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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 27

वन में द्रौपदी का विलाप

एक सन्ध्या वन में द्रौपदी युधिष्ठिर के सामने अपना दुःख प्रकट करती है। वह उनके पहले के वैभव — रत्नजटित हाथीदाँत का सिंहासन, हज़ारों ब्राह्मणों को भोजन — की तुलना वनवास के वल्कल और कुश की चटाई से करती है, और बार-बार पूछती है कि भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव और स्वयं उसे दुःख में देखकर भी उनका क्रोध क्यों नहीं जागता। अन्त में वह कहती है कि क्रोधहीन क्षत्रिय का सब तिरस्कार करते हैं, यद्यपि क्षमा के समय शान्त न होने वाला क्षत्रिय भी नष्ट होता है।

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.27.1)

ततो वनगताः पार्थाः सायाह्ने सह कृष्णया । उपविष्टाः कथाश्चक्रुर्दुःखशोकपरायणाः ॥

tato vanagatāḥ pārthāḥ sāyāhne saha kṛṣṇayā | upaviṣṭāḥ kathāścakrurduḥkhaśokaparāyaṇāḥ

तब वन में आए पृथापुत्र सन्ध्या के समय द्रौपदी के साथ बैठकर दुःख और शोक में डूबे हुए आपस में बातें करने लगे।

श्लोक 2 (3.27.2)

प्रिया च दर्शनीया च पण्डिता च पतिव्रता । अथ कृष्णा धर्मराजमिदं वचनमब्रवीत् ॥

priyā ca darśanīyā ca paṇḍitā ca pativratā | atha kṛṣṇā dharmarājamidaṃ vacanamabravīt

तब प्रिय, दर्शनीय, विदुषी और पतिव्रता द्रौपदी ने धर्मराज से यह वचन कहा।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 3 (3.27.3)

न नूनं तस्य पापस्य दुःखमस्मासु किंचन । विद्यते धार्तराष्ट्रस्य नृशंसस्य दुरात्मनः ॥

na nūnaṃ tasya pāpasya duḥkhamasmāsu kiṃcana | vidyate dhārtarāṣṭrasya nṛśaṃsasya durātmanaḥ

निश्चय ही उस पापी, क्रूर और दुष्टात्मा धृतराष्ट्रपुत्र को हमारे लिए तनिक भी दुःख नहीं है।

श्लोक 4 (3.27.4)

यस्त्वां राजन्मया सार्धमजिनैः प्रतिवासितम् । वनं प्रस्थाप्य दुष्टात्मा नान्वतप्यत दुर्मतिः ॥

yastvāṃ rājanmayā sārdhamajinaiḥ prativāsitam | vanaṃ prasthāpya duṣṭātmā nānvatapyata durmatiḥ

हे राजन्, उस दुष्टबुद्धि दुरात्मा ने आपको मेरे साथ मृगचर्म पहनाकर वन भेज दिया, फिर भी उसे कोई पछतावा नहीं हुआ।

श्लोक 5 (3.27.5)

आयसं हृदयं नूनं तस्य दुष्कृतकर्मणः । यस्त्वां धर्मपरं श्रेष्ठं रूक्षाण्यश्रावयत्तदा । वचनान्यपरोक्षाणि दुर्वाच्यानि च संसदि ॥

āyasaṃ hṛdayaṃ nūnaṃ tasya duṣkṛtakarmaṇaḥ | yastvāṃ dharmaparaṃ śreṣṭhaṃ rūkṣāṇyaśrāvayattadā | vacanānyaparokṣāṇi durvācyāni ca saṃsadi

निश्चय ही उस दुष्कर्मी का हृदय लोहे का है, जिसने उस समय धर्मपरायण और श्रेष्ठ आपको भरी सभा में मुँह पर कही गई, न कहने योग्य कठोर बातें सुनाईं।

श्लोक 6 (3.27.6)

सुखोचितमदुःखार्हं दुरात्मा ससुहृद्गणः । ईदृशं दुःखमानीय मोदते पापपूरुषः ॥

sukhocitamaduḥkhārhaṃ durātmā sasuhṛdgaṇaḥ | īdṛśaṃ duḥkhamānīya modate pāpapūruṣaḥ

आप सुख के अभ्यस्त थे, दुःख के योग्य नहीं; फिर भी आपको ऐसे दुःख में डालकर वह दुरात्मा पापी अपने मित्रों के साथ आनन्द मना रहा है।

श्लोक 7 (3.27.7)

