आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 33
भीम का युद्ध के लिए आग्रह
द्रौपदी के वचनों से उत्तेजित भीम युधिष्ठिर को क्रोधपूर्वक उलाहना देते हैं कि उनके धर्म-आग्रह के कारण ही भाइयों का राज्य छिन गया। वे बताते हैं कि धर्म, अर्थ और काम एक-दूसरे पर निर्भर हैं, क्षत्रिय का धर्म बल है और धन के बिना धर्म का पालन संभव नहीं। वे यह भी कहते हैं कि प्रजा युधिष्ठिर की सत्यनिष्ठा की प्रशंसा और दुर्योधन के शासन की निन्दा करती है, और राजा से आग्रह करते हैं कि वे भाइयों और मित्रों के साथ तुरंत हस्तिनापुर पर चढ़ाई करके राज्य वापस लें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.33.1)
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा भीमसेनो ह्यमर्षणः । निश्वसन्नुपसंगम्य क्रुद्धो राजानमब्रवीत् ॥
yājñasenyā vacaḥ śrutvā bhīmaseno hyamarṣaṇaḥ | niśvasannupasaṃgamya kruddho rājānamabravīt
याज्ञसेनी (द्रौपदी) के वचन सुनकर अपमान न सह सकने वाले भीमसेन लंबी साँसें लेते हुए राजा के पास आए और क्रोध में भरकर बोले।
भीम उवाच
श्लोक 2 (3.33.2)
राजन्सत्पदवीं धर्म्यां व्रज सत्पुरुषोचिताम् । धर्मकामार्थहीनानां किं नो वस्तुं तपोवने ॥
rājansatpadavīṃ dharmyāṃ vraja satpuruṣocitām | dharmakāmārthahīnānāṃ kiṃ no vastuṃ tapovane
हे राजन्, सत्पुरुषों के योग्य धर्ममय मार्ग पर चलिए। धर्म, काम और अर्थ से वंचित होकर इस तपोवन में रहने से हमें क्या लाभ?
श्लोक 3 (3.33.3)
नैव धर्मेण तद्राज्यं नार्जवेन न चौजसा । अक्षकूटमधिष्ठाय हृतं दुर्योधनेन वै ॥
naiva dharmeṇa tadrājyaṃ nārjavena na caujasā | akṣakūṭamadhiṣṭhāya hṛtaṃ duryodhanena vai
वह राज्य दुर्योधन ने न धर्म से लिया, न सरलता से और न पराक्रम से; उसने पासों के कपट का सहारा लेकर उसे छीन लिया।
श्लोक 4 (3.33.4)
गोमायुनेव सिंहानां दुर्बलेन बलीयसाम् । आमिषं विघसाशेन तद्वद्राज्यं हि नो हृतम् ॥
gomāyuneva siṃhānāṃ durbalena balīyasām | āmiṣaṃ vighasāśena tadvadrājyaṃ hi no hṛtam
जैसे जूठन पर पलने वाला दुर्बल सियार बलवान सिंहों का मांस उठा ले जाए, वैसे ही हमारा राज्य हमसे छीन लिया गया है।
श्लोक 5 (3.33.5)
धर्मलेशप्रतिच्छन्नः प्रभवं धर्मकामयोः । अर्थमुत्सृज्य किं राजन्दुःखेन परितप्यसे ॥
dharmaleśapraticchannaḥ prabhavaṃ dharmakāmayoḥ | arthamutsṛjya kiṃ rājanduḥkhena paritapyase
हे राजन्, धर्म के एक लेश से ढके हुए आप धर्म और काम के मूल अर्थ को छोड़कर दुःख में क्यों तप रहे हैं?
श्लोक 6 (3.33.6)
भवतोऽनुविधानेन राज्यं नः पश्यतां हृतम् । अहार्यमपि शक्रेण गुप्तं गाण्डीवधन्वना ॥
bhavato'nuvidhānena rājyaṃ naḥ paśyatāṃ hṛtam | ahāryamapi śakreṇa guptaṃ gāṇḍīvadhanvanā
आपकी इच्छा के अनुसार चलने से हमारे देखते-देखते हमारा राज्य छिन गया — वह राज्य, जिसकी रक्षा गाण्डीवधारी अर्जुन करते थे और जिसे इन्द्र भी नहीं छीन सकते थे।
श्लोक 7 (3.33.7)
कुणीनामिव बिल्वानि पङ्गूनामिव धेनवः । हृतमैश्वर्यमस्माकं जीवतां भवतः कृते ॥
kuṇīnāmiva bilvāni paṅgūnāmiva dhenavaḥ | hṛtamaiśvaryamasmākaṃ jīvatāṃ bhavataḥ kṛte
जैसे लूले लोगों से बेल के फल और लँगड़ों से गायें छीन ली जाती हैं, वैसे ही हमारे जीते-जी आपके कारण हमारा ऐश्वर्य छीन लिया गया।
श्लोक 8 (3.33.8)
भवतः प्रियमित्येवं महद्व्यसनमीदृशम् । धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्नाः स्म भारत ॥
bhavataḥ priyamityevaṃ mahadvyasanamīdṛśam | dharmakāme pratītasya pratipannāḥ sma bhārata
हे भारत, केवल यह सोचकर कि इससे आप प्रसन्न होंगे, हम इस घोर विपत्ति में पड़े हैं, क्योंकि आपने धर्म की इच्छा पर ही भरोसा किया।
श्लोक 9 (3.33.9)
कर्शयामः स्वमित्राणि नन्दयामश्च शात्रवान् । आत्मानं भवतः शास्त्रैर्नियम्य भरतर्षभ ॥
karśayāmaḥ svamitrāṇi nandayāmaśca śātravān | ātmānaṃ bhavataḥ śāstrairniyamya bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, आपके उपदेशों से अपने को रोककर हम अपने ही मित्रों को कष्ट दे रहे हैं और शत्रुओं को आनन्दित कर रहे हैं।
श्लोक 10 (3.33.10)
यद्वयं न तदैवैतान्धार्तराष्ट्रान्निहन्महि । भवतः शास्त्रमादाय तन्नस्तपति दुष्कृतम् ॥
yadvayaṃ na tadaivaitāndhārtarāṣṭrānnihanmahi | bhavataḥ śāstramādāya tannastapati duṣkṛtam
आपकी शिक्षा मानकर हमने उसी समय इन धृतराष्ट्रपुत्रों को नहीं मार डाला — हमारी यह भूल हमें जला रही है।
श्लोक 11 (3.33.11)
अथैनामन्ववेक्षस्व मृगचर्यामिवात्मनः । अवीराचरितां राजन्नबलस्थैर्निषेविताम् ॥
athaināmanvavekṣasva mṛgacaryāmivātmanaḥ | avīrācaritāṃ rājannabalasthairniṣevitām
हे राजन्, अब हमारे इस पशुओं जैसे भटकते जीवन को देखिए, जिसे न वीरों ने अपनाया और न बलवानों ने जिया।
श्लोक 12 (3.33.12)
यां न कृष्णो न बीभत्सुर्नाभिमन्युर्न सृञ्जयाः । न चाहमभिनन्दामि न च माद्रीसुतावुभौ ॥
yāṃ na kṛṣṇo na bībhatsurnābhimanyurna sṛñjayāḥ | na cāhamabhinandāmi na ca mādrīsutāvubhau
इसमें न कृष्ण प्रसन्न हैं, न अर्जुन, न अभिमन्यु, न सृंजय, न मैं और न माद्री के दोनों पुत्र।
श्लोक 13 (3.33.13)
भवान्धर्मो धर्म इति सततं व्रतकर्शितः । कच्चिद्राजन्न निर्वेदादापन्नः क्लीबजीविकाम् ॥
bhavāndharmo dharma iti satataṃ vratakarśitaḥ | kaccidrājanna nirvedādāpannaḥ klībajīvikām
"धर्म, धर्म" कहते हुए सदा व्रतों से दुर्बल हुए आप, हे राजन्, कहीं निराशा के कारण नपुंसकों जैसी जीविका तो नहीं अपना बैठे?
