आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 29
युधिष्ठिर द्वारा क्षमा की महिमा
युधिष्ठिर मुस्कराते हुए द्रौपदी को क्षमा की विस्तृत महिमा सुनाते हैं। वे कहते हैं कि क्रोध विवेक को अन्धा कर देता है और बदले की अन्तहीन शृंखला से संसार को नष्ट कर देगा, जबकि सच्चा तेज क्रोध को जीतने में है; पृथ्वी के समान क्षमाशील लोगों के कारण ही प्राणी जन्म लेते और फलते-फूलते हैं। वे काश्यप की गाथाएँ सुनाते हैं, जो क्षमा को धर्म, सत्य और ब्रह्म बताती हैं; आशा करते हैं कि भीष्म, कृष्ण, विदुर आदि बड़े धृतराष्ट्र को शान्ति के लिए प्रेरित करेंगे; और क्षमा तथा दया पर दृढ़ रहने का संकल्प करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.29.1)
द्रौपद्या वचनं श्रुत्वा श्लक्ष्णाक्षरपदं शुभम् । उवाच द्रौपदीं राजा स्मयमानो युधिष्ठिरः ॥
draupadyā vacanaṃ śrutvā ślakṣṇākṣarapadaṃ śubham | uvāca draupadīṃ rājā smayamāno yudhiṣṭhiraḥ
द्रौपदी के मधुर अक्षरों और पदों से युक्त सुन्दर वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर मुस्कराते हुए द्रौपदी से बोले।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (3.29.2)
कारणे भवती क्रुद्धा धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । येन क्रोधं महाप्रज्ञे बहुधा बहुमन्यसे । क्रोधमूलं हरं शत्रुं कारणैः शृणु तं मम ॥
kāraṇe bhavatī kruddhā dhārtarāṣṭrasya durmateḥ | yena krodhaṃ mahāprajñe bahudhā bahumanyase | krodhamūlaṃ haraṃ śatruṃ kāraṇaiḥ śṛṇu taṃ mama
तुम दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र के कारण क्रुद्ध हो, इसीलिए, हे महाप्रज्ञे, तुम क्रोध को अनेक प्रकार से बहुत महत्त्व दे रही हो। अब क्रोध से उपजने वाले उस विनाशकारी शत्रु के विषय में मेरे तर्क सुनो।
श्लोक 3 (3.29.3)
क्रोधो हन्ता मनुष्याणां क्रोधो भावयिता पुनः । इति विद्धि महाप्राज्ञे क्रोधमूलौ भवाभवौ ॥
krodho hantā manuṣyāṇāṃ krodho bhāvayitā punaḥ | iti viddhi mahāprājñe krodhamūlau bhavābhavau
क्रोध मनुष्यों का नाश करने वाला है, और (वश में कर लिया जाए तो) वही फिर उनकी उन्नति करने वाला भी है। हे महाप्राज्ञे, जान लो कि उन्नति और विनाश, दोनों का मूल क्रोध ही है।
श्लोक 4 (3.29.4)
यो हि संहरते क्रोधं भावस्तस्य सुशोभने । यो न संहरते क्रोधं तस्याभावो भवत्युत । अभावकारणं तस्मात्क्रोधो भवति शोभने ॥
yo hi saṃharate krodhaṃ bhāvastasya suśobhane | yo na saṃharate krodhaṃ tasyābhāvo bhavatyuta | abhāvakāraṇaṃ tasmātkrodho bhavati śobhane
हे सुशोभने, जो क्रोध को रोक लेता है, उसकी उन्नति होती है; जो उसे नहीं रोकता, उसका पतन होता है। इसलिए, हे शोभने, क्रोध विनाश का कारण बनता है।
श्लोक 5 (3.29.5)
यः पुनः पुरुषः क्रोधं नित्यं विसृजते शुभे । तस्याभावाय भवति क्रोधः परमदारुणः ॥
yaḥ punaḥ puruṣaḥ krodhaṃ nityaṃ visṛjate śubhe | tasyābhāvāya bhavati krodhaḥ paramadāruṇaḥ
पर हे शुभे, जो पुरुष सदा क्रोध को खुला छोड़ देता है, उसके लिए वह अत्यन्त भयंकर क्रोध विनाश का कारण बन जाता है।
श्लोक 6 (3.29.6)
क्रोधमूलो विनाशो हि प्रजानामिह दृश्यते । तत्कथं मादृशः क्रोधमुत्सृजेल्लोकनाशनम् ॥
krodhamūlo vināśo hi prajānāmiha dṛśyate | tatkathaṃ mādṛśaḥ krodhamutsṛjellokanāśanam
इस संसार में प्राणियों का विनाश क्रोध के कारण ही होता दिखाई देता है। तब मुझ-जैसा व्यक्ति लोकों का नाश करने वाले क्रोध को कैसे खुला छोड़ दे?