चतुर्णामेव पापानामस्रं न पतितं तदा । त्वयि भारत निष्क्रान्ते वनायाजिनवाससि ॥

caturṇāmeva pāpānāmasraṃ na patitaṃ tadā | tvayi bhārata niṣkrānte vanāyājinavāsasi

हे भारत, जब आप मृगचर्म पहनकर वन को निकले, तब केवल चार पापियों की आँखों से आँसू नहीं गिरे —

श्लोक 8 (3.27.8)

दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः । दुर्भ्रातुस्तस्य चोग्रस्य राजन्दुःशासनस्य च ॥

duryodhanasya karṇasya śakuneśca durātmanaḥ | durbhrātustasya cograsya rājanduḥśāsanasya ca

दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि और, हे राजन्, वह उग्र दुष्ट भाई दुःशासन।

श्लोक 9 (3.27.9)

इतरेषां तु सर्वेषां कुरूणां कुरुसत्तम । दुःखेनाभिपरीतानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥

itareṣāṃ tu sarveṣāṃ kurūṇāṃ kurusattama | duḥkhenābhiparītānāṃ netrebhyaḥ prāpatajjalam

हे कुरुश्रेष्ठ, किन्तु शेष सभी कुरुओं की आँखों से, जो दुःख से घिर गए थे, आँसू बह निकले।

श्लोक 10 (3.27.10)

इदं च शयनं दृष्ट्वा यच्चासीत्ते पुरातनम् । शोचामि त्वां महाराज दुःखानर्हं सुखोचितम् ॥

idaṃ ca śayanaṃ dṛṣṭvā yaccāsītte purātanam | śocāmi tvāṃ mahārāja duḥkhānarhaṃ sukhocitam

यह शय्या देखकर, और आपकी पहले की शय्या को याद करके, हे महाराज, मैं आपके लिए शोक करती हूँ — आप दुःख के योग्य नहीं थे, सुख के अभ्यस्त थे।

श्लोक 11 (3.27.11)

दान्तं यच्च सभामध्य आसनं रत्नभूषितम् । दृष्ट्वा कुशबृसीं चेमां शोको मां दारयत्ययम् ॥

dāntaṃ yacca sabhāmadhya āsanaṃ ratnabhūṣitam | dṛṣṭvā kuśabṛsīṃ cemāṃ śoko māṃ dārayatyayam

सभा के बीच रखे उस रत्नजटित हाथीदाँत के आसन को याद करके और यह कुश की चटाई देखकर यह शोक मुझे विदीर्ण कर देता है।

श्लोक 12 (3.27.12)

यदपश्यं सभायां त्वां राजभिः परिवारितम् । तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥

yadapaśyaṃ sabhāyāṃ tvāṃ rājabhiḥ parivāritam | tacca rājannapaśyantyāḥ kā śāntirhṛdayasya me

मैं आपको सभा में राजाओं से घिरा देखा करती थी। हे राजन्, अब वह दृश्य न देखकर मेरे हृदय को क्या शान्ति मिले?

श्लोक 13 (3.27.13)

या त्वाऽहं चन्दनादिग्धमपश्यं सूर्यवर्चसम् । सा त्वां पङ्कमलादिग्धं दृष्ट्वा मुह्यामि भारत ॥

yā tvā'haṃ candanādigdhamapaśyaṃ sūryavarcasam | sā tvāṃ paṅkamalādigdhaṃ dṛṣṭvā muhyāmi bhārata

हे भारत, जिसने कभी आपको चन्दन से लिप्त और सूर्य के समान तेजस्वी देखा था, वही मैं आज आपको कीचड़ और मैल से सना देखकर व्याकुल हो जाती हूँ।

श्लोक 14 (3.27.14)

या त्वाऽहं कौशिकैर्वस्त्रैः शुभ्रैराच्छादितं पुरा । दृष्टवत्यस्मि राजेन्द्र साऽद्य पश्यामि चीरिणम् ॥

yā tvā'haṃ kauśikairvastraiḥ śubhrairācchāditaṃ purā | dṛṣṭavatyasmi rājendra sā'dya paśyāmi cīriṇam

हे राजेन्द्र, जिसने आपको कभी उजले रेशमी वस्त्रों से ढका देखा था, वही आज आपको वल्कल पहने देख रही है।

श्लोक 15 (3.27.15)

यच्च तद्रुक्मपात्रीभिर्ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः । ह्रियते ते गृहादन्नं संस्कृतं सार्वकामिकम् ॥

yacca tadrukmapātrībhirbrāhmaṇebhyaḥ sahasraśaḥ | hriyate te gṛhādannaṃ saṃskṛtaṃ sārvakāmikam