श्लोक 14 (3.33.14)
दुर्मनुष्या हि निर्वेदमफलं सर्वघातकम् । अशक्ताः श्रियमाहर्तुमात्मनः कुर्वते प्रियम् ॥
durmanuṣyā hi nirvedamaphalaṃ sarvaghātakam | aśaktāḥ śriyamāhartumātmanaḥ kurvate priyam
जो लक्ष्मी को स्वयं प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं, वे अधम मनुष्य ही उस निराशा को प्रिय मानते हैं, जो निष्फल है और सबका नाश कर देती है।
श्लोक 15 (3.33.15)
स भवान्दृष्टिमाञ्शक्तः पश्यन्नस्मासु पौरुषम् । आनृशंस्यपरो राजन्नात्मार्थमवबुध्यसे ॥
sa bhavāndṛṣṭimāñśaktaḥ paśyannasmāsu pauruṣam | ānṛśaṃsyaparo rājannātmārthamavabudhyase
आप दूरदर्शी और समर्थ हैं, और हममें पौरुष भी देखते हैं; फिर भी हे राजन्, कोमलता में लगे रहकर आप अपना हित नहीं पहचानते।
श्लोक 16 (3.33.16)
अस्मानमी धार्तराष्ट्राः क्षममाणानहिंसतः । अशक्तानेव मन्यन्ते तद्दुःखं नाहवे वधः ॥
asmānamī dhārtarāṣṭrāḥ kṣamamāṇānahiṃsataḥ | aśaktāneva manyante tadduḥkhaṃ nāhave vadhaḥ
हमें क्षमाशील और अहिंसक देखकर ये धृतराष्ट्रपुत्र हमें असमर्थ ही समझते हैं। दुःख यही है, युद्ध में मरना दुःख नहीं।
श्लोक 17 (3.33.17)
तत्र चेद्युध्यमानानामजिह्ममनिवर्तिनाम् । सर्वशो हि वधः श्रेयान्प्रेत्य लोकांल्लभेमहि ॥
tatra cedyudhyamānānāmajihmamanivartinām | sarvaśo hi vadhaḥ śreyānpretya lokāṃllabhemahi
यदि उस युद्ध में हम बिना कुटिलता के और पीठ दिखाए बिना लड़ें, तो मृत्यु भी हर प्रकार से श्रेष्ठ है, क्योंकि मरकर हम उत्तम लोक पाएँगे।
श्लोक 18 (3.33.18)
अथवा वयमेवैतान्निहत्य भरतर्षभ । आददीमहि गां सर्वां तथापि श्रेय एव नः ॥
athavā vayamevaitānnihatya bharatarṣabha | ādadīmahi gāṃ sarvāṃ tathāpi śreya eva naḥ
अथवा, हे भरतश्रेष्ठ, हम ही इन्हें मारकर सारी पृथ्वी ले लें; वह भी हमारे लिए कल्याणकारी है।
श्लोक 19 (3.33.19)
सर्वथा कार्यमेतन्नः स्वधर्ममनुतिष्ठताम् । काङ्क्षतां विपुलां कीर्तिं वैरं प्रतिचिकीर्षताम् ॥
sarvathā kāryametannaḥ svadharmamanutiṣṭhatām | kāṅkṣatāṃ vipulāṃ kīrtiṃ vairaṃ praticikīrṣatām
अपने धर्म का पालन करने वाले, विशाल कीर्ति चाहने वाले और वैर का बदला चुकाने की इच्छा रखने वाले हम लोगों को यह हर हाल में करना ही है।
श्लोक 20 (3.33.20)
आत्मार्थं युध्यमानानां जीविते कृत्यलक्षणे । अन्यैरपि हृते राज्ये प्रशंसैव न गर्हणा ॥
ātmārthaṃ yudhyamānānāṃ jīvite kṛtyalakṣaṇe | anyairapi hṛte rājye praśaṃsaiva na garhaṇā
जब राज्य दूसरों ने छीन लिया हो, तब कर्तव्य को ही जीवन का लक्षण मानकर अपने हित के लिए लड़ने वालों की प्रशंसा ही होती है, निन्दा नहीं।
श्लोक 21 (3.33.21)
कर्शनार्थो हि यो धर्मो विप्राणामात्मनस्तथा । व्यसनं नाम तद्राजन्न धर्मः स कुवर्त्मतत् ॥
karśanārtho hi yo dharmo viprāṇāmātmanastathā | vyasanaṃ nāma tadrājanna dharmaḥ sa kuvartmatat
हे राजन्, जो धर्म ब्राह्मणों को और स्वयं को क्षीण करने वाला हो, वह तो विपत्ति ही है; वह धर्म नहीं, कुमार्ग है।
श्लोक 22 (3.33.22)
सर्वथा धर्मनित्यं तु पुरुषं धर्मदुर्बलम् । जहतस्तात धर्मार्थौ प्रेतं दुःखसुखे यथा ॥
sarvathā dharmanityaṃ tu puruṣaṃ dharmadurbalam | jahatastāta dharmārthau pretaṃ duḥkhasukhe yathā
हे तात, जो सदा धर्म में लगा रहकर भी धर्म के कारण दुर्बल हो गया हो, उसे धर्म और अर्थ दोनों वैसे ही छोड़ देते हैं जैसे मरे हुए को सुख और दुःख।
श्लोक 23 (3.33.23)
यस्य धर्मो हि धर्मार्थं क्लेशभाङ्न स पण्डितः । न स धर्मस्य वेदार्थं सूर्यस्यान्धः प्रभामिव ॥
yasya dharmo hi dharmārthaṃ kleśabhāṅna sa paṇḍitaḥ | na sa dharmasya vedārthaṃ sūryasyāndhaḥ prabhāmiva
जिसका धर्म केवल धर्म के लिए ही है, वह केवल क्लेश भोगता है; वह बुद्धिमान नहीं। वह धर्म का प्रयोजन नहीं जानता, जैसे अंधा सूर्य के प्रकाश को नहीं जानता।
श्लोक 24 (3.33.24)
यस्य चार्थार्थ एवार्थः स च नार्थस्य कोविदः । रक्ष्यते भृतकः पुण्यं यथा स्यात्तादृगेव सः ॥
yasya cārthārtha evārthaḥ sa ca nārthasya kovidaḥ | rakṣyate bhṛtakaḥ puṇyaṃ yathā syāttādṛgeva saḥ
और जिसका धन केवल धन के लिए ही है, वह भी धन का मर्म नहीं जानता; वह उस वेतनभोगी सेवक जैसा ही है जो किसी और के पुण्य-भंडार की रखवाली करता है।
श्लोक 25 (3.33.25)
