Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 32

द्रौपदी द्वारा कर्म की अनिवार्यता का प्रतिपादन

द्रौपदी युधिष्ठिर को विश्वास दिलाती हैं कि वे धर्म या ईश्वर का अपमान नहीं करतीं, बल्कि दुःख में ऐसा कह रही हैं, और तर्क देती हैं कि हर प्राणी को जीने के लिए कर्म करना ही पड़ता है। वे मनुष्य की प्राप्तियों के कारण बताती हैं (हठ, दैव, स्वभाव और अपना पुरुषार्थ), केवल भाग्य के भरोसे बैठने वाले और सब कुछ संयोग मानने वाले दोनों की निन्दा करती हैं, और मनु का मत उद्धृत करके कहती हैं कि परिणाम अनिश्चित होने पर भी कर्म करना चाहिए, जैसे किसान हल चलाकर बीज बोता है और शेष वर्षा पर छोड़ देता है। वे कहती हैं कि असफलता से युधिष्ठिर और उनके भाइयों की महिमा कम नहीं होगी, पर निष्क्रियता से विनाश निश्चित है; अन्त में वे बताती हैं कि बृहस्पति की यह नीति उन्होंने अपने पिता के घर में रहने वाले एक विद्वान ब्राह्मण से सीखी थी।

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

द्रौपद्युवाच

श्लोक 1 (3.32.1)

नावमन्ये न गर्हे च धर्मं पार्थ कथंचन । ईश्वरं कुत एवाहमवमंस्ये प्रजापतिम् ॥

nāvamanye na garhe ca dharmaṃ pārtha kathaṃcana | īśvaraṃ kuta evāhamavamaṃsye prajāpatim

हे पार्थ, मैं धर्म का किसी प्रकार भी न अपमान करती हूँ, न उसकी निन्दा करती हूँ। फिर प्रजापति ईश्वर का अपमान मैं कैसे करूँगी?

श्लोक 2 (3.32.2)

आर्ताऽहं प्रलपामीदमिति मां विद्धि भारत । भूयश्च विलपिष्यामि सुमनास्त्वं निबोध मे ॥

ārtā'haṃ pralapāmīdamiti māṃ viddhi bhārata | bhūyaśca vilapiṣyāmi sumanāstvaṃ nibodha me

हे भारत, यह समझो कि मैं दुःख से पीड़ित होकर यह प्रलाप कर रही हूँ। मैं और भी विलाप करूँगी; तुम प्रसन्न मन से मेरी बात सुनो।

श्लोक 3 (3.32.3)

कर्म खल्विह कर्तव्यं जातेनामित्रकर्शन । अकर्माणो हि जीवन्ति स्थावरा नेतरे जनाः ॥

karma khalviha kartavyaṃ jātenāmitrakarśana | akarmāṇo hi jīvanti sthāvarā netare janāḥ

हे शत्रुनाशक, इस संसार में जन्म लेने वाले को कर्म अवश्य करना चाहिए। कर्म किए बिना तो केवल स्थावर (अचल) वस्तुएँ जीती हैं, दूसरे प्राणी नहीं।

श्लोक 4 (3.32.4)

आमातृस्तन्यपानाच्च यावच्छय्योपसर्पणम् । जङ्गमाः कर्मणा वृत्तिमाप्नुवन्ति युधिष्ठिर ॥

āmātṛstanyapānācca yāvacchayyopasarpaṇam | jaṅgamāḥ karmaṇā vṛttimāpnuvanti yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, माता का स्तनपान करने से लेकर अन्तिम शय्या पर लेटने तक सभी जंगम प्राणी कर्म से ही अपनी जीविका पाते हैं।

श्लोक 5 (3.32.5)

जङ्गमेषु विशेषेण मनुष्या भरतर्षभ । इच्छन्ति कर्मणा वृत्तिमवाप्तुं प्रेत्य चेह च ॥

jaṅgameṣu viśeṣeṇa manuṣyā bharatarṣabha | icchanti karmaṇā vṛttimavāptuṃ pretya ceha ca

हे भरतश्रेष्ठ, जंगम प्राणियों में भी विशेष रूप से मनुष्य कर्म के द्वारा इस लोक में और मरने के बाद भी अपनी वृत्ति पाना चाहते हैं।

श्लोक 6 (3.32.6)

उत्थानमभिजानन्ति सर्वभूतानि भारत । प्रत्यक्षं फलमश्नन्ति कर्मणां लोकसाक्षिकम् ॥

utthānamabhijānanti sarvabhūtāni bhārata | pratyakṣaṃ phalamaśnanti karmaṇāṃ lokasākṣikam

