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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 262

मुद्गल का स्वर्ग से विमुख होना

देवदूत मुद्गल को स्वर्ग का वर्णन सुनाता है—उसके लोक, स्वर्णमय मेरु और नन्दन वन, भूख, बुढ़ापे और शोक से रहित तेजोमय शरीर, और उनसे भी ऊपर ब्रह्मा तथा ऋभुओं के लोक। परन्तु वहाँ पुण्य केवल भोगा जाता है, नया अर्जित नहीं होता, और अन्त में कष्टदायक पतन होता है; ब्रह्मलोक से ऊपर विष्णु का निर्दोष परम पद है, जहाँ केवल ममता-रहित ध्यानयोगी पहुँचते हैं। मुद्गल देवदूत को लौटा देते हैं, शिलोञ्छ-वृत्ति छोड़कर ध्यान में लीन होते हैं और निर्वाण-रूप परम सिद्धि पाते हैं। व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि शोक न करें, क्योंकि सुख-दुःख पहिये के अरों की भाँति घूमते हैं और तेरहवें वर्ष के बाद उन्हें राज्य मिलेगा; फिर वे अपने आश्रम लौट जाते हैं।

अध्याय 261अध्याय-सूचीअध्याय 263

देवदूत उवाच

श्लोक 1 (3.262.1)

महर्षेऽकार्यबुद्धिस्त्वं यः स्वर्गसुखमुत्तमम् । संप्राप्तं प्रतिपत्तव्यं विमृशस्यबुधो यथा ॥

maharṣe'kāryabuddhistvaṃ yaḥ svargasukhamuttamam | saṃprāptaṃ pratipattavyaṃ vimṛśasyabudho yathā

"हे महर्षि, आपकी बुद्धि ठीक निर्णय नहीं कर रही; आप किसी अज्ञानी की भाँति स्वर्ग के उस उत्तम सुख पर विचार कर रहे हैं जो आपको प्राप्त हो चुका है और जिसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

श्लोक 2 (3.262.2)

उपरिष्टादयं लोको योऽयं स्वरिति संज्ञितः । ऊर्ध्वगः सत्पथः शश्वद्देवयानचरो मुने ॥

upariṣṭādayaṃ loko yo'yaṃ svariti saṃjñitaḥ | ūrdhvagaḥ satpathaḥ śaśvaddevayānacaro mune

हे मुने, यह जो स्वः नाम का लोक है, वह ऊपर स्थित है; वह ऊँचाई पर, सज्जनों का मार्ग, सनातन और देवताओं के विमानों से विचरण किया जाने वाला है।

श्लोक 3 (3.262.3)

नातप्ततपसः पुंसो नामहायज्ञयाजिनः । नानृता नास्तिकाश्चैव तत्रगच्छन्ति मुद्गल ॥

nātaptatapasaḥ puṃso nāmahāyajñayājinaḥ | nānṛtā nāstikāścaiva tatragacchanti mudgala

हे मुद्गल, जिन्होंने तप नहीं किया, जिन्होंने बड़े यज्ञ नहीं किए, ऐसे लोग, और असत्यवादी तथा नास्तिक वहाँ नहीं जाते।

श्लोक 4 (3.262.4)

धर्मात्मानो जितात्मानः शान्ता दान्ता विमत्सराः । दानधर्मरताः पुंसः शूराश्चाहितलक्षणाः ॥

dharmātmāno jitātmānaḥ śāntā dāntā vimatsarāḥ | dānadharmaratāḥ puṃsaḥ śūrāścāhitalakṣaṇāḥ

धर्मात्मा, आत्मजयी, शान्त, संयमी, ईर्ष्या से रहित, दान-धर्म में लगे हुए पुरुष और युद्ध के चिह्न धारण करने वाले शूरवीर

श्लोक 5 (3.262.5)

