आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 31
युधिष्ठिर द्वारा धर्म का समर्थन
युधिष्ठिर द्रौपदी को उत्तर देते हुए उसके वचनों को नास्तिकता बताते हैं। वे कहते हैं कि वे धर्म का आचरण फल के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य समझकर करते हैं, और चेतावनी देते हैं कि जो धर्म, ऋषियों के वचन या सज्जनों के आचरण पर शंका करता है, वह अधम योनि में जाता है और कहीं शान्ति नहीं पाता। मार्कण्डेय, व्यास, नारद आदि ऋषियों का तथा द्रौपदी और धृष्टद्युम्न के अलौकिक जन्म का उदाहरण देकर वे सिद्ध करते हैं कि धर्म अवश्य फल देता है, यद्यपि उसकी गति देवताओं का रहस्य है, और उससे संशय छोड़ने तथा फिर कभी धाता की निन्दा न करने का आग्रह करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (3.31.1)
वल्गु चित्रपदं श्लक्ष्णं याज्ञसेनि त्वया वचः । उक्तं तच्छ्रुतमस्माभिर्नास्तिक्यं तु प्रभाषसे ॥
valgu citrapadaṃ ślakṣṇaṃ yājñaseni tvayā vacaḥ | uktaṃ tacchrutamasmābhirnāstikyaṃ tu prabhāṣase
हे याज्ञसेनी, तुमने जो सुन्दर, अलंकृत और मधुर वचन कहे, वे हमने सुने; पर तुम नास्तिकता की बात कह रही हो।
श्लोक 2 (3.31.2)
नाहं धर्मफलाकाङ्क्षी राजपुत्रि चराम्युत । ददामि देयमित्येव यजे यष्टव्यमित्युत ॥
nāhaṃ dharmaphalākāṅkṣī rājaputri carāmyuta | dadāmi deyamityeva yaje yaṣṭavyamityuta
हे राजपुत्री, मैं धर्म के फल की इच्छा से धर्म का आचरण नहीं करता। मैं इसलिए देता हूँ कि देना चाहिए, और इसलिए यज्ञ करता हूँ कि यज्ञ करना चाहिए।
श्लोक 3 (3.31.3)
अस्तु वाऽत्र फलं मा वा कर्तव्यं पुरुषेण यत् । गृहे निवसता कृष्णे यथाशक्ति करोमि तत् ॥
astu vā'tra phalaṃ mā vā kartavyaṃ puruṣeṇa yat | gṛhe nivasatā kṛṣṇe yathāśakti karomi tat
हे कृष्णा, उसका फल हो या न हो, गृहस्थ के रूप में रहते हुए मनुष्य को जो करना चाहिए, वह मैं अपनी शक्ति भर करता हूँ।
श्लोक 4 (3.31.4)
धर्मं चरामि सुश्रोणि न धर्मफलकारणात् । आगमाननतिक्रम्य सतां वृत्तमवेक्ष्य च ॥
dharmaṃ carāmi suśroṇi na dharmaphalakāraṇāt | āgamānanatikramya satāṃ vṛttamavekṣya ca
हे सुन्दरी, मैं धर्म का आचरण उसके फल के कारण नहीं करता, बल्कि शास्त्रों का उल्लंघन न करते हुए और सज्जनों के आचरण को देखकर करता हूँ।
श्लोक 5 (3.31.5)
धर्म एव मनः कृष्णे स्वभावाच्चैव मे धृतम् । धर्मवाणिज्यको हीनो जघन्यो धर्मवादिनाम् ॥
dharma eva manaḥ kṛṣṇe svabhāvāccaiva me dhṛtam | dharmavāṇijyako hīno jaghanyo dharmavādinām
हे कृष्णा, मेरा मन स्वभाव से ही केवल धर्म में लगा है। जो धर्म का व्यापार करता है, वह नीच है और धर्म की बात करने वालों में सबसे अधम है।
श्लोक 6 (3.31.6)
न धर्मफलमाप्नोति यो धर्मं दोग्धुमिच्छति । यश्चैनं शङ्कते कृत्वा नास्तिक्यात्पापचेतनः ॥
na dharmaphalamāpnoti yo dharmaṃ dogdhumicchati | yaścainaṃ śaṅkate kṛtvā nāstikyātpāpacetanaḥ