हे भारत, सभी प्राणी उद्यम को जानते हैं, और सारा संसार साक्षी है कि वे अपने कर्मों का फल प्रत्यक्ष भोगते हैं।

श्लोक 7 (3.32.7)

पश्यन्तः स्वं समुत्थानमुपजीवन्ति जन्तवः । अपि धाता विधाता च यथाऽयमुदके बकः ॥

paśyantaḥ svaṃ samutthānamupajīvanti jantavaḥ | api dhātā vidhātā ca yathā'yamudake bakaḥ

प्राणी अपने ही उद्यम का फल देखते हुए उसी के सहारे जीते हैं; धाता और विधाता भी ऐसा ही करते हैं, जैसे जल में खड़ा यह बगुला।

श्लोक 8 (3.32.8)

अकर्मणां वै भूतानां वृत्तिः स्यान्न हि काचन । तदेवाभिप्रपद्येत न विहन्यात्कदाचन ॥

akarmaṇāṃ vai bhūtānāṃ vṛttiḥ syānna hi kācana | tadevābhiprapadyeta na vihanyātkadācana

कर्म न करने वाले प्राणियों की कोई भी जीविका नहीं हो सकती। इसलिए कर्म का ही आश्रय लेना चाहिए और उसे कभी छोड़ना नहीं चाहिए।

श्लोक 9 (3.32.9)

स्वकर्म कुरु माहासीः कर्मणा भव दंशितः । कृत्यं हि योऽभिजानाति सहस्रे सोऽस्ति नास्ति वा ॥

svakarma kuru māhāsīḥ karmaṇā bhava daṃśitaḥ | kṛtyaṃ hi yo'bhijānāti sahasre so'sti nāsti vā

अपना कर्म करो, उसे मत छोड़ो; कर्म को ही अपना कवच बना लो। जो सचमुच जानता है कि क्या करना चाहिए, ऐसा व्यक्ति हज़ार में एक होता है, या नहीं भी होता।

श्लोक 10 (3.32.10)

तस्य चापि भवेत्कार्यं विवृद्धौ रक्षणे तथा । भक्ष्यमाणो ह्यनावापः क्षीयेत हिमवानपि ॥

tasya cāpi bhavetkāryaṃ vivṛddhau rakṣaṇe tathā | bhakṣyamāṇo hyanāvāpaḥ kṣīyeta himavānapi

उसे भी अपनी सम्पत्ति की वृद्धि और रक्षा के लिए कर्म करना पड़ता है; क्योंकि यदि केवल खर्च होता रहे और कुछ जुड़े नहीं, तो हिमालय भी क्षीण हो जाए।

श्लोक 11 (3.32.11)

उत्सीदेरन्प्रजाः सर्वा न कुर्युः कर्म चेद्यदि । तथा ह्येता न वर्धेरन्कर्म चेदफलं भवेत् ॥

utsīderanprajāḥ sarvā na kuryuḥ karma cedyadi | tathā hyetā na vardherankarma cedaphalaṃ bhavet

यदि लोग कर्म न करें तो सारी प्रजा नष्ट हो जाए; और यदि कर्म निष्फल होता तो ये प्रजाएँ बढ़ती भी नहीं।

श्लोक 12 (3.32.12)

दृष्ट्वाऽपिच फलं कर्म पश्यामः कुर्वतो जनान् । नान्यथा ह्यपि जानन्ति वृत्तिं लोकाः कथंचन ॥

dṛṣṭvā'pica phalaṃ karma paśyāmaḥ kurvato janān | nānyathā hyapi jānanti vṛttiṃ lokāḥ kathaṃcana

कर्म का फल देखकर ही हम लोगों को कर्म करते हुए देखते हैं; संसार के लोग जीविका का कोई दूसरा उपाय जानते ही नहीं।

श्लोक 13 (3.32.13)

यश्च दिष्टपरो लोके यश्चापि हठवादकः । उभावपि शठावेतौ कर्मबुद्धिः प्रशस्यते ॥

yaśca diṣṭaparo loke yaścāpi haṭhavādakaḥ | ubhāvapi śaṭhāvetau karmabuddhiḥ praśasyate

जो संसार में केवल दैव पर निर्भर रहता है और जो सब कुछ हठ (संयोग) से हुआ मानता है, वे दोनों ही धूर्त हैं; प्रशंसा तो कर्म में लगी बुद्धि की ही होती है।

श्लोक 14 (3.32.14)

यो हि दिष्टमुपासीत निर्विचेष्टः सुखं स्वपन् । अवसीदेत्सुदुर्बुद्धिरामो घट इवोदके ॥

yo hi diṣṭamupāsīta nirviceṣṭaḥ sukhaṃ svapan | avasīdetsudurbuddhirāmo ghaṭa ivodake

