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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 264

कृष्ण द्वारा दुर्वासा से पाण्डवों की रक्षा

द्रौपदी के भोजन कर लेने के ठीक बाद दुर्वासा अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ पाण्डवों के वन-आश्रम में पहुँचते हैं, युधिष्ठिर का निमन्त्रण स्वीकार कर स्नान करने चले जाते हैं। अन्न न बचने से चिन्तित द्रौपदी श्रीकृष्ण की स्तुति करती हैं। कृष्ण तुरन्त आकर स्वयं उनसे भोजन माँगते हैं और सूर्य के दिए पात्र के किनारे लगा साग का एक कण खाकर कहते हैं कि इससे विश्वात्मा तृप्त हों। उसी क्षण नदी में स्नान करते मुनि पूरी तरह तृप्त हो जाते हैं और पाण्डवों के कोप से डरकर दुर्वासा शिष्यों सहित भाग जाते हैं। कृष्ण पाण्डवों को आश्वस्त करके लौट जाते हैं, और वैशम्पायन कहते हैं कि धृतराष्ट्र के पुत्रों के ऐसे सभी षड्यन्त्र व्यर्थ हो गए।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.264.1)

ततः कदाचिद्दुर्वासाः सुखासीनांस्तु पाण्डवान् । भुक्त्वा चावस्थितां कृष्णां ज्ञात्वा तस्मिन्वने मुनिः । अभ्यागच्छत्परिवृतः शिष्यैरयुतसंमितैः ॥

tataḥ kadāciddurvāsāḥ sukhāsīnāṃstu pāṇḍavān | bhuktvā cāvasthitāṃ kṛṣṇāṃ jñātvā tasminvane muniḥ | abhyāgacchatparivṛtaḥ śiṣyairayutasaṃmitaiḥ

फिर एक दिन मुनि दुर्वासा यह जानकर कि पाण्डव सुख से बैठे हैं और कृष्णा (द्रौपदी) भोजन करके विश्राम कर रही है, अपने दस हज़ार शिष्यों से घिरे हुए उस वन में आ पहुँचे।

श्लोक 2 (3.264.2)

दृष्ट्वायान्तं तमतिथिं स च राजा युधिष्ठिरः । जगामाभिमुखः श्रीमान्सह भ्रातृभिरच्युतः ॥

dṛṣṭvāyāntaṃ tamatithiṃ sa ca rājā yudhiṣṭhiraḥ | jagāmābhimukhaḥ śrīmānsaha bhrātṛbhiracyutaḥ

उस अतिथि को आते देखकर अपनी मर्यादा से कभी न डिगने वाले श्रीमान् राजा युधिष्ठिर भाइयों सहित उनकी अगवानी के लिए आगे बढ़े।

श्लोक 3 (3.264.3)

तस्मै बद्ध्वाञ्जलिं सम्यगुपवेश्य वरासने । विधिवत्पूजयित्वा तमातिथ्येन न्यमन्त्रयत् । आह्निकं भगवन्कृत्वा शीघ्रमेहीति चाब्रवीत् ॥

tasmai baddhvāñjaliṃ samyagupaveśya varāsane | vidhivatpūjayitvā tamātithyena nyamantrayat | āhnikaṃ bhagavankṛtvā śīghramehīti cābravīt

उन्होंने हाथ जोड़कर उन्हें आदरपूर्वक श्रेष्ठ आसन पर बिठाया, विधिपूर्वक उनकी पूजा की और आतिथ्य के लिए निमन्त्रित किया। फिर कहा, "भगवन्, अपना नित्यकर्म करके शीघ्र पधारिए।"

श्लोक 4 (3.264.4)

जगाम च मुनिः सोपि स्नातुं शिष्यैः सहानघः । भोजयेत्सहशिष्यं मां कथमित्यविचिन्तयन् ॥

jagāma ca muniḥ sopi snātuṃ śiṣyaiḥ sahānaghaḥ | bhojayetsahaśiṣyaṃ māṃ kathamityavicintayan

और वे निष्पाप मुनि भी, यह विचार किए बिना कि राजा शिष्यों सहित मुझे भोजन कैसे कराएँगे, शिष्यों के साथ स्नान करने चले गए।