श्लोक 7 (3.29.7)
क्रुद्धः पापं नरः कुर्यात्क्रुद्धो हन्याद्गुरूनपि । क्रुद्धः परुषया वाचा श्रेयसोऽप्यवमन्यते ॥
kruddhaḥ pāpaṃ naraḥ kuryātkruddho hanyādgurūnapi | kruddhaḥ paruṣayā vācā śreyaso'pyavamanyate
क्रोधी मनुष्य पाप कर सकता है, क्रोधी गुरुजनों को भी मार सकता है, क्रोधी कठोर वाणी से अपने से श्रेष्ठ लोगों का भी अपमान करता है।
श्लोक 8 (3.29.8)
वाच्यावाच्ये हि कुपितो न प्रजानाति कर्हिचित् । नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यं विद्यते तथा ॥
vācyāvācye hi kupito na prajānāti karhicit | nākāryamasti kruddhasya nāvācyaṃ vidyate tathā
क्रोध में भरा मनुष्य कभी नहीं जानता कि क्या कहना चाहिए और क्या नहीं। क्रोधी के लिए न कुछ अकरणीय है, न कुछ अकथनीय।
श्लोक 9 (3.29.9)
हिंस्यात्क्रोधादवध्यांस्तु वध्यान्संपूजयीत च । आत्मानमपि च क्रुद्धः प्रेषयेद्यमसादनम् ॥
hiṃsyātkrodhādavadhyāṃstu vadhyānsaṃpūjayīta ca | ātmānamapi ca kruddhaḥ preṣayedyamasādanam
क्रोध में मनुष्य अवध्य लोगों की हिंसा कर सकता है और वध के योग्य लोगों का सम्मान कर सकता है; क्रुद्ध व्यक्ति अपने-आप को भी यमलोक भेज सकता है।
श्लोक 10 (3.29.10)
एतान्दोषान्प्रपश्यद्भिर्जितः क्रोधो मनीषिभिः । इच्छद्भिः परमं श्रेय इह चामुत्र चोत्तमम् ॥
etāndoṣānprapaśyadbhirjitaḥ krodho manīṣibhiḥ | icchadbhiḥ paramaṃ śreya iha cāmutra cottamam
इन दोषों को देखकर, इस लोक में परम कल्याण और परलोक में उत्तम गति चाहने वाले मनीषियों ने क्रोध को जीत लिया है।
श्लोक 11 (3.29.11)
तं क्रोधं वर्जितं धीरैः कथमस्मद्विधश्चरेत् । एतद्द्रौपदि संस्मृत्य न मे मन्युः प्रवर्धते ॥
taṃ krodhaṃ varjitaṃ dhīraiḥ kathamasmadvidhaścaret | etaddraupadi saṃsmṛtya na me manyuḥ pravardhate
जिस क्रोध को धीर पुरुषों ने त्याग दिया, उसे मुझ-जैसा व्यक्ति कैसे अपनाए? हे द्रौपदी, यही सोचकर मेरा क्रोध नहीं बढ़ता।
श्लोक 12 (3.29.12)
आत्मानं च परांश्चैव त्रायते महतो भयात् । क्रुध्यन्तमप्रतिक्रुध्यन्द्वयोरेष चिकित्सकः ॥
ātmānaṃ ca parāṃścaiva trāyate mahato bhayāt | krudhyantamapratikrudhyandvayoreṣa cikitsakaḥ
जो क्रोध करने वाले पर बदले में क्रोध नहीं करता, वह अपने को और दूसरों को भी बड़े भय से बचा लेता है; वह दोनों का चिकित्सक है।
श्लोक 13 (3.29.13)
मूढो यदि क्लिश्यमानः क्रुध्यतेऽशक्तिमान्नरः । बलीयसां मनुष्याणां त्यजत्यात्मानमन्ततः ॥
mūḍho yadi kliśyamānaḥ krudhyate'śaktimānnaraḥ | balīyasāṃ manuṣyāṇāṃ tyajatyātmānamantataḥ
यदि कोई मूर्ख और निर्बल मनुष्य सताए जाने पर अपने से बलवान लोगों पर क्रोध करता है, तो अन्त में वह स्वयं को ही नष्ट कर डालता है।
श्लोक 14 (3.29.14)
