आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 263
दुर्वासा का पाण्डवों के पास भेजा जाना
जनमेजय पूछते हैं कि जब पाण्डव वन में रहकर सूर्य के दिए अक्षय पात्र से ब्राह्मणों को भोजन करा रहे थे, तब दुर्योधन और उसके साथियों ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया। वैशम्पायन बताते हैं कि अत्यन्त क्रोधी मुनि दुर्वासा दस हज़ार शिष्यों के साथ दुर्योधन के यहाँ आए और भोजन की मनमानी माँगों से उसकी परीक्षा लेते रहे; दुर्योधन ने धैर्य से उनकी सेवा की, यहाँ तक कि मुनि ने उसे वर देने का प्रस्ताव किया। कर्ण और दुःशासन की पहले से की गई मन्त्रणा के अनुसार दुर्योधन ने वर माँगा कि मुनि युधिष्ठिर के यहाँ उस समय अतिथि बनकर जाएँ जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो। षड्यन्त्रकारी यह सोचकर प्रसन्न होते हुए घर लौटते हैं कि मुनि का कोप पाण्डवों को नष्ट कर देगा।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (3.263.1)
वसत्स्वेवं वने तेषु पाण्डवेषु महात्मसु । रममाणेषु चित्राभिः कथाभिर्मुनिभिः सह ॥
vasatsvevaṃ vane teṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | ramamāṇeṣu citrābhiḥ kathābhirmunibhiḥ saha
"जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वन में रह रहे थे और मुनियों के साथ भाँति-भाँति की कथाओं में आनन्द ले रहे थे,
श्लोक 2 (3.263.2)
सूर्यदत्ताक्षयान्नेन कृष्णाया भोजनावधि । ब्राह्मणांस्तर्पमाणेषु ये चान्नार्थमुपागताः । आरण्यानां मृगाणां च मांसैर्नानाविधैरपि ॥
sūryadattākṣayānnena kṛṣṇāyā bhojanāvadhi | brāhmaṇāṃstarpamāṇeṣu ye cānnārthamupāgatāḥ | āraṇyānāṃ mṛgāṇāṃ ca māṃsairnānāvidhairapi
और जब वे सूर्य के दिए उस अक्षय अन्न से, जो कृष्णा (द्रौपदी) के भोजन कर लेने तक बना रहता था, भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को तृप्त कर रहे थे, तथा वन के अनेक प्रकार के पशुओं के मांस से भी,
श्लोक 3 (3.263.3)
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सर्वे दुर्योधनादयः । कथं तेष्वन्ववर्तन्त पापाचारा महामुने ॥
dhārtarāṣṭrā durātmānaḥ sarve duryodhanādayaḥ | kathaṃ teṣvanvavartanta pāpācārā mahāmune
तब हे महामुने, दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के सभी दुष्ट और पापाचारी पुत्रों ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया,
श्लोक 4 (3.263.4)
दुःशासनस्य कर्णस्य शकुनेश्च मते स्थिताः । एतदाचक्ष्व भगवन्वैशंपायन पृच्छतः ॥
duḥśāsanasya karṇasya śakuneśca mate sthitāḥ | etadācakṣva bhagavanvaiśaṃpāyana pṛcchataḥ
जो दुःशासन, कर्ण और शकुनि की सलाह पर चलते थे? हे भगवन् वैशम्पायन, मैं पूछ रहा हूँ, यह मुझे बताइए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (3.263.5)
श्रुत्वा तेषां तथा वृत्तिं नगरे वसतामिव । दुर्योधनो महाराज तेषु पापमरोचयत् ॥
śrutvā teṣāṃ tathā vṛttiṃ nagare vasatāmiva | duryodhano mahārāja teṣu pāpamarocayat