श्लोक 5 (3.264.5)

न्यमज्जत्सलिले चापि मुनिसङ्घः समाहितः ॥

nyamajjatsalile cāpi munisaṅghaḥ samāhitaḥ

एकाग्रचित्त मुनियों का वह पूरा समूह जल में डुबकी लगाने लगा।

श्लोक 6 (3.264.6)

एतस्मिन्नन्तरे राजन्द्रौपदी योषितां वरा । चिन्तामवाप परमामन्नहेतोः पतिव्रता ॥

etasminnantare rājandraupadī yoṣitāṃ varā | cintāmavāpa paramāmannahetoḥ pativratā

हे राजन्, इसी बीच स्त्रियों में श्रेष्ठ पतिव्रता द्रौपदी भोजन के कारण बड़ी चिन्ता में पड़ गई।

श्लोक 7 (3.264.7)

सा चिन्तयन्ती च यदा नान्नहेतुमविन्दत । मनसा चिन्तयामास कृष्णं कंसनिषूदनम् ॥

sā cintayantī ca yadā nānnahetumavindata | manasā cintayāmāsa kṛṣṇaṃ kaṃsaniṣūdanam

बहुत सोचने पर भी जब उसे अन्न का कोई उपाय न सूझा, तब उसने मन ही मन कंस का वध करने वाले श्रीकृष्ण का स्मरण किया।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 8 (3.264.8)

कृष्णकृष्ण महाबाहो देवकीनन्दनाव्यय । वासुदेव जगन्नाथ प्रणतार्तिविनाशन ॥

kṛṣṇakṛṣṇa mahābāho devakīnandanāvyaya | vāsudeva jagannātha praṇatārtivināśana

"हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे महाबाहो, हे देवकीनन्दन, हे अविनाशी! हे वासुदेव, हे जगन्नाथ, हे शरण में आए लोगों का दुःख मिटाने वाले!

श्लोक 9 (3.264.9)

विश्वात्मन्विश्वजनक विश्वहर्तः प्रभोऽव्यय । प्रपन्नपाल गोपाल प्रजापाल परात्पर । आकूतीनां च चित्तीनां प्रवर्तक नताऽस्मि ते ॥

viśvātmanviśvajanaka viśvahartaḥ prabho'vyaya | prapannapāla gopāla prajāpāla parātpara | ākūtīnāṃ ca cittīnāṃ pravartaka natā'smi te

हे विश्वात्मा, हे विश्व के जनक और संहारक, हे अविनाशी प्रभु! हे शरणागतों के रक्षक, हे गोपाल, हे प्रजापालक, हे परात्पर! हे सब संकल्पों और चित्तवृत्तियों के प्रेरक, मैं आपको प्रणाम करती हूँ।

श्लोक 10 (3.264.10)

वरेण्य वरदानन्त अगतीनां गतिप्रद । पुराणपुरुष प्राणमनोवृत्त्याद्यगोचर ॥

vareṇya varadānanta agatīnāṃ gatiprada | purāṇapuruṣa prāṇamanovṛttyādyagocara

हे वरणीय, हे वरदाता, हे अनन्त, हे निराश्रितों को आश्रय देने वाले! हे पुराणपुरुष, हे प्राण, मन और उनकी वृत्तियों से परे रहने वाले!

श्लोक 11 (3.264.11)

सर्वाध्यक्ष पराध्यक्ष त्वामहं शरणं गता । पाहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ॥

sarvādhyakṣa parādhyakṣa tvāmahaṃ śaraṇaṃ gatā | pāhi māṃ kṛpayā deva śaraṇāgatavatsala

हे सर्वाध्यक्ष, हे परमाध्यक्ष, मैं आपकी शरण में आई हूँ। हे देव, हे शरणागतवत्सल, कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक 12 (3.264.12)

नीलोत्पलदलश्याम पद्मगर्भारुणेक्षण । पीताम्बरपरीधान लसत्कौस्तुभभूषण ॥

nīlotpaladalaśyāma padmagarbhāruṇekṣaṇa | pītāmbaraparīdhāna lasatkaustubhabhūṣaṇa

हे नीलकमल की पंखुड़ी के समान श्यामवर्ण, हे कमल के भीतरी भाग जैसी अरुण आँखों वाले, हे पीताम्बरधारी, हे चमकते कौस्तुभ मणि से विभूषित!