जो दुर्बुद्धि केवल दैव के भरोसे बैठा रहता है और बिना कोई चेष्टा किए सुख से सोता है, वह जल में रखे कच्चे घड़े की तरह गलकर नष्ट हो जाता है।

श्लोक 15 (3.32.15)

तथैव हठबुद्धिर्यः शक्तः कर्मण्यकर्मकृत् । आसीत न चिरं जीवेदनाथ इव दुर्बलः ॥

tathaiva haṭhabuddhiryaḥ śaktaḥ karmaṇyakarmakṛt | āsīta na ciraṃ jīvedanātha iva durbalaḥ

इसी प्रकार जो हठवादी समर्थ होकर भी कर्म नहीं करता और बैठा रहता है, वह अनाथ और दुर्बल व्यक्ति की तरह अधिक दिन नहीं जीता।

श्लोक 16 (3.32.16)

अकस्मादिह यः कश्चिदर्थं प्राप्नोति पूरुषः । तं हठेनेति मन्यन्ते स हि यत्नो न कस्यचित् ॥

akasmādiha yaḥ kaścidarthaṃ prāpnoti pūruṣaḥ | taṃ haṭheneti manyante sa hi yatno na kasyacit

जब कोई मनुष्य यहाँ अकस्मात् कोई धन पा जाता है, तो लोग उसे हठ (संयोग) से मिला मानते हैं, क्योंकि वह किसी के प्रयत्न का फल नहीं होता।

श्लोक 17 (3.32.17)

यश्चापि कश्चित्पुरुषो दिष्टं नाम भजत्युत । दैवेन विधिना पार्थ तद्दैवमिति निश्चितम् ॥

yaścāpi kaścitpuruṣo diṣṭaṃ nāma bhajatyuta | daivena vidhinā pārtha taddaivamiti niścitam

और हे पार्थ, जब कोई मनुष्य दैवी विधान से वह पाता है जिसे प्रारब्ध कहते हैं, तो उसे निश्चय ही दैव माना जाता है।

श्लोक 18 (3.32.18)

यत्तावत्कर्मणा किंचित्फलमाप्नोति पूरुषः । प्रत्यक्षं चक्षुषा दृष्टं तत्पौरुषमिति श्रुतम् ॥

yattāvatkarmaṇā kiṃcitphalamāpnoti pūruṣaḥ | pratyakṣaṃ cakṣuṣā dṛṣṭaṃ tatpauruṣamiti śrutam

परन्तु जो फल मनुष्य अपने कर्म से पाता है और जो आँखों से प्रत्यक्ष दिखाई देता है, उसे पौरुष कहा गया है।

श्लोक 19 (3.32.19)

स्वभावतः प्रवृत्तो यः प्राप्नोत्यर्थं न कारणात् । तत्स्वभावात्मकं विद्धि फलं पुरुषसत्तम ॥

svabhāvataḥ pravṛtto yaḥ prāpnotyarthaṃ na kāraṇāt | tatsvabhāvātmakaṃ viddhi phalaṃ puruṣasattama

हे पुरुषश्रेष्ठ, जो अपने स्वभाव से प्रवृत्त होकर बिना किसी कारण के धन पा लेता है, उस फल को स्वभावजन्य समझो।

श्लोक 20 (3.32.20)

एवं हठाच्च दैवाच्च स्वभावात्कर्मणस्तथा । यानि प्राप्नोति पुरुषस्तत्फलं पूर्वकर्मणाम् ॥

evaṃ haṭhācca daivācca svabhāvātkarmaṇastathā | yāni prāpnoti puruṣastatphalaṃ pūrvakarmaṇām

इस प्रकार मनुष्य हठ से, दैव से, स्वभाव से और कर्म से जो कुछ पाता है, वह उसके पूर्वकर्मों का ही फल है।

श्लोक 21 (3.32.21)

धातापि हि स्वकर्मैव तैस्तैर्हेतुभिरीश्वरः । विदधाति विभज्येह फलं पूर्वकृतं नृणाम् ॥

dhātāpi hi svakarmaiva taistairhetubhirīśvaraḥ | vidadhāti vibhajyeha phalaṃ pūrvakṛtaṃ nṛṇām

धाता ईश्वर भी उन-उन कारणों के द्वारा मनुष्यों को उनके पूर्वकृत कर्मों का फल, उनके अपने कर्म के अनुसार बाँटकर, यहाँ प्रदान करते हैं।

श्लोक 22 (3.32.22)

यद्धि यः पुरुषः किंचित्कुरुते वै शुभाशुभम् । तद्धातृविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदयम् ॥

yaddhi yaḥ puruṣaḥ kiṃcitkurute vai śubhāśubham | taddhātṛvihitaṃ viddhi pūrvakarmaphalodayam