जो धर्म को दुहना चाहता है, उसे धर्म का फल नहीं मिलता; और न उस पापबुद्धि को मिलता है जो धर्म करके फिर नास्तिकता के कारण उस पर शंका करता है।
श्लोक 7 (3.31.7)
अतिवादान्मदाच्चैव मा धर्ममभिशङ्कथाः । धर्मातिशङ्की पुरुषस्तिर्यग्गतिपरायणः ॥
ativādānmadāccaiva mā dharmamabhiśaṅkathāḥ | dharmātiśaṅkī puruṣastiryaggatiparāyaṇaḥ
वाचालता और अहंकार के कारण धर्म पर शंका मत करो। धर्म पर शंका करने वाला मनुष्य पशु-पक्षियों की योनि में जाता है।
श्लोक 8 (3.31.8)
धर्मो यस्यातिशङ्क्यः स्यादार्षं वा दुर्बलात्मनः । वेदाच्छूद्र इवापेयात्स लोकादजरामरात् ॥
dharmo yasyātiśaṅkyaḥ syādārṣaṃ vā durbalātmanaḥ | vedācchūdra ivāpeyātsa lokādajarāmarāt
जिस दुर्बल-चित्त मनुष्य को धर्म पर या ऋषियों के वचन पर शंका होती है, वह अजर-अमर लोक से वैसे ही वंचित हो जाता है जैसे शूद्र वेद से।
श्लोक 9 (3.31.9)
वेदाध्यायी धर्मपरः कुले जातो मनस्विनि । स्थविरेषु स योक्तव्यो राजभिर्धर्मचारिभिः ॥
vedādhyāyī dharmaparaḥ kule jāto manasvini | sthavireṣu sa yoktavyo rājabhirdharmacāribhiḥ
हे मनस्विनी, जो वेद का अध्ययन करता है, धर्मपरायण है और अच्छे कुल में जन्मा है, उसे धर्मात्मा राजाओं को वृद्धों में गिनना चाहिए।
श्लोक 10 (3.31.10)
पापीयान्स हि शूद्रेभ्यस्तस्करेभ्यो विशिष्यते । शास्त्रातिगो मन्दबुद्धिर्यो धर्ममतिशङ्कते ॥
pāpīyānsa hi śūdrebhyastaskarebhyo viśiṣyate | śāstrātigo mandabuddhiryo dharmamatiśaṅkate
पर जो मन्दबुद्धि शास्त्रों का उल्लंघन करके धर्म पर शंका करता है, वह शूद्रों से भी अधिक पापी है और चोरों से भी बढ़कर है।
श्लोक 11 (3.31.11)
प्रत्यक्षं हि त्वया दृष्ट ऋषिर्गच्छन्महातपाः । मार्कण्डेयोऽप्रमेयात्मा धर्मेण चिरजीविता ॥
pratyakṣaṃ hi tvayā dṛṣṭa ṛṣirgacchanmahātapāḥ | mārkaṇḍeyo'prameyātmā dharmeṇa cirajīvitā
तुमने अपनी आँखों से अप्रमेय आत्मा वाले महातपस्वी ऋषि मार्कण्डेय को यहाँ आते देखा है, जो धर्म के बल से चिरजीवी हैं।
श्लोक 12 (3.31.12)
व्यासो वसिष्ठो मैत्रेयो नारदो लोमशः शुकः । अन्ये च ऋषयः सर्वे धर्मेणैव सुचेतसः ॥
vyāso vasiṣṭho maitreyo nārado lomaśaḥ śukaḥ | anye ca ṛṣayaḥ sarve dharmeṇaiva sucetasaḥ
व्यास, वसिष्ठ, मैत्रेय, नारद, लोमश, शुक और अन्य सभी ऋषि धर्म के द्वारा ही शुद्धचित्त हुए हैं।
श्लोक 13 (3.31.13)
प्रत्यक्षं पश्यसि ह्येतान्दिव्ययोगसमन्वितान् । शापानुग्रहणे शक्तान्देवेभ्योऽपि गरीयसः ॥
pratyakṣaṃ paśyasi hyetāndivyayogasamanvitān | śāpānugrahaṇe śaktāndevebhyo'pi garīyasaḥ
तुम उन्हें प्रत्यक्ष देखती हो, जो दिव्य योग से सम्पन्न हैं, शाप और अनुग्रह देने में समर्थ हैं, और देवताओं से भी बढ़कर हैं।
श्लोक 14 (3.31.14)
एते हि धर्ममेवादौ वर्णयन्ति सदाऽनघे । कर्तव्यममरप्रख्याः प्रत्यक्षागमबुद्धयः ॥
ete hi dharmamevādau varṇayanti sadā'naghe | kartavyamamaraprakhyāḥ pratyakṣāgamabuddhayaḥ
