आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 284
वानर-सेना का प्रस्थान और लंका का सेतु
सुग्रीव के बुलावे पर वानरों और रीछों के सरदार असंख्य सेनाओं के साथ राम के पास एकत्र होते हैं, और सेना दक्षिण की ओर बढ़कर समुद्र-तट पर पहुँचती है। छलाँग, नाव और बेड़ों के उपाय ठुकराकर राम समुद्र के सामने उपवास करते हुए लेट जाते हैं; समुद्र स्वप्न में प्रकट होकर सलाह देता है कि विश्वकर्मा का पुत्र वानर नल सेतु बनाए, जिसे वह थामे रखेगा। विभीषण राम की शरण में आते हैं और राक्षसों के राजा के रूप में अभिषिक्त होते हैं; सेना समुद्र पार करके लंका के उद्यान उजाड़ती है, पकड़े गए गुप्तचर शुक और सारण छोड़ दिए जाते हैं, और राम अङ्गद को दूत बनाकर रावण के पास भेजते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.284.1)
ततस्तत्रैवरामस्य समासीनस्य तैः सह । समाजग्मुः कपिश्रेष्ठाः सुग्रीववचनात्तदा ॥
tatastatraivarāmasya samāsīnasya taiḥ saha | samājagmuḥ kapiśreṣṭhāḥ sugrīvavacanāttadā
फिर जब राम उनके साथ वहीं बैठे थे, तब सुग्रीव की आज्ञा से श्रेष्ठ वानर वहाँ आ जुटे।
श्लोक 2 (3.284.2)
वृतः कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम् । श्वशुरो वालिनः श्रीमान्सुषेणो राममभ्ययात् ॥
vṛtaḥ koṭisahasreṇa vānarāṇāṃ tarasvinām | śvaśuro vālinaḥ śrīmānsuṣeṇo rāmamabhyayāt
वाली के श्वशुर तेजस्वी सुषेण हज़ार करोड़ वेगवान वानरों से घिरे हुए राम के पास आए।
श्लोक 3 (3.284.3)
कोटीशतवृतोवाऽपिगजो गवय एव च । वानरेन्द्रौ महावीर्यौ पृथक्पृथगदृश्यताम् ॥
koṭīśatavṛtovā'pigajo gavaya eva ca | vānarendrau mahāvīryau pṛthakpṛthagadṛśyatām
गज और गवय, ये दोनों महापराक्रमी वानर-सरदार भी, सौ-सौ करोड़ वानरों से घिरे हुए, अलग-अलग दिखाई दिए।
श्लोक 4 (3.284.4)
षष्टिकोटिसहस्राणि प्रकर्षन्प्रत्यदृश्यत । गोलाङ्गूलो महाराज गवाक्षो भीमदर्शनः ॥
ṣaṣṭikoṭisahasrāṇi prakarṣanpratyadṛśyata | golāṅgūlo mahārāja gavākṣo bhīmadarśanaḥ
हे महाराज, भयानक दिखने वाला गोलांगूल (लंगूर) गवाक्ष साठ हज़ार करोड़ वानरों को लेकर आता दिखाई दिया।
श्लोक 5 (3.284.5)
गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादनः । कोटीशतसहस्राणि हरीणां समकर्षत ॥
gandhamādanavāsī tu prathito gandhamādanaḥ | koṭīśatasahasrāṇi harīṇāṃ samakarṣata
गन्धमादन पर्वत पर रहने वाला विख्यात गन्धमादन सौ हज़ार करोड़ वानरों को लेकर आया।
श्लोक 6 (3.284.6)
पनसो नाम मेधावी वानरःसुमहाबलः । कोटीर्दश द्वादश च त्रिंशत्पञ्च प्रकर्षति ॥
panaso nāma medhāvī vānaraḥsumahābalaḥ | koṭīrdaśa dvādaśa ca triṃśatpañca prakarṣati
पनस नाम का बुद्धिमान और अत्यन्त बलवान वानर दस, बारह और पैंतीस करोड़ वानरों को लेकर आया।
श्लोक 7 (3.284.7)
श्रीमान्दधिमुखो नाम हरिवृद्धोऽतिवीर्यवान् । प्रचकर्ष महासैन्यं हरीणां भीमतेजसाम् ॥
śrīmāndadhimukho nāma harivṛddho'tivīryavān | pracakarṣa mahāsainyaṃ harīṇāṃ bhīmatejasām
वानरों में वृद्ध, अत्यन्त पराक्रमी, तेजस्वी दधिमुख भयानक तेज वाले वानरों की बड़ी सेना लेकर आया।
श्लोक 8 (3.284.8)
कृष्णानां मुखपुण्ड्राणामृक्षाणां भीमकर्मणाम् । कोटीशतसहस्रेण जाम्बवान्प्रत्यदृश्यत ॥
kṛṣṇānāṃ mukhapuṇḍrāṇāmṛkṣāṇāṃ bhīmakarmaṇām | koṭīśatasahasreṇa jāmbavānpratyadṛśyata
जाम्बवान् सौ हज़ार करोड़ काले, मुख पर तिलक-चिह्न वाले, भयानक कर्म करने वाले रीछों के साथ दिखाई दिए।
श्लोक 9 (3.284.9)
एते चान्ये च बहवो हरियूथपयूथपाः । असङ्ख्येया महाराज समीयू रामकारणात् ॥
ete cānye ca bahavo hariyūthapayūthapāḥ | asaṅkhyeyā mahārāja samīyū rāmakāraṇāt
हे महाराज, ये और दूसरे अनगिनत वानर-यूथपतियों के भी यूथपति राम के लिए एकत्र हुए।
श्लोक 10 (3.284.10)
गिरिकूटनिभाङ्गानां सिंहानामिव गर्जताम् । श्रूयते तुमुलः शब्दस्तत्रतत्रप्रधावताम् ॥
girikūṭanibhāṅgānāṃ siṃhānāmiva garjatām | śrūyate tumulaḥ śabdastatratatrapradhāvatām
पर्वत-शिखरों जैसे शरीर वाले, सिंहों की तरह गरजते और इधर-उधर दौड़