मनुष्य जो कुछ शुभ या अशुभ करता है, उसे विधाता का विधान और पूर्वकर्मों के फल का उदय समझो।

श्लोक 23 (3.32.23)

कारणं तस्य देहोऽयं धातुः कर्मणि कर्मणि । स यथा प्रेरयत्येनं तथाऽयं कुरुतेऽवशः ॥

kāraṇaṃ tasya deho'yaṃ dhātuḥ karmaṇi karmaṇi | sa yathā prerayatyenaṃ tathā'yaṃ kurute'vaśaḥ

हर कर्म में यह शरीर विधाता का साधन है; वह इसे जैसे प्रेरित करता है, मनुष्य विवश होकर वैसा ही करता है।

श्लोक 24 (3.32.24)

तेषुतेषु हि कृत्येषु विनियोक्ता महेश्वरः । सर्वभूतानि कौन्तेय कारयत्यवशान्यपि ॥

teṣuteṣu hi kṛtyeṣu viniyoktā maheśvaraḥ | sarvabhūtāni kaunteya kārayatyavaśānyapi

हे कौन्तेय, उन-उन सब कार्यों में महेश्वर ही नियोजक हैं; वे सब प्राणियों से, विवश होने पर भी, कर्म कराते हैं।

श्लोक 25 (3.32.25)

मनसाऽर्थान्विनिश्चित्य पश्चात्प्राप्नोति कर्मणा । बुद्धिपूर्वं स्वयं वीर पुरुषस्तत्र कारणम् ॥

manasā'rthānviniścitya paścātprāpnoti karmaṇā | buddhipūrvaṃ svayaṃ vīra puruṣastatra kāraṇam

फिर भी, हे वीर, मनुष्य पहले मन से अपने लक्ष्य निश्चित करता है और बाद में कर्म से उन्हें पाता है; बुद्धिपूर्वक स्वयं ऐसा करने के कारण वहाँ मनुष्य ही कारण है।

श्लोक 26 (3.32.26)

संख्यातुं नैव शक्यानि कर्माणि पुरुषर्षभ । अगारनगराणां हि सिद्धिः पुरुषहैतुकी ॥

saṃkhyātuṃ naiva śakyāni karmāṇi puruṣarṣabha | agāranagarāṇāṃ hi siddhiḥ puruṣahaitukī

हे पुरुषश्रेष्ठ, कर्मों की गिनती नहीं की जा सकती; घरों और नगरों का निर्माण मनुष्य के ही द्वारा सिद्ध होता है।

श्लोक 27 (3.32.27)

तिले तैलं गवि क्षीरं काष्ठे पावकमन्ततः । एवं धीरो विजानीयादुपायं चास्य सिद्धये ॥

tile tailaṃ gavi kṣīraṃ kāṣṭhe pāvakamantataḥ | evaṃ dhīro vijānīyādupāyaṃ cāsya siddhaye

तिल में तेल, गाय में दूध और लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है; इसी प्रकार धीर पुरुष को (छिपी वस्तु को) और उसे सिद्ध करने के उपाय को भी पहचानना चाहिए।

श्लोक 28 (3.32.28)

ततः प्रवर्तते पश्चात्कारणेष्वस्य सिद्धये । तां सिद्धिमुपजीवन्ति कर्मणामिह जन्तवः ॥

tataḥ pravartate paścātkāraṇeṣvasya siddhaye | tāṃ siddhimupajīvanti karmaṇāmiha jantavaḥ

फिर वह उसकी सिद्धि के लिए साधनों में प्रवृत्त होता है; और इस संसार के प्राणी कर्मों से मिली उसी सिद्धि के सहारे जीते हैं।

श्लोक 29 (3.32.29)

कुशलेन कृतं कर्म कर्त्रा साधु स्वनुष्ठितम् । इदं त्वकुशलेनेति विशेषादुपलभ्यते ॥

kuśalena kṛtaṃ karma kartrā sādhu svanuṣṭhitam | idaṃ tvakuśaleneti viśeṣādupalabhyate

'यह कर्म किसी कुशल कर्ता ने भली-भाँति सम्पन्न किया है, और यह किसी अकुशल ने', यह भेद स्पष्ट दिखाई देता है।

श्लोक 30 (3.32.30)

इष्टापूर्त्तफलं न स्यान्न शिष्यो न गुरुर्भवेत् । पुरुषः कर्मसाध्येषु स्याच्चेदयमकारणम् ॥

iṣṭāpūrttaphalaṃ na syānna śiṣyo na gururbhavet | puruṣaḥ karmasādhyeṣu syāccedayamakāraṇam