अतिवेलं हि योऽर्थार्थी नेतरावनुतिष्ठति । स वध्यः सर्वभूतानां ब्रह्महेव जुगुप्सितः ॥
ativelaṃ hi yo'rthārthī netarāvanutiṣṭhati | sa vadhyaḥ sarvabhūtānāṃ brahmaheva jugupsitaḥ
जो धन का सीमा से अधिक लोभी होकर शेष दोनों (धर्म और काम) का पालन नहीं करता, वह सब प्राणियों द्वारा वध के योग्य है और ब्रह्महत्यारे की भाँति घृणित है।
श्लोक 26 (3.33.26)
सततं यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्ठति । मित्राणि तस्य नश्यन्ति धर्मार्थाभ्यां च हीयते ॥
satataṃ yaśca kāmārthī netarāvanutiṣṭhati | mitrāṇi tasya naśyanti dharmārthābhyāṃ ca hīyate
जो सदा काम के पीछे रहता है और शेष दोनों का पालन नहीं करता, उसके मित्र छूट जाते हैं और वह धर्म तथा अर्थ दोनों से वंचित हो जाता है।
श्लोक 27 (3.33.27)
तस्य धर्मार्थहीनस्य कामान्ते निधनं ध्रुवम् । कामतो रममाणस्य मीनस्येवाम्भसः क्षये ॥
tasya dharmārthahīnasya kāmānte nidhanaṃ dhruvam | kāmato ramamāṇasya mīnasyevāmbhasaḥ kṣaye
धर्म और अर्थ से हीन, मनमाने ढंग से भोग में रमने वाले उस व्यक्ति की मृत्यु भोगों के समाप्त होते ही निश्चित है, जैसे जल सूखने पर मछली की।
श्लोक 28 (3.33.28)
तस्माद्धर्मार्थयोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिताः । प्रकृतिः सा हि कामस्य पावकस्यारणिर्यथा ॥
tasmāddharmārthayornityaṃ na pramādyanti paṇḍitāḥ | prakṛtiḥ sā hi kāmasya pāvakasyāraṇiryathā
इसलिए बुद्धिमान लोग धर्म और अर्थ के विषय में कभी असावधान नहीं होते, क्योंकि वे ही काम के मूल हैं, जैसे अरणि अग्नि का मूल है।
श्लोक 29 (3.33.29)
सर्वथा धर्ममूलोऽर्थो धर्मश्चार्थपरिग्रहः । इतरेतरयोर्नीतौ विद्धि मेघोदधी यथा ॥
sarvathā dharmamūlo'rtho dharmaścārthaparigrahaḥ | itaretarayornītau viddhi meghodadhī yathā
हर प्रकार से अर्थ का मूल धर्म है और धर्म अर्थ के संग्रह पर टिका है। जानिए कि ये दोनों एक-दूसरे से आगे बढ़ते हैं, जैसे मेघ और समुद्र।
श्लोक 30 (3.33.30)
द्रव्यार्थस्पर्शसंयोगे या प्रीतिरुपजायते । स कामश्चित्तसंकल्पः शरीरं नास्य दृश्यते ॥
dravyārthasparśasaṃyoge yā prītirupajāyate | sa kāmaścittasaṃkalpaḥ śarīraṃ nāsya dṛśyate
वस्तुओं के स्पर्श और धन की प्राप्ति से जो आनन्द उत्पन्न होता है, वही काम है। वह मन का संकल्प है; उसका कोई शरीर दिखाई नहीं देता।
श्लोक 31 (3.33.31)
अर्थार्थी पुरुषो राजन्बृहन्तं धर्ममिच्छति । अर्थमिच्छति कामार्थी न कामादन्यमिच्छति ॥
arthārthī puruṣo rājanbṛhantaṃ dharmamicchati | arthamicchati kāmārthī na kāmādanyamicchati
हे राजन्, धन चाहने वाला पुरुष वास्तव में महान धर्म चाहता है, और काम चाहने वाला धन चाहता है; पर काम से आगे कोई कुछ नहीं चाहता।
श्लोक 32 (3.33.32)
न हि कामेन कामोऽन्यः सिध्यते फलमेव तत् । उपयोगात्फलस्यैव काष्ठाद्भस्मेव पण्डितः ॥
na hi kāmena kāmo'nyaḥ sidhyate phalameva tat | upayogātphalasyaiva kāṣṭhādbhasmeva paṇḍitaḥ
एक काम से दूसरा काम सिद्ध नहीं होता; वह स्वयं ही फल है, जो उपभोग में ही समाप्त हो जाता है, हे विद्वान् — जैसे लकड़ी से राख बनती है, पर राख से आगे कुछ नहीं बनता।
श्लोक 33 (3.33.33)
इमाञ्शकुनकान्राजन्हन्ति वैतंसिको यथा । एतद्रूपमधर्मस्य भूतेषु च विहिंसनम् ॥
imāñśakunakānrājanhanti vaitaṃsiko yathā | etadrūpamadharmasya bhūteṣu ca vihiṃsanam
हे राजन्, जैसे बहेलिया इन छोटे पक्षियों को मारता है, वैसा ही अधर्म का रूप है — प्राणियों की हिंसा।
श्लोक 34 (3.33.34)
कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रवृत्तिं यो न पश्यति । स वध्यः सर्वभूतानां प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ॥
kāmāllobhācca dharmasya pravṛttiṃ yo na paśyati | sa vadhyaḥ sarvabhūtānāṃ pretya ceha ca durmatiḥ
जो काम और लोभ के कारण धर्म की गति को नहीं देखता, वह सब प्राणियों द्वारा वध के योग्य है; वह दुर्बुद्धि इस लोक और परलोक दोनों में (दुःख पाता है)।
श्लोक 35 (3.33.35)
व्यक्तं ते विदितो राजन्नर्थो द्रव्यपरिग्रहः । प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूयसीम् ॥
vyaktaṃ te vidito rājannartho dravyaparigrahaḥ | prakṛtiṃ cāpi vetthāsya vikṛtiṃ cāpi bhūyasīm