श्लोक 13 (3.264.13)

त्वमादिरन्तो भूतानां त्वमेव च परायणम् । परात्परतरं ज्योतिर्विश्वात्मा सर्वतोमुखः ॥

tvamādiranto bhūtānāṃ tvameva ca parāyaṇam | parātparataraṃ jyotirviśvātmā sarvatomukhaḥ

आप ही प्राणियों के आदि और अन्त हैं, और आप ही उनके परम आश्रय हैं। आप परात्पर ज्योति हैं, विश्व की आत्मा हैं, सब ओर मुख वाले हैं।

श्लोक 14 (3.264.14)

त्वामेवाहुः परं बीजं निधानं सर्वसंपदाम् । त्वया नाथेन देवेश सर्वापद्भ्यो भयं न हि ॥

tvāmevāhuḥ paraṃ bījaṃ nidhānaṃ sarvasaṃpadām | tvayā nāthena deveśa sarvāpadbhyo bhayaṃ na hi

आपको ही परम बीज और सारी सम्पदाओं का भण्डार कहा जाता है। हे देवेश, आप जैसे स्वामी के रहते किसी भी विपत्ति से भय नहीं है।

श्लोक 15 (3.264.15)

दुःशासनादहं पूर्वं सभायां मोचिता यथा । तथैव संकटादस्मान्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ॥

duḥśāsanādahaṃ pūrvaṃ sabhāyāṃ mocitā yathā | tathaiva saṃkaṭādasmānmāmuddhartumihārhasi

जैसे आपने पहले सभा में मुझे दुःशासन से छुड़ाया था, वैसे ही अब इस संकट से भी मेरा उद्धार कीजिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.264.16)

एवं स्तुतस्तदा देवः कृष्णया भक्तवत्सलः । द्रौपद्याः संकटं ज्ञात्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥

evaṃ stutastadā devaḥ kṛṣṇayā bhaktavatsalaḥ | draupadyāḥ saṃkaṭaṃ jñātvā devadevo jagatpatiḥ

कृष्णा के इस प्रकार स्तुति करने पर भक्तवत्सल, देवाधिदेव जगत्पति भगवान् ने द्रौपदी के संकट को जान लिया।

श्लोक 17 (3.264.17)

पार्श्वस्थां शयने त्यक्त्वा रुक्मिणीं केशवः प्रभुः । तत्राजगाम त्वरितो ह्यचिन्त्यगतिरीश्वरः ॥

pārśvasthāṃ śayane tyaktvā rukmiṇīṃ keśavaḥ prabhuḥ | tatrājagāma tvarito hyacintyagatirīśvaraḥ

शय्या पर अपने पास लेटी रुक्मिणी को छोड़कर, जिनकी गति अचिन्त्य है वे प्रभु केशव तुरन्त वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 18 (3.264.18)

ततस्तं द्रौपदी दृष्ट्वाप्रणम्य परया मुदा । अब्रवीद्वासुदेवाय मुनेरागमनादिकम् ॥

tatastaṃ draupadī dṛṣṭvāpraṇamya parayā mudā | abravīdvāsudevāya munerāgamanādikam

उन्हें देखकर द्रौपदी ने अत्यन्त हर्ष से प्रणाम किया और वासुदेव को मुनि के आगमन आदि का सारा वृत्तान्त सुनाया।

श्लोक 19 (3.264.19)

ततस्तामब्रवीत्कृष्णः क्षुधितोस्मि भृशातुरः । शीघ्रं भोजय मां कृष्णे पश्चात्सर्वं करिष्यसि ॥

tatastāmabravītkṛṣṇaḥ kṣudhitosmi bhṛśāturaḥ | śīghraṃ bhojaya māṃ kṛṣṇe paścātsarvaṃ kariṣyasi

तब कृष्ण ने उससे कहा, "मैं भूख से बहुत व्याकुल हूँ। हे कृष्णे, मुझे शीघ्र भोजन कराओ; बाकी सब बाद में कर लेना।"

श्लोक 20 (3.264.20)