तस्यात्मानं संत्यजतो लोका नश्यन्त्यनात्मनः । तस्माद्द्रौपद्यशक्तस्य मन्योर्नियमनं स्मृतम् ॥
tasyātmānaṃ saṃtyajato lokā naśyantyanātmanaḥ | tasmāddraupadyaśaktasya manyorniyamanaṃ smṛtam
अपने प्राण गँवाने वाले उस असंयमी के परलोक भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए, हे द्रौपदी, निर्बल के लिए क्रोध को वश में रखना ही बताया गया है।
श्लोक 15 (3.29.15)
विद्वांस्तथैव यः शक्तः क्लिश्यमानः प्रकुप्यति । स नाशयित्वा द्वेष्टारं परलोके न नन्दति ॥
vidvāṃstathaiva yaḥ śaktaḥ kliśyamānaḥ prakupyati | sa nāśayitvā dveṣṭāraṃ paraloke na nandati
इसी प्रकार जो विद्वान और समर्थ पुरुष सताए जाने पर भड़क उठता है, वह द्वेष करने वाले का नाश करके भी परलोक में आनन्द नहीं पाता।
श्लोक 16 (3.29.16)
तस्माद्बलवता चैव दुर्बलेन च नित्यदा । क्षन्तव्यं पुरुषेणाहुरापत्स्वपि विजानता ॥
tasmādbalavatā caiva durbalena ca nityadā | kṣantavyaṃ puruṣeṇāhurāpatsvapi vijānatā
इसलिए कहा गया है कि बलवान हो या निर्बल, समझदार पुरुष को आपत्ति में भी सदा क्षमा करनी चाहिए।
श्लोक 17 (3.29.17)
मन्योर्हि विजयं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधवः । क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम् ॥
manyorhi vijayaṃ kṛṣṇe praśaṃsantīha sādhavaḥ | kṣamāvato jayo nityaṃ sādhoriha satāṃ matam
हे कृष्णे, सज्जन इस संसार में क्रोध पर विजय की प्रशंसा करते हैं। सन्तों का मत है कि क्षमाशील साधु पुरुष की ही सदा जय होती है।
श्लोक 18 (3.29.18)
सत्यं चानृततः श्रेयो नृशंसाच्चानृशंसता । तमेवं बहुदोषं तु क्रोधं सद्भिर्विवर्जितम् । मादृशो विसृजेत्तस्मात्सर्वलोकविनाशनम् ॥
satyaṃ cānṛtataḥ śreyo nṛśaṃsāccānṛśaṃsatā | tamevaṃ bahudoṣaṃ tu krodhaṃ sadbhirvivarjitam | mādṛśo visṛjettasmātsarvalokavināśanam
असत्य से सत्य श्रेष्ठ है और क्रूरता से दया। इसलिए मुझ-जैसे व्यक्ति को अनेक दोषों से भरे, सज्जनों द्वारा त्यागे गए, सब लोकों का नाश करने वाले उस क्रोध को त्याग देना चाहिए।
श्लोक 19 (3.29.19)
तेजस्वीति यमाहुर्वै पण्डिता दीर्घदर्शिनः । न क्रोधोऽभ्यन्तरस्तस्य भवतीति विनिश्चितम् ॥
tejasvīti yamāhurvai paṇḍitā dīrghadarśinaḥ | na krodho'bhyantarastasya bhavatīti viniścitam
दूरदर्शी पण्डित जिसे तेजस्वी कहते हैं, उसके भीतर क्रोध नहीं रहता — यह निश्चित है।
श्लोक 20 (3.29.20)
यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं प्रज्ञया परिबाधते । तेजस्विनं तं विदुषो मन्यन्ते तत्त्वदर्शिनः ॥
yastu krodhaṃ samutpannaṃ prajñayā paribādhate | tejasvinaṃ taṃ viduṣo manyante tattvadarśinaḥ
जो उत्पन्न हुए क्रोध को बुद्धि से रोक देता है, तत्त्वदर्शी विद्वान उसी को तेजस्वी मानते हैं।