हे राजन्, आप भली-भाँति जानते हैं कि अर्थ का अर्थ है द्रव्य का संग्रह; आप उसकी स्वाभाविक अवस्था और उसके अनेक विकारों को भी जानते हैं।
श्लोक 36 (3.33.36)
तस्य नाशं विनाशं वा जरया मरणेन वा । अनर्थ इति मन्यन्ते सोयमस्मासु वर्तते ॥
tasya nāśaṃ vināśaṃ vā jarayā maraṇena vā | anartha iti manyante soyamasmāsu vartate
बुढ़ापे या मृत्यु से उसका नष्ट होना या विनाश — इसी को लोग अनर्थ कहते हैं; वही अब हम पर आ पड़ा है।
श्लोक 37 (3.33.37)
इन्द्रियाणां च पञ्चानां मनसो हृदयस्य च । विषये वर्तमानानां या प्रीतिरुपजायते ॥
indriyāṇāṃ ca pañcānāṃ manaso hṛdayasya ca | viṣaye vartamānānāṃ yā prītirupajāyate
पाँचों इन्द्रियों, मन और हृदय के अपने-अपने विषयों में लगे रहने पर जो आनन्द उत्पन्न होता है —
श्लोक 38 (3.33.38)
स काम इति मे बुद्धिः कर्मणां फलमुत्तमम् । एवमेव पृथग्दृष्ट्वा धर्मार्थौ काममेव च ॥
sa kāma iti me buddhiḥ karmaṇāṃ phalamuttamam | evameva pṛthagdṛṣṭvā dharmārthau kāmameva ca
वही काम है, ऐसा मेरा मत है; वह कर्मों का उत्तम फल है। इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम को अलग-अलग पहचानकर,
श्लोक 39 (3.33.39)
न धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नरः । न कामपरमो वा स्यात्सर्वान्सेवेत सर्वदा ॥
na dharmapara eva syānna cārthaparamo naraḥ | na kāmaparamo vā syātsarvānseveta sarvadā
मनुष्य को न केवल धर्मपरायण होना चाहिए, न केवल अर्थपरायण और न केवल कामपरायण; उसे सदा तीनों का सेवन करना चाहिए।
श्लोक 40 (3.33.40)
धर्मं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये काममाचरेत् । अहन्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥
dharmaṃ pūrve dhanaṃ madhye jaghanye kāmamācaret | ahanyanucaredevameṣa śāstrakṛto vidhiḥ
दिन के पहले भाग में धर्म, मध्य में अर्थ और अंतिम भाग में काम का आचरण करे। दिन भर में इसी क्रम का पालन करे — यही शास्त्रों का विधान है।
श्लोक 41 (3.33.41)
कामं पूर्वे धनं मध्ये जघन्ये धर्ममाचरेत् । वयस्यनुचरेदेवमेष शास्त्रकृतो विधिः ॥
kāmaṃ pūrve dhanaṃ madhye jaghanye dharmamācaret | vayasyanucaredevameṣa śāstrakṛto vidhiḥ
जीवन के पहले भाग में काम, मध्य में अर्थ और अंतिम भाग में धर्म का आचरण करे। आयु भर में इसी क्रम का पालन करे — यही शास्त्रों का विधान है।
श्लोक 42 (3.33.42)
धर्मं चार्थं च कामं च यथावद्वदतां वर । विभज्य काले कालज्ञः सर्वान्सेवेत पण्डितः ॥
dharmaṃ cārthaṃ ca kāmaṃ ca yathāvadvadatāṃ vara | vibhajya kāle kālajñaḥ sarvānseveta paṇḍitaḥ
हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, समय को पहचानने वाला बुद्धिमान पुरुष धर्म, अर्थ और काम को समय के अनुसार ठीक से बाँटकर तीनों का सेवन करे।
श्लोक 43 (3.33.43)
मोक्षो वा परमं श्रेय एष राजन्सुखार्थिनाम् । प्राप्तिं वा बुद्धिमास्थाय सोपायां कुरुनन्दन ॥
mokṣo vā paramaṃ śreya eṣa rājansukhārthinām | prāptiṃ vā buddhimāsthāya sopāyāṃ kurunandana
हे राजन्, सुख चाहने वालों के लिए या तो मोक्ष परम कल्याण है, या फिर हे कुरुनन्दन, बुद्धि का आश्रय लेकर उचित उपायों से (अपने राज्य की) प्राप्ति।
श्लोक 44 (3.33.44)
तद्वाऽऽशु क्रियतां राजन्प्राप्तिर्वाप्यधिगम्यताम् । जीवितं ह्यातुरस्येव दुःखमन्तरवर्तिनः ॥
tadvā''śu kriyatāṃ rājanprāptirvāpyadhigamyatām | jīvitaṃ hyāturasyeva duḥkhamantaravartinaḥ
इसलिए हे राजन्, या तो पहला मार्ग शीघ्र अपनाइए, या फिर (राज्य की) प्राप्ति कीजिए; क्योंकि बीच में अटके व्यक्ति का जीवन रोगी के जीवन की भाँति दुःखमय होता है।
श्लोक 45 (3.33.45)
विदितश्चैव मे धर्मः सततं चरितश्च ते । जानन्तस्त्वयि शंसन्ति सुहृदः कर्मचोदनाम् ॥
viditaścaiva me dharmaḥ satataṃ caritaśca te | jānantastvayi śaṃsanti suhṛdaḥ karmacodanām
धर्म को मैं जानता हूँ और आपने सदा उसका आचरण किया है; यह जानते हुए ही आपके हितैषी आपको कर्म के लिए प्रेरित करते हैं।
श्लोक 46 (3.33.46)
दानं यज्ञाः सतां पूजा वेदधारणमार्जवम् । एष धर्मः परो राजन्फलवान्प्रेत्य चेह च ॥
dānaṃ yajñāḥ satāṃ pūjā vedadhāraṇamārjavam | eṣa dharmaḥ paro rājanphalavānpretya ceha ca
दान, यज्ञ, सज्जनों का सम्मान, वेदों को धारण करना और सरलता — हे राजन्, यही परम धर्म है, जो इस लोक और परलोक में फल देता है।
