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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 28

क्षमा और तेज पर प्रह्लाद का उपदेश

द्रौपदी युधिष्ठिर को वह प्राचीन संवाद सुनाती है जिसमें बलि अपने पितामह प्रह्लाद से पूछते हैं कि क्षमा श्रेष्ठ है या तेज। प्रह्लाद बताते हैं कि सदा क्षमा करने वाले और कभी क्षमा न करने वाले, दोनों पर क्या-क्या विपत्तियाँ आती हैं, किन अवसरों पर क्षमा करनी चाहिए, और निष्कर्ष देते हैं कि बुद्धिमान समय के अनुसार कोमल या कठोर होता है। फिर द्रौपदी कहती है कि लोभी धृतराष्ट्रपुत्रों के विरुद्ध अब तेज का समय आ गया है।

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

द्रौपद्युवाच

श्लोक 1 (3.28.1)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रह्लादस्य च संवादं बलेर्वैरोचनस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | prahlādasya ca saṃvādaṃ balervairocanasya ca

इस विषय में प्रह्लाद और विरोचनपुत्र बलि के संवाद का यह प्राचीन इतिहास उदाहरण के रूप में सुनाया जाता है।

श्लोक 2 (3.28.2)

असुरेन्द्रं महाप्राज्ञं धर्माणामागतागमम् । बलिः पप्रच्छ दैत्येन्द्रं प्रह्लादं पितरं पितुः ॥

asurendraṃ mahāprājñaṃ dharmāṇāmāgatāgamam | baliḥ papraccha daityendraṃ prahlādaṃ pitaraṃ pituḥ

बलि ने अपने पिता के पिता प्रह्लाद से — जो असुरों के स्वामी, दैत्यराज, महाज्ञानी और धर्मों के रहस्य जानने वाले थे — पूछा:

बलिरुवाच

श्लोक 3 (3.28.3)

क्षमा स्विच्छ्रेयसी तात उताहो तेज इत्युत । एतन्मे संशयं तात यथावद्ब्रूहि पृच्छते ॥

kṣamā svicchreyasī tāta utāho teja ityuta | etanme saṃśayaṃ tāta yathāvadbrūhi pṛcchate

"तात, क्षमा श्रेष्ठ है या तेज? तात, मेरा यही संशय है; मैं पूछ रहा हूँ, मुझे ठीक-ठीक बताइए।"

श्लोक 4 (3.28.4)

श्रेयो यदत्र धर्मज्ञ ब्रूहि मे तदसंशयम् । करिष्यामि हि तत्सर्वं यथावदनुशासनम् ॥

śreyo yadatra dharmajña brūhi me tadasaṃśayam | kariṣyāmi hi tatsarvaṃ yathāvadanuśāsanam

"हे धर्मज्ञ, इन दोनों में जो श्रेष्ठ हो, वह मुझे निःसंशय बताइए। आप जो आदेश देंगे, मैं वह सब ठीक वैसा ही करूँगा।"

द्रौपद्युवाच

श्लोक 5 (3.28.5)

तस्मै प्रोवाच तत्सर्वमेवं पृष्टः पितामहः । सर्वनिश्चयवित्प्राज्ञः संशयं परिपृच्छते ॥

tasmai provāca tatsarvamevaṃ pṛṣṭaḥ pitāmahaḥ | sarvaniścayavitprājñaḥ saṃśayaṃ paripṛcchate

इस प्रकार पूछे जाने पर, सब निर्णयों को जानने वाले बुद्धिमान पितामह ने संशय पूछने वाले बलि को सब कुछ बताया।

प्रह्लाद उवाच

श्लोक 6 (3.28.6)

न श्रेयः सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा । इति तात विजानीहि द्वयमेतदसंशयम् ॥

na śreyaḥ satataṃ tejo na nityaṃ śreyasī kṣamā | iti tāta vijānīhi dvayametadasaṃśayam

न तेज सदा श्रेष्ठ है, न क्षमा सदा श्रेष्ठ है। तात, इन दोनों के विषय में यह निःसंशय जान लो।

श्लोक 7 (3.28.7)

यो नित्यं क्षमते तात बहून्दोषान्स विन्दति । भृत्याः परिभवन्त्येनमुदासीनास्तथाऽरयः ॥

yo nityaṃ kṣamate tāta bahūndoṣānsa vindati | bhṛtyāḥ paribhavantyenamudāsīnāstathā'rayaḥ