श्लोक 21 (3.29.21)
क्रुद्धो हि कार्यं सुश्रोणि न यथावत्प्रपश्यति । नाकार्यं न च मर्यादां नरः क्रुद्धोऽनुपश्यति ॥
kruddho hi kāryaṃ suśroṇi na yathāvatprapaśyati | nākāryaṃ na ca maryādāṃ naraḥ kruddho'nupaśyati
हे सुश्रोणि, क्रोधी मनुष्य अपने कर्तव्य को ठीक से नहीं देख पाता; क्रोध में भरा मनुष्य न अकर्तव्य का ध्यान रखता है, न मर्यादा का।
श्लोक 22 (3.29.22)
हन्त्यवध्यानपि क्रुद्धो गुरून्रूक्षैस्तुदत्यपि । तस्मात्तेजसि कर्तव्ये क्रोधो दूरात्प्रतिष्ठितः ॥
hantyavadhyānapi kruddho gurūnrūkṣaistudatyapi | tasmāttejasi kartavye krodho dūrātpratiṣṭhitaḥ
क्रोधी व्यक्ति अवध्यों को भी मार डालता है और कठोर वचनों से गुरुजनों को भी चोट पहुँचाता है। इसलिए जहाँ तेज की आवश्यकता हो, वहाँ क्रोध को दूर ही रखा जाता है।
श्लोक 23 (3.29.23)
दाक्ष्यं ह्यमर्षः शौर्यं च शीघ्रत्वमिति तेजसः । गुणाः क्रोधाभिभूतेन न शक्याः प्राप्तुमञ्जसा ॥
dākṣyaṃ hyamarṣaḥ śauryaṃ ca śīghratvamiti tejasaḥ | guṇāḥ krodhābhibhūtena na śakyāḥ prāptumañjasā
दक्षता, अमर्ष, शौर्य और शीघ्रता — ये तेज के गुण हैं; क्रोध के वश में पड़ा व्यक्ति इन्हें सहज ही नहीं पा सकता।
श्लोक 24 (3.29.24)
क्रोधं त्यक्त्वा तु पुरुषः सम्यक्तेजोऽभिपद्यते । कालयुक्तं महाप्राज्ञैः क्रुद्धैस्तेजः सुदुर्लभम् ॥
krodhaṃ tyaktvā tu puruṣaḥ samyaktejo'bhipadyate | kālayuktaṃ mahāprājñaiḥ kruddhaistejaḥ sudurlabham
क्रोध छोड़कर ही मनुष्य सच्चा तेज प्राप्त करता है। समय के अनुरूप तेज क्रोधी लोगों के लिए, चाहे वे कितने ही बुद्धिमान हों, अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 25 (3.29.25)
क्रोधस्त्वपण्डितैः शश्वत्तेज इत्यभिनिश्चितम् । रजस्तु लोकनाशाय विहितं मानुषान्प्रति ॥
krodhastvapaṇḍitaiḥ śaśvatteja ityabhiniścitam | rajastu lokanāśāya vihitaṃ mānuṣānprati
अज्ञानियों ने सदा क्रोध को ही तेज मान लिया है; पर यह रजोगुण तो मनुष्यों के विनाश के लिए ही बना है।
श्लोक 26 (3.29.26)
तस्माच्छश्वत्त्यजेत्क्रोधं पुरुषः सम्यगाचरन् । श्रेयान्स्वधर्मानपगो न क्रुद्ध इति निश्चितम् ॥
tasmācchaśvattyajetkrodhaṃ puruṣaḥ samyagācaran | śreyānsvadharmānapago na kruddha iti niścitam
इसलिए सदाचारी पुरुष को सदा क्रोध त्याग देना चाहिए। यह निश्चित है कि अपने धर्म से हटा हुआ व्यक्ति भी क्रोधी से श्रेष्ठ है।
श्लोक 27 (3.29.27)
यदि सर्वमबुद्धीनामतिक्रान्तमचेतसाम् । अतिक्रमो मद्विधस्य कथं स्वित्स्यादनिन्दिते ॥
yadi sarvamabuddhīnāmatikrāntamacetasām | atikramo madvidhasya kathaṃ svitsyādanindite
हे अनिन्दिते, यदि मूर्ख और विवेकहीन लोग इन सब (क्षमा आदि गुणों) का उल्लंघन करते हैं, तो मुझ-जैसा व्यक्ति उनका उल्लंघन कैसे करे?
