आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 30
द्रौपदी द्वारा विधाता की निन्दा
वन में द्रौपदी युधिष्ठिर से कहती है कि धर्म, क्षमा और कोमलता से उन्हें कुछ नहीं मिला। वह स्मरण कराती है कि उन्होंने धर्म को भाइयों, पत्नी और अपने प्राणों से भी ऊपर रखा, ब्राह्मणों, देवताओं और पितरों का सत्कार किया और बड़े-बड़े यज्ञ किए, फिर भी जुए में सब कुछ हार गए। यह तर्क देते हुए कि सब प्राणी धाता के हाथ की कठपुतलियों की तरह चलते हैं, वह उस ईश्वर की निन्दा करती है जो सज्जनों को दुःख देता है और दुर्योधन को समृद्ध करता है, और अन्त में कहती है कि यदि ईश्वर अपने करवाए कर्मों से लिप्त नहीं होता, तो संसार में केवल बल का ही राज है।
द्रौपद्युवाच
श्लोक 1 (3.30.1)
नमो धात्रे विधात्रे च यौ मोहं चक्रतुस्तव । पितृपैतामहे राज्ये वोढव्ये तेऽन्यथा मतिः ॥
namo dhātre vidhātre ca yau mohaṃ cakratustava | pitṛpaitāmahe rājye voḍhavye te'nyathā matiḥ
उस धाता और विधाता को नमस्कार है, जिन्होंने तुम्हें ऐसा मोह में डाल दिया कि जब तुम्हें पिता-पितामह के राज्य का भार उठाना चाहिए, तब तुम्हारी बुद्धि उलटी दिशा में चल रही है।
श्लोक 2 (3.30.2)
कर्मभिश्चिन्तितो लोको गत्यांगत्यां पृथग्विधः । तस्मात्कर्माणि नित्यानि लोभान्मोक्षं यियासति ॥
karmabhiścintito loko gatyāṃgatyāṃ pṛthagvidhaḥ | tasmātkarmāṇi nityāni lobhānmokṣaṃ yiyāsati
यह जगत् कर्मों से रचा गया है और जन्म-जन्मान्तर की हर गति में अलग-अलग रूप लेता है। इसलिए कर्मों का फल टाला नहीं जा सकता; मनुष्य लोभवश ही उनसे छुटकारा पाना चाहता है।
श्लोक 3 (3.30.3)
नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च । पुरुषः श्रियमाप्नोति न घृणित्वेन कर्हिचित् ॥
neha dharmānṛśaṃsyābhyāṃ na kṣāntyā nārjavena ca | puruṣaḥ śriyamāpnoti na ghṛṇitvena karhicit
इस संसार में न तो धर्म और दयालुता से, न क्षमा और सरलता से, और न ही करुणा से मनुष्य कभी लक्ष्मी प्राप्त करता है।
श्लोक 4 (3.30.4)
त्वां चेद्व्यसनमभ्यागादिदं भारत दुःसहम् । स त्वं नार्हसि नापीमे भ्रातरस्ते महौजसः ॥
tvāṃ cedvyasanamabhyāgādidaṃ bhārata duḥsaham | sa tvaṃ nārhasi nāpīme bhrātaraste mahaujasaḥ
हे भारत, यह असह्य विपत्ति तुम पर आ पड़ी है, जबकि न तुम इसके योग्य हो और न तुम्हारे ये महाबली भाई।
श्लोक 5 (3.30.5)
न हि तेऽध्यगमञ्जातु तदानीं नाद्य भारत । धर्मात्प्रियतरं किंचिदपि चेज्जीवितादपि ॥
na hi te'dhyagamañjātu tadānīṃ nādya bhārata | dharmātpriyataraṃ kiṃcidapi cejjīvitādapi
हे भारत, न तब और न अब, लोगों ने कभी यह नहीं जाना कि तुम्हें धर्म से अधिक प्रिय कुछ है, अपना जीवन भी नहीं।
श्लोक 6 (3.30.6)
धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थं जीवितं च ते । ब्राह्मणा गुरवश्चैव जानन्त्यपि च देवताः ॥
dharmārthameva te rājyaṃ dharmārthaṃ jīvitaṃ ca te | brāhmaṇā guravaścaiva jānantyapi ca devatāḥ
तुम्हारा राज्य धर्म के लिए है और तुम्हारा जीवन भी धर्म के लिए ही है। यह बात ब्राह्मण और गुरुजन जानते हैं, और देवता भी जानते हैं।
श्लोक 7 (3.30.7)
भीमसेनार्जुनौ चोभौ माद्रेयौ च मया सह । त्यजेस्त्वमिति मे बुद्धिर्न तु धर्मं परित्यजेः ॥
bhīmasenārjunau cobhau mādreyau ca mayā saha | tyajestvamiti me buddhirna tu dharmaṃ parityajeḥ
मेरा विश्वास है कि तुम भीमसेन और अर्जुन को, माद्री के दोनों पुत्रों को और मुझे भी त्याग सकते हो, पर धर्म को कभी नहीं त्यागोगे।
श्लोक 8 (3.30.8)
राजानं धर्मगोप्तारं धर्मो रक्षति रक्षितः । इति मे श्रुतमार्याणां त्वां तु मन्ये न रक्षति ॥
rājānaṃ dharmagoptāraṃ dharmo rakṣati rakṣitaḥ | iti me śrutamāryāṇāṃ tvāṃ tu manye na rakṣati
मैंने श्रेष्ठ जनों से सुना है कि रक्षा किया हुआ धर्म अपनी रक्षा करने वाले राजा की रक्षा करता है; पर मुझे लगता है कि वह तुम्हारी रक्षा नहीं करता।
श्लोक 9 (3.30.9)
त्यक्त्वाऽन्यान्हि नरव्याघ्र नित्यदा धर्ममेव ते । बुद्धिः सततमन्वेति छायेव पुरुषं निजा ॥
tyaktvā'nyānhi naravyāghra nityadā dharmameva te | buddhiḥ satatamanveti chāyeva puruṣaṃ nijā
हे पुरुषसिंह, सब कुछ छोड़कर तुम्हारी बुद्धि सदा केवल धर्म के पीछे वैसे ही चलती है, जैसे मनुष्य की अपनी छाया उसके पीछे चलती है।
श्लोक 10 (3.30.10)
नावमंस्था हि सदृशान्नावराञ्श्रेयसः कुतः । अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां न ते शृङ्गमवर्धत ॥
nāvamaṃsthā hi sadṛśānnāvarāñśreyasaḥ kutaḥ | avāpya pṛthivīṃ kṛtsnāṃ na te śṛṅgamavardhata
तुमने कभी अपने बराबर वालों का अपमान नहीं किया, अपने से छोटों का भी नहीं, फिर श्रेष्ठ जनों का तो प्रश्न ही कहाँ? सारी पृथ्वी पाकर भी तुम्हारा अभिमान नहीं बढ़ा।
श्लोक 11 (3.30.11)
स्वाहाकारैः स्वधाभिश्च पूजाभिरपि च द्विजान् । देवताश्च पितॄंश्चैव सततं पार्थ सेवसे ॥
svāhākāraiḥ svadhābhiśca pūjābhirapi ca dvijān | devatāśca pitṝṃścaiva satataṃ pārtha sevase
हे पार्थ, स्वाहाकार, स्वधा और पूजा के द्वारा तुम निरन्तर ब्राह्मणों, देवताओं और पितरों की सेवा करते हो।
श्लोक 12 (3.30.12)
ब्राह्मणाः सर्वकामैस्ते सततं पार्थ तर्पिताः । यतयो मोक्षिणश्चैव गृहस्थाश्चैव भारत ॥
brāhmaṇāḥ sarvakāmaiste satataṃ pārtha tarpitāḥ | yatayo mokṣiṇaścaiva gṛhasthāścaiva bhārata
हे पार्थ, हे भारत, तुमने ब्राह्मणों को सदा सभी मनचाही वस्तुएँ देकर तृप्त किया है, चाहे वे यति हों, मोक्ष के अभिलाषी हों या गृहस्थ।