तात, जो सदा क्षमा करता है, उसे अनेक दोष घेर लेते हैं। उसके सेवक, उदासीन लोग और शत्रु भी उसका तिरस्कार करते हैं।

श्लोक 8 (3.28.8)

सर्वभूतानि चाप्यस्य न नमन्ते कदाचन । तस्मान्नित्यं क्षमा तात पण्डितैरपि वर्जिता ॥

sarvabhūtāni cāpyasya na namante kadācana | tasmānnityaṃ kṣamā tāta paṇḍitairapi varjitā

कोई भी प्राणी कभी उसके आगे नहीं झुकता। इसलिए तात, पण्डित लोग भी सदा की क्षमा को त्याग देते हैं।

श्लोक 9 (3.28.9)

अवज्ञाय हितं भृत्या भजन्ते बहुदोषताम् । आदातुं चास्य वित्तानि प्रार्थयन्तेऽल्पचेतसः ॥

avajñāya hitaṃ bhṛtyā bhajante bahudoṣatām | ādātuṃ cāsya vittāni prārthayante'lpacetasaḥ

स्वामी के हित की अवहेलना करके सेवक अनेक दोषों में पड़ जाते हैं, और ओछी बुद्धि वाले लोग उसका धन हड़पना चाहते हैं।

श्लोक 10 (3.28.10)

यानं वस्त्राण्यलंकाराञ्शयनान्यासनानि च । भोजनान्यथ पानानि सर्वोपकरणानि च ॥

yānaṃ vastrāṇyalaṃkārāñśayanānyāsanāni ca | bhojanānyatha pānāni sarvopakaraṇāni ca

वाहन, वस्त्र और आभूषण, शय्याएँ और आसन, भोजन और पेय, तथा सब प्रकार की सामग्री —

श्लोक 11 (3.28.11)

आददीरन्नधिकृता यथाकाममचेतसः । प्रदिष्टानि च देयानि न दद्युर्भर्तृशासनात् ॥

ādadīrannadhikṛtā yathākāmamacetasaḥ | pradiṣṭāni ca deyāni na dadyurbhartṛśāsanāt

इनकी देखरेख पर नियुक्त विवेकहीन लोग इन्हें मनमाने ढंग से ले लेते हैं; और स्वामी की आज्ञा होने पर भी, जो वस्तुएँ देने को कहा गया है, उन्हें नहीं देते।

श्लोक 12 (3.28.12)

न चैनं भर्तृपूजाभिः पूजयन्ति कदाचन । अवज्ञानं हि लोकेऽस्मिन्मरणादपि गर्हितम् ॥

na cainaṃ bhartṛpūjābhiḥ pūjayanti kadācana | avajñānaṃ hi loke'sminmaraṇādapi garhitam

वे कभी स्वामी के योग्य सम्मान से उसका आदर नहीं करते; और इस संसार में अपमान मृत्यु से भी अधिक निन्दनीय माना गया है।

श्लोक 13 (3.28.13)

क्षमिणं तादृशं तात ब्रुवन्ति कटुकान्यपि । प्रेष्याः पुत्राश्च भृत्याश्च तथोदासीनवृत्तयः ॥

kṣamiṇaṃ tādṛśaṃ tāta bruvanti kaṭukānyapi | preṣyāḥ putrāśca bhṛtyāśca tathodāsīnavṛttayaḥ

तात, ऐसे क्षमाशील व्यक्ति को उसके दास, पुत्र, सेवक और उदासीन लोग भी कड़वी बातें सुनाते हैं।

श्लोक 14 (3.28.14)

अप्यस्य दारानिच्छन्ति परिभूय क्षमावतः । दाराश्चास्य प्रवर्तन्ते यथाकाममचेतसः ॥

apyasya dārānicchanti paribhūya kṣamāvataḥ | dārāścāsya pravartante yathākāmamacetasaḥ

क्षमाशील का तिरस्कार करके लोग उसकी पत्नियों की भी कामना करते हैं, और उसकी पत्नियाँ भी विवेक खोकर मनमाना आचरण करती हैं।

श्लोक 15 (3.28.15)

तथा च नित्यमुदिता यदि नाल्पमपीश्वरात् । दण्डमर्हन्ति दुष्यन्ति दुष्टाश्चाप्यपकुर्वते ॥

tathā ca nityamuditā yadi nālpamapīśvarāt | daṇḍamarhanti duṣyanti duṣṭāścāpyapakurvate