श्लोक 28 (3.29.28)
यदि न स्युर्मानुषेषु क्षमिणः पृथिवीसमाः । न स्यात्सन्धिर्मनुष्याणां क्रोधमूलो हि विग्रहः ॥
yadi na syurmānuṣeṣu kṣamiṇaḥ pṛthivīsamāḥ | na syātsandhirmanuṣyāṇāṃ krodhamūlo hi vigrahaḥ
यदि मनुष्यों में पृथ्वी के समान क्षमाशील लोग न होते, तो मनुष्यों में कभी मेल न होता, क्योंकि कलह की जड़ क्रोध ही है।
श्लोक 29 (3.29.29)
अभिषक्तो ह्यभिषजेदाहन्याद्गुरुणा हतः । एवं विनाशो भूतानामधर्मः प्रथितो भवेत् ॥
abhiṣakto hyabhiṣajedāhanyādguruṇā hataḥ | evaṃ vināśo bhūtānāmadharmaḥ prathito bhavet
सताया गया व्यक्ति बदले में सताता, और गुरुजन से मार खाया हुआ भी पलटकर मारता। इस प्रकार प्राणियों का विनाश हो जाता और अधर्म फैल जाता।
श्लोक 30 (3.29.30)
आक्रुष्टः पुरुषः सर्वं प्रत्याक्रोशेदनन्तरम् । प्रतिहन्याद्धतश्चैव तथा हिंस्याच्च हिंसितः ॥
ākruṣṭaḥ puruṣaḥ sarvaṃ pratyākrośedanantaram | pratihanyāddhataścaiva tathā hiṃsyācca hiṃsitaḥ
जिसे गाली दी जाए, वह तुरन्त सारी गालियाँ लौटा देता; मार खाने वाला पलटकर मारता और जिसे चोट पहुँचे, वह भी चोट पहुँचाता।
श्लोक 31 (3.29.31)
हन्युर्हि पितरः पुत्रान्पुत्राश्चापि तथा पितॄन् । हन्युश्च पतयो भार्याः पतीन्भार्यास्तथैव च ॥
hanyurhi pitaraḥ putrānputrāścāpi tathā pitṝn | hanyuśca patayo bhāryāḥ patīnbhāryāstathaiva ca
पिता पुत्रों को मार डालते और पुत्र पिताओं को; पति पत्नियों को मारते और पत्नियाँ पतियों को।
श्लोक 32 (3.29.32)
एवं संकुपिते लोके जन्म कृष्णे न विद्यते । प्रजानां सन्धिमूलं हि जन्म विद्धि शुभानने ॥
evaṃ saṃkupite loke janma kṛṣṇe na vidyate | prajānāṃ sandhimūlaṃ hi janma viddhi śubhānane
हे कृष्णे, ऐसे क्रोध से भरे संसार में जन्म ही न होता; हे सुमुखि, जान लो कि प्राणियों का जन्म आपसी मेल पर ही टिका है।
श्लोक 33 (3.29.33)
ताः क्षीयेरन्प्रजाः सर्वाः क्षिप्रं द्रौपदि तादृशाः । तस्मान्मन्युर्विनाशाय प्रजानामभवाय च ॥
tāḥ kṣīyeranprajāḥ sarvāḥ kṣipraṃ draupadi tādṛśāḥ | tasmānmanyurvināśāya prajānāmabhavāya ca
हे द्रौपदी, तब ऐसे सब प्राणी शीघ्र ही नष्ट हो जाते। इसलिए क्रोध प्राणियों के विनाश और पतन का कारण है।
श्लोक 34 (3.29.34)
यस्मात्तु लोके दृश्यन्ते क्षमिणः पृथिवीसमाः । तस्माज्जन्म च भूतानां भवश्च प्रतिपद्यते ॥
yasmāttu loke dṛśyante kṣamiṇaḥ pṛthivīsamāḥ | tasmājjanma ca bhūtānāṃ bhavaśca pratipadyate
क्योंकि संसार में पृथ्वी के समान क्षमाशील लोग दिखाई देते हैं, इसीलिए प्राणियों का जन्म होता है और उनकी उन्नति होती है।
श्लोक 35 (3.29.35)
क्षन्तव्यं पुरुषेणेह सर्वापत्सु सुशोभने । क्षमावतो हि भूतानां जन्म चैव प्रकीर्तितम् ॥
