आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 285
अंगद का दूतकर्म और लंका पर धावा
राम लंका के निकट वन में सेना का पड़ाव डालते हैं, और रावण खाइयों, यन्त्रों और सैनिक टुकड़ियों से नगर की किलेबन्दी करता है। अंगद राम का अन्तिम सन्देश लेकर रावण की सभा में जाते हैं, उन्हें पकड़ने भेजे गए चार राक्षसों को झटककर राम के पास लौट आते हैं। फिर वानर और रीछ परकोटे पर धावा बोलते हैं, राक्षस निकलकर उनसे गुत्थमगुत्था लड़ते हैं, और राम-लक्ष्मण बाणों से रक्षकों को मार गिराते हैं; अन्त में विजयी राम सेना को लौटा लेते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.285.1)
प्रभूतान्नोदके तस्मिन्बहुमूलफले वने । सेनां निवेश्य काकुत्स्थो विधिवत्पर्यरक्षत ॥
prabhūtānnodake tasminbahumūlaphale vane | senāṃ niveśya kākutstho vidhivatparyarakṣata
अन्न और जल से भरपूर, बहुत-से कन्द-मूल और फलों वाले उस वन में ककुत्स्थवंशी राम ने सेना का पड़ाव डाला और विधिपूर्वक उसकी रक्षा की।
श्लोक 2 (3.285.2)
रावणः संविधां चक्रे लङ्कायां शास्त्रनिर्मिताम् । प्रकृत्यैव दुराधर्षा दृढप्राकारतोरणा ॥
rāvaṇaḥ saṃvidhāṃ cakre laṅkāyāṃ śāstranirmitām | prakṛtyaiva durādharṣā dṛḍhaprākāratoraṇā
उधर रावण ने शास्त्र की रीति से लंका में युद्ध की व्यवस्था की। वह नगरी स्वभाव से ही दुर्जेय थी; उसके परकोटे और तोरण-द्वार सुदृढ़ थे।
श्लोक 3 (3.285.3)
अगाधतोयाः परिखा मीननक्रसमाकुलाः । बभूवुः सप्त दुर्धर्षाः खादिरैः शङ्कुभिश्चिताः ॥
agādhatoyāḥ parikhā mīnanakrasamākulāḥ | babhūvuḥ sapta durdharṣāḥ khādiraiḥ śaṅkubhiścitāḥ
सात अथाह खाइयाँ थीं, जो मछलियों और मगरों से भरी थीं और खैर की लकड़ी के गड़े हुए खूँटों के कारण दुर्गम थीं।
श्लोक 4 (3.285.4)
कर्णाट्टयन्त्रा दुर्धर्षा बभूवुः सहुडोपलाः । साशीविषघटायोधाः ससर्जरसपांसवः ॥
karṇāṭṭayantrā durdharṣā babhūvuḥ sahuḍopalāḥ | sāśīviṣaghaṭāyodhāḥ sasarjarasapāṃsavaḥ
बुर्जों पर लगे यन्त्र दुर्जेय थे, जिनके साथ प्रहार के उपकरण और फेंकने के पत्थर रखे थे; विषैले सर्पों से भरे घड़े लिए योद्धा तैनात थे, और राल तथा धूल के भण्डार भी थे।
श्लोक 5 (3.285.5)
मुसलालातनाराचतोमरासिपरश्वथैः । अन्विताश्च शतघ्नीभिः समधूच्छिष्टमुद्गराः ॥
musalālātanārācatomarāsiparaśvathaiḥ | anvitāśca śataghnībhiḥ samadhūcchiṣṭamudgarāḥ
वे मूसल, जलती लुकाठियाँ, नाराच बाण, तोमर, तलवारें और फरसे लिए थे; उनके पास शतघ्नियाँ और मोम लगे मुद्गर भी थे।
श्लोक 6 (3.285.6)