श्लोक 13 (3.30.13)
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्यत्राहं परिचारिका । आरण्यकेभ्यो वन्यानि भोजनानि प्रयच्छसि । नादेयं ब्राह्मणेभ्यस्ते गृहे किंचन विद्यते ॥
bhuñjate rukmapātrībhiryatrāhaṃ paricārikā | āraṇyakebhyo vanyāni bhojanāni prayacchasi | nādeyaṃ brāhmaṇebhyaste gṛhe kiṃcana vidyate
जहाँ मैं परिचारिका बनकर सेवा करती थी, वहाँ वे सोने की थालियों में भोजन करते थे। वनवासियों को तुम वन के भोजन देते हो। तुम्हारे घर में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो ब्राह्मणों को न दी जा सके।
श्लोक 14 (3.30.14)
यदिदं वैश्वदेवान्ते सायं प्रातः प्रदीयते । तद्दत्त्वाऽतिथिभृत्येभ्यो राजञ्शिष्टेन जीवसि ॥
yadidaṃ vaiśvadevānte sāyaṃ prātaḥ pradīyate | taddattvā'tithibhṛtyebhyo rājañśiṣṭena jīvasi
हे राजन्, वैश्वदेव के अन्त में सुबह-शाम जो अन्न दान किया जाता है, उसे पहले अतिथियों और आश्रितों को देकर तुम बचे हुए से जीवन चलाते हो।
श्लोक 15 (3.30.15)
इष्टयः पशुबन्धाश्च काम्यनैमित्तिकाश्च ये । वर्तन्ते पाकयज्ञाश्च सदा यज्ञाश्च तेऽनघ ॥
iṣṭayaḥ paśubandhāśca kāmyanaimittikāśca ye | vartante pākayajñāśca sadā yajñāśca te'nagha
हे निष्पाप, इष्टियाँ, पशुबन्ध, काम्य और नैमित्तिक कर्म, पाकयज्ञ तथा अन्य यज्ञ तुम्हारे यहाँ सदा होते रहते हैं।
श्लोक 16 (3.30.16)
अस्मिन्नपि महारण्ये विजने दस्युसेविते । राष्ट्रादपेत्य वसतो धर्मस्ते नावसीदति ॥
asminnapi mahāraṇye vijane dasyusevite | rāṣṭrādapetya vasato dharmaste nāvasīdati
इस निर्जन, डाकुओं से भरे महावन में भी, अपने राज्य से दूर रहते हुए तुम्हारा धर्म शिथिल नहीं होता।
श्लोक 17 (3.30.17)
अश्वमेधो राजसूयः पौण्डरीकोऽथ गोसवः । इष्टास्त्वया महायज्ञा बहवोऽन्ये सदक्षिणाः ॥
aśvamedho rājasūyaḥ pauṇḍarīko'tha gosavaḥ | iṣṭāstvayā mahāyajñā bahavo'nye sadakṣiṇāḥ
अश्वमेध, राजसूय, पौण्डरीक और गोसव, ये महायज्ञ तुमने किए हैं, और दक्षिणा सहित अनेक अन्य यज्ञ भी।
श्लोक 18 (3.30.18)
राजन्परीतया बुद्ध्या विषमेऽक्षपराजये । पार्थ मित्राणि चास्मांश्च वसूनि च पराजितः ॥
rājanparītayā buddhyā viṣame'kṣaparājaye | pārtha mitrāṇi cāsmāṃśca vasūni ca parājitaḥ
और फिर भी, हे राजन्, हे पार्थ, उस कपटपूर्ण द्यूत में तुम्हारी बुद्धि उलट गई और तुम मित्रों को, हमें और अपना धन, सब हार गए।
श्लोक 19 (3.30.19)
ऋजोर्मृदोर्बदान्यस्य धीमतः सत्यवादिनः । कथमक्षव्यसनजा बुद्धिरापतिता तव ॥
ṛjormṛdorbadānyasya dhīmataḥ satyavādinaḥ | kathamakṣavyasanajā buddhirāpatitā tava
तुम जैसे सरल, कोमल, उदार, बुद्धिमान और सत्यवादी पुरुष में जुए के व्यसन से उपजी यह बुद्धि कैसे आ गई?