तत्रगच्छन्ति धर्माग्र्यं कृत्वा शमदमात्मकम् । लोकान्पुण्यकृतां ब्रह्मन्सद्भिराचरितान्नृभिः ॥

tatragacchanti dharmāgryaṃ kṛtvā śamadamātmakam | lokānpuṇyakṛtāṃ brahmansadbhirācaritānnṛbhiḥ

शम और दम से युक्त श्रेष्ठ धर्म का पालन करके वहाँ जाते हैं—हे ब्रह्मन्, पुण्य करने वालों के उन लोकों में, जिनमें सज्जन पुरुष रहते हैं।

श्लोक 6 (3.262.6)

देवाः साध्यास्तथा विश्वे तथैव च महर्षयः । यामा धामाश्च मौद्गल्य गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥

devāḥ sādhyāstathā viśve tathaiva ca maharṣayaḥ | yāmā dhāmāśca maudgalya gandharvāpsarasastathā

हे मौद्गल्य, देवता, साध्य, विश्वेदेव, महर्षि, याम और धाम नामक गण, गन्धर्व और अप्सराएँ—

श्लोक 7 (3.262.7)

एषां देवनिकायानां पृथक्‌पृथगनेकशः । भास्वन्तः कामसंपन्ना लोकास्तेजोमयाः शुभाः ॥

eṣāṃ devanikāyānāṃ pṛthakpṛthaganekaśaḥ | bhāsvantaḥ kāmasaṃpannā lokāstejomayāḥ śubhāḥ

इन सब देव-समूहों के अलग-अलग अनेक लोक हैं, जो प्रकाशमान, सब कामनाओं से पूर्ण, तेजोमय और शुभ हैं।

श्लोक 8 (3.262.8)

त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानि हिरण्मयः । मेरुः पर्वतराड्यत्रदेवोद्यानानि मुद्गल ॥

trayastriṃśatsahasrāṇi yojanāni hiraṇmayaḥ | meruḥ parvatarāḍyatradevodyānāni mudgala

हे मुद्गल, वहाँ तैंतीस हज़ार योजन ऊँचा स्वर्णमय पर्वतराज मेरु है, जहाँ देवताओं के उद्यान हैं।

श्लोक 9 (3.262.9)

नन्दनान्यतिरम्याणि तत्रोद्यानानि मुद्गल । सर्वकामफलैर्वृक्षैः शोभितानि समन्ततः ॥

nandanānyatiramyāṇi tatrodyānāni mudgala | sarvakāmaphalairvṛkṣaiḥ śobhitāni samantataḥ

हे मुद्गल, वहाँ नन्दन आदि अत्यन्त रमणीय उद्यान हैं, जो सब कामनाओं के फल देने वाले वृक्षों से चारों ओर सुशोभित हैं।

श्लोक 10 (3.262.10)

नन्दनादीनि पुण्यानि विहाराः पुण्यकर्मणाम् । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णे भयं तथा ॥

nandanādīni puṇyāni vihārāḥ puṇyakarmaṇām | na kṣutpipāse na glānirna śītoṣṇe bhayaṃ tathā

नन्दन आदि पवित्र विहार-स्थल पुण्यकर्मा लोगों के लिए हैं। वहाँ न भूख है न प्यास, न थकान, न सर्दी-गर्मी, और न कोई भय;

श्लोक 11 (3.262.11)

बीभत्समशुभं वाऽपि रोगो वा तत्र कश्चन । मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ॥

bībhatsamaśubhaṃ vā'pi rogo vā tatra kaścana | manojñāḥ sarvato gandhāḥ sukhasparśāśca sarvaśaḥ

वहाँ कुछ भी घिनौना या अशुभ नहीं, और न कोई रोग है। चारों ओर मनोहर सुगन्धें हैं और सब ओर सुखद स्पर्श हैं,

श्लोक 12 (3.262.12)