पुरद्वारेषु सर्वेषु गुल्माः स्थावरजङ्गमाः । बभूवुः पत्तिबहुलाः प्रभूतगजवाजिनः ॥
puradvāreṣu sarveṣu gulmāḥ sthāvarajaṅgamāḥ | babhūvuḥ pattibahulāḥ prabhūtagajavājinaḥ
नगर के सभी द्वारों पर सेना की टुकड़ियाँ थीं — कुछ अपने स्थान पर जमी हुई और कुछ घूमती-फिरती; उनमें पैदल सैनिक बहुत थे और हाथी-घोड़े भी प्रचुर थे।
श्लोक 7 (3.285.7)
अङ्गदस्त्वथ लङ्कायां द्वारदेशमुपागतः । विदितो राक्षसेन्द्रस्य प्रविवेश गतव्यथः ॥
aṅgadastvatha laṅkāyāṃ dvāradeśamupāgataḥ | vidito rākṣasendrasya praviveśa gatavyathaḥ
तब अंगद लंका के द्वार पर पहुँचे। राक्षसराज को उनके आगमन की सूचना दी गई, और वे निर्भय होकर भीतर गए।
श्लोक 8 (3.285.8)
मध्ये राक्षसकोटीनां बह्वीनां सुमहाबलः । शुशुभे मेघमालाभिरादित्य इव संवृतः ॥
madhye rākṣasakoṭīnāṃ bahvīnāṃ sumahābalaḥ | śuśubhe meghamālābhirāditya iva saṃvṛtaḥ
करोड़ों राक्षसों के बीच वे महाबली अंगद मेघमालाओं से घिरे सूर्य के समान शोभित हुए।
श्लोक 9 (3.285.9)
स समासाद्य पौलस्त्यममात्यैरभिसंवृतम् । रामसंदेशमामन्त्र्य वाग्मी वक्तुं प्रचक्रमे ॥
sa samāsādya paulastyamamātyairabhisaṃvṛtam | rāmasaṃdeśamāmantrya vāgmī vaktuṃ pracakrame
मन्त्रियों से घिरे पुलस्त्यवंशी रावण के पास पहुँचकर उस वाक्पटु दूत ने उसे सम्बोधित किया और राम का सन्देश सुनाना आरम्भ किया।
अङ्गद उवाच
श्लोक 10 (3.285.10)
आह त्वां राघवो राजन्कोसलेन्द्रो महायशाः । प्राप्तकालमिदं वाक्यं तदादत्स्व सुदुर्मते ॥
āha tvāṃ rāghavo rājankosalendro mahāyaśāḥ | prāptakālamidaṃ vākyaṃ tadādatsva sudurmate
हे राजन्, महायशस्वी कोसलनरेश राघव तुमसे कहते हैं — यह वचन समय के अनुकूल है; हे दुर्बुद्धि, इसे ग्रहण करो।
श्लोक 11 (3.285.11)
अकृतात्मानमासाद्य राजानमनये रतम् । विनश्यन्त्यनयाविष्टा देशाश्च नगराणि च ॥
akṛtātmānamāsādya rājānamanaye ratam | vinaśyantyanayāviṣṭā deśāśca nagarāṇi ca
जब देश और नगर किसी अजितात्मा, अनीति में रमे राजा के हाथ पड़ते हैं, तो उसकी अनीति से ग्रस्त होकर वे नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 12 (3.285.12)
त्वयैकेनापराद्धं मे सीतामाहरता बलात् । वधायानपराद्धानामन्येषां तद्भविष्यति ॥
tvayaikenāparāddhaṃ me sītāmāharatā balāt | vadhāyānaparāddhānāmanyeṣāṃ tadbhaviṣyati
सीता को बलपूर्वक हरकर अपराध तो अकेले तुमने मेरा किया है, पर उसका परिणाम उन दूसरों का वध होगा जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया।
श्लोक 13 (3.285.13)
ये त्वया बलदर्पाभ्यामाविष्टेन वनेचराः । ऋषयो हिंसिताः पूर्वं देवाश्चाप्यवमानिताः ॥