श्लोक 20 (3.30.20)
अतीव मोह आयाति मनश्च परिदूयते । निशाम्य व्यसनं पार्थ तवेदमतिदुःसहम् ॥
atīva moha āyāti manaśca paridūyate | niśāmya vyasanaṃ pārtha tavedamatiduḥsaham
हे पार्थ, तुम्हारी यह अत्यन्त असह्य विपत्ति देखकर मुझ पर गहरा मोह छा जाता है और मेरा मन व्याकुल हो उठता है।
श्लोक 21 (3.30.21)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ईश्वरस्य वशे लोकस्तिष्ठते नात्मनो यथा ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | īśvarasya vaśe lokastiṣṭhate nātmano yathā
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं, जो बताता है कि संसार ईश्वर के वश में है, अपने वश में नहीं।
श्लोक 22 (3.30.22)
धातैव खलु भूतानां सुखदुःखे प्रियाप्रिये । ददाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् ॥
dhātaiva khalu bhūtānāṃ sukhaduḥkhe priyāpriye | dadāti sarvamīśānaḥ purastācchukramuccaran
धाता ही, वह ईश्वर ही, प्राणियों के पूर्वकर्मों के बीज के अनुसार उन्हें सब कुछ देता है: सुख और दुःख, प्रिय और अप्रिय।
श्लोक 23 (3.30.23)
यथा दारुमयीं योषां नरो धीरः समाहितः । इङ्गयत्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः ॥
yathā dārumayīṃ yoṣāṃ naro dhīraḥ samāhitaḥ | iṅgayatyaṅgamaṅgāni tathā rājannimāḥ prajāḥ
जैसे कोई स्थिरचित्त, एकाग्र मनुष्य लकड़ी की पुतली के अंग-अंग को हिलाता है, वैसे ही, हे राजन्, ये सब प्राणी चलाए जाते हैं।
श्लोक 24 (3.30.24)
आकाश इव भूतानि व्याप्य सर्वाणि भारत । ईश्वरो विदधातीह कल्याणं यच्च पापकम् ॥
ākāśa iva bhūtāni vyāpya sarvāṇi bhārata | īśvaro vidadhātīha kalyāṇaṃ yacca pāpakam
हे भारत, आकाश की भाँति सब प्राणियों में व्याप्त होकर ईश्वर ही यहाँ शुभ और अशुभ दोनों का विधान करता है।
श्लोक 25 (3.30.25)
शकुनिस्तन्तुबद्धो वा नीयतेऽयमनीश्वरः । ईश्वरस्य वशे तिष्ठन्नान्येषामात्मनः प्रभुः ॥
śakunistantubaddho vā nīyate'yamanīśvaraḥ | īśvarasya vaśe tiṣṭhannānyeṣāmātmanaḥ prabhuḥ
डोरी से बँधे पक्षी की तरह यह असमर्थ प्राणी खींचा जाता है। ईश्वर के वश में रहता हुआ वह न दूसरों का स्वामी है, न अपना।
श्लोक 26 (3.30.26)
मणिः सूत्र इव प्रोतो नस्योत इव गोवृषः । धातुरादेशमन्वेति तन्मयो हि तदर्पणः ॥
maṇiḥ sūtra iva proto nasyota iva govṛṣaḥ | dhāturādeśamanveti tanmayo hi tadarpaṇaḥ
धागे में पिरोई मणि की तरह, नाक में नकेल डाले बैल की तरह, मनुष्य धाता के आदेश के पीछे चलता है, क्योंकि वह उसी से बना है और उसी को समर्पित है।
श्लोक 27 (3.30.27)
नात्माधीनो मनुष्योऽयं कालं भवति कंचन । स्रोतसो मध्यमापन्नः कूलवृक्ष इव च्युतः ॥
nātmādhīno manuṣyo'yaṃ kālaṃ bhavati kaṃcana | srotaso madhyamāpannaḥ kūlavṛkṣa iva cyutaḥ
मनुष्य किसी भी समय अपने अधीन नहीं होता। वह किनारे के उस वृक्ष के समान है जो टूटकर धारा के बीच जा पड़ा हो।
श्लोक 28 (3.30.28)
अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं नरकमेव च ॥