हे निष्पाप, अमरों के समान ये ऋषि, जिनकी बुद्धि प्रत्यक्ष और शास्त्र पर टिकी है, सदा सबसे पहले यही बताते हैं कि धर्म का आचरण करना चाहिए।
श्लोक 15 (3.31.15)
अतो नार्हसि कल्याणि धातारं धर्ममेव च । रजोमूढेन मनसा क्षेप्तुं शङ्कितुमेव च ॥
ato nārhasi kalyāṇi dhātāraṃ dharmameva ca | rajomūḍhena manasā kṣeptuṃ śaṅkitumeva ca
इसलिए हे कल्याणी, रजोगुण से मूढ़ मन के साथ तुम्हें धाता और धर्म की निन्दा करना या उन पर शंका करना उचित नहीं।
श्लोक 16 (3.31.16)
उन्मत्तान्मन्यते बालः सर्वानागतनिश्चयान् । धर्मातिशङ्की नान्यस्मिन्प्रमाणमधिगच्छति ॥
unmattānmanyate bālaḥ sarvānāgataniścayān | dharmātiśaṅkī nānyasminpramāṇamadhigacchati
मूर्ख मनुष्य उन सबको पागल समझता है जो निश्चय पर पहुँच चुके हैं। धर्म पर शंका करने वाला अपने से बाहर किसी को प्रमाण नहीं मानता।
श्लोक 17 (3.31.17)
इन्द्रियप्रीतिसंबद्धं यदिदं लोकसाक्षिकम् । एतावन्मन्यते बालो मोहमन्यत्र गच्छति ॥
indriyaprītisaṃbaddhaṃ yadidaṃ lokasākṣikam | etāvanmanyate bālo mohamanyatra gacchati
इन्द्रियों के सुख से जुड़ा और सबके द्वारा प्रत्यक्ष देखा जाने वाला यह जगत्, बस इतना ही मूर्ख मानता है; इससे आगे की बात में वह मोह में पड़ जाता है।
श्लोक 18 (3.31.18)
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति यो धर्ममतिशङ्कते । ध्यायन्स कृपणः पापो न लोकान्प्रतिपद्यते ॥
prāyaścittaṃ na tasyāsti yo dharmamatiśaṅkate | dhyāyansa kṛpaṇaḥ pāpo na lokānpratipadyate
जो धर्म पर शंका करता है, उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है। वह दीन पापी चिन्ता करता रहता है और उत्तम लोकों को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 19 (3.31.19)
प्रमाणाद्धि निवृत्तो हि वेदशास्त्रार्थनिन्दकः । कामलोभानुगो मूढो नरकं प्रतिपद्यते ॥
pramāṇāddhi nivṛtto hi vedaśāstrārthanindakaḥ | kāmalobhānugo mūḍho narakaṃ pratipadyate
जो मूढ़ प्रमाण से विमुख होकर वेद और शास्त्रों के अर्थ की निन्दा करता है और काम तथा लोभ के पीछे चलता है, वह नरक में जाता है।
श्लोक 20 (3.31.20)
आर्षं प्रमाणमुत्क्रम्य धर्मं न प्रतिपालयन् । सर्वशास्त्रातिगो मूढः शं जन्मसु न विन्दति ॥
ārṣaṃ pramāṇamutkramya dharmaṃ na pratipālayan | sarvaśāstrātigo mūḍhaḥ śaṃ janmasu na vindati
ऋषियों के प्रमाण का उल्लंघन करके और धर्म का पालन न करते हुए, सब शास्त्रों को लाँघने वाला वह मूढ़ किसी भी जन्म में शान्ति नहीं पाता।
श्लोक 21 (3.31.21)
यस्तु नित्यं कृतमतिर्धर्ममेवाभिपद्यते । अशङ्कमानः कल्याणि सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ॥
yastu nityaṃ kṛtamatirdharmamevābhipadyate | aśaṅkamānaḥ kalyāṇi so'mutrānantyamaśnute
पर हे कल्याणी, जो दृढ़ निश्चय के साथ बिना शंका किए सदा धर्म का ही आश्रय लेता है, वह परलोक में अनन्त सुख पाता है।
श्लोक 22 (3.31.22)