निशम्य तद्वचः कृष्णा लज्जिता वाक्यमब्रवीत् । स्थाल्यां भास्करदत्तायामन्नं मद्भोजनावधि ॥

niśamya tadvacaḥ kṛṣṇā lajjitā vākyamabravīt | sthālyāṃ bhāskaradattāyāmannaṃ madbhojanāvadhi

उनकी बात सुनकर कृष्णा लज्जित होकर बोली, "सूर्य के दिए पात्र में अन्न तभी तक रहता है जब तक मैं भोजन न कर लूँ,

श्लोक 21 (3.264.21)

भुक्तवत्यस्म्यहं देव तस्मादन्नं न विद्यते । ततः प्रोवाच भगवान्कृष्णां कमललोचनः ॥

bhuktavatyasmyahaṃ deva tasmādannaṃ na vidyate | tataḥ provāca bhagavānkṛṣṇāṃ kamalalocanaḥ

और हे देव, मैं भोजन कर चुकी हूँ, इसलिए अब अन्न नहीं बचा।" तब कमलनयन भगवान् ने कृष्णा से कहा —

कृष्ण उवाच

श्लोक 22 (3.264.22)

कृष्णे न नर्मकालोऽयं क्षुच्छ्रमेणातुरे मयि । शीघ्रं गच्छ मम स्थालीमानयित्वा प्रदर्शय ॥

kṛṣṇe na narmakālo'yaṃ kṣucchrameṇāture mayi | śīghraṃ gaccha mama sthālīmānayitvā pradarśaya

"हे कृष्णे, जब मैं भूख और थकान से व्याकुल हूँ, तब यह हँसी-ठिठोली का समय नहीं है। जल्दी जाओ, पात्र लाकर मुझे दिखाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (3.264.23)

इति निर्बन्धतः स्थालीमानाय्य स यदूद्वहः । स्थाल्याः कण्ठेऽथ संलग्नं शाकान्नं वीक्ष्यकेशवः ॥

iti nirbandhataḥ sthālīmānāyya sa yadūdvahaḥ | sthālyāḥ kaṇṭhe'tha saṃlagnaṃ śākānnaṃ vīkṣyakeśavaḥ

इस प्रकार आग्रह करके पात्र मँगवाने पर यदुश्रेष्ठ केशव ने देखा कि उसके किनारे पर साग और अन्न का एक कण लगा है।

श्लोक 24 (3.264.24)

उपयुज्याब्रवीदेनामनेन हरिरीश्वरः । विश्वात्मा प्रीयतां देवस्तुष्टश्चास्त्विति यज्ञभूक् ॥

upayujyābravīdenāmanena harirīśvaraḥ | viśvātmā prīyatāṃ devastuṣṭaścāstviti yajñabhūk

उसे खाकर भगवान् हरि ने उससे कहा, "इससे यज्ञभोक्ता विश्वात्मा देव प्रसन्न और तृप्त हों।"

श्लोक 25 (3.264.25)

आकारय मुनीञ्शीघ्रं भोजनायेति चाब्रवीत् । भीमसेनं महाबाहुः कृष्णः क्लेशविनाशनः ॥

ākāraya munīñśīghraṃ bhojanāyeti cābravīt | bhīmasenaṃ mahābāhuḥ kṛṣṇaḥ kleśavināśanaḥ

फिर क्लेशों का नाश करने वाले महाबाहु कृष्ण ने भीमसेन से कहा, "मुनियों को शीघ्र भोजन के लिए बुला लाओ।"

श्लोक 26 (3.264.26)

ततो जगाम त्वरितो भीमसेनो महायशाः । आकारितुं तु तान्सर्वान्भोजनार्थं नृपोत्तम । स्नातुं गतान्देवनद्यां दुर्वासःप्रभृतीन्मुनीन् ॥

tato jagāma tvarito bhīmaseno mahāyaśāḥ | ākārituṃ tu tānsarvānbhojanārthaṃ nṛpottama | snātuṃ gatāndevanadyāṃ durvāsaḥprabhṛtīnmunīn

हे नृपश्रेष्ठ, तब यशस्वी भीमसेन देवनदी में स्नान करने गए दुर्वासा आदि सब मुनियों को भोजन के लिए बुलाने तुरन्त चल पड़े।