और यदि स्वामी से उन्हें थोड़ा भी दण्ड नहीं मिलता, तो वे सदा उद्दण्ड बने रहते हैं; वे दण्ड के योग्य हो जाते हैं, बिगड़ जाते हैं और बिगड़कर हानि पहुँचाते हैं।

श्लोक 16 (3.28.16)

अकृतोपद्रवः कश्चिन्महानपि न पूज्यते । पूजयन्ति नरा नागान्न तार्क्ष्यं नागघातिनम् ॥

akṛtopadravaḥ kaścinmahānapi na pūjyate | pūjayanti narā nāgānna tārkṣyaṃ nāgaghātinam

जो किसी का अनिष्ट नहीं करता, वह महान होकर भी पूजा नहीं जाता: लोग नागों को पूजते हैं, पर नागों का संहार करने वाले तार्क्ष्य (गरुड़) को नहीं।

श्लोक 17 (3.28.17)

एते चान्ये च बहवो नित्यं दोषाः क्षमावताम् । अथ वैरोचने दोषानिमान्विद्ध्यक्षमावताम् ॥

ete cānye ca bahavo nityaṃ doṣāḥ kṣamāvatām | atha vairocane doṣānimānviddhyakṣamāvatām

क्षमाशीलों के साथ ये और ऐसे ही बहुत-से दोष सदा लगे रहते हैं। अब, हे विरोचनपुत्र, क्षमा न करने वालों के इन दोषों को जानो।

श्लोक 18 (3.28.18)

अस्थाने यदि वा स्थाने सततं रजसावृतः । क्रुद्धो दण्डान्प्रणयति विविधान्स्वेन तेजसा ॥

asthāne yadi vā sthāne satataṃ rajasāvṛtaḥ | kruddho daṇḍānpraṇayati vividhānsvena tejasā

उचित हो या अनुचित, सदा रजोगुण से घिरा मनुष्य क्रोध में आकर अपने तेज के बल पर तरह-तरह के दण्ड देता है।

श्लोक 19 (3.28.19)

मित्रैः सह विरोधं च प्राप्नुते तेजसाऽऽवृतः । आप्नोति द्वेष्यतां चैव लोकात्स्वजनतस्तथा ॥

mitraiḥ saha virodhaṃ ca prāpnute tejasā''vṛtaḥ | āpnoti dveṣyatāṃ caiva lokātsvajanatastathā

क्रोध से घिरा वह मित्रों से भी विरोध कर बैठता है, और लोगों का तथा अपने स्वजनों का भी द्वेषपात्र बन जाता है।

श्लोक 20 (3.28.20)

सोऽवमानादर्थहानिमुपालम्भमनादरम् । संतापद्वेषमोहांश्च शत्रूंश्च लभते नरः ॥

so'vamānādarthahānimupālambhamanādaram | saṃtāpadveṣamohāṃśca śatrūṃśca labhate naraḥ

ऐसा मनुष्य अपमान, धन की हानि, निन्दा और अनादर, सन्ताप, द्वेष और मोह तथा शत्रुओं को पाता है।

श्लोक 21 (3.28.21)

क्रोधाद्दण्डान्मनुष्येषु विविधान्पुरुषोऽनयात् । भ्रश्यते शीघ्रमैश्वर्यात्प्राणेभ्यः स्वजनादपि ॥

krodhāddaṇḍānmanuṣyeṣu vividhānpuruṣo'nayāt | bhraśyate śīghramaiśvaryātprāṇebhyaḥ svajanādapi

जो मनुष्य अविवेक से, क्रोध में आकर लोगों को तरह-तरह के दण्ड देता है, वह शीघ्र ही ऐश्वर्य से, प्राणों से और अपने स्वजनों से भी गिर जाता है।

श्लोक 22 (3.28.22)

योपकर्तॄश्च हर्तॄश्च तेजसैवोपगच्छति । तस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद्वेश्मगतादिव ॥

yopakartṝśca hartṝśca tejasaivopagacchati | tasmādudvijate lokaḥ sarpādveśmagatādiva

जो अपना हित करने वालों और चोरों — दोनों के साथ एक-सी कठोरता बरतता है, उससे लोग वैसे ही डरते हैं जैसे घर में बसे साँप से।