आपके घर से हज़ारों ब्राह्मणों के लिए सोने की थालियों में हर रुचि के अनुसार तैयार किया हुआ भोजन ले जाया जाता था।

श्लोक 16 (3.27.16)

यतीनामगृहाणां ते तथैव गृहमेधिनाम् । दीयते भोजनं राजन्नतीव गुणवत्प्रभो ॥

yatīnāmagṛhāṇāṃ te tathaiva gṛhamedhinām | dīyate bhojanaṃ rājannatīva guṇavatprabho

हे राजन्, हे प्रभो, आपके यहाँ गृहहीन संन्यासियों को और गृहस्थों को भी अत्यन्त उत्तम भोजन दिया जाता था।

श्लोक 17 (3.27.17)

सत्कृतानि सहस्राणि सर्वकामैः पुरा गृहे । सर्वकामैः सुविहितैर्यदपूजयथा द्विजान् । तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥

satkṛtāni sahasrāṇi sarvakāmaiḥ purā gṛhe | sarvakāmaiḥ suvihitairyadapūjayathā dvijān | tacca rājannapaśyantyāḥ kā śāntirhṛdayasya me

पहले आप अपने घर में हज़ारों ब्राह्मणों का सत्कार करते थे और भली-भाँति सजाई हुई सब मनचाही वस्तुओं से उनका पूजन करते थे। हे राजन्, अब वह न देखकर मेरे हृदय को क्या शान्ति मिले?

श्लोक 18 (3.27.18)

यत्ते भ्रातॄन्महाराज युवानो मृष्टकुण्डलाः । अभोजयन्त मृष्टान्नैः सूदाः परमसंस्कृतैः ॥

yatte bhrātṝnmahārāja yuvāno mṛṣṭakuṇḍalāḥ | abhojayanta mṛṣṭānnaiḥ sūdāḥ paramasaṃskṛtaiḥ

हे महाराज, चमकते कुण्डल पहने युवा रसोइये आपके भाइयों को उत्तम ढंग से बनाए गए स्वादिष्ट व्यंजन खिलाया करते थे।

श्लोक 19 (3.27.19)

सर्वांस्तानद्य पश्यामि वने वन्येन जीविनः । अदुःखार्हान्मनुष्येन्द्र नोपशाम्यति मे मनः ॥

sarvāṃstānadya paśyāmi vane vanyena jīvinaḥ | aduḥkhārhānmanuṣyendra nopaśāmyati me manaḥ

हे नरेन्द्र, आज मैं उन सबको वन में वन के फल-मूल पर जीते देखती हूँ, जबकि वे दुःख के योग्य नहीं; इससे मेरा मन शान्त नहीं होता।

श्लोक 20 (3.27.20)

भीमसेनमिमं चापि दुःखितं वनवासिनम् । ध्यायतः किं न मन्युस्ते प्राप्ते काले विवर्धते ॥

bhīmasenamimaṃ cāpi duḥkhitaṃ vanavāsinam | dhyāyataḥ kiṃ na manyuste prāpte kāle vivardhate

वन में रहने वाले इस दुःखी भीमसेन के बारे में सोचते हुए भी, समय आ जाने पर, आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता?

श्लोक 21 (3.27.21)

भीमसेनं हि कर्माणि स्वयं कुर्वाणमच्युतम् । सुखार्हं दुःखितं दृष्ट्वा कस्माद्राजन्नुपेक्षसे ॥

bhīmasenaṃ hi karmāṇi svayaṃ kurvāṇamacyutam | sukhārhaṃ duḥkhitaṃ dṛṣṭvā kasmādrājannupekṣase

अडिग भीमसेन सारे काम अपने हाथों से करता है; सुख के योग्य उसे दुःखी देखकर भी, हे राजन्, आप इसकी उपेक्षा क्यों करते हैं?

श्लोक 22 (3.27.22)

सत्कृतं विविधैर्यानैर्वस्त्रैरुच्चावचैस्तथा । तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ॥

satkṛtaṃ vividhairyānairvastrairuccāvacaistathā | taṃ te vanagataṃ dṛṣṭvā kasmānmanyurna vardhate

जिसका भाँति-भाँति के वाहनों और तरह-तरह के वस्त्रों से सत्कार होता था, उसे वन में पड़ा देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता?