हे महाराज, यह सुनकर कि वे वन में ऐसे सुख से रह रहे हैं मानो नगर में रहते हों, दुर्योधन ने उनका अनिष्ट करने का मन बना लिया।
श्लोक 6 (3.263.6)
तथा तैर्निकृतिप्रज्ञैः कर्णदुःशासनादिभिः । नानोपायैरघं तेषु चिन्तयत्सु दुरात्मसु ॥
tathā tairnikṛtiprajñaiḥ karṇaduḥśāsanādibhiḥ | nānopāyairaghaṃ teṣu cintayatsu durātmasu
और जब कपट में निपुण वे दुष्ट — कर्ण, दुःशासन आदि — अनेक उपायों से उन पर विपत्ति लाने की युक्तियाँ सोच रहे थे,
श्लोक 7 (3.263.7)
अभ्यागच्छत्स धर्मात्मा तपस्वी सुमहायशाः । शिष्यायुतसमोपेतो दुर्वासा नाम कामतः ॥
abhyāgacchatsa dharmātmā tapasvī sumahāyaśāḥ | śiṣyāyutasamopeto durvāsā nāma kāmataḥ
तभी धर्मात्मा, अत्यन्त यशस्वी तपस्वी दुर्वासा नामक मुनि अपनी इच्छा से दस हज़ार शिष्यों के साथ वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 8 (3.263.8)
तमागतमभिप्रेक्ष्य मुनिं परमकोपनम् । दुर्योधनो विनीतात्मा प्रश्रयेण दमेन च । सहितो भ्रातृभिः श्रीमानातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ॥
tamāgatamabhiprekṣya muniṃ paramakopanam | duryodhano vinītātmā praśrayeṇa damena ca | sahito bhrātṛbhiḥ śrīmānātithyena nyamantrayat
उस परम क्रोधी मुनि को आया देखकर श्रीमान् दुर्योधन ने विनीत भाव से, शिष्टता और संयम के साथ, अपने भाइयों सहित उन्हें आतिथ्य के लिए निमन्त्रित किया।
श्लोक 9 (3.263.9)
विधिवत्पूजयामास स्वयं किंकरवत्स्थितः । अहानि कतिचित्तत्र तस्थौ स मुनिसत्तमः ॥
vidhivatpūjayāmāsa svayaṃ kiṃkaravatsthitaḥ | ahāni katicittatra tasthau sa munisattamaḥ
उसने स्वयं सेवक की भाँति खड़े रहकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की। वे मुनिश्रेष्ठ कुछ दिन वहाँ ठहरे।
श्लोक 10 (3.263.10)
तं च पर्यचरद्राजा दिवारात्रमतन्द्रितः । दुर्योधनो महाराज शापात्तस्य विशङ्कितः ॥
taṃ ca paryacaradrājā divārātramatandritaḥ | duryodhano mahārāja śāpāttasya viśaṅkitaḥ
हे महाराज, राजा दुर्योधन उनके शाप से डरता हुआ दिन-रात बिना आलस्य के उनकी सेवा करता रहा।
श्लोक 11 (3.263.11)
क्षुधितोऽस्मि ददस्वान्नं शीघ्रं मम नराधिप । इत्युक्त्वा गच्छति स्नातुं प्रत्यागच्छति वै चिरात् ॥
kṣudhito'smi dadasvānnaṃ śīghraṃ mama narādhipa | ityuktvā gacchati snātuṃ pratyāgacchati vai cirāt
"हे नरेश, मैं भूखा हूँ, मुझे शीघ्र भोजन दो" — यह कहकर वे स्नान करने चले जाते और बहुत देर बाद लौटते।
श्लोक 12 (3.263.12)
न भोक्ष्याम्यद्यमे नास्ति क्षुधेत्युक्त्वैत्यदर्शनम् । अकस्मादेत्य च ब्रूते भोजयास्मांस्त्वरान्वितः ॥
na bhokṣyāmyadyame nāsti kṣudhetyuktvaityadarśanam | akasmādetya ca brūte bhojayāsmāṃstvarānvitaḥ
"आज मैं भोजन नहीं करूँगा, मुझे भूख नहीं है" — यह कहकर वे आँखों से ओझल हो जाते, और फिर अचानक आकर उतावली से कहते, "हमें भोजन कराओ।"
श्लोक 13 (3.263.13)
कदाचिच्च निशीथे स उत्थाय निकृतौ स्थितः । पूर्ववत्कारयित्वाऽन्नं न भुङ्क्ते गर्हयन्स्म सः ॥