kṣantavyaṃ puruṣeṇeha sarvāpatsu suśobhane | kṣamāvato hi bhūtānāṃ janma caiva prakīrtitam
हे सुशोभने, मनुष्य को हर आपत्ति में क्षमा करनी चाहिए; क्योंकि कहा गया है कि प्राणियों का जन्म भी क्षमाशीलों के कारण ही है।
श्लोक 36 (3.29.36)
आक्रुष्टस्ताडितः क्रुद्धः क्षमते यो बलीयसा । यश्च नित्यं जितक्रोधो विद्वानुत्तमपूरुषः । प्रभाववानपि नरस्तस्य लोकाः सनातनाः ॥
ākruṣṭastāḍitaḥ kruddhaḥ kṣamate yo balīyasā | yaśca nityaṃ jitakrodho vidvānuttamapūruṣaḥ | prabhāvavānapi narastasya lokāḥ sanātanāḥ
जो अपने से बलवान द्वारा गाली दिए जाने, मारे जाने और क्रोध दिलाए जाने पर भी क्षमा करता है, और जो सदा क्रोध को जीते रहता है — ऐसा विद्वान, उत्तम पुरुष जो सामर्थ्यवान होकर भी क्षमा करता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं।
श्लोक 37 (3.29.37)
क्रोधनस्त्वल्पविज्ञानः प्रेत्य चेह च नश्यति ॥
krodhanastvalpavijñānaḥ pretya ceha ca naśyati
पर क्रोधी और अल्पबुद्धि मनुष्य इस लोक में और मरने के बाद भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 38 (3.29.38)
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् । गीताः क्षमावतां कृष्णे काश्यपेन महात्मना ॥
atrāpyudāharantīmā gāthā nityaṃ kṣamāvatām | gītāḥ kṣamāvatāṃ kṛṣṇe kāśyapena mahātmanā
हे कृष्णे, इस विषय में क्षमाशीलों की प्रशंसा में सदा कही जाने वाली वे गाथाएँ उदाहरण के रूप में सुनाई जाती हैं, जिन्हें क्षमाशीलों में श्रेष्ठ महात्मा काश्यप ने गाया था।
श्लोक 39 (3.29.39)
क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम् । यस्तमेवं विजानाति स सर्वं क्षन्तुमर्हति ॥
kṣamā dharmaḥ kṣamā yajñaḥ kṣamā vedāḥ kṣamā śrutam | yastamevaṃ vijānāti sa sarvaṃ kṣantumarhati
क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है, क्षमा शास्त्रज्ञान है। जो इसे ऐसा जानता है, वह सब कुछ क्षमा कर सकता है।
श्लोक 40 (3.29.40)
क्षमा ब्रह्म क्षमा सत्यं क्षमा भूतं च भावि च । क्षमा तपः क्षमा शौचं क्षमयेदं धृतं जगत् ॥
kṣamā brahma kṣamā satyaṃ kṣamā bhūtaṃ ca bhāvi ca | kṣamā tapaḥ kṣamā śaucaṃ kṣamayedaṃ dhṛtaṃ jagat
क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा भूत और भविष्य है। क्षमा तप है, क्षमा शौच है; क्षमा ने ही इस जगत् को धारण कर रखा है।
श्लोक 41 (3.29.41)
अति यज्ञविदां लोकान्क्षमिणः प्राप्नुवन्ति च । अति ब्रह्मविदां लोकानति चापि तपस्विनाम् ॥
ati yajñavidāṃ lokānkṣamiṇaḥ prāpnuvanti ca | ati brahmavidāṃ lokānati cāpi tapasvinām
क्षमाशील लोग यज्ञ जानने वालों के लोकों से, वेद जानने वालों के लोकों से और तपस्वियों के लोकों से भी आगे के लोक प्राप्त करते हैं।