शब्दाः श्रुतिमनोग्राह्याः सर्वतस्तत्रवै मुने । न शोको न जरा तत्र नायासपरिदेवने ॥

śabdāḥ śrutimanogrāhyāḥ sarvatastatravai mune | na śoko na jarā tatra nāyāsaparidevane

और हे मुने, वहाँ सब ओर कानों और मन को भाने वाले शब्द हैं। वहाँ न शोक है, न बुढ़ापा, न थकान और न विलाप।

श्लोक 13 (3.262.13)

ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः । सुकृतैस्तत्रपुरुषाः संभवन्त्यात्मकर्मभिः ॥

īdṛśaḥ sa mune lokaḥ svakarmaphalahetukaḥ | sukṛtaistatrapuruṣāḥ saṃbhavantyātmakarmabhiḥ

हे मुने, वह लोक ऐसा है, जो अपने कर्मों के फल से प्राप्त होता है। मनुष्य अपने ही पुण्यकर्मों से वहाँ जन्म लेते हैं।

श्लोक 14 (3.262.14)

तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् । कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ॥

taijasāni śarīrāṇi bhavantyatropapadyatām | karmajānyeva maudgalya na mātṛpitṛjānyuta

हे मौद्गल्य, वहाँ पहुँचने वालों के शरीर तेजोमय होते हैं, जो केवल कर्मों से उत्पन्न होते हैं, माता-पिता से नहीं।

श्लोक 15 (3.262.15)

न संस्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च । तेषां न च रजोवस्त्रं बाधते तत्रवै मुने ॥

na saṃsvedo na daurgandhyaṃ purīṣaṃ mūtrameva ca | teṣāṃ na ca rajovastraṃ bādhate tatravai mune

हे मुने, वहाँ न पसीना है, न दुर्गन्ध, न मल-मूत्र, और धूल उनके वस्त्रों को मैला नहीं करती।

श्लोक 16 (3.262.16)

न म्लायन्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः । समूह्यन्ते विमानैश्च ब्रह्मन्नेवंविधा हि ते ॥

na mlāyanti srajasteṣāṃ divyagandhā manoramāḥ | samūhyante vimānaiśca brahmannevaṃvidhā hi te

उनकी दिव्य सुगन्ध वाली मनोहर मालाएँ कभी नहीं मुरझातीं, और वे विमानों में घूमते हैं—हे ब्रह्मन्, वे ऐसे होते हैं।

श्लोक 17 (3.262.17)

ईर्ष्याशोकक्लमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः । सुखं स्वर्गजितस्तत्रवर्तयन्ते महामुने ॥

īrṣyāśokaklamāpetā mohamātsaryavarjitāḥ | sukhaṃ svargajitastatravartayante mahāmune

हे महामुने, ईर्ष्या, शोक और थकान से रहित, मोह और मत्सर से मुक्त होकर स्वर्ग को जीतने वाले वहाँ सुख से रहते हैं।

श्लोक 18 (3.262.18)

तेषां तथाविधानां तु लोकानां मुनिपुङ्गव । उपर्युपरि शक्रस्य लोका दिव्या गुणान्विताः ॥

teṣāṃ tathāvidhānāṃ tu lokānāṃ munipuṅgava | uparyupari śakrasya lokā divyā guṇānvitāḥ

हे मुनिश्रेष्ठ, ऐसे लोकों के ऊपर एक-के-ऊपर-एक इन्द्र के दिव्य गुणों से युक्त लोक हैं।

श्लोक 19 (3.262.19)

परतो ब्रह्मणस्तस्य लोकस्तेजोमयः शुभः । यत्र यान्त्यृषयो ब्रह्मन्पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ॥

parato brahmaṇastasya lokastejomayaḥ śubhaḥ | yatra yāntyṛṣayo brahmanpūtāḥ svaiḥ karmabhiḥ śubhaiḥ

उनसे परे ब्रह्मा का तेजोमय, शुभ लोक है, जहाँ हे ब्रह्मन्, अपने शुभ कर्मों से पवित्र हुए ऋषि जाते हैं।