यदि कर्म से सिद्ध होने वाले कार्यों में मनुष्य कारण न होता, तो यज्ञ और पुण्य-कार्यों (इष्टापूर्त) का कोई फल न होता, और न कोई शिष्य होता, न गुरु।

श्लोक 31 (3.32.31)

कर्तृत्वादेव पुरुषः कर्मसिद्धौ प्रशस्यते । असिद्धौ निन्द्यते चापि कर्मनाशः कथं त्विह ॥

kartṛtvādeva puruṣaḥ karmasiddhau praśasyate | asiddhau nindyate cāpi karmanāśaḥ kathaṃ tviha

कर्ता होने के कारण ही कर्म सफल होने पर मनुष्य की प्रशंसा होती है और असफल होने पर निन्दा भी होती है। तब यहाँ कर्म व्यर्थ कैसे हो सकता है?

श्लोक 32 (3.32.32)

सर्वमेव हठेनैके दैवेनैके वदन्त्युत । पुंसः प्रयत्नजं केचिद्दैवमेतद्विशिष्यते ॥

sarvameva haṭhenaike daivenaike vadantyuta | puṃsaḥ prayatnajaṃ keciddaivametadviśiṣyate

कुछ लोग कहते हैं कि सब कुछ हठ (संयोग) से होता है, कुछ कहते हैं दैव से, और कुछ कहते हैं कि यह मनुष्य के प्रयत्न से उत्पन्न होता है; इस प्रकार दैव को अन्य कारणों से अलग किया जाता है।

श्लोक 33 (3.32.33)

न चैवैतावता कार्यं मन्यन्त इति चापरे । अस्ति सर्वमदृश्यं तु दिष्टं चैव तथा हठः ॥

na caivaitāvatā kāryaṃ manyanta iti cāpare | asti sarvamadṛśyaṃ tu diṣṭaṃ caiva tathā haṭhaḥ

कुछ अन्य लोग मानते हैं कि केवल इतने से ही फल नहीं मिलता; इनके अतिरिक्त सब कुछ अदृश्य भी है, दैव भी और हठ भी।

श्लोक 34 (3.32.34)

दृश्यते हि हठाच्चैव दिष्टाच्चार्थस्य संततिः । किंचिद्दैवाद्धठात्किंचित्किंचिदेव स्वकर्मतः ॥

dṛśyate hi haṭhāccaiva diṣṭāccārthasya saṃtatiḥ | kiṃciddaivāddhaṭhātkiṃcitkiṃcideva svakarmataḥ

क्योंकि धन की धारा हठ से भी और दैव से भी आती दिखाई देती है। कुछ दैव से, कुछ हठ से और कुछ अपने ही कर्म से

श्लोक 35 (3.32.35)

पुरुषः फलमाप्नोति चतुर्थं नात्र कारणम् । कुशलाः प्रतिजानन्ति ये वै तत्त्वविदो जनाः ॥

puruṣaḥ phalamāpnoti caturthaṃ nātra kāraṇam | kuśalāḥ pratijānanti ye vai tattvavido janāḥ

मनुष्य फल पाता है; इसमें कोई चौथा कारण नहीं है। तत्त्व को जानने वाले कुशल लोग ऐसा ही कहते हैं।

श्लोक 36 (3.32.36)

तथैव धाता भूतानामिष्टानिष्टफलप्रदः । यदि न स्यान्न भूतानां कृपणो नाम कश्चन ॥

tathaiva dhātā bhūtānāmiṣṭāniṣṭaphalapradaḥ | yadi na syānna bhūtānāṃ kṛpaṇo nāma kaścana

इसी प्रकार धाता ही प्राणियों को इच्छित और अनिच्छित फल देते हैं; यदि ऐसा न होता तो प्राणियों में कोई भी दीन-दुखी न होता।

श्लोक 37 (3.32.37)

यंयमर्थमभिप्रेप्सुः कुरुते कर्म पूरुषः । तत्तत्सफलमेव स्याद्यदि न स्यात्पुरा कृतम् ॥

yaṃyamarthamabhiprepsuḥ kurute karma pūruṣaḥ | tattatsaphalameva syādyadi na syātpurā kṛtam

मनुष्य जिस-जिस लक्ष्य को पाने की इच्छा से कर्म करता है, वह सब सफल ही होता, यदि पहले किया हुआ कर्म बीच में न होता।

श्लोक 38 (3.32.38)

त्रिद्वारामर्थसिद्धिं तु नानुपश्यन्ति ये नराः । तथैवानर्थसिद्धिं च यथा लोकास्तथैव ते ॥

tridvārāmarthasiddhiṃ tu nānupaśyanti ye narāḥ | tathaivānarthasiddhiṃ ca yathā lokāstathaiva te