यस्य नार्षं प्रमाणं स्याच्छिष्टाचारश्च भामिनि । न वै तस्य परो लोको नायमस्तीति निश्चयः ॥
yasya nārṣaṃ pramāṇaṃ syācchiṣṭācāraśca bhāmini | na vai tasya paro loko nāyamastīti niścayaḥ
हे भामिनी, जिसके लिए न ऋषियों का वचन प्रमाण है और न शिष्ट जनों का आचरण, उसके लिए निश्चय ही न परलोक है और न यह लोक।
श्लोक 23 (3.31.23)
शिष्टैराचरितं धर्मं कृष्णे मास्मातिशङ्कथाः । पुराणमृषिभिः प्रोक्तं सर्वज्ञैः सर्वदर्शिभिः ॥
śiṣṭairācaritaṃ dharmaṃ kṛṣṇe māsmātiśaṅkathāḥ | purāṇamṛṣibhiḥ proktaṃ sarvajñaiḥ sarvadarśibhiḥ
हे कृष्णा, शिष्ट जनों द्वारा आचरित उस धर्म पर शंका मत करो, जिसे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी ऋषियों ने प्राचीन काल से कहा है।
श्लोक 24 (3.31.24)
धर्म एव प्लवो नान्यः स्वर्गं द्रौपदि गच्छताम् । सैव नौः सागरस्येव वणिजः पारमिच्छतः ॥
dharma eva plavo nānyaḥ svargaṃ draupadi gacchatām | saiva nauḥ sāgarasyeva vaṇijaḥ pāramicchataḥ
हे द्रौपदी, स्वर्ग जाने वालों के लिए धर्म ही एकमात्र नौका है, कोई और नहीं, जैसे समुद्र के पार जाने की इच्छा रखने वाले व्यापारी के लिए जहाज।
श्लोक 25 (3.31.25)
अफलो यदि धर्मः स्याच्चरितो धर्मचारिभिः । अप्रतिष्ठे तमस्येतज्जगन्मज्जेदनिन्दिते ॥
aphalo yadi dharmaḥ syāccarito dharmacāribhiḥ | apratiṣṭhe tamasyetajjaganmajjedanindite
हे अनिन्दिते, यदि धर्मात्माओं द्वारा आचरित धर्म निष्फल होता, तो यह सारा जगत् अथाह अन्धकार में डूब जाता।
श्लोक 26 (3.31.26)
निर्वाणं नाधिगच्छेयुर्जीवेयुः पशुजीविकाम् । विघातेनैव युज्येयुर्न चार्थं कंचिदाप्नुयुः ॥
nirvāṇaṃ nādhigaccheyurjīveyuḥ paśujīvikām | vighātenaiva yujyeyurna cārthaṃ kaṃcidāpnuyuḥ
लोग कभी शान्ति न पाते; वे पशुओं जैसा जीवन जीते, केवल विनाश को प्राप्त होते और उन्हें कुछ भी उपलब्ध न होता।
श्लोक 27 (3.31.27)
तपश्च ब्रह्मचर्यं च यज्ञः स्वाध्याय एव च । दानमार्जवमेतानि यदि स्युरफलानि वै ॥
tapaśca brahmacaryaṃ ca yajñaḥ svādhyāya eva ca | dānamārjavametāni yadi syuraphalāni vai
यदि तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, स्वाध्याय, दान और सरलता, ये सब निष्फल होते,
श्लोक 28 (3.31.28)
नाचरिष्यन्परे धर्मं परे परतरेऽपि च । विप्रलम्भोऽयमत्यन्तं यदि स्युरफलाः क्रियाः ॥
nācariṣyanpare dharmaṃ pare paratare'pi ca | vipralambho'yamatyantaṃ yadi syuraphalāḥ kriyāḥ
तो प्राचीन लोग, और उनसे भी पहले के लोग, कभी धर्म का आचरण न करते। यदि कर्म निष्फल होते, तो यह सब घोर छल ही होता।
श्लोक 29 (3.31.29)
ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वासुरराक्षसाः । ईश्वराः कस्य हेतोस्ते चरेयुर्धर्ममादृताः ॥
ṛṣayaścaiva devāśca gandharvāsurarākṣasāḥ | īśvarāḥ kasya hetoste careyurdharmamādṛtāḥ
नहीं तो ऋषि और देवता, गन्धर्व, असुर और राक्षस, जो स्वयं समर्थ स्वामी हैं, किस कारण इतने आदर से धर्म का आचरण करते?