श्लोक 42 (3.29.42)
अन्ये वै यजुषां लोकाः कर्मिणामपरे तथा । क्षमावतां ब्रह्मलोके लोकाः परमपूजिताः ॥
anye vai yajuṣāṃ lokāḥ karmiṇāmapare tathā | kṣamāvatāṃ brahmaloke lokāḥ paramapūjitāḥ
यजुर्मन्त्रों से यज्ञ करने वालों के लोक अलग हैं और (कुएँ-तालाब बनवाने जैसे) पुण्यकर्म करने वालों के अलग; पर क्षमाशीलों के लोक ब्रह्मलोक में हैं, जो परम पूजित हैं।
श्लोक 43 (3.29.43)
क्षमा तेजस्विनां तेजः क्षमा ब्रह्म तपस्विनाम् । क्षमा सत्यं सत्यवतां क्षमा यज्ञः क्षमा शमः ॥
kṣamā tejasvināṃ tejaḥ kṣamā brahma tapasvinām | kṣamā satyaṃ satyavatāṃ kṣamā yajñaḥ kṣamā śamaḥ
क्षमा तेजस्वियों का तेज है, तपस्वियों का ब्रह्म है, सत्यवादियों का सत्य है; क्षमा यज्ञ है, क्षमा शम है।
श्लोक 44 (3.29.44)
तां क्षमां तादृशीं कृष्णे कथमस्मद्विधस्त्यजेत् । यत्र ब्रह्म च सत्यं च यज्ञा लोकाश्च विष्ठिताः ॥
tāṃ kṣamāṃ tādṛśīṃ kṛṣṇe kathamasmadvidhastyajet | yatra brahma ca satyaṃ ca yajñā lokāśca viṣṭhitāḥ
हे कृष्णे, जिसमें ब्रह्म और सत्य, यज्ञ और लोक प्रतिष्ठित हैं, ऐसी क्षमा को मुझ-जैसा व्यक्ति कैसे छोड़ दे?
श्लोक 45 (3.29.45)
इज्यन्ते यज्वनां लोकाः क्षमिणामपरे तथा । क्षन्तव्यमेव सततं पुरुषेण विजानता । यदा हि क्षमते सर्वं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥
ijyante yajvanāṃ lokāḥ kṣamiṇāmapare tathā | kṣantavyameva satataṃ puruṣeṇa vijānatā | yadā hi kṣamate sarvaṃ brahma saṃpadyate tadā
यज्ञ करने वाले पूजा से अपने लोक पाते हैं, और क्षमाशीलों के लोक दूसरे ही हैं। समझदार पुरुष को सदा क्षमा ही करनी चाहिए, क्योंकि जब वह सब कुछ क्षमा कर देता है, तब ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 46 (3.29.46)
क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् । इह सन्मानमृच्छन्ति परत्र च परा गतिम् ॥
kṣamāvatāmayaṃ lokaḥ paraścaiva kṣamāvatām | iha sanmānamṛcchanti paratra ca parā gatim
यह लोक क्षमाशीलों का है और परलोक भी क्षमाशीलों का ही है। यहाँ वे सम्मान पाते हैं और परलोक में परम गति।
श्लोक 47 (3.29.47)
येषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमयाऽभिहतः सदा । तेषां परतरे लोकास्तस्मात्क्षान्तिः परा मता ॥
yeṣāṃ manyurmanuṣyāṇāṃ kṣamayā'bhihataḥ sadā | teṣāṃ paratare lokāstasmātkṣāntiḥ parā matā
जिन मनुष्यों का क्रोध सदा क्षमा से दबा रहता है, उन्हें श्रेष्ठतर लोक मिलते हैं; इसलिए क्षमा को सर्वोपरि माना गया है।
श्लोक 48 (3.29.48)
इति गीताः काश्यपेन गाथा नित्यं क्षमावताम् । श्रुत्वा गाथाः क्षमायास्त्वं तुष्य द्रौपदि मा क्रुधः ॥
iti gītāḥ kāśyapena gāthā nityaṃ kṣamāvatām | śrutvā gāthāḥ kṣamāyāstvaṃ tuṣya draupadi mā krudhaḥ