श्लोक 47 (3.33.47)
एष नार्थविहीनेन शक्यो राजन्निषेवितुम् । अखिलाः पुरुषव्याघ्र गुणाः स्युर्यद्यपीतरे ॥
eṣa nārthavihīnena śakyo rājanniṣevitum | akhilāḥ puruṣavyāghra guṇāḥ syuryadyapītare
हे पुरुषसिंह राजन्, चाहे मनुष्य में अन्य सभी गुण हों, फिर भी धनहीन व्यक्ति इस धर्म का पालन नहीं कर सकता।
श्लोक 48 (3.33.48)
धर्ममूलं जगद्राजन्नान्यद्धर्माद्विशिष्यते । धर्मश्चार्थेन महता शक्यो राजन्निषेवितुम् ॥
dharmamūlaṃ jagadrājannānyaddharmādviśiṣyate | dharmaścārthena mahatā śakyo rājanniṣevitum
हे राजन्, जगत का मूल धर्म है; धर्म से बढ़कर कुछ नहीं। पर हे राजन्, धर्म का पालन बहुत धन से ही हो सकता है।
श्लोक 49 (3.33.49)
न चार्थो भैक्ष्यचर्येण नापि क्लैब्येन कर्हिचित् । वेत्तुं शक्यस्तथा राजन्केवलं धर्मबुद्धिना ॥
na cārtho bhaikṣyacaryeṇa nāpi klaibyena karhicit | vettuṃ śakyastathā rājankevalaṃ dharmabuddhinā
हे राजन्, धन न भिक्षा से, न कायरता से और न केवल धर्मबुद्धि से कभी प्राप्त किया जा सकता है।
श्लोक 50 (3.33.50)
प्रतिषिद्धा हि ते याच्ञा यया सिध्यति वै द्विजः । तेजसैवार्थलिप्सायां यतस्व पुरुषर्षभ ॥
pratiṣiddhā hi te yācñā yayā sidhyati vai dvijaḥ | tejasaivārthalipsāyāṃ yatasva puruṣarṣabha
जिस याचना से ब्राह्मण सफल होता है, वह आपके लिए निषिद्ध है। हे पुरुषश्रेष्ठ, अपने तेज से ही धन प्राप्त करने का प्रयत्न कीजिए।
श्लोक 51 (3.33.51)
भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका । क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु बलमौरसम् ॥
bhaikṣyacaryā na vihitā na ca viṭśūdrajīvikā | kṣatriyasya viśeṣeṇa dharmastu balamaurasam
क्षत्रिय के लिए न भिक्षावृत्ति विहित है और न वैश्य या शूद्र की जीविका; क्षत्रिय का विशेष धर्म तो उसका अपना जन्मजात बल ही है।
श्लोक 52 (3.33.52)
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व जहि शत्रून्समागतान् । धार्तराष्ट्रवनं पार्थ मया पार्थेन नाशय ॥
svadharmaṃ pratipadyasva jahi śatrūnsamāgatān | dhārtarāṣṭravanaṃ pārtha mayā pārthena nāśaya
अपने धर्म को अपनाइए और एकत्र हुए शत्रुओं का संहार कीजिए। हे पार्थ, मेरे और अर्जुन के द्वारा धृतराष्ट्रपुत्रों रूपी वन को नष्ट कर दीजिए।
श्लोक 53 (3.33.53)
उदारमेव विद्वांसो धर्मं प्राहुर्मनीषिणः । उदारं प्रतिपद्यस्व नावरे स्थातुमर्हसि ॥
udārameva vidvāṃso dharmaṃ prāhurmanīṣiṇaḥ | udāraṃ pratipadyasva nāvare sthātumarhasi
विद्वान और मनीषी उदारता (महानता) को ही धर्म कहते हैं। उसी महानता को अपनाइए; आपको हीन अवस्था में नहीं रहना चाहिए।
श्लोक 54 (3.33.54)
अनुबुध्यस्व राजेन्द्र वेत्थ धर्मान्सनातनान् । क्रूरकर्माऽभिजातोसि यस्मादुद्विजते जनः ॥
anubudhyasva rājendra vettha dharmānsanātanān | krūrakarmā'bhijātosi yasmādudvijate janaḥ
हे राजेन्द्र, जागिए; आप सनातन धर्मों को जानते हैं। आप कठोर कर्म वाले कुल में जन्मे हैं, जिससे लोग भय खाते हैं।
श्लोक 55 (3.33.55)
प्रजापालनसंभूतं फलं तव न गर्हितम् । एष ते विहितो राजन्धात्रा धर्मः सनातनः ॥
prajāpālanasaṃbhūtaṃ phalaṃ tava na garhitam | eṣa te vihito rājandhātrā dharmaḥ sanātanaḥ
प्रजा की रक्षा से मिलने वाला फल आपके लिए निन्दनीय नहीं है। हे राजन्, विधाता ने आपके लिए यही सनातन धर्म नियत किया है।
श्लोक 56 (3.33.56)
तस्माद्विचलितः पार्थ लोके हास्यं गमिष्यसि । स्वधर्माद्धि मनुष्याणां चलनं न प्रशस्यते ॥
tasmādvicalitaḥ pārtha loke hāsyaṃ gamiṣyasi | svadharmāddhi manuṣyāṇāṃ calanaṃ na praśasyate
हे पार्थ, इससे डिगने पर आप संसार में हँसी के पात्र बनेंगे; क्योंकि अपने धर्म से हटने वाले मनुष्य की कोई प्रशंसा नहीं करता।
श्लोक 57 (3.33.57)
स क्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मनः । वीर्यमास्थाय कौरव्य धुरमुद्वह धुर्यवत् ॥
sa kṣātraṃ hṛdayaṃ kṛtvā tyaktvedaṃ śithilaṃ manaḥ | vīryamāsthāya kauravya dhuramudvaha dhuryavat
इसलिए हे कौरव्य, क्षत्रिय का हृदय धारण कीजिए, इस शिथिल मन को त्यागिए, पराक्रम का सहारा लेकर बोझ ढोने वाले बैल की तरह धुरी को उठाइए।
श्लोक 58 (3.33.58)