श्लोक 27 (3.264.27)

ते चावतीर्णाः सलिले कृतवन्तोऽघमर्षणम् । दृष्ट्वोद्गारान्सान्नरसांस्तृप्त्या परमया युताः । उत्तीर्य सलिलात्तस्माद्दृष्टवन्तः परस्परम् ॥

te cāvatīrṇāḥ salile kṛtavanto'ghamarṣaṇam | dṛṣṭvodgārānsānnarasāṃstṛptyā paramayā yutāḥ | uttīrya salilāttasmāddṛṣṭavantaḥ parasparam

जल में उतरकर अघमर्षण का जप करते हुए उन मुनियों को अन्न के रस वाली डकारें आने लगीं और वे पूर्णतः तृप्त हो गए। जल से बाहर निकलकर वे एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

श्लोक 28 (3.264.28)

दुर्वाससमभिप्रेक्ष्यते सर्वे मुनयोऽब्रुवन् । राज्ञा हिकारयित्वाऽन्नं वयं स्नातुं समागताः ॥

durvāsasamabhiprekṣyate sarve munayo'bruvan | rājñā hikārayitvā'nnaṃ vayaṃ snātuṃ samāgatāḥ

दुर्वासा की ओर देखकर सब मुनि बोले, "हम तो राजा से भोजन बनवाकर स्नान करने आए हैं,

मुनय ऊचुः

श्लोक 29 (3.264.29)

आकण्ठतृप्ता विप्रर्षे किंस्विद्भुञ्जामहे वयम् । वृथा पाकः कृतोस्माभिस्तत्र किं करवामहे ॥

ākaṇṭhatṛptā viprarṣe kiṃsvidbhuñjāmahe vayam | vṛthā pākaḥ kṛtosmābhistatra kiṃ karavāmahe

पर हे विप्रर्षे, अब हम गले तक तृप्त हैं; हम भोजन कैसे करें? हमने व्यर्थ ही भोजन बनवाया। अब क्या करें?"

दुर्वासा उवाच

श्लोक 30 (3.264.30)

वृथा पाकेन राजर्षेरपराधः कृतो महान् । माऽस्मानधाक्षुर्दृष्ट्वैव पाण्डवाः क्रूरचक्षुषा ॥

vṛthā pākena rājarṣeraparādhaḥ kṛto mahān | mā'smānadhākṣurdṛṣṭvaiva pāṇḍavāḥ krūracakṣuṣā

"व्यर्थ भोजन बनवाकर हमने उस राजर्षि का बड़ा अपराध किया है। कहीं ऐसा न हो कि पाण्डव हमें देखते ही अपनी क्रूर दृष्टि से भस्म कर दें।

श्लोक 31 (3.264.31)

स्मृत्वाऽनुभावं राजर्षेरम्बरीषस्य धीमतः । बिभेमि सुतरां विप्रा हरिपादाश्रयाज्जनात् ॥

smṛtvā'nubhāvaṃ rājarṣerambarīṣasya dhīmataḥ | bibhemi sutarāṃ viprā haripādāśrayājjanāt

हे विप्रो, बुद्धिमान राजर्षि अम्बरीष का प्रभाव याद करके मैं हरि के चरणों का आश्रय लेने वाले लोगों से बहुत डरता हूँ।

श्लोक 32 (3.264.32)

पाण्डवाश्च महात्मानः सर्वे धर्मपरायणाः । शूराश्चकृतविद्याश्च व्रतिनस्तपसि स्थिताः ॥

pāṇḍavāśca mahātmānaḥ sarve dharmaparāyaṇāḥ | śūrāścakṛtavidyāśca vratinastapasi sthitāḥ

महात्मा पाण्डव सब के सब धर्मपरायण हैं; वे शूरवीर, विद्वान्, व्रतधारी और तप में स्थित हैं,

श्लोक 33 (3.264.33)

सदाचाररता नित्यं वासुदेवपरायणाः । क्रुद्धास्ते निर्दहेयुर्वै तूलराशिमिवानलः । तत एतानपृष्ट्वैव शिष्याः शीघ्रं पलायत ॥

sadācāraratā nityaṃ vāsudevaparāyaṇāḥ | kruddhāste nirdaheyurvai tūlarāśimivānalaḥ | tata etānapṛṣṭvaiva śiṣyāḥ śīghraṃ palāyata