ये हैं क्षमाशीलों की प्रशंसा में काश्यप की गाई हुई गाथाएँ। हे द्रौपदी, क्षमा की ये गाथाएँ सुनकर सन्तुष्ट हो जाओ, क्रोध मत करो।
श्लोक 49 (3.29.49)
पितामहः शान्तनवः शमं संपूजयिष्यति । कृष्णश्च देवकीपुत्रः शमं संपूजयिष्यति ॥
pitāmahaḥ śāntanavaḥ śamaṃ saṃpūjayiṣyati | kṛṣṇaśca devakīputraḥ śamaṃ saṃpūjayiṣyati
पितामह शान्तनुनन्दन भीष्म शान्ति का समर्थन करेंगे; देवकीनन्दन कृष्ण भी शान्ति का समर्थन करेंगे।
श्लोक 50 (3.29.50)
आचार्यो विदुरः क्षत्ता शममेव वदिष्यतः । कृपश्च संजयश्चैव शममेव वदिष्यतः ॥
ācāryo viduraḥ kṣattā śamameva vadiṣyataḥ | kṛpaśca saṃjayaścaiva śamameva vadiṣyataḥ
आचार्य द्रोण और क्षत्ता विदुर, दोनों शान्ति की ही बात कहेंगे; कृप और संजय भी शान्ति की ही बात कहेंगे।
श्लोक 51 (3.29.51)
सोमदत्तो युयुत्सुश्च द्रोणपुत्रस्तथैव च । पितामहश्च नो व्यासः शमं वदति नित्यशः ॥
somadatto yuyutsuśca droṇaputrastathaiva ca | pitāmahaśca no vyāsaḥ śamaṃ vadati nityaśaḥ
सोमदत्त, युयुत्सु, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और हमारे पितामह व्यास — ये सब सदा शान्ति की ही बात कहते हैं।
श्लोक 52 (3.29.52)
एतैर्हि राजा नियतं चोद्यमानः शमं प्रति । राज्यं दातेति मे बुद्धिर्न चेल्लोभान्नशिष्यति ॥
etairhi rājā niyataṃ codyamānaḥ śamaṃ prati | rājyaṃ dāteti me buddhirna cellobhānnaśiṣyati
इन सबके द्वारा बराबर शान्ति के लिए प्रेरित किए जाने पर राजा (धृतराष्ट्र) राज्य लौटा देंगे — ऐसा मेरा विश्वास है; यदि नहीं लौटाएँगे, तो लोभ के कारण नष्ट हो जाएँगे।
श्लोक 53 (3.29.53)
कालोऽयं दारुणः प्राप्तो भरतानामभूतये । निश्चितं मे सदैवैतत्पुरस्तादपि भामिनि ॥
kālo'yaṃ dāruṇaḥ prāpto bharatānāmabhūtaye | niścitaṃ me sadaivaitatpurastādapi bhāmini
भरतवंशियों के विनाश के लिए यह भयंकर समय आ पहुँचा है। हे भामिनि, यह बात मुझे पहले से ही सदा निश्चित रूप से ज्ञात थी।
श्लोक 54 (3.29.54)
सुयोधनो नार्हतीति क्षमा मामेव विन्दति । अर्हस्तत्राहमित्येवं तस्मान्मां विन्दते क्षमा ॥
suyodhano nārhatīti kṣamā māmeva vindati | arhastatrāhamityevaṃ tasmānmāṃ vindate kṣamā
सुयोधन क्षमा के योग्य नहीं है, इसलिए क्षमा मुझे ही प्राप्त होती है; मैं उसके योग्य हूँ, इसीलिए क्षमा मेरे पास आती है।
श्लोक 55 (3.29.55)
एतदात्मवतां वृत्तमेष धर्मः सनातनः । क्षमा चैवानृशंस्यं च तत्कर्ताऽस्म्यहमञ्जसा ॥
etadātmavatāṃ vṛttameṣa dharmaḥ sanātanaḥ | kṣamā caivānṛśaṃsyaṃ ca tatkartā'smyahamañjasā
यही आत्मसंयमी पुरुषों का आचरण है, यही सनातन धर्म है — क्षमा और दयालुता। मैं निष्ठापूर्वक इन्हीं का पालन करूँगा।