श्लोक 30 (3.31.30)
फलदं त्विह विज्ञाय धातारं श्रेयसि स्थितम् । धर्मं ते ह्याचरन्कृष्णे स हि धर्म सनातनः ॥
phaladaṃ tviha vijñāya dhātāraṃ śreyasi sthitam | dharmaṃ te hyācarankṛṣṇe sa hi dharma sanātanaḥ
हे कृष्णा, यह जानकर कि धाता यहाँ फल देता है और कल्याण में स्थित है, उन्होंने धर्म का आचरण किया; क्योंकि वही सनातन धर्म है।
श्लोक 31 (3.31.31)
स चायं सफलो धर्मो न धर्मोऽफल उच्यते । दृश्यन्तेऽपि हि विद्यानां फलानि तपसां तथा ॥
sa cāyaṃ saphalo dharmo na dharmo'phala ucyate | dṛśyante'pi hi vidyānāṃ phalāni tapasāṃ tathā
यह धर्म फल देने वाला है; धर्म को निष्फल नहीं कहा जाता। विद्या और तप के फल भी प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं।
श्लोक 32 (3.31.32)
त्वय्येतद्वै विजानीहि जन्म कृष्णे यथाश्रुतम् । वेत्थ चापि यथा जातो धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ॥
tvayyetadvai vijānīhi janma kṛṣṇe yathāśrutam | vettha cāpi yathā jāto dhṛṣṭadyumnaḥ pratāpavān
हे कृष्णा, अपने जन्म के विषय में जैसा तुमने सुना है, उसी से यह बात जान लो; और तुम यह भी जानती हो कि प्रतापी धृष्टद्युम्न का जन्म कैसे हुआ।
श्लोक 33 (3.31.33)
एतावदेव पर्याप्तमुपमानं शुचिस्मिते । कर्मणां फलमस्तीति धीरोऽल्पेनापि तुष्यति ॥
etāvadeva paryāptamupamānaṃ śucismite | karmaṇāṃ phalamastīti dhīro'lpenāpi tuṣyati
हे शुचिस्मिते, इतना ही उदाहरण पर्याप्त है। धीर पुरुष यह जानकर कि कर्मों का फल होता है, थोड़े में भी सन्तुष्ट रहता है।
श्लोक 34 (3.31.34)
बहुनाऽपि ह्यविद्वांसो नैव तुष्यन्त्यबुद्धयः । तेषां न धर्मजं किंचित्प्रेत्य कर्मास्ति शर्म वा ॥
bahunā'pi hyavidvāṃso naiva tuṣyantyabuddhayaḥ | teṣāṃ na dharmajaṃ kiṃcitpretya karmāsti śarma vā
पर अज्ञानी और बुद्धिहीन लोग बहुत पाकर भी सन्तुष्ट नहीं होते। मरने के बाद उनके लिए धर्म से उत्पन्न कुछ भी नहीं रहता, न पुण्य-कर्म और न सुख।
श्लोक 35 (3.31.35)
कर्मणामुत पुण्यानां पापानां च फलोदयः । प्रभवश्चाप्ययश्चैव देवगुह्यानि भामिनि ॥
karmaṇāmuta puṇyānāṃ pāpānāṃ ca phalodayaḥ | prabhavaścāpyayaścaiva devaguhyāni bhāmini
हे भामिनी, पुण्य और पाप कर्मों का फल कैसे उदय होता है, और उनकी उत्पत्ति तथा लय कैसे होते हैं, ये देवताओं के रहस्य हैं।
श्लोक 36 (3.31.36)
नैतानि वेद यः कश्चिन्मुह्यन्त्यत्र प्रजा इमाः । अपि कल्पसहस्रेण न च श्रेयोऽधिगच्छति ॥
naitāni veda yaḥ kaścinmuhyantyatra prajā imāḥ | api kalpasahasreṇa na ca śreyo'dhigacchati