kadācicca niśīthe sa utthāya nikṛtau sthitaḥ | pūrvavatkārayitvā'nnaṃ na bhuṅkte garhayansma saḥ
एक बार वे आधी रात को उठ खड़े हुए और छल पर उतारू होकर पहले की तरह भोजन बनवाया, फिर उसकी निन्दा करते हुए उसे खाया नहीं।
श्लोक 14 (3.263.14)
वर्तमाने तथा तस्मिन्यदा दुर्योधनो नृपः । विकृतिं नैति न क्रोधं तदा तुष्टोऽभवन्मुनिः ॥
vartamāne tathā tasminyadā duryodhano nṛpaḥ | vikṛtiṃ naiti na krodhaṃ tadā tuṣṭo'bhavanmuniḥ
जब इस प्रकार के व्यवहार के बीच भी राजा दुर्योधन के मन में न कोई विकार आया, न क्रोध, तब मुनि प्रसन्न हो गए।
श्लोक 15 (3.263.15)
आहचैनं दुराधर्षो वरदोऽस्मीति भारत ॥
āhacainaṃ durādharṣo varado'smīti bhārata
हे भारत, तब उन दुर्धर्ष मुनि ने उससे कहा, "मैं तुम्हें वर देने को उद्यत हूँ।"
दुर्वासा उवाच
श्लोक 16 (3.263.16)
वरं वरय भद्रं ते यत्ते मनसि वर्तते । मयि प्रीते तु यद्धर्म्यं नालभ्यं विद्यते तव ॥
varaṃ varaya bhadraṃ te yatte manasi vartate | mayi prīte tu yaddharmyaṃ nālabhyaṃ vidyate tava
"तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारे मन में जो हो, वह वर माँग लो। मेरे प्रसन्न होने पर धर्मसम्मत कोई भी वस्तु तुम्हारे लिए अप्राप्य नहीं है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (3.263.17)
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महर्षेर्भावितात्मनः । अमन्यत पुनर्जातमात्मानं स सुयोधनः ॥
etacchrutvā vacastasya maharṣerbhāvitātmanaḥ | amanyata punarjātamātmānaṃ sa suyodhanaḥ
उन शुद्धचित्त महर्षि के ये वचन सुनकर सुयोधन ने स्वयं को मानो फिर से जन्मा हुआ अनुभव किया।
श्लोक 18 (3.263.18)
प्रागेव मन्त्रितं चासीत्कर्णदुःशासनादिभिः । याचनीयं मुनेस्तुष्टादिति निश्चित्य दुर्मतिः ॥
prāgeva mantritaṃ cāsītkarṇaduḥśāsanādibhiḥ | yācanīyaṃ munestuṣṭāditi niścitya durmatiḥ
कर्ण, दुःशासन आदि के साथ पहले ही यह मन्त्रणा हो चुकी थी कि मुनि के प्रसन्न होने पर उनसे क्या माँगना है। उसी निश्चय के अनुसार उस दुर्बुद्धि ने
श्लोक 19 (3.263.19)
अतिहर्षान्वितो राजन्वरमेनमयाचत । शिष्यैः सह मम ब्रह्मन्यथा जातोऽतिथिर्भवान् ॥
atiharṣānvito rājanvaramenamayācata | śiṣyaiḥ saha mama brahmanyathā jāto'tithirbhavān
हे राजन्, अत्यन्त हर्षित होकर यह वर माँगा — "हे ब्रह्मन्, जैसे आप शिष्यों सहित मेरे अतिथि हुए हैं,
दुर्योधन उवाच
श्लोक 20 (3.263.20)
अस्मत्कुले महाराजो ज्येष्ठः श्रेष्ठो युधिष्ठिरः । वने वसति धर्मात्मा भ्रातृभिः परिवारितः । गुणवाञ्शीलसंपन्नस्तस्य त्वमतिथिर्भव ॥
asmatkule mahārājo jyeṣṭhaḥ śreṣṭho yudhiṣṭhiraḥ | vane vasati dharmātmā bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | guṇavāñśīlasaṃpannastasya tvamatithirbhava
वैसे ही हमारे कुल के ज्येष्ठ और श्रेष्ठ, धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर अपने भाइयों से घिरे हुए वन में रहते हैं। वे गुणवान् और शीलसम्पन्न हैं; आप उनके भी अतिथि बनिए।