श्लोक 23 (3.27.23)

अयं कुरून्रणे सर्वान्हन्तुमुत्सहते प्रभुः । त्वत्प्रतिज्ञां प्रतीक्षंस्तु सहतेऽयं वृकोदरः ॥

ayaṃ kurūnraṇe sarvānhantumutsahate prabhuḥ | tvatpratijñāṃ pratīkṣaṃstu sahate'yaṃ vṛkodaraḥ

यह समर्थ वृकोदर युद्ध में सब कुरुओं को मार डालने का साहस रखता है; केवल आपकी प्रतिज्ञा की प्रतीक्षा में ही यह सब सह रहा है।

श्लोक 24 (3.27.24)

योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना । शरातिसर्गे शीघ्रत्वात्कालान्तकयमोपमः ॥

yo'rjunenārjunastulyo dvibāhurbahubāhunā | śarātisarge śīghratvātkālāntakayamopamaḥ

दो भुजाओं वाला अर्जुन सहस्रबाहु अर्जुन (कार्तवीर्य) के समान है; बाण छोड़ने की शीघ्रता में वह काल, अन्तक और यम जैसा है।

श्लोक 25 (3.27.25)

यस्य शस्त्रप्रतापेन प्रणताः सर्वपार्थिवाः । यज्ञे तव महाराज ब्राह्मणानुपतस्थिरे ॥

yasya śastrapratāpena praṇatāḥ sarvapārthivāḥ | yajñe tava mahārāja brāhmaṇānupatasthire

हे महाराज, उसी के शस्त्रों के प्रताप से सब राजा झुक गए और आपके यज्ञ में ब्राह्मणों की सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 26 (3.27.26)

तमिमं पुरुषव्याघ्रं पूजितं देवदानवैः । ध्यायन्तमर्जुनं दृष्ट्वा कस्माद्राजन्न कुप्यसि ॥

tamimaṃ puruṣavyāghraṃ pūjitaṃ devadānavaiḥ | dhyāyantamarjunaṃ dṛṣṭvā kasmādrājanna kupyasi

देवताओं और दानवों से पूजित इस पुरुषसिंह अर्जुन को चिन्ता में डूबा देखकर, हे राजन्, आप कुपित क्यों नहीं होते?

श्लोक 27 (3.27.27)

दृष्ट्वा वनगतं पार्थमदुःखार्हं सुखोचितम् । न च ते वर्धते मन्युस्तेन मुह्यामि भारत ॥

dṛṣṭvā vanagataṃ pārthamaduḥkhārhaṃ sukhocitam | na ca te vardhate manyustena muhyāmi bhārata

दुःख के अयोग्य और सुख के अभ्यस्त पार्थ को वन में देखकर भी आपका क्रोध नहीं बढ़ता — हे भारत, इसी से मैं हतबुद्धि हूँ।

श्लोक 28 (3.27.28)

यो देवांश्च मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजयत् । तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ॥

yo devāṃśca manuṣyāṃśca sarpāṃścaikaratho'jayat | taṃ te vanagataṃ dṛṣṭvā kasmānmanyurna vardhate

जिसने अकेले रथ से देवताओं, मनुष्यों और नागों को जीत लिया, उसे वन में देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता?

श्लोक 29 (3.27.29)

यो यानैरद्भुताकारैर्हयैर्नागैश्च संवृतः । प्रसह्य वित्तान्यादत्त पार्थिवेभ्यः परंतप ॥

yo yānairadbhutākārairhayairnāgaiśca saṃvṛtaḥ | prasahya vittānyādatta pārthivebhyaḥ paraṃtapa

हे परन्तप, जिसने अद्भुत आकार वाले रथों, घोड़ों और हाथियों के साथ राजाओं से बलपूर्वक धन ले लिया,

श्लोक 30 (3.27.30)

क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्चबाणशतानि यः । तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ॥

kṣipatyekena vegena pañcabāṇaśatāni yaḥ | taṃ te vanagataṃ dṛṣṭvā kasmānmanyurna vardhate

और जो एक ही वेग में पाँच सौ बाण छोड़ता है — उसे वन में देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता?

श्लोक 31 (3.27.31)

श्यामं बृहन्तं तरुणं चर्मिणामुत्तमं रणे । नकुलं ते वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ॥

śyāmaṃ bṛhantaṃ taruṇaṃ carmiṇāmuttamaṃ raṇe | nakulaṃ te vane dṛṣṭvā kasmānmanyurna vardhate

साँवले, ऊँचे-पूरे, युवा और युद्ध में ढाल-तलवार धारण करने वालों में श्रेष्ठ नकुल को वन में देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता?