श्लोक 23 (3.28.23)

यस्मादुद्विजते लोकः कथं तस्य भवो भवेत् । अन्तरं तस्य दृष्ट्वैव लोको विकुरुते ध्रुवम् ॥

yasmādudvijate lokaḥ kathaṃ tasya bhavo bhavet | antaraṃ tasya dṛṣṭvaiva loko vikurute dhruvam

जिससे लोग डरते हों, उसका ऐश्वर्य कैसे टिक सकता है? उसमें कोई दुर्बलता देखते ही लोग निश्चय ही उसके विरुद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 24 (3.28.24)

तस्मान्नात्युत्सृजेत्तेजो न च नित्यं मृदुर्भवेत् । कालेकाले तु संप्राप्ते मृदुस्तीक्ष्णोऽपि वा भवेत् ॥

tasmānnātyutsṛjettejo na ca nityaṃ mṛdurbhavet | kālekāle tu saṃprāpte mṛdustīkṣṇo'pi vā bhavet

इसलिए न तो तेज को बहुत खुला छोड़ना चाहिए और न सदा कोमल ही रहना चाहिए; हर अवसर आने पर उसके अनुसार कोमल या कठोर होना चाहिए।

श्लोक 25 (3.28.25)

काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः । स वै सुखमवाप्नोति लोकेऽमुष्मिन्निहैव च ॥

kāle mṛduryo bhavati kāle bhavati dāruṇaḥ | sa vai sukhamavāpnoti loke'muṣminnihaiva ca

जो समय पर कोमल और समय पर कठोर होता है, वही इस लोक और परलोक में सुख पाता है।

श्लोक 26 (3.28.26)

क्षमाकालांस्तु वक्ष्यामि शृणु मे विस्तरेण तान् । ये ते नित्यमसंत्याज्या यथा प्राहुर्मनीषिणः ॥

kṣamākālāṃstu vakṣyāmi śṛṇu me vistareṇa tān | ye te nityamasaṃtyājyā yathā prāhurmanīṣiṇaḥ

अब मैं तुम्हें विस्तार से क्षमा के अवसर बताता हूँ, सुनो। मनीषियों के कथन के अनुसार इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

श्लोक 27 (3.28.27)

पूर्वोपकारी यस्ते स्यादपराधे गरीयसि । उपकारेण तत्तस्य क्षन्तव्यमपराधिनः ॥

pūrvopakārī yaste syādaparādhe garīyasi | upakāreṇa tattasya kṣantavyamaparādhinaḥ

जिसने पहले तुम्हारा उपकार किया हो, उसका बड़ा अपराध भी उस उपकार के कारण क्षमा कर देना चाहिए।

श्लोक 28 (3.28.28)

अबुद्धिमाश्रितानां तु क्षन्तव्यमपराधिनाम् । न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै ॥

abuddhimāśritānāṃ tu kṣantavyamaparādhinām | na hi sarvatra pāṇḍityaṃ sulabhaṃ puruṣeṇa vai

जो अज्ञानवश अपराध कर बैठें, उन्हें क्षमा करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य को हर बात में समझदारी सुलभ नहीं होती।

श्लोक 29 (3.28.29)

अथ चेद्बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदबुद्धिजम् । पापान्स्वल्पेऽपि तान्हन्यादपराधे तथाऽनृजून् ॥

atha cedbuddhijaṃ kṛtvā brūyuste tadabuddhijam | pāpānsvalpe'pi tānhanyādaparādhe tathā'nṛjūn

पर यदि वे जान-बूझकर अपराध करें और फिर कहें कि अनजाने में किया, तो उन कुटिल पापियों को छोटे अपराध पर भी मार देना चाहिए।

श्लोक 30 (3.28.30)

सर्वस्यैकोऽपराधस्ते क्षन्तव्यः प्राणिनो भवेत् । द्वितीये सति वध्यस्तु स्वल्पेऽप्यपकृते भवेत् ॥

sarvasyaiko'parādhaste kṣantavyaḥ prāṇino bhavet | dvitīye sati vadhyastu svalpe'pyapakṛte bhavet

किसी भी प्राणी का पहला अपराध क्षमा कर देना चाहिए; पर दूसरी बार छोटा-सा अपकार करने पर भी वह वध के योग्य होता है।

श्लोक 31 (3.28.31)