श्लोक 21 (3.263.21)
यदा च राजपुत्री सा सुकुमारी यशस्विनी । भोजयित्वा द्विजान्सर्वान्पतींश्च वरवर्णिनी ॥
yadā ca rājaputrī sā sukumārī yaśasvinī | bhojayitvā dvijānsarvānpatīṃśca varavarṇinī
और जब वह सुकुमारी, यशस्विनी, सुन्दर वर्ण वाली राजकुमारी सब ब्राह्मणों और अपने पतियों को भोजन करा चुके,
श्लोक 22 (3.263.22)
विश्रान्ता च स्वयं भुक्त्वा सुखासीना भवेद्यदा । तदा त्वं तत्रगच्छेथा यद्यनुग्राह्यता मयि ॥
viśrāntā ca svayaṃ bhuktvā sukhāsīnā bhavedyadā | tadā tvaṃ tatragacchethā yadyanugrāhyatā mayi
और स्वयं भी भोजन करके विश्राम करती हुई सुख से बैठी हो, तब आप वहाँ जाइए — यदि आप मुझ पर कृपा करना चाहते हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (3.263.23)
तथा करिष्ये त्वत्प्रीत्येत्येवमुक्त्वा सुयोधनम् । दुर्वासा अपिविप्रेन्द्रो यथागतमगात्ततः ॥
tathā kariṣye tvatprītyetyevamuktvā suyodhanam | durvāsā apiviprendro yathāgatamagāttataḥ
"तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैं ऐसा ही करूँगा" — सुयोधन से यह कहकर विप्रश्रेष्ठ दुर्वासा जैसे आए थे वैसे ही वहाँ से चले गए।
श्लोक 24 (3.263.24)
कृतार्थमपि चात्मानं तदा मेने सुयोधनः । करेण च करं गृह्य कर्णस्य मुदितो भृशम् ॥
kṛtārthamapi cātmānaṃ tadā mene suyodhanaḥ | kareṇa ca karaṃ gṛhya karṇasya mudito bhṛśam
तब सुयोधन ने अपने को कृतार्थ माना और अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्ण का हाथ अपने हाथ में ले लिया।
श्लोक 25 (3.263.25)
कर्णोपि भ्रातृसहितमित्युवाच नृपं मुदा । दिष्ट्या कामः सुसंवृत्तोदिष्ट्या कौरव वर्धसे । दिष्ट्या ते शत्रवो मग्ना दुस्तरे व्यसनार्णवे ॥
karṇopi bhrātṛsahitamityuvāca nṛpaṃ mudā | diṣṭyā kāmaḥ susaṃvṛttodiṣṭyā kaurava vardhase | diṣṭyā te śatravo magnā dustare vyasanārṇave
कर्ण ने भी भाइयों के साथ प्रसन्न होकर राजा से कहा — "सौभाग्य से तुम्हारी कामना पूरी हुई! हे कौरव, सौभाग्य से तुम्हारी उन्नति हो रही है! सौभाग्य से तुम्हारे शत्रु विपत्ति के दुस्तर सागर में डूब गए हैं!
कर्ण उवाच
श्लोक 26 (3.263.26)
दुर्वासःक्रोधजे वह्नौ पतिताः पाण्डुनन्दनाः । स्वैरेव ते महापापैर्गता वै दुस्तरं तमः ॥
durvāsaḥkrodhaje vahnau patitāḥ pāṇḍunandanāḥ | svaireva te mahāpāpairgatā vai dustaraṃ tamaḥ
पाण्डुपुत्र दुर्वासा के क्रोध से उपजी आग में गिर पड़े हैं। अपने ही महापापों के कारण वे दुस्तर अन्धकार में जा पहुँचे हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (3.263.27)
इत्थं ते निकृतिप्रज्ञा राजन्दुर्योधनादयः । हसन्तः प्रीतमनसो जग्मुः स्वंस्वं निकेतनम् ॥
itthaṃ te nikṛtiprajñā rājanduryodhanādayaḥ | hasantaḥ prītamanaso jagmuḥ svaṃsvaṃ niketanam
हे राजन्, इस प्रकार कपट में निपुण दुर्योधन आदि हँसते हुए, प्रसन्न मन से अपने-अपने भवन को चले गए।