श्लोक 20 (3.262.20)

ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः । तेषां लोकाः परतरे यान्यजन्तीह देवताः ॥

ṛbhavo nāma tatrānye devānāmapi devatāḥ | teṣāṃ lokāḥ paratare yānyajantīha devatāḥ

वहाँ ऋभु नाम के दूसरे देव हैं, जो देवताओं के भी देवता हैं; उनके लोक उससे भी ऊपर हैं, और यहाँ के देवता उनकी पूजा करते हैं।

श्लोक 21 (3.262.21)

स्वयंप्रभास्ते भास्वन्तो लोकाः कामदुघाः परे । न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न भोगैश्वर्यमत्सरः ॥

svayaṃprabhāste bhāsvanto lokāḥ kāmadughāḥ pare | na teṣāṃ strīkṛtastāpo na bhogaiśvaryamatsaraḥ

वे परम लोक स्वयंप्रकाश, दीप्तिमान और सब कामनाएँ पूरी करने वाले हैं। उन्हें न स्त्रियों के कारण होने वाला सन्ताप होता है, न भोग और ऐश्वर्य को लेकर ईर्ष्या।

श्लोक 22 (3.262.22)

न वर्तयन्त्याहुतिभिस्ते नाप्यमृतभोजनाः । तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तयः ॥

na vartayantyāhutibhiste nāpyamṛtabhojanāḥ | tathā divyaśarīrāste na ca vigrahamūrtayaḥ

वे आहुतियों पर नहीं जीते, न अमृत का भोजन करते हैं; उनके शरीर दिव्य हैं, फिर भी वे किसी आकार में बँधे नहीं हैं।

श्लोक 23 (3.262.23)

नासुखाः सुखकामास्ते देवदेवाः सनातनाः । न कल्पपरिवर्तेषु परिवर्तन्ति ते तथा ॥

nāsukhāḥ sukhakāmāste devadevāḥ sanātanāḥ | na kalpaparivarteṣu parivartanti te tathā

वे सनातन देवाधिदेव न दुःखी होते हैं, न सुख की कामना करते हैं, और कल्पों के बदलने पर भी उनमें परिवर्तन नहीं होता।

श्लोक 24 (3.262.24)

जरा मृत्युः कुतस्तेषां हर्षः प्रीतिः सुखं न च । न दुःखं न सुखं चापि रागद्वेषौ कुतो मुने ॥

jarā mṛtyuḥ kutasteṣāṃ harṣaḥ prītiḥ sukhaṃ na ca | na duḥkhaṃ na sukhaṃ cāpi rāgadveṣau kuto mune

उन्हें बुढ़ापा और मृत्यु कहाँ? उनमें न हर्ष है, न प्रीति, न सुख; न दुःख है, न सुख; फिर हे मुने, उनमें राग-द्वेष कहाँ से होंगे?

श्लोक 25 (3.262.25)

देवानामपि मौद्गल्यकाङ्क्षिता सा गतिः परा । दुष्प्रापा परमा सिद्धिरगम्या कामगोचरैः ॥

devānāmapi maudgalyakāṅkṣitā sā gatiḥ parā | duṣprāpā paramā siddhiragamyā kāmagocaraiḥ

हे मौद्गल्य, उस परम गति की देवता भी अभिलाषा करते हैं। वह दुर्लभ परम सिद्धि है, जो कामनाओं में विचरने वालों के लिए अगम्य है।

श्लोक 26 (3.262.26)

त्रयस्त्रिंशदिमे लोकाः शेषा लोका मनीषिभिः । गम्यन्ते नियमैः श्रेष्ठैर्दानैर्वा विधिपूर्वकैः ॥

trayastriṃśadime lokāḥ śeṣā lokā manīṣibhiḥ | gamyante niyamaiḥ śreṣṭhairdānairvā vidhipūrvakaiḥ