जो मनुष्य यह नहीं देखते कि अर्थ की सिद्धि के तीन द्वार हैं, और इसी प्रकार अनर्थ के भी, वे साधारण संसार जैसे ही हैं।

श्लोक 39 (3.32.39)

कर्तव्यमेव कर्मेति मनोरेष विनिश्चयः । एकान्तेन ह्यनीहोऽयं वर्ततेऽस्मासु संप्रति ॥

kartavyameva karmeti manoreṣa viniścayaḥ | ekāntena hyanīho'yaṃ vartate'smāsu saṃprati

'कर्म अवश्य करना चाहिए', यही मनु का निश्चित मत है। परन्तु इस समय हमारे बीच यह (व्यक्ति) सर्वथा निश्चेष्ट होकर बैठा है।

श्लोक 40 (3.32.40)

कुर्वतो हि भवत्येव प्रायेणेह युधिष्ठिर । एकान्तफलसिद्धिं तु न विन्दत्यलसः क्वचित् ॥

kurvato hi bhavatyeva prāyeṇeha yudhiṣṭhira | ekāntaphalasiddhiṃ tu na vindatyalasaḥ kvacit

हे युधिष्ठिर, कर्म करने वाले को प्रायः सफलता मिलती ही है; पर आलसी को कभी भी निश्चित फल की सिद्धि नहीं मिलती।

श्लोक 41 (3.32.41)

असंभवे त्वस्य हेतुः प्रायश्चित्तं तु लक्ष्यते । कृते कर्मणि राजेन्द्र तथाऽनृण्यमवाप्नुते ॥

asaṃbhave tvasya hetuḥ prāyaścittaṃ tu lakṣyate | kṛte karmaṇi rājendra tathā'nṛṇyamavāpnute

यदि सफलता असम्भव हो जाए तो उसका कारण खोजा जा सकता है और उसका प्रायश्चित्त (उपाय) दिखाई देता है; और हे राजेन्द्र, कर्म कर लेने पर मनुष्य उऋण हो जाता है।

श्लोक 42 (3.32.42)

अलक्ष्मीराविशत्येनं शयानमलसं नरम् । निःसंशयं फलं लब्ध्वा दक्षो भूतिमुपाश्नुते ॥

alakṣmīrāviśatyenaṃ śayānamalasaṃ naram | niḥsaṃśayaṃ phalaṃ labdhvā dakṣo bhūtimupāśnute

सोते हुए आलसी मनुष्य में अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) प्रवेश करती है; और दक्ष मनुष्य निश्चय ही फल पाकर समृद्धि भोगता है।

श्लोक 43 (3.32.43)

अनर्थं संशयावस्थं गृणन्त्यामुक्तसंशयाः । धीरा नराः कर्मरता न तु निःसंशयाः क्वचित् ॥

anarthaṃ saṃśayāvasthaṃ gṛṇantyāmuktasaṃśayāḥ | dhīrā narāḥ karmaratā na tu niḥsaṃśayāḥ kvacit

कर्म में रत और संशय त्याग चुके धीर पुरुष संदिग्ध परिणाम वाले कार्य को भी अपना लेते हैं, यद्यपि वे कभी पूर्णतः निःसंशय नहीं होते।

श्लोक 44 (3.32.44)

एकान्तेन ह्यनर्थोऽयं वर्ततेऽस्मासु सांप्रतम् । स तु निःसंशयं न स्यात्त्वयि कर्मण्यवस्थिते ॥

ekāntena hyanartho'yaṃ vartate'smāsu sāṃpratam | sa tu niḥsaṃśayaṃ na syāttvayi karmaṇyavasthite

इस समय यह अनर्थ पूरी तरह हम पर छाया हुआ है; परन्तु यदि तुम कर्म में लग जाओ तो यह निश्चय ही न रहे।

श्लोक 45 (3.32.45)

अथवाऽसिद्धिरेव स्यान्महिमा तु तदेव ते । वृकोदरस्य बीभत्सोर्भ्रात्रोश्च यमयोरपि ॥

athavā'siddhireva syānmahimā tu tadeva te | vṛkodarasya bībhatsorbhrātrośca yamayorapi

अथवा असफलता ही मिले, तब भी तुम्हारी महिमा वैसी ही बनी रहेगी, और वृकोदर, बीभत्सु तथा तुम्हारे दोनों जुड़वाँ भाइयों (नकुल-सहदेव) की भी।

श्लोक 46 (3.32.46)

अन्येषां कर्म सफलमस्माकमपि वा पुनः । विप्रकर्षेण बुध्येत कृतकर्मा यथा फलम् ॥

anyeṣāṃ karma saphalamasmākamapi vā punaḥ | viprakarṣeṇa budhyeta kṛtakarmā yathā phalam