सदा सदाचार में लगे रहते हैं और वासुदेव के भक्त हैं। क्रुद्ध होने पर वे हमें वैसे ही जला डालेंगे जैसे आग रुई के ढेर को। इसलिए हे शिष्यो, उनसे बिना पूछे ही शीघ्र भाग चलो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (3.264.34)

इत्युक्तास्ते द्विजाः सर्वे मुनिना गुरुणा तदा । पाण्डवेभ्यो भृशं भीता दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥

ityuktāste dvijāḥ sarve muninā guruṇā tadā | pāṇḍavebhyo bhṛśaṃ bhītā dudruvuste diśo daśa

अपने गुरु मुनि के ऐसा कहने पर वे सब ब्राह्मण पाण्डवों से अत्यन्त भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 35 (3.264.35)

भीमसेनो देवनद्यामपश्यन्मुनिसत्तमान् । तीर्थेष्वितस्ततस्तस्या विचचार गवेषयन् ॥

bhīmaseno devanadyāmapaśyanmunisattamān | tīrtheṣvitastatastasyā vicacāra gaveṣayan

देवनदी में उन श्रेष्ठ मुनियों को न पाकर भीमसेन उसके घाटों पर इधर-उधर उन्हें खोजते हुए घूमते रहे।

श्लोक 36 (3.264.36)

तत्रस्थेभ्यस्तापसेभ्यः श्रुत्वा तांश्चैव विद्रुतान् । युधिष्ठिरमथाभ्येत्य तं वृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥

tatrasthebhyastāpasebhyaḥ śrutvā tāṃścaiva vidrutān | yudhiṣṭhiramathābhyetya taṃ vṛttāntaṃ nyavedayat

वहाँ रहने वाले तपस्वियों से उनके भाग जाने की बात सुनकर वे युधिष्ठिर के पास लौटे और उन्हें सारा वृत्तान्त सुनाया।

श्लोक 37 (3.264.37)

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे प्रत्यागमनकाङ्क्षिणः । प्रतीक्षन्तः कियत्कालं जितात्मानोऽवतस्थिरे ॥

tataste pāṇḍavāḥ sarve pratyāgamanakāṅkṣiṇaḥ | pratīkṣantaḥ kiyatkālaṃ jitātmāno'vatasthire

तब सब जितेन्द्रिय पाण्डव उनके लौटने की आशा में कुछ समय तक प्रतीक्षा करते रहे।

पाण्डवा ऊचुः

श्लोक 38 (3.264.38)

निशीथेऽभ्येत्य चाकस्मादस्मान्स च्छलयिष्यति । कथं च निस्तरेमास्मात्कृच्छ्राद्दैवोपसादितात् ॥

niśīthe'bhyetya cākasmādasmānsa cchalayiṣyati | kathaṃ ca nistaremāsmātkṛcchrāddaivopasāditāt

"वे आधी रात को अचानक आकर हमें छल में फँसा देंगे। दैव के लाए इस संकट से हम कैसे पार पाएँगे?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (3.264.39)

इति चिन्तापरान्दृष्ट्वा निःश्वसन्तो मुहुर्मुहुः । उवाच वचनं श्रीमान्कृष्णः प्रत्यक्षतां गतः ॥

iti cintāparāndṛṣṭvā niḥśvasanto muhurmuhuḥ | uvāca vacanaṃ śrīmānkṛṣṇaḥ pratyakṣatāṃ gataḥ

उन्हें इस प्रकार चिन्ता में डूबे और बार-बार लम्बी साँसें लेते देखकर श्रीमान् कृष्ण उनके सामने प्रकट हुए और यह वचन बोले —

कृष्ण उवाच

श्लोक 40 (3.264.40)

भवतामापदं ज्ञात्वा ऋषेः परमकोपनात् । द्रौपद्या चिन्तितः पार्था अहं सत्वरमागतः ॥

bhavatāmāpadaṃ jñātvā ṛṣeḥ paramakopanāt | draupadyā cintitaḥ pārthā ahaṃ satvaramāgataḥ