ये तैंतीस लोक हैं। शेष लोकों को बुद्धिमान लोग श्रेष्ठ नियमों से या विधिपूर्वक दिए गए दानों से प्राप्त करते हैं।

श्लोक 27 (3.262.27)

सेयं दानकृता व्युष्टिरनुप्राप्ता सुखं त्वया । तां भुङ्क्ष्व सुकृतैर्लब्धां तपसा द्योतितप्रभः ॥

seyaṃ dānakṛtā vyuṣṭiranuprāptā sukhaṃ tvayā | tāṃ bhuṅkṣva sukṛtairlabdhāṃ tapasā dyotitaprabhaḥ

दान से अर्जित यह समृद्धि आपको सुखपूर्वक प्राप्त हुई है। हे तप से प्रकाशित तेज वाले, अपने पुण्यकर्मों से पाई हुई इस समृद्धि का भोग कीजिए।

श्लोक 28 (3.262.28)

एतत्स्वर्गसुखं विप्र लोका नानाविधास्तथा । गुणाः स्वर्गस्य प्रोक्तास्ते दोषानपि निबोध मे ॥

etatsvargasukhaṃ vipra lokā nānāvidhāstathā | guṇāḥ svargasya proktāste doṣānapi nibodha me

हे विप्र, यह स्वर्ग का सुख है और ये उसके अनेक प्रकार के लोक हैं। मैंने आपको स्वर्ग के गुण बताए; अब उसके दोष भी मुझसे सुनिए।

श्लोक 29 (3.262.29)

कृतस्य कर्मणस्तत्रभुज्यते यत्फलं दिवि । न चान्यत्क्रियते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ॥

kṛtasya karmaṇastatrabhujyate yatphalaṃ divi | na cānyatkriyate karma mūlacchedena bhujyate

स्वर्ग में किए हुए कर्मों का ही फल भोगा जाता है; वहाँ कोई नया कर्म नहीं किया जाता, और वह भोग मूल को ही काटता जाता है।

श्लोक 30 (3.262.30)

सोऽत्रदोषो मम मतस्तस्यान्ते पतनं च यत् । सुखव्याप्तमनस्कानां पतनं यच्च मुद्गल ॥

so'tradoṣo mama matastasyānte patanaṃ ca yat | sukhavyāptamanaskānāṃ patanaṃ yacca mudgala

हे मुद्गल, मेरे मत में यही उसका दोष है कि अन्त में पतन होता है—उनका पतन, जिनका मन सुख में डूबा रहता था।

श्लोक 31 (3.262.31)

असंतोषः परीतापो दृष्ट्वा दीप्ततराः श्रियः । यद्भवत्यवरे स्थाने स्थितानां तत्सुदुष्करम् ॥

asaṃtoṣaḥ parītāpo dṛṣṭvā dīptatarāḥ śriyaḥ | yadbhavatyavare sthāne sthitānāṃ tatsuduṣkaram

नीचे के स्थान पर स्थित लोगों को दूसरों की अधिक दीप्तिमान समृद्धि देखकर जो असन्तोष और सन्ताप होता है, वह अत्यन्त दुःसह है।

श्लोक 32 (3.262.32)

संज्ञामोहश्चपततां रजसा च प्रधर्षणम् । प्रम्लानेषु च माल्येषु ततः पिपतिषोर्भयम् ॥

saṃjñāmohaścapatatāṃ rajasā ca pradharṣaṇam | pramlāneṣu ca mālyeṣu tataḥ pipatiṣorbhayam

गिरने वालों की चेतना मोह से ढक जाती है और रजोगुण उन्हें दबा लेता है; और मालाओं के मुरझाने पर गिरने को उद्यत व्यक्ति को भय होता है।

श्लोक 33 (3.262.33)