दूसरों का कर्म सफल हो या हमारा, कर्म करने वाला उसके फल को समय बीतने पर ही जान पाता है।

श्लोक 47 (3.32.47)

पृथिवीं लाङ्गलेनेह कृष्ट्वा बीजं वपत्युत । आस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम् ॥

pṛthivīṃ lāṅgaleneha kṛṣṭvā bījaṃ vapatyuta | āste'tha karṣakastūṣṇīṃ parjanyastatra kāraṇam

किसान हल से भूमि जोतकर बीज बोता है और फिर चुपचाप बैठ जाता है; वहाँ कारण तो मेघ होता है।

श्लोक 48 (3.32.48)

वृष्टिश्चेन्नानुगृह्णीयादनेनास्तत्र कर्षकः । यदन्यः पुरुषः कुर्यात्तत्कृतं सफलं मया ॥

vṛṣṭiścennānugṛhṇīyādanenāstatra karṣakaḥ | yadanyaḥ puruṣaḥ kuryāttatkṛtaṃ saphalaṃ mayā

यदि वर्षा अनुग्रह न करे तो उसमें किसान का कोई दोष नहीं। (वह सोचता है:) 'दूसरा कोई मनुष्य जो कर सकता था, वह मैंने भली-भाँति कर दिया;

श्लोक 49 (3.32.49)

तच्चेदं फलमस्माकमपराधो न मे क्वचित् । इति धीरोऽन्ववेक्ष्यैव नात्मानं तत्र गर्हयेत् ॥

taccedaṃ phalamasmākamaparādho na me kvacit | iti dhīro'nvavekṣyaiva nātmānaṃ tatra garhayet

यदि हमें यही फल मिला है तो इसमें मेरा कोई अपराध नहीं।' ऐसा विचार करके धीर पुरुष उसके लिए अपनी निन्दा नहीं करता।

श्लोक 50 (3.32.50)

कुर्वतो नार्थसिद्धिर्मे भवतीति ह भारत । निर्वेदो नात्र गन्तव्यो द्वावन्तौ यस्य कर्मणः ॥

kurvato nārthasiddhirme bhavatīti ha bhārata | nirvedo nātra gantavyo dvāvantau yasya karmaṇaḥ

हे भारत, 'कर्म करते हुए भी मुझे अर्थ की सिद्धि नहीं मिल रही', ऐसा सोचकर निराश नहीं होना चाहिए। कर्म के दो ही परिणाम होते हैं:

श्लोक 51 (3.32.51)

सिद्धिर्वाऽप्यथवाऽसिद्धिरप्रवृत्तिरतोऽन्यथा । बहूनां समवाये हि भावानां कर्म सिध्यति ॥

siddhirvā'pyathavā'siddhirapravṛttirato'nyathā | bahūnāṃ samavāye hi bhāvānāṃ karma sidhyati

सफलता या असफलता; कर्म न करना इनसे भिन्न बात है। बहुत-से कारणों के एक साथ मिलने पर ही कर्म सिद्ध होता है।

श्लोक 52 (3.32.52)

गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव च । अनारम्भे हि न फलं न गुणो दृश्यते क्वचित् ॥

guṇābhāve phalaṃ nyūnaṃ bhavatyaphalameva ca | anārambhe hi na phalaṃ na guṇo dṛśyate kvacit

किसी साधन के अभाव में फल कम होता है या बिल्कुल नहीं होता; परन्तु आरम्भ ही न किया जाए तो न कहीं फल दिखाई देता है, न कोई गुण।

श्लोक 53 (3.32.53)

देशकालावुपायांश्च मङ्गलं स्वस्तिसिद्धये । युनक्ति मेधया धीरो यथायोगं यथाबलम् ॥

deśakālāvupāyāṃśca maṅgalaṃ svastisiddhaye | yunakti medhayā dhīro yathāyogaṃ yathābalam

धीर पुरुष अपनी बुद्धि से, परिस्थिति और अपने बल के अनुसार, कल्याण की सिद्धि के लिए देश, काल, उपाय और मंगल-कर्मों का संयोग करता है।

श्लोक 54 (3.32.54)

अप्युपायेन तत्कार्यमुपदेष्टा पराक्रमः । भूयिष्ठं कर्मयोगेषु सर्व एव पराक्रमः ॥

apyupāyena tatkāryamupadeṣṭā parākramaḥ | bhūyiṣṭhaṃ karmayogeṣu sarva eva parākramaḥ

वह कार्य उचित उपाय से करना चाहिए, और पराक्रम ही उसका मार्ग दिखाता है; कर्मों के सब प्रयोगों में सबसे बड़ा स्थान पराक्रम का ही है।

श्लोक 55 (3.32.55)