"हे पार्थो, उस परम क्रोधी ऋषि से तुम पर आई विपत्ति को जानकर, द्रौपदी के स्मरण करने पर मैं तुरन्त यहाँ आया हूँ।

श्लोक 41 (3.264.41)

न भयं विद्यतेतस्मादृषेर्दुर्वाससोऽल्पकम् । तेजसा भवतां भीतः पूर्वमेव पलायितः ॥

na bhayaṃ vidyatetasmādṛṣerdurvāsaso'lpakam | tejasā bhavatāṃ bhītaḥ pūrvameva palāyitaḥ

दुर्वासा ऋषि से तुम्हें तनिक भी भय नहीं है। तुम्हारे तेज से डरकर वे पहले ही भाग चुके हैं।

श्लोक 42 (3.264.42)

धर्मनित्यास्तु ये केचिन्न ते सीदन्ति कर्हिचित् । आपृच्छे वो गमिष्यामि नियतं भद्रमस्तु वः ॥

dharmanityāstu ye kecinna te sīdanti karhicit | āpṛcche vo gamiṣyāmi niyataṃ bhadramastu vaḥ

जो सदा धर्म में लगे रहते हैं, वे कभी दुःख नहीं पाते। अब मैं तुमसे विदा लेकर जाता हूँ; तुम्हारा सदा कल्याण हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (3.264.43)

श्रुत्वेरितं केशवस्य बभूवुः स्वस्थमानसाः । द्रौपद्या सहिताः पार्थास्तमूचुर्विगतज्वराः ॥

śrutveritaṃ keśavasya babhūvuḥ svasthamānasāḥ | draupadyā sahitāḥ pārthāstamūcurvigatajvarāḥ

केशव के वचन सुनकर द्रौपदी सहित पार्थों का मन स्वस्थ हो गया, और चिन्ता का ज्वर उतर जाने पर उन्होंने उनसे कहा —

पाण्डवा ऊचुः

श्लोक 44 (3.264.44)

त्वया नाथेन गोविन्द दुस्तरामापदं विभो । तीर्णाः प्लवमिवासाद्य मज्जमाना महार्णवे ॥

tvayā nāthena govinda dustarāmāpadaṃ vibho | tīrṇāḥ plavamivāsādya majjamānā mahārṇave

"हे गोविन्द, हे विभो, आप जैसे रक्षक के सहारे हम इस दुस्तर विपत्ति से वैसे ही पार हो गए जैसे महासागर में डूबते लोग बेड़ा पाकर पार हो जाते हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 45 (3.264.45)

स्वस्ति साधय भद्रं ते इत्याज्ञातो ययौ पुरीम् ॥

svasti sādhaya bhadraṃ te ityājñāto yayau purīm

"आपका मंगल हो, सकुशल पधारिए" — इस प्रकार विदा पाकर वे अपनी नगरी को चले गए।

श्लोक 46 (3.264.46)

पाण्डवाश्च महाभाग द्रौपद्या सहिताः प्रभो । ऊषुः प्रहृष्टमनसो विहरन्तो वनाद्वनम् । इति तेऽभिहितं राजन्यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ॥

pāṇḍavāśca mahābhāga draupadyā sahitāḥ prabho | ūṣuḥ prahṛṣṭamanaso viharanto vanādvanam | iti te'bhihitaṃ rājanyatpṛṣṭo'hamiha tvayā

हे महाभाग प्रभो, द्रौपदी सहित पाण्डव प्रसन्न मन से एक वन से दूसरे वन में विचरते हुए रहने लगे। हे राजन्, तुमने मुझसे जो पूछा था, वह मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 47 (3.264.47)

एवंविधान्यलीकानि धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः । पाण्डवेषु वनस्थेषु प्रयुक्तानि वृथाऽभवन् ॥

evaṃvidhānyalīkāni dhārtarāṣṭrairdurātmabhiḥ | pāṇḍaveṣu vanastheṣu prayuktāni vṛthā'bhavan

वन में रहते पाण्डवों के विरुद्ध धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्रों ने ऐसे-ऐसे अनिष्टकारी उपाय किए, पर वे सब व्यर्थ हो गए।

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