आब्रह्मभवनादेते दोषा मौद्गल्य दारुणाः । नाकलोकेसुकृतिनां गुणास्त्वयुतशो नृणाम् ॥

ābrahmabhavanādete doṣā maudgalya dāruṇāḥ | nākalokesukṛtināṃ guṇāstvayutaśo nṛṇām

हे मौद्गल्य, ये भयंकर दोष ब्रह्मलोक तक विद्यमान हैं। फिर भी स्वर्गलोक में पुण्यात्मा मनुष्यों के गुण दस-दस हज़ार हैं।

श्लोक 34 (3.262.34)

अयं त्वन्यो गुणः श्रेष्ठश्च्युतानां स्वर्गतो मुने । शुभानुशययोगेन मनुष्येषूपजायते ॥

ayaṃ tvanyo guṇaḥ śreṣṭhaścyutānāṃ svargato mune | śubhānuśayayogena manuṣyeṣūpajāyate

हे मुने, स्वर्ग से गिरने वालों के लिए एक और श्रेष्ठ गुण है: वे अपने शुभ संस्कारों के योग से मनुष्यों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 35 (3.262.35)

तत्रापि स महाभागः कुले महति जायते । न चेत्संबुध्यते तत्रगच्छत्यधमतां ततः ॥

tatrāpi sa mahābhāgaḥ kule mahati jāyate | na cetsaṃbudhyate tatragacchatyadhamatāṃ tataḥ

वहाँ भी वह महाभाग्यशाली महान कुल में जन्म लेता है; परन्तु यदि वहाँ वह जाग्रत नहीं होता, तो वहाँ से अधोगति को प्राप्त होता है।

श्लोक 36 (3.262.36)

इह यत्क्रियते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते । कर्मभूमिरियं ब्रह्मन्फलभूमिरसौ मता ॥

iha yatkriyate karma tatparatropabhujyate | karmabhūmiriyaṃ brahmanphalabhūmirasau matā

यहाँ जो कर्म किया जाता है, उसका फल परलोक में भोगा जाता है। हे ब्रह्मन्, यह कर्मभूमि मानी गई है और वह फलभूमि।"

मुद्गल उवाच

श्लोक 37 (3.262.37)

महान्तस्तु अमी दोषास्त्वया स्वर्गस्य कीर्तिताः । निर्दोष एव यस्त्वन्यो लोकं तं प्रवदस्व मे ॥

mahāntastu amī doṣāstvayā svargasya kīrtitāḥ | nirdoṣa eva yastvanyo lokaṃ taṃ pravadasva me

"आपने स्वर्ग के ये बड़े-बड़े दोष बताए हैं। अब जो दूसरा लोक सर्वथा निर्दोष है, उसके विषय में मुझे बताइए।"

देवदूत उवाच

श्लोक 38 (3.262.38)

ब्रह्मणः सदनादूर्ध्वं तद्विष्णोः परमं पदम् । शुद्धं सनातनं ज्योतिः परं ब्रह्मेति यद्विदुः ॥

brahmaṇaḥ sadanādūrdhvaṃ tadviṣṇoḥ paramaṃ padam | śuddhaṃ sanātanaṃ jyotiḥ paraṃ brahmeti yadviduḥ

"ब्रह्मा के धाम से ऊपर विष्णु का वह परम पद है, जिसे ज्ञानी शुद्ध, सनातन ज्योति और परब्रह्म के रूप में जानते हैं।

श्लोक 39 (3.262.39)

न तत्रविप्र गच्छन्ति पुरुषा विषयात्मकाः । दम्भलोभमहाक्रोधमोहद्रोहैरभिद्रुताः ॥

na tatravipra gacchanti puruṣā viṣayātmakāḥ | dambhalobhamahākrodhamohadrohairabhidrutāḥ

हे विप्र, विषयों में आसक्त पुरुष, और दम्भ, लोभ, महाक्रोध, मोह तथा द्रोह से ग्रस्त लोग वहाँ नहीं जाते।