ajño janturanīśo'yamātmanaḥ sukhaduḥkhayoḥ | īśvaraprerito gacchetsvargaṃ narakameva ca
यह अज्ञानी प्राणी अपने सुख-दुःख पर कोई अधिकार नहीं रखता। ईश्वर की प्रेरणा से ही वह स्वर्ग या नरक को जाता है।
श्लोक 29 (3.30.29)
यथा वायोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति बलीयसः । धातुरेवं वशं यान्ति सर्वभूतानि भारत ॥
yathā vāyostṛṇāgrāṇi vaśaṃ yānti balīyasaḥ | dhāturevaṃ vaśaṃ yānti sarvabhūtāni bhārata
हे भारत, जैसे तिनकों के सिरे प्रबल वायु के वश में हो जाते हैं, वैसे ही सब प्राणी धाता के वश में रहते हैं।
श्लोक 30 (3.30.30)
आर्ये कर्मणि युञ्जानः पापे वा पुनरीश्वरः । व्याप्य भूतानि चरते न चायमिति लक्ष्यते ॥
ārye karmaṇi yuñjānaḥ pāpe vā punarīśvaraḥ | vyāpya bhūtāni carate na cāyamiti lakṣyate
प्राणियों को कभी श्रेष्ठ कर्मों में और कभी पाप-कर्मों में लगाता हुआ ईश्वर सब भूतों में व्याप्त होकर विचरता है, फिर भी कोई यह नहीं पहचान पाता कि यह वही है।
श्लोक 31 (3.30.31)
हेतुमात्रमिदं धातुः शरीरं क्षेत्रसंज्ञितम् । येन कारयते कर्म शुभाशुभफलं विभुः ॥
hetumātramidaṃ dhātuḥ śarīraṃ kṣetrasaṃjñitam | yena kārayate karma śubhāśubhaphalaṃ vibhuḥ
यह शरीर, जिसे क्षेत्र कहा जाता है, धाता का एक साधन मात्र है, जिसके द्वारा वह सर्वव्यापी प्रभु प्राणी से शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्म करवाता है।
श्लोक 32 (3.30.32)
पश्य मायाप्रभावोऽयमीश्वरेण यथा कृतः । यो हन्ति भूतैर्भूतानि मोहयित्वाऽऽत्ममायया ॥
paśya māyāprabhāvo'yamīśvareṇa yathā kṛtaḥ | yo hanti bhūtairbhūtāni mohayitvā''tmamāyayā
देखो, ईश्वर ने कैसी माया का प्रभाव रचा है: वह अपनी माया से मोहित करके प्राणियों के द्वारा ही प्राणियों का संहार करता है।
श्लोक 33 (3.30.33)
अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः ॥
anyathā paridṛṣṭāni munibhistattvadarśibhiḥ | anyathā parivartante vegā iva nabhasvataḥ
तत्त्वदर्शी मुनि जिन बातों को एक प्रकार से देखते हैं, वे वायु के झोंकों की तरह किसी और ही प्रकार से बदल जाती हैं।
श्लोक 34 (3.30.34)
अन्यथैव हि वर्तन्ते पुरुषास्तानि तानि च । अन्यथैव प्रभुस्तानि करोति विकरोति च ॥
anyathaiva hi vartante puruṣāstāni tāni ca | anyathaiva prabhustāni karoti vikaroti ca
मनुष्य उन-उन वस्तुओं को एक ढंग से समझते हैं, पर प्रभु उन्हें बिल्कुल दूसरे ढंग से बनाता और बिगाड़ता है।
श्लोक 35 (3.30.35)
यथा काष्ठेन वा काष्ठमश्मानं चाश्मना पुनः । अयसा चाप्ययश्छिन्द्यान्निर्विचेष्टमचेतनम् ॥
yathā kāṣṭhena vā kāṣṭhamaśmānaṃ cāśmanā punaḥ | ayasā cāpyayaśchindyānnirviceṣṭamacetanam
जैसे कोई लकड़ी से लकड़ी को, पत्थर से पत्थर को और लोहे से लोहे को काट डाले, जो सब निश्चेष्ट और अचेतन हैं,
श्लोक 36 (3.30.36)
एवं स भगवान्देवः स्वयंभूः प्रपितामहः । निहन्ति भूतैर्भूतानि छद्म कृत्वा युधिष्ठिर ॥