न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन । पार्थिवो व्यजयद्राजन्न भूतिं न पुनः श्रियम् ॥
na hi kevaladharmātmā pṛthivīṃ jātu kaścana | pārthivo vyajayadrājanna bhūtiṃ na punaḥ śriyam
हे राजन्, केवल धर्म में लगे रहने वाले किसी भी राजा ने कभी पृथ्वी को नहीं जीता, न ऐश्वर्य पाया और न लक्ष्मी।
श्लोक 59 (3.33.59)
जिह्वां दत्त्वा बहूनां हि क्षुद्राणां लुब्धचेतसाम् । निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः ॥
jihvāṃ dattvā bahūnāṃ hi kṣudrāṇāṃ lubdhacetasām | nikṛtyā labhate rājyamāhāramiva śalyakaḥ
अनेक क्षुद्र और लोभी लोगों की जीभ को (स्वादिष्ट भेंट देकर) लुभाकर राजा छल से राज्य पा लेता है, जैसे शिकारी चारा डालकर अपना आहार पाता है।
श्लोक 60 (3.33.60)
भ्रातरः पूर्वजाताश्च सुसमृद्धाश्च सर्वशः । निकृत्या निर्जिता देवैरसुराः पाण्डवर्षभ ॥
bhrātaraḥ pūrvajātāśca susamṛddhāśca sarvaśaḥ | nikṛtyā nirjitā devairasurāḥ pāṇḍavarṣabha
हे पाण्डवश्रेष्ठ, असुर देवताओं के बड़े भाई थे और सब प्रकार से समृद्ध थे, फिर भी देवताओं ने उन्हें छल से जीत लिया।
श्लोक 61 (3.33.61)
एवं बलवतः सर्वमिति बुद्ध्वा महीपते । जहि शत्रून्महाबाहो परां निकृतिमास्थितान् ॥
evaṃ balavataḥ sarvamiti buddhvā mahīpate | jahi śatrūnmahābāho parāṃ nikṛtimāsthitān
हे पृथ्वीपति, यह समझकर कि सब कुछ बलवान का ही होता है, हे महाबाहु, परम छल का सहारा लेने वाले शत्रुओं का वध कीजिए।
श्लोक 62 (3.33.62)
न ह्यर्जुनसमः कश्चिद्युधि योद्धा धनुर्धरः । भविता वा पुमान्कश्चिन्मत्समो वा गदाधरः ॥
na hyarjunasamaḥ kaścidyudhi yoddhā dhanurdharaḥ | bhavitā vā pumānkaścinmatsamo vā gadādharaḥ
युद्ध में अर्जुन के समान कोई धनुर्धर योद्धा नहीं है, और न कभी मेरे समान कोई गदाधारी होगा।
श्लोक 63 (3.33.63)
सत्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुबलवानपि । न प्रमाणेन नोत्साहात्सत्वस्थो भव पाण्डव ॥
satvena kurute yuddhaṃ rājansubalavānapi | na pramāṇena notsāhātsatvastho bhava pāṇḍava
हे राजन्, अत्यंत बलवान पुरुष भी युद्ध साहस से ही करता है, न शरीर के आकार से और न केवल उत्साह से। हे पाण्डुपुत्र, साहस में दृढ़ रहिए।
श्लोक 64 (3.33.64)
सत्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा । न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छायेव हैमनी ॥
satvaṃ hi mūlamarthasya vitathaṃ yadato'nyathā | na tu prasaktaṃ bhavati vṛkṣacchāyeva haimanī
साहस ही सफलता का मूल है; इसके अतिरिक्त सब व्यर्थ है। वह टिकता नहीं, जैसे जाड़े में वृक्ष की छाया।
श्लोक 65 (3.33.65)
अर्थत्यागोऽपि कार्यः स्यादर्थं श्रेयांसमिच्छता । बीजौपम्येन कौन्तेय मा ते भूदत्र संशयः ॥
arthatyāgo'pi kāryaḥ syādarthaṃ śreyāṃsamicchatā | bījaupamyena kaunteya mā te bhūdatra saṃśayaḥ
हे कुन्तीपुत्र, अधिक धन चाहने वाले को धन का त्याग भी करना पड़ता है, जैसे बीज बोते समय उसे छोड़ा जाता है; इसमें आपको संदेह नहीं होना चाहिए।
श्लोक 66 (3.33.66)
अर्थेन तु समोऽनर्थो यत्र लब्धो महोदयः । न तत्र विपणः कार्यः खरकण्डूयनं हि तत् ॥
arthena tu samo'nartho yatra labdho mahodayaḥ | na tatra vipaṇaḥ kāryaḥ kharakaṇḍūyanaṃ hi tat
परंतु जहाँ बड़ा लाभ उतनी ही हानि उठाकर मिलता हो, वहाँ सौदा नहीं करना चाहिए; वह तो गधे को खुजलाने जैसा (व्यर्थ) है।
श्लोक 67 (3.33.67)
एवमेव मनुष्येन्द्र धर्मं त्यक्त्वाऽल्पकं नरः । बृहन्तं धर्ममाप्नोति स बुद्ध इति निश्चितम् ॥
evameva manuṣyendra dharmaṃ tyaktvā'lpakaṃ naraḥ | bṛhantaṃ dharmamāpnoti sa buddha iti niścitam
हे नरेन्द्र, इसी प्रकार जो मनुष्य छोटे धर्म को त्यागकर महान धर्म प्राप्त करता है, वही निश्चय ही बुद्धिमान कहलाता है।
श्लोक 68 (3.33.68)
अमित्रं मित्रसंपन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिताः ॥
amitraṃ mitrasaṃpannaṃ mitrairbhindanti paṇḍitāḥ
बुद्धिमान लोग मित्रों से संपन्न शत्रु में उसके मित्रों के द्वारा ही फूट डालते हैं;
श्लोक 69 (3.33.69)
भिन्नैर्मित्रैः परित्यक्तं दुर्बलं कुरुते वशे ॥
bhinnairmitraiḥ parityaktaṃ durbalaṃ kurute vaśe
फिर फूटे हुए मित्रों द्वारा त्याग दिए गए उस दुर्बल शत्रु को राजा अपने वश में कर लेता है।