श्लोक 40 (3.262.40)

निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वाः संयतेन्द्रियाः । ध्यानयोगपराश्चैव तत्रगच्छन्ति मानवाः ॥

nirmamā nirahaṃkārā nirdvandvāḥ saṃyatendriyāḥ | dhyānayogaparāścaiva tatragacchanti mānavāḥ

ममता और अहंकार से रहित, द्वन्द्वों से मुक्त, इन्द्रियों को वश में रखने वाले और ध्यानयोग में लगे हुए मनुष्य ही वहाँ जाते हैं।

श्लोक 41 (3.262.41)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि मुद्गल । तवानुकम्पया साधो साधु गच्छाम माचिरम् ॥

etatte sarvamākhyātaṃ yanmāṃ pṛcchasi mudgala | tavānukampayā sādho sādhu gacchāma māciram

हे मुद्गल, आपने मुझसे जो पूछा, वह सब मैंने आपको बता दिया। हे साधु, आप पर कृपा करके कहता हूँ—अब बिना देर किए हम चलें।"

व्यास उवाच

श्लोक 42 (3.262.42)

एतच्छ्रुत्वा तु मौद्गल्यो वाक्यं विममृशे धिया । विमृश्य च मुनिश्रेष्ठो देवदूतमुवाचह ॥

etacchrutvā tu maudgalyo vākyaṃ vimamṛśe dhiyā | vimṛśya ca muniśreṣṭho devadūtamuvācaha

यह सुनकर मौद्गल्य ने उन वचनों पर बुद्धि से विचार किया, और विचार करके उस मुनिश्रेष्ठ ने देवदूत से कहा—

मुद्गल उवाच

श्लोक 43 (3.262.43)

देवदूत नमस्तेऽस्तु गच्छ तात यथासुखम् । महादोषेण मे कार्यं न स्वर्गेण सुखेन वा ॥

devadūta namaste'stu gaccha tāta yathāsukham | mahādoṣeṇa me kāryaṃ na svargeṇa sukhena vā

"हे देवदूत, आपको नमस्कार है; हे तात, आप सुखपूर्वक जाइए। इतने बड़े दोष वाले स्वर्ग से और उसके सुख से मुझे कोई प्रयोजन नहीं।

श्लोक 44 (3.262.44)

पतनान्ते महादुःखं परितापः सुदारुणः । स्वर्गभाजः पतन्तीह तस्मात्स्वर्गं न कामये ॥

patanānte mahāduḥkhaṃ paritāpaḥ sudāruṇaḥ | svargabhājaḥ patantīha tasmātsvargaṃ na kāmaye

पतन के अन्त में बड़ा दुःख और भयंकर सन्ताप होता है; स्वर्ग भोगने वाले यहीं वापस गिरते हैं। इसलिए मैं स्वर्ग की कामना नहीं करता।

श्लोक 45 (3.262.45)

यत्रगत्वान शोचन्ति न व्यथन्तिचलन्ति वा । तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गयिष्यामि केवलम् ॥

yatragatvāna śocanti na vyathanticalanti vā | tadahaṃ sthānamatyantaṃ mārgayiṣyāmi kevalam

जहाँ जाकर लोग न शोक करते हैं, न व्यथित होते हैं, न विचलित होते हैं, मैं केवल उसी शाश्वत स्थान को खोजूँगा।"

व्यास उवाच

श्लोक 46 (3.262.46)

इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतंविसृज्य तम् । शिलोञ्छवृत्तिमुत्सृज्य शममातिष्ठदुत्तमम् ॥

ityuktvā sa munirvākyaṃ devadūtaṃvisṛjya tam | śiloñchavṛttimutsṛjya śamamātiṣṭhaduttamam

ऐसा कहकर उस मुनि ने देवदूत को विदा किया, शिलोञ्छ-वृत्ति छोड़ दी और परम शान्ति का आश्रय लिया।

श्लोक 47 (3.262.47)