ye tvayā baladarpābhyāmāviṣṭena vanecarāḥ | ṛṣayo hiṃsitāḥ pūrvaṃ devāścāpyavamānitāḥ
बल और दर्प में चूर होकर तुमने पहले वनवासी ऋषियों को सताया है और देवताओं का भी अपमान किया है;
श्लोक 14 (3.285.14)
राजर्षयश्च निहता रुदत्यश्चाहृताः स्त्रियः । तदिदं समनुप्राप्तं फलं तस्यानयस्य ते ॥
rājarṣayaśca nihatā rudatyaścāhṛtāḥ striyaḥ | tadidaṃ samanuprāptaṃ phalaṃ tasyānayasya te
तुमने राजर्षियों को मारा है और रोती हुई स्त्रियों का हरण किया है। तुम्हारी उसी अनीति का यह फल अब तुम्हारे सामने आ पहुँचा है।
श्लोक 15 (3.285.15)
हन्तास्मि त्वां सहामात्यैर्युध्यस्व पुरुषो भव । पश्य मे धनुषो वीर्यं मानुषस्य निशाचर ॥
hantāsmi tvāṃ sahāmātyairyudhyasva puruṣo bhava | paśya me dhanuṣo vīryaṃ mānuṣasya niśācara
मैं तुम्हें तुम्हारे मन्त्रियों सहित मार डालूँगा। युद्ध करो, पुरुष बनो! हे निशाचर, एक मनुष्य के धनुष का पराक्रम देखो।
श्लोक 16 (3.285.16)
मुच्यतां जानकी सीता न मे मोक्ष्यसि कर्हिचित् । अराक्षसमिमं लोकं कर्ताऽस्मि निशितैः शरैः ॥
mucyatāṃ jānakī sītā na me mokṣyasi karhicit | arākṣasamimaṃ lokaṃ kartā'smi niśitaiḥ śaraiḥ
जनकनन्दिनी सीता को छोड़ दो! तुम मुझसे कभी नहीं बच पाओगे। अपने तीखे बाणों से मैं इस संसार को राक्षसों से रहित कर दूँगा।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 17 (3.285.17)
इति तस्य ब्रुवाणस्य दूतस्य परुषं वचः । श्रुत्वा न ममृषे राजा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥
iti tasya bruvāṇasya dūtasya paruṣaṃ vacaḥ | śrutvā na mamṛṣe rājā rāvaṇaḥ krodhamūrcchitaḥ
बोलते हुए दूत के ऐसे कठोर वचन सुनकर क्रोध से मूर्च्छित राजा रावण उन्हें सहन न कर सका।
श्लोक 18 (3.285.18)
इङ्गितज्ञास्ततो भर्तुश्चत्वारो रजनीचराः । चतुर्ष्वङ्गेषु जगृहुः शार्दूलमिव पक्षिणः ॥
iṅgitajñāstato bhartuścatvāro rajanīcarāḥ | caturṣvaṅgeṣu jagṛhuḥ śārdūlamiva pakṣiṇaḥ
तब स्वामी का संकेत समझने वाले चार निशाचरों ने अंगद को उनके चारों अंगों से पकड़ लिया, जैसे पक्षी किसी बाघ को पकड़ें।
श्लोक 19 (3.285.19)
तांस्तथाङ्गेषु संसक्तानङ्गदो रजनीचरान् । आदायैव खमुत्पत्य प्रासादतलमाविशत् ॥
tāṃstathāṅgeṣu saṃsaktānaṅgado rajanīcarān | ādāyaiva khamutpatya prāsādatalamāviśat
अपने अंगों से चिपटे उन निशाचरों को साथ लिए हुए ही अंगद आकाश में उछले और महल की छत पर जा उतरे।
श्लोक 20 (3.285.20)
वेगेनोत्पततस्तस्य पेतुस्ते रजनीचराः । भुवि संभिन्नहृदयाः प्रहारवरपीडिताः ॥