श्लोक 70 (3.33.70)
सत्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुबलवानपि । नोद्यमेन न होत्राभिः सर्वाः स्वीकुरुते प्रजाः ॥
satvena kurute yuddhaṃ rājansubalavānapi | nodyamena na hotrābhiḥ sarvāḥ svīkurute prajāḥ
हे राजन्, अत्यंत बलवान पुरुष भी युद्ध साहस से ही करता है; केवल परिश्रम से या मीठे निमंत्रणों से राजा सारी प्रजा को अपना नहीं बना लेता।
श्लोक 71 (3.33.71)
सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि । अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव ॥
sarvathā saṃhataireva durbalairbalavānapi | amitraḥ śakyate hantuṃ madhuhā bhramarairiva
दुर्बल लोग भी संगठित होकर बलवान शत्रु को हर प्रकार से मार सकते हैं, जैसे मधु लेने आए व्यक्ति को मधुमक्खियाँ मार डालती हैं।
श्लोक 72 (3.33.72)
यथा राजन्प्रजाः सर्वाः सूर्यः पाति गभस्तिभिः । हन्ति चैव तथैव त्वं सदृशः सवितुर्भव ॥
yathā rājanprajāḥ sarvāḥ sūryaḥ pāti gabhastibhiḥ | hanti caiva tathaiva tvaṃ sadṛśaḥ saviturbhava
हे राजन्, जैसे सूर्य अपनी किरणों से सब प्राणियों की रक्षा भी करता है और उन्हें नष्ट भी करता है, वैसे ही आप भी सूर्य के समान बनिए।
श्लोक 73 (3.33.73)
एतच्चापि तपो राजन्पुराणमिति नः श्रुतम् । विधिना पालनं भूमेर्यत्कृतं नः पितामहैः ॥
etaccāpi tapo rājanpurāṇamiti naḥ śrutam | vidhinā pālanaṃ bhūmeryatkṛtaṃ naḥ pitāmahaiḥ
हे राजन्, हमने सुना है कि यह भी प्राचीन तप है — विधिपूर्वक पृथ्वी का पालन, जैसा हमारे पितामहों ने किया था।
श्लोक 74 (3.33.74)
न तथा तपसा राजँल्लोकान्प्राप्नोति क्षत्रियः । यथा सृष्टेन युद्धेन विजयेनेतरेण वा ॥
na tathā tapasā rājam̐llokānprāpnoti kṣatriyaḥ | yathā sṛṣṭena yuddhena vijayenetareṇa vā
हे राजन्, क्षत्रिय तप से उत्तम लोकों को वैसे नहीं पाता जैसे धर्मपूर्वक छेड़े गए युद्ध से, चाहे उसका परिणाम विजय हो या दूसरा (वीरगति)।
श्लोक 75 (3.33.75)
अपेयात्किल भा सूर्याल्लक्ष्मीश्चन्द्रमसस्तथा । इति लोको व्यवसितो दृष्ट्वेमां भवतो व्यथाम् ॥
apeyātkila bhā sūryāllakṣmīścandramasastathā | iti loko vyavasito dṛṣṭvemāṃ bhavato vyathām
आपकी यह व्यथा देखकर लोगों ने यह निश्चय कर लिया है कि सूर्य से प्रकाश और चन्द्रमा से शोभा भले ही हट जाए, पर आप अपने वचन से नहीं हटेंगे।
श्लोक 76 (3.33.76)
भवतश्च प्रशंसाभिर्निन्दाभिरितरस्य च । कथयन्त्यः परिषदः पृथग्राजन्समागताः ॥
bhavataśca praśaṃsābhirnindābhiritarasya ca | kathayantyaḥ pariṣadaḥ pṛthagrājansamāgatāḥ
हे राजन्, जगह-जगह एकत्र हुई सभाएँ आपकी प्रशंसा और दूसरे (दुर्योधन) की निन्दा करती हुई आपस में चर्चा करती हैं।
श्लोक 77 (3.33.77)
इदमभ्यधिकं राजन्ब्राह्मणाः कुरवश्च ते । समेताः कथयन्तीह मुदिताः सत्यसन्धताम् ॥
idamabhyadhikaṃ rājanbrāhmaṇāḥ kuravaśca te | sametāḥ kathayantīha muditāḥ satyasandhatām
हे राजन्, इससे भी बढ़कर, ब्राह्मण और आपके कुरुवंशी यहाँ एकत्र होकर प्रसन्नता से आपकी सत्यनिष्ठा का बखान करते हैं —
श्लोक 78 (3.33.78)
यन्न मोहान्न कार्पण्यान्न लोभान्न भयादपि । अनृतं किंचिदुक्तं ते न कामान्नार्थकारणात् ॥
yanna mohānna kārpaṇyānna lobhānna bhayādapi | anṛtaṃ kiṃciduktaṃ te na kāmānnārthakāraṇāt
कि आपने न मोह से, न दीनता से, न लोभ से, न भय से, न काम से और न धन के कारण कभी कोई असत्य कहा है।
श्लोक 79 (3.33.79)
यदेनः कुरुते किंचिद्राजा भूमिमवाप्नुवन् । सर्वं तन्नुदते पश्चाद्यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः ॥
yadenaḥ kurute kiṃcidrājā bhūmimavāpnuvan | sarvaṃ tannudate paścādyajñairvipuladakṣiṇaiḥ
पृथ्वी को प्राप्त करते समय राजा जो कुछ पाप करता है, वह सब बाद में भरपूर दक्षिणा वाले यज्ञों से धो डालता है।
श्लोक 80 (3.33.80)
ब्राह्मणेभ्यो ददद्ग्रामान्गाश्च राजन्सहस्रशः । मुच्यते वीर पापेभ्यस्तमोभ्य इव चन्द्रमाः ॥
brāhmaṇebhyo dadadgrāmāngāśca rājansahasraśaḥ | mucyate vīra pāpebhyastamobhya iva candramāḥ
हे राजन्, ब्राह्मणों को हजारों गाँव और गायें दान देकर वीर पुरुष पापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा अंधकार से।
श्लोक 81 (3.33.81)
पौरजानपदाः सर्वे प्रायशः कुरुनन्दन । सवृद्धबालाः सहिताः शंसन्ति त्वां युधिष्ठिर ॥