तुल्यनिन्दास्तुतिर्भूत्वासमलोष्टाश्मकाञ्चनः । ज्ञानयोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो बभूव ह ॥

tulyanindāstutirbhūtvāsamaloṣṭāśmakāñcanaḥ | jñānayogena śuddhena dhyānanityo babhūva ha

निन्दा और स्तुति को समान मानकर, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को एक-सा समझकर, वे शुद्ध ज्ञानयोग से नित्य ध्यान में लीन रहने लगे।

श्लोक 48 (3.262.48)

निगृहीतेन्द्रियग्रामः समयोजयदात्मनि । युक्तचित्तं यथाऽऽत्मानं युयोज परमेश्वरे ॥

nigṛhītendriyagrāmaḥ samayojayadātmani | yuktacittaṃ yathā''tmānaṃ yuyoja parameśvare

इन्द्रियों के समूह को वश में करके उन्होंने उन्हें आत्मा में लगाया, और एकाग्र चित्त से अपनी आत्मा को परमेश्वर में जोड़ दिया।

श्लोक 49 (3.262.49)

ध्यानयोगाद्बलं लब्ध्वा प्राप्य बुद्धिमनुत्तमाम् । जगाम शाश्वतीं सिद्धिं परां निर्वाणलक्षणाम् ॥

dhyānayogādbalaṃ labdhvā prāpya buddhimanuttamām | jagāma śāśvatīṃ siddhiṃ parāṃ nirvāṇalakṣaṇām

ध्यानयोग से बल पाकर और सर्वोत्तम बुद्धि प्राप्त करके वे निर्वाण-लक्षण वाली शाश्वत परम सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 50 (3.262.50)

तस्मात्त्वमपिकौन्तेय न शोकं कर्तुमर्हसि । राज्यात्स्फीतात्परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि ॥

tasmāttvamapikaunteya na śokaṃ kartumarhasi | rājyātsphītātparibhraṣṭastapasā tadavāpsyasi

इसलिए हे कुन्तीनन्दन, तुम्हें भी शोक नहीं करना चाहिए। समृद्ध राज्य से च्युत होकर भी तुम तप के बल से उसे फिर पा लोगे।

श्लोक 51 (3.262.51)

सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । पर्यायेणोपसर्पन्ते नरं नेमिमरा इव ॥

sukhasyānantaraṃ duḥkhaṃ duḥkhasyānantaraṃ sukham | paryāyeṇopasarpante naraṃ nemimarā iva

सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख; जैसे पहिये के अरे बारी-बारी से नेमि तक पहुँचते हैं, वैसे ही ये मनुष्य के पास बारी-बारी से आते हैं।

श्लोक 52 (3.262.52)

पितृपैतामहं राज्यंप्राप्स्यस्यमितविक्रम । वर्षात्रयोदशादूर्ध्वंव्येतु ते मानसो ज्वरः ॥

pitṛpaitāmahaṃ rājyaṃprāpsyasyamitavikrama | varṣātrayodaśādūrdhvaṃvyetu te mānaso jvaraḥ

हे अमित पराक्रमी, तेरहवें वर्ष के बाद तुम अपने पिता-पितामहों का राज्य पा लोगे। तुम्हारे मन का यह ज्वर दूर हो जाए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 53 (3.262.53)

स एवमुक्त्वाभगवान्व्यासः पाण्डवनन्दनम् । जगाम तपसे धीमान्पुनरेवाश्रमं प्रति ॥

sa evamuktvābhagavānvyāsaḥ pāṇḍavanandanam | jagāma tapase dhīmānpunarevāśramaṃ prati

पाण्डवों को आनन्द देने वाले युधिष्ठिर से ऐसा कहकर बुद्धिमान भगवान् व्यास तपस्या के लिए फिर अपने आश्रम को लौट गए।

अध्याय 261अध्याय-सूचीअध्याय 263