vegenotpatatastasya petuste rajanīcarāḥ | bhuvi saṃbhinnahṛdayāḥ prahāravarapīḍitāḥ
उनकी उछाल के वेग से वे निशाचर धरती पर गिर पड़े; उनके हृदय फट गए और वे भारी आघात से कुचल गए।
श्लोक 21 (3.285.21)
संसक्तो हर्म्यशिखरात्तस्मात्पुनरवापतत् । लङ्घयित्वा पुरं लङ्कां सुवेलस्य समीपतः ॥
saṃsakto harmyaśikharāttasmātpunaravāpatat | laṅghayitvā puraṃ laṅkāṃ suvelasya samīpataḥ
जिस महल के शिखर पर वे टिके थे, वहाँ से वे फिर नीचे कूदे और लंका नगरी को लाँघकर सुवेल पर्वत के निकट आ पहुँचे।
श्लोक 22 (3.285.22)
कोसलेन्द्रमथागम्य सर्वमावेद्य वानरः । विशश्राम स तेजस्वी राघवेणाभिनन्दितः ॥
kosalendramathāgamya sarvamāvedya vānaraḥ | viśaśrāma sa tejasvī rāghaveṇābhinanditaḥ
कोसलनरेश के पास आकर उस वानर ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया, और राघव से सराहना पाकर वह तेजस्वी विश्राम करने लगा।
श्लोक 23 (3.285.23)
ततः सर्वाभिसारेण हरीणां वातरंहसाम् । भेदयामास लङ्कायाः प्राकारं रघुनन्दनः ॥
tataḥ sarvābhisāreṇa harīṇāṃ vātaraṃhasām | bhedayāmāsa laṅkāyāḥ prākāraṃ raghunandanaḥ
तब रघुनन्दन ने वायु के समान वेगवान वानरों के सम्पूर्ण आक्रमण से लंका का परकोटा तुड़वा दिया।
श्लोक 24 (3.285.24)
विभीषणर्क्षाधिपती पुरस्कृत्याथ लक्ष्मणः । दक्षिणं नगरद्वारमवामृद्नाद्दुरासदम् ॥
vibhīṣaṇarkṣādhipatī puraskṛtyātha lakṣmaṇaḥ | dakṣiṇaṃ nagaradvāramavāmṛdnāddurāsadam
विभीषण और ऋक्षराज (जाम्बवान्) को आगे करके लक्ष्मण ने नगर के दुर्गम दक्षिणी द्वार को रौंद डाला।
श्लोक 25 (3.285.25)
करभारुणगात्राणां हरीणां युद्धशालिनाम् । कोटीशतसहस्रेण लङ्कामभ्यपतत्तदा ॥
karabhāruṇagātrāṇāṃ harīṇāṃ yuddhaśālinām | koṭīśatasahasreṇa laṅkāmabhyapatattadā
तब वे हथेली के किनारे जैसे लालिमा लिए शरीर वाले, युद्धकुशल वानरों की सौ हज़ार करोड़ की सेना लेकर लंका पर टूट पड़े।
श्लोक 26 (3.285.26)
प्रलम्बबाहूरुकरजङ्घान्तरविलम्बिनाम् । ऋक्षाणां धूम्रवर्णानां तिस्रः कोट्यो व्यवस्थिताः ॥
pralambabāhūrukarajaṅghāntaravilambinām | ṛkṣāṇāṃ dhūmravarṇānāṃ tisraḥ koṭyo vyavasthitāḥ
धुएँ के रंग वाले तीन करोड़ रीछ भी पंक्तिबद्ध खड़े थे; उनकी भुजाएँ लम्बी थीं और जाँघें, हाथ तथा पिंडलियाँ भारी होकर लटकी थीं।
श्लोक 27 (3.285.27)
उत्पतद्भिः पतद्भिश्च निपतद्भिश्च वानरैः । नादृश्यत तदा सूर्यो रजसा नाशितप्रभः ॥
utpatadbhiḥ patadbhiśca nipatadbhiśca vānaraiḥ | nādṛśyata tadā sūryo rajasā nāśitaprabhaḥ