paurajānapadāḥ sarve prāyaśaḥ kurunandana | savṛddhabālāḥ sahitāḥ śaṃsanti tvāṃ yudhiṣṭhira
हे कुरुनन्दन युधिष्ठिर, नगर और जनपद के प्रायः सभी लोग, बूढ़े और बच्चे मिलकर, आपकी प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 82 (3.33.82)
श्वदृतौ क्षीरमासक्तं ब्रह्म वा वृषले यथा । सत्यं स्तेने बलं नार्यां राज्यं दुर्योधने तथा ॥
śvadṛtau kṣīramāsaktaṃ brahma vā vṛṣale yathā | satyaṃ stene balaṃ nāryāṃ rājyaṃ duryodhane tathā
"जैसे कुत्ते की खाल की मशक में भरा दूध, जैसे शूद्र में वेद, चोर में सत्य और स्त्री में बल, वैसा ही दुर्योधन के हाथ में राज्य है।"
श्लोक 83 (3.33.83)
इति लोके निर्वचनं पुरश्चरति भारत । अपि चैताः स्त्रियो बालाः स्वाध्यायमधिकुर्वते ॥
iti loke nirvacanaṃ puraścarati bhārata | api caitāḥ striyo bālāḥ svādhyāyamadhikurvate
हे भारत, लोगों के बीच यह कहावत खुले आम चल पड़ी है; ये स्त्रियाँ और बच्चे भी इसे नित्य के पाठ की तरह दोहराते हैं।
श्लोक 84 (3.33.84)
इमामवस्थां च गते सहास्माभिररिंदम । हन्त नष्टाः स्म सर्वे वै भवतोपद्रवे सति ॥
imāmavasthāṃ ca gate sahāsmābhirariṃdama | hanta naṣṭāḥ sma sarve vai bhavatopadrave sati
हे शत्रुदमन, आप भी हमारे साथ इस दशा में आ पहुँचे हैं — हाय, आपके कारण आई इस विपत्ति से हम सब नष्ट हो गए हैं।
श्लोक 85 (3.33.85)
स भवान्रथमास्थाय सर्वोपकरणान्वितम् । त्वरमाणोऽभिनिर्यातु विप्रेभ्योऽर्थविभावकः ॥
sa bhavānrathamāsthāya sarvopakaraṇānvitam | tvaramāṇo'bhiniryātu viprebhyo'rthavibhāvakaḥ
इसलिए आप सब साधनों से सुसज्जित रथ पर चढ़कर शीघ्र निकल पड़िए, ताकि (विजय से) धन प्राप्त कर ब्राह्मणों को दे सकें।
श्लोक 86 (3.33.86)
वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठानद्यैव गजसाह्वयम् । अस्त्रविद्भिः परिवृतो भ्रातृभिर्दृढधन्विभिः ॥
vācayitvā dvijaśreṣṭhānadyaiva gajasāhvayam | astravidbhiḥ parivṛto bhrātṛbhirdṛḍhadhanvibhiḥ
श्रेष्ठ ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर आज ही हस्तिनापुर के लिए चल पड़िए, अस्त्रविद्या में निपुण और दृढ़ धनुष वाले अपने भाइयों से घिरे हुए,
श्लोक 87 (3.33.87)
आशीविषसमैर्वीरैर्मरुद्भिरिव वृत्रहा । अमित्रांस्तेजसा मृद्नन्नसुरानिव वृत्रहा । श्रियमादत्स्व कौन्तेय धार्तराष्ट्रान्महाबल ॥
āśīviṣasamairvīrairmarudbhiriva vṛtrahā | amitrāṃstejasā mṛdnannasurāniva vṛtrahā | śriyamādatsva kaunteya dhārtarāṣṭrānmahābala
विषैले सर्पों जैसे वीरों से, जैसे वृत्रहन्ता इन्द्र मरुतों से घिरे रहते हैं। हे महाबली कुन्तीपुत्र, जैसे वृत्रहन्ता ने असुरों को कुचला था, वैसे ही अपने तेज से शत्रुओं को कुचलते हुए धृतराष्ट्रपुत्रों से अपनी राजलक्ष्मी वापस ले लीजिए।
श्लोक 88 (3.33.88)
न हि गाण्डीवमुक्तानां शराणां गार्ध्रवाससाम् । स्पर्शमाशीविषाभानां मर्त्यः कश्चन संसहेत् ॥
na hi gāṇḍīvamuktānāṃ śarāṇāṃ gārdhravāsasām | sparśamāśīviṣābhānāṃ martyaḥ kaścana saṃsahet
गाण्डीव से छूटे, गिद्ध के पंखों वाले और विषधर सर्पों जैसे बाणों का स्पर्श कोई भी मनुष्य सहन नहीं कर सकता।
श्लोक 89 (3.33.89)
न स वीरो न मातङ्गो न च सोऽश्वोस्ति भारत । यः सहेत गदावेगं मम क्रुद्धस्य संयुगे ॥
na sa vīro na mātaṅgo na ca so'śvosti bhārata | yaḥ saheta gadāvegaṃ mama kruddhasya saṃyuge
हे भारत, ऐसा कोई वीर, कोई हाथी और कोई घोड़ा नहीं है जो युद्ध में क्रोधित हुए मेरी गदा के वेग को सह सके।
श्लोक 90 (3.33.90)
सृञ्जयैः सह कैकेयैर्वृष्णीनां वृषभेण च । कथं स्विद्युधि कौन्तेय न राज्यं प्राप्नुयामहे ॥
sṛñjayaiḥ saha kaikeyairvṛṣṇīnāṃ vṛṣabheṇa ca | kathaṃ svidyudhi kaunteya na rājyaṃ prāpnuyāmahe
हे कुन्तीपुत्र, सृंजयों और कैकेयों के साथ तथा वृष्णिश्रेष्ठ (श्रीकृष्ण) के साथ रहते हुए हम युद्ध में राज्य कैसे नहीं पाएँगे?
श्लोक 91 (3.33.91)
शत्रुहस्तगतां राजन्कथं स्विन्नाहरेर्महीम् । इह यत्नमुपाहृत्य बलेन महताऽन्वितः ॥
śatruhastagatāṃ rājankathaṃ svinnāharermahīm | iha yatnamupāhṛtya balena mahatā'nvitaḥ
हे राजन्, यहाँ प्रयत्न करके, विशाल सेना से युक्त होकर, आप शत्रु के हाथ में गई पृथ्वी को वापस क्यों न ले लें?