता प्रोक्तान्गुणान्स्वर्गनिवासिनां ॥
tamevaṃvādinamṛṣirdevadūtamuvāca ha | icchāmi bhavatā proktānguṇānsvarganivāsināṃ
ऐसा कहने वाले देवदूत से ऋषि ने कहा—"मैं आपके मुख से स्वर्ग में रहने वालों के गुण सुनना चाहता हूँ।
मुद्गल उवाच
श्लोक 36 (3.261.36)
के गुणास्तत्रवसतां किं तपः कश्च निश्चयः । स्वर्गे तत्रसुखं किं च दोषो वा देवदूतक ॥
ke guṇāstatravasatāṃ kiṃ tapaḥ kaśca niścayaḥ | svarge tatrasukhaṃ kiṃ ca doṣo vā devadūtaka
हे देवदूत, वहाँ रहने वालों के क्या गुण हैं? उनका तप क्या है और उनका निश्चय क्या है? स्वर्ग में क्या सुख है और क्या दोष है?
श्लोक 37 (3.261.37)
सतां साप्तपदं मित्रमाहुः सन्तः कुलोचिताः । मित्रतां च पुरस्कृत्य पृच्छामि त्वामहं विभो ॥
satāṃ sāptapadaṃ mitramāhuḥ santaḥ kulocitāḥ | mitratāṃ ca puraskṛtya pṛcchāmi tvāmahaṃ vibho
कुलीन सज्जन कहते हैं कि सत्पुरुषों की मित्रता सात पग साथ चलने से हो जाती है। उसी मित्रता को आगे रखकर, हे प्रभो, मैं आपसे पूछता हूँ।
श्लोक 38 (3.261.38)
यदत्र तथ्यं पथ्यं च तद्ब्रवीह्यविचारयन् । श्रुत्वा तथा करिष्यामि व्यवसायं गिरा तव ॥
yadatra tathyaṃ pathyaṃ ca tadbravīhyavicārayan | śrutvā tathā kariṣyāmi vyavasāyaṃ girā tava
इस विषय में जो सत्य और हितकर हो, वह बिना संकोच मुझे बताइए। उसे सुनकर मैं आपके वचन के अनुसार अपना निश्चय करूँगा।"