evaṃ sa bhagavāndevaḥ svayaṃbhūḥ prapitāmahaḥ | nihanti bhūtairbhūtāni chadma kṛtvā yudhiṣṭhira
वैसे ही, हे युधिष्ठिर, वह भगवान् देव, स्वयम्भू प्रपितामह, छल का आवरण डालकर प्राणियों के द्वारा प्राणियों का वध करता है।
श्लोक 37 (3.30.37)
संप्रयोज्य वियोज्यायं कामकारकरः प्रभुः । क्रीडते भगवान्भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ॥
saṃprayojya viyojyāyaṃ kāmakārakaraḥ prabhuḥ | krīḍate bhagavānbhūtairbālaḥ krīḍanakairiva
अपनी इच्छा से प्राणियों को मिलाता और बिछुड़ाता हुआ वह भगवान् प्रभु उनसे वैसे ही खेलता है जैसे बालक खिलौनों से खेलता है।
श्लोक 38 (3.30.38)
न मातृपितृवद्राजन्धाता भूतेषु वर्तते । रोषादिव प्रवृत्तोऽयं यथाऽयमितरो जनः ॥
na mātṛpitṛvadrājandhātā bhūteṣu vartate | roṣādiva pravṛtto'yaṃ yathā'yamitaro janaḥ
हे राजन्, धाता प्राणियों के साथ माता-पिता जैसा व्यवहार नहीं करता। वह किसी साधारण मनुष्य की भाँति मानो क्रोध से प्रेरित होकर काम करता है।
श्लोक 39 (3.30.39)
आर्याञ्शीलवतो दृष्ट्वा ह्रीमतो वृत्तिकर्शितान् । अनार्यान्सुखिनश्चैव विह्वलानिव चिन्तये ॥
āryāñśīlavato dṛṣṭvā hrīmato vṛttikarśitān | anāryānsukhinaścaiva vihvalāniva cintaye
जब मैं शीलवान और लज्जाशील श्रेष्ठ जनों को आजीविका के अभाव में दुर्बल होते और अनार्य लोगों को सुखी देखती हूँ, तो मैं व्याकुल-सी होकर सोच में डूब जाती हूँ।
श्लोक 40 (3.30.40)
तवेमामापदं दृष्ट्वा समृद्धिं च सुयोधने । धातारं गर्हये पार्थ विषमं योऽनुपश्यति ॥
tavemāmāpadaṃ dṛṣṭvā samṛddhiṃ ca suyodhane | dhātāraṃ garhaye pārtha viṣamaṃ yo'nupaśyati
हे पार्थ, तुम्हारी यह विपत्ति और सुयोधन की समृद्धि देखकर मैं उस धाता की निन्दा करती हूँ, जो इतनी विषम दृष्टि से देखता है।
श्लोक 41 (3.30.41)
आर्यशास्त्रातिगे क्रूरे लुब्धे धर्मापचायिनि । धार्तराष्ट्रे श्रियं दत्त्वा धाता किं फलमश्नुते ॥
āryaśāstrātige krūre lubdhe dharmāpacāyini | dhārtarāṣṭre śriyaṃ dattvā dhātā kiṃ phalamaśnute
श्रेष्ठ जनों के शास्त्र का उल्लंघन करने वाले, क्रूर, लोभी और धर्म का अनादर करने वाले धृतराष्ट्र-पुत्र को लक्ष्मी देकर धाता को कौन-सा फल मिलता है?
श्लोक 42 (3.30.42)
कर्म चेत्कृतमन्वेति कर्तारं नान्यमृच्छति । कर्मणा तेन पापेन लिप्यते नूनमीश्वरः ॥
karma cetkṛtamanveti kartāraṃ nānyamṛcchati | karmaṇā tena pāpena lipyate nūnamīśvaraḥ
यदि किया हुआ कर्म अपने कर्ता के ही पीछे जाता है और किसी दूसरे तक नहीं पहुँचता, तो निश्चय ही ईश्वर भी उस पाप-कर्म से लिप्त होता है।
श्लोक 43 (3.30.43)
अथ कर्मकृतं पापं न चेत्कर्तारमृच्छति । कारणं बलमेवेह जनाञ्शोचामि दुर्बलान् ॥
atha karmakṛtaṃ pāpaṃ na cetkartāramṛcchati | kāraṇaṃ balameveha janāñśocāmi durbalān
और यदि किए हुए कर्म का पाप कर्ता तक नहीं पहुँचता, तो यहाँ केवल बल ही कारण है, और मैं निर्बल लोगों के लिए शोक करती हूँ।