यत्र धीमानवेक्षेत श्रेयांसं बहुभिर्गुणैः । साम्नैवार्थं ततो लिप्सेत्कर्म चास्मै प्रयोजयेत् ॥

yatra dhīmānavekṣeta śreyāṃsaṃ bahubhirguṇaiḥ | sāmnaivārthaṃ tato lipsetkarma cāsmai prayojayet

जहाँ बुद्धिमान मनुष्य किसी को अनेक गुणों में अपने से श्रेष्ठ देखे, वहाँ उससे साम (मेल-मिलाप) द्वारा ही अपना प्रयोजन सिद्ध करना चाहिए और उसी के अनुरूप कर्म करना चाहिए।

श्लोक 56 (3.32.56)

व्यसनं नाभिकाङ्क्षेत विनाशं वा युधिष्ठिर । अपि सिन्धोर्गिरेर्वाऽपि किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः ॥

vyasanaṃ nābhikāṅkṣeta vināśaṃ vā yudhiṣṭhira | api sindhorgirervā'pi kiṃ punarmartyadharmiṇaḥ

हे युधिष्ठिर, किसी के संकट या विनाश की कामना नहीं करनी चाहिए, चाहे वह समुद्र हो या पर्वत; फिर मरणशील मनुष्य की तो बात ही क्या।

श्लोक 57 (3.32.57)

उत्थानयुक्तः सततं परेषामन्तरैषणे । आनृण्यमाप्नोति नरः परस्यात्मन एव च ॥

utthānayuktaḥ satataṃ pareṣāmantaraiṣaṇe | ānṛṇyamāpnoti naraḥ parasyātmana eva ca

सदा उद्यम में लगा रहकर और दूसरों की दुर्बलताओं की खोज करता हुआ मनुष्य दूसरों के प्रति और अपने प्रति भी उऋण हो जाता है।

श्लोक 58 (3.32.58)

न त्वेवात्माऽवमन्तव्यः पुरुषेण कदाचन । न ह्यात्मपरिभूतस्य भूतिर्भवति शोभना ॥

na tvevātmā'vamantavyaḥ puruṣeṇa kadācana | na hyātmaparibhūtasya bhūtirbhavati śobhanā

मनुष्य को कभी अपना अपमान नहीं करना चाहिए; जो स्वयं को तुच्छ मानता है, उसे उत्तम समृद्धि कभी नहीं मिलती।

श्लोक 59 (3.32.59)

एवं संस्थितिका सिद्धिरियं लोकस्य भारत । चित्रा सिद्धिगतिः प्रोक्ता कालावस्थाविभागशः ॥

evaṃ saṃsthitikā siddhiriyaṃ lokasya bhārata | citrā siddhigatiḥ proktā kālāvasthāvibhāgaśaḥ

हे भारत, संसार में सिद्धि की यही व्यवस्था है; समय और परिस्थिति के भेद से सिद्धि की गति विचित्र बताई गई है।

श्लोक 60 (3.32.60)

ब्राह्मणं मे पिता पूर्वं वासयामास पण्डितम् । सर्वं चार्थमिमं प्राह पित्रे मे भरतर्षभ ॥

brāhmaṇaṃ me pitā pūrvaṃ vāsayāmāsa paṇḍitam | sarvaṃ cārthamimaṃ prāha pitre me bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, बहुत पहले मेरे पिता ने एक विद्वान ब्राह्मण को अपने घर में रखा था; उसने यह सारा विषय मेरे पिता को समझाया था।

श्लोक 61 (3.32.61)

नीतिं बृहस्पतिप्रोक्तां भ्रातॄन्मेऽग्राहयन्पुरा । तेषां सकाशादश्रौषमहमेतां तदा गृहे ॥

nītiṃ bṛhaspatiproktāṃ bhrātṝnme'grāhayanpurā | teṣāṃ sakāśādaśrauṣamahametāṃ tadā gṛhe

उन्होंने पहले मेरे भाइयों को बृहस्पति द्वारा कही गई नीति सिखाई थी; तब मैंने घर में उन्हीं के पास यह सुनी थी।

श्लोक 62 (3.32.62)

स मां राजन्कर्मवतीमागतामाह सान्त्वयन् । शुश्रूषमाणामासीनां पितुरङ्के युधिष्ठिर ॥

sa māṃ rājankarmavatīmāgatāmāha sāntvayan | śuśrūṣamāṇāmāsīnāṃ pituraṅke yudhiṣṭhira

हे राजन् युधिष्ठिर, जब मैं किसी काम से पिता के पास आकर उनकी गोद में बैठी ध्यान से सुन रही थी, तब उस ब्राह्मण ने मुझे सान्त्वना देते हुए यह कहा था।

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33