इन्हें कोई नहीं जानता; यहाँ की प्रजा इनके विषय में मोह में पड़ी है। हजार कल्पों में भी मनुष्य परम कल्याण को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 37 (3.31.37)
रक्ष्याण्येतानि देवानां गूढमाया हि देवताः । कृशाङ्गाः सुव्रताश्चैव तपसा दग्धकिल्विषाः । प्रसन्नैर्मानसैर्युक्ताः पश्यन्त्येतानि वै द्विजाः ॥
rakṣyāṇyetāni devānāṃ gūḍhamāyā hi devatāḥ | kṛśāṅgāḥ suvratāścaiva tapasā dagdhakilviṣāḥ | prasannairmānasairyuktāḥ paśyantyetāni vai dvijāḥ
ये देवताओं द्वारा रक्षित हैं, क्योंकि देवता अपनी माया को गुप्त रखते हैं। जिनके अंग कृश हैं, जो उत्तम व्रतों वाले हैं, जिनके पाप तप से भस्म हो चुके हैं और जिनके मन प्रसन्न हैं, ऐसे ब्राह्मण ही इन्हें देख पाते हैं।
श्लोक 38 (3.31.38)
न फलादर्शनाद्धर्मः शङ्कितव्यो न देवताः । यष्टव्यं च प्रयत्नेन दातव्यं चानसूयता ॥
na phalādarśanāddharmaḥ śaṅkitavyo na devatāḥ | yaṣṭavyaṃ ca prayatnena dātavyaṃ cānasūyatā
फल दिखाई न देने के कारण धर्म पर शंका नहीं करनी चाहिए, न देवताओं पर। प्रयत्नपूर्वक यज्ञ करना चाहिए और ईर्ष्या-रहित होकर दान देना चाहिए।
श्लोक 39 (3.31.39)
कर्मणां फलमस्तीह तथैतद्धर्मशासनम् । ब्रह्मा प्रोवाच पुत्राणां यदृषिर्वेद काश्यपः ॥
karmaṇāṃ phalamastīha tathaitaddharmaśāsanam | brahmā provāca putrāṇāṃ yadṛṣirveda kāśyapaḥ
कर्मों का फल यहाँ होता है, यही धर्म का उपदेश है, जिसे ब्रह्मा ने अपने पुत्रों से कहा था और जिसे ऋषि कश्यप जानते हैं।
श्लोक 40 (3.31.40)
तस्मात्ते संशयः कृष्णे नीहार इव नश्यतु । विमृश्य सर्वमस्तीति नास्तिक्यं भावमुत्सृज ॥
tasmātte saṃśayaḥ kṛṣṇe nīhāra iva naśyatu | vimṛśya sarvamastīti nāstikyaṃ bhāvamutsṛja
इसलिए हे कृष्णा, तुम्हारा संशय कुहरे की तरह मिट जाए। विचार करके यह निश्चय करो कि यह सब सत्य है, और नास्तिकता का भाव छोड़ दो।
श्लोक 41 (3.31.41)
ईश्वरं चापि भूतानां धातारं मा च वै क्षिप । शिक्षस्वैनं नमस्वैनं मा तेऽभूद्बुद्धिरीदृशी ॥
īśvaraṃ cāpi bhūtānāṃ dhātāraṃ mā ca vai kṣipa | śikṣasvainaṃ namasvainaṃ mā te'bhūdbuddhirīdṛśī
और प्राणियों के स्वामी, उस धाता की निन्दा मत करो। उसे जानने का प्रयत्न करो, उसे नमस्कार करो, और तुम्हारी बुद्धि ऐसी न हो।
श्लोक 42 (3.31.42)
यस्य प्रसादात्तद्भक्तो मर्त्यो गच्छत्यमर्त्यताम् । उत्तमां देवतां कृष्णे मातिवोचः कथंचन ॥
yasya prasādāttadbhakto martyo gacchatyamartyatām | uttamāṃ devatāṃ kṛṣṇe mātivocaḥ kathaṃcana
हे कृष्णा, उस सर्वोत्तम देवता के विषय में कभी अनुचित वचन मत कहो, जिसकी कृपा से उसका भक्त मनुष्य अमरत्व को प्राप्त होता है।