श्लोक 32 (3.27.32)

दर्शनीयं च शूरं च माद्रीपुत्रं युधिष्ठिर । सहदेवं वने दृष्ट्वा कस्मात्क्षमसि पार्थिव ॥

darśanīyaṃ ca śūraṃ ca mādrīputraṃ yudhiṣṭhira | sahadevaṃ vane dṛṣṭvā kasmātkṣamasi pārthiva

हे युधिष्ठिर, माद्री के सुन्दर और शूरवीर पुत्र सहदेव को वन में देखकर, हे राजन्, आप यह क्यों सह रहे हैं?

श्लोक 33 (3.27.33)

नकुलं सहदेवं च दृष्ट्वा ते दुःखितावुभौ । अदुःखार्हौ मनुष्येन्द्र कस्मान्मन्युर्न वर्धते ॥

nakulaṃ sahadevaṃ ca dṛṣṭvā te duḥkhitāvubhau | aduḥkhārhau manuṣyendra kasmānmanyurna vardhate

हे नरेन्द्र, दुःख के अयोग्य नकुल और सहदेव दोनों को दुःखी देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता?

श्लोक 34 (3.27.34)

द्रुपदस्य कुले जातां स्नुषां पाण्डोर्महात्मनः । धृष्टद्युम्नस्य भगिनीं वीरपत्नीमनुव्रताम् । मां वै वनगतां दृष्ट्वा कस्मात्क्षमसि पार्थिव ॥

drupadasya kule jātāṃ snuṣāṃ pāṇḍormahātmanaḥ | dhṛṣṭadyumnasya bhaginīṃ vīrapatnīmanuvratām | māṃ vai vanagatāṃ dṛṣṭvā kasmātkṣamasi pārthiva

मैं द्रुपद के कुल में जन्मी हूँ, महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू हूँ, धृष्टद्युम्न की बहन और वीरों की अनुगामिनी पत्नी हूँ; मुझे वन में देखकर, हे राजन्, आप यह क्यों सह रहे हैं?

श्लोक 35 (3.27.35)

नूनं च तव नैवास्ति मन्युर्भरतसत्तम । यत्ते भ्रातॄंश्च मां चैव दृष्ट्वा न व्यथते मनः ॥

nūnaṃ ca tava naivāsti manyurbharatasattama | yatte bhrātṝṃśca māṃ caiva dṛṣṭvā na vyathate manaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, निश्चय ही आपमें क्रोध है ही नहीं, क्योंकि अपने भाइयों को और मुझे देखकर भी आपका मन व्यथित नहीं होता।

श्लोक 36 (3.27.36)

न निर्मन्युः क्षत्रियोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम् । तदद्य त्वयि पश्यामि क्षत्रिये विपरीतवत् ॥

na nirmanyuḥ kṣatriyo'sti loke nirvacanaṃ smṛtam | tadadya tvayi paśyāmi kṣatriye viparītavat

संसार में कोई क्षत्रिय क्रोधहीन नहीं होता — "क्षत्रिय" शब्द का अर्थ ही यही बताया गया है। पर आज मैं आप क्षत्रिय में इसका उलटा देख रही हूँ।

श्लोक 37 (3.27.37)

यो न दर्शयते तेजः क्षत्रियः काल आगते । सर्वभूतानि तं पार्थ सदा परिभवन्त्युत ॥

yo na darśayate tejaḥ kṣatriyaḥ kāla āgate | sarvabhūtāni taṃ pārtha sadā paribhavantyuta

हे पार्थ, जो क्षत्रिय समय आने पर अपना तेज नहीं दिखाता, सब प्राणी सदा उसका तिरस्कार करते हैं।

श्लोक 38 (3.27.38)

तत्त्वया न क्षमा कार्या शत्रून्प्रति कथंचन । तेजसैव हि ते शक्या निहन्तुं नात्र संशयः ॥

tattvayā na kṣamā kāryā śatrūnprati kathaṃcana | tejasaiva hi te śakyā nihantuṃ nātra saṃśayaḥ

इसलिए शत्रुओं के प्रति आपको किसी भी प्रकार क्षमा नहीं दिखानी चाहिए; उन्हें केवल तेज से ही मारा जा सकता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 39 (3.27.39)

तथैव यः क्षमाकाले क्षत्रियो नोपशाम्यति । अप्रियः सर्वभूतानां सोऽमुत्रेह च नश्यति ॥

tathaiva yaḥ kṣamākāle kṣatriyo nopaśāmyati | apriyaḥ sarvabhūtānāṃ so'mutreha ca naśyati

उसी प्रकार जो क्षत्रिय क्षमा के समय शान्त नहीं होता, वह सब प्राणियों का अप्रिय हो जाता है और इस लोक तथा परलोक दोनों में नष्ट होता है।

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