उछलते, गिरते और कूदते वानरों से उड़ी धूल ने सूर्य की प्रभा ढक दी, और उस समय सूर्य दिखाई ही नहीं देता था।
श्लोक 28 (3.285.28)
शालिप्रसूनसदृशैः शिरीषकुसुमप्रभैः । तरुणादित्यसदृशैः शणगौरैश्च वानरैः ॥
śāliprasūnasadṛśaiḥ śirīṣakusumaprabhaiḥ | taruṇādityasadṛśaiḥ śaṇagauraiśca vānaraiḥ
धान के फूलों जैसे, शिरीष-पुष्प की आभा वाले, उगते सूर्य जैसे और सन के समान पीले-सफ़ेद वानरों से —
श्लोक 29 (3.285.29)
प्राकारं ददृशुस्ते तु समन्तात्कपिलीकृतम् । राक्षसा विस्मिता राजन्सस्त्रीवृद्धाः समन्ततः ॥
prākāraṃ dadṛśuste tu samantātkapilīkṛtam | rākṣasā vismitā rājansastrīvṛddhāḥ samantataḥ
हे राजन्, स्त्रियों और वृद्धों सहित राक्षसों ने देखा कि इन वानरों से परकोटा चारों ओर कपिल वर्ण का हो गया है, और वे चकित रह गए।
श्लोक 30 (3.285.30)
बिभिदुस्ते मणिस्तम्भान्कर्णाट्टशिखराणि च । भग्नोन्मथितशृङ्गाणि यन्त्राणि च विचिक्षिपुः ॥
bibhiduste maṇistambhānkarṇāṭṭaśikharāṇi ca | bhagnonmathitaśṛṅgāṇi yantrāṇi ca vicikṣipuḥ
वानरों ने मणिमय खम्भे और अटारियों के शिखर तोड़ डाले, और जिनके शिखर टूट-उखड़ गए थे ऐसे यन्त्रों को उठाकर फेंक दिया।
श्लोक 31 (3.285.31)
परिगृह्य शतघ्नीश्च सचक्राः सगुडोपलाः । चिक्षिपुर्भुजवेगेन लङ्कामध्ये महास्वनाः ॥
parigṛhya śataghnīśca sacakrāḥ saguḍopalāḥ | cikṣipurbhujavegena laṅkāmadhye mahāsvanāḥ
चक्रों, गोलों और पत्थरों सहित शतघ्नियों को उठाकर उन्होंने ऊँची गर्जना करते हुए भुजाओं के वेग से लंका के बीच फेंक दिया।
श्लोक 32 (3.285.32)
प्राकारस्थाश्च ये केचिन्निशाचरगणास्तथा । प्रदुद्रुवुस्ते शतशः कपिभिः समभिद्रुताः ॥
prākārasthāśca ye kecinniśācaragaṇāstathā | pradudruvuste śataśaḥ kapibhiḥ samabhidrutāḥ
परकोटे पर निशाचरों के जो भी दल खड़े थे, वे वानरों द्वारा खदेड़े जाकर सैकड़ों की संख्या में भाग खड़े हुए।
श्लोक 33 (3.285.33)
ततस्तु राजवचनाद्राक्षसाः कामरूपिणः । निर्ययुर्विकृताकाराः सहस्रशतसङ्घशः ॥
tatastu rājavacanādrākṣasāḥ kāmarūpiṇaḥ | niryayurvikṛtākārāḥ sahasraśatasaṅghaśaḥ
तब राजा की आज्ञा से इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, विकराल आकृति के राक्षस लाखों की टोलियों में बाहर निकले।
श्लोक 34 (3.285.34)
शस्त्रवर्षाणि वर्षन्तो द्रावयित्वा वनौकसः । प्राकारं शोभयन्तस्ते परं विस्मयमास्थिताः ॥
śastravarṣāṇi varṣanto drāvayitvā vanaukasaḥ | prākāraṃ śobhayantaste paraṃ vismayamāsthitāḥ