अजानता भवेत्कश्चिदपराधः कृतो यदि । क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया ॥

ajānatā bhavetkaścidaparādhaḥ kṛto yadi | kṣantavyameva tasyāhuḥ suparīkṣya parīkṣayā

यदि किसी ने अनजाने में अपराध कर दिया हो, तो भली-भाँति जाँच-परखकर उसे क्षमा ही कर देना चाहिए, ऐसा कहा गया है।

श्लोक 32 (3.28.32)

मृदुना दारुणं हन्ति मृदुना हन्त्यदारुणम् । नासाध्यं मृदुना किंचित्तस्मात्तीव्रतरं मृदु ॥

mṛdunā dāruṇaṃ hanti mṛdunā hantyadāruṇam | nāsādhyaṃ mṛdunā kiṃcittasmāttīvrataraṃ mṛdu

कोमलता कठोर को भी जीत लेती है और कोमल को भी; कोमलता के लिए कुछ भी असाध्य नहीं। इसलिए कोमलता ही अधिक तीक्ष्ण है।

श्लोक 33 (3.28.33)

देशकालौ तु संप्रेक्ष्य बलाबलमथात्मनः । अन्वीक्ष्य कारणं चैव कार्यं तेजः क्षमापि वा ॥

deśakālau tu saṃprekṣya balābalamathātmanaḥ | anvīkṣya kāraṇaṃ caiva kāryaṃ tejaḥ kṣamāpi vā

देश और काल को, अपने बल-अबल को देखकर, और कारण की भी जाँच करके, तेज या क्षमा का प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक 34 (3.28.34)

नादेशकाले किंचित्स्याद्देशकालौ प्रतीक्षताम् । तथा लोकभयाच्चैव क्षन्तव्यमपराधितम् ॥

nādeśakāle kiṃcitsyāddeśakālau pratīkṣatām | tathā lokabhayāccaiva kṣantavyamaparādhitam

जो उचित देश-काल की प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें अनुचित देश-काल में कुछ नहीं करना चाहिए। लोकनिन्दा के भय से भी अपराध क्षमा कर देना चाहिए।

श्लोक 35 (3.28.35)

एत एवंविधाः कालाः क्षमायाः परिकीर्तिताः । अतोऽन्यथाऽनुवर्तत्सु तेजसः काल उच्यते ॥

eta evaṃvidhāḥ kālāḥ kṣamāyāḥ parikīrtitāḥ | ato'nyathā'nuvartatsu tejasaḥ kāla ucyate

ये और इस प्रकार के अवसर क्षमा के बताए गए हैं। जो इनके विपरीत आचरण करते हैं, उनके प्रति तेज का समय कहा जाता है।

द्रौपद्युवाच

श्लोक 36 (3.28.36)

तदहं तेजसः कालं तव मन्ये नराधिप । धार्तराष्ट्रेषु लुब्धेषु सततं चापकारिषु ॥

tadahaṃ tejasaḥ kālaṃ tava manye narādhipa | dhārtarāṣṭreṣu lubdheṣu satataṃ cāpakāriṣu

इसलिए, हे नराधिप, मैं मानती हूँ कि लोभी और सदा अपकार करने वाले धृतराष्ट्रपुत्रों के प्रति आपके लिए यह तेज का समय है।

श्लोक 37 (3.28.37)

न हि कश्चित्क्षमाकालो विद्यतेऽद्य कुरून्प्रति । तेजसश्चागते काले तेज उत्स्रष्टुमर्हसि ॥

na hi kaścitkṣamākālo vidyate'dya kurūnprati | tejasaścāgate kāle teja utsraṣṭumarhasi

अब कुरुओं के प्रति क्षमा का कोई अवसर नहीं है। तेज का समय आ गया है; आपको अपना तेज प्रकट करना चाहिए।

श्लोक 38 (3.28.38)

मृदुर्भवत्यवज्ञातस्तीक्ष्णादुद्विजते जनः । काले प्राप्ते द्वयं चैतद्यो वेद स महीपतिः ॥

mṛdurbhavatyavajñātastīkṣṇādudvijate janaḥ | kāle prāpte dvayaṃ caitadyo veda sa mahīpatiḥ

कोमल व्यक्ति की अवहेलना होती है और कठोर से लोग डरते हैं। जो समय आने पर इन दोनों का प्रयोग जानता है, वही सच्चा राजा है।

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29