शस्त्रों की वर्षा करते हुए उन्होंने वनवासी वानरों को भगा दिया, और परकोटे को फिर से सुशोभित करते हुए वे अत्यन्त विस्मय से भर उठे।
श्लोक 35 (3.285.35)
स माषराशिसदृशैर्बभूव क्षणदाचरैः । कृतो निर्वानरो भूयः प्राकारो भीमदर्शनैः ॥
sa māṣarāśisadṛśairbabhūva kṣaṇadācaraiḥ | kṛto nirvānaro bhūyaḥ prākāro bhīmadarśanaiḥ
उड़द के ढेरों जैसे काले, भयानक दिखने वाले उन निशाचरों ने क्षण भर में परकोटे को फिर से वानरों से खाली कर दिया।
श्लोक 36 (3.285.36)
पेतुः शूलविभिन्नाङ्गा बहवो वानरर्षभाः । स्तम्भतोरणभग्नाश्च पेतुस्तत्र निशाचराः ॥
petuḥ śūlavibhinnāṅgā bahavo vānararṣabhāḥ | stambhatoraṇabhagnāśca petustatra niśācarāḥ
शूलों से अंग छिद जाने पर बहुत-से श्रेष्ठ वानर गिर पड़े, और खम्भों तथा तोरणों की मार से कुचलकर निशाचर भी वहाँ गिरे।
श्लोक 37 (3.285.37)
केशाकेश्यभवद्युद्धं रक्षसां वानरैः सह । नखैर्दन्तैश्च वीराणां खादतां वै परस्परम् ॥
keśākeśyabhavadyuddhaṃ rakṣasāṃ vānaraiḥ saha | nakhairdantaiśca vīrāṇāṃ khādatāṃ vai parasparam
राक्षसों और वानरों में एक-दूसरे के बाल पकड़कर युद्ध होने लगा; वे वीर नखों और दाँतों से एक-दूसरे को नोचने-काटने लगे।
श्लोक 38 (3.285.38)
निष्टनन्तो ह्युभयतस्तत्र वानरराक्षसाः । हता निपतिता भूमौ न मुञ्चन्ति परस्परम् ॥
niṣṭananto hyubhayatastatra vānararākṣasāḥ | hatā nipatitā bhūmau na muñcanti parasparam
दोनों ओर गर्जना करते वानर और राक्षस मरकर धरती पर गिर पड़ते, फिर भी एक-दूसरे को नहीं छोड़ते थे।
श्लोक 39 (3.285.39)
रामस्तु शरजालानि ववर्ष जलदो यथा । तानि लङ्कां समासाद्य जघ्नुस्तान्रजनीचरान् ॥
rāmastu śarajālāni vavarṣa jalado yathā | tāni laṅkāṃ samāsādya jaghnustānrajanīcarān
राम ने मेघ के समान बाणों के जाल बरसाए, और वे बाण लंका में पहुँचकर उन निशाचरों को मारने लगे।
श्लोक 40 (3.285.40)
सौमित्रिरपि नाराचैर्दृढधन्वा जितक्लमः । आदिश्यादिश्य दुर्गस्थान्पातयामास राक्षसान् ॥
saumitrirapi nārācairdṛḍhadhanvā jitaklamaḥ | ādiśyādiśya durgasthānpātayāmāsa rākṣasān
दृढ़ धनुष वाले, थकान को जीत चुके सुमित्रानन्दन ने भी दुर्ग में स्थित राक्षसों को एक-एक करके निशाना बनाया और नाराच बाणों से गिरा दिया।
श्लोक 41 (3.285.41)
ततः प्रत्यवहारोऽभूत्सैन्यानां राघवाज्ञया । कृते विमर्दे लङ्कायां लब्धलक्ष्यो जयोत्तरः ॥
tataḥ pratyavahāro'bhūtsainyānāṃ rāghavājñayā | kṛte vimarde laṅkāyāṃ labdhalakṣyo jayottaraḥ
लंका में यह विध्वंस हो जाने पर राघव की आज्ञा से सेनाएँ लौटा ली गईं; उनके प्रहार लक्ष्य पर लगे थे और विजय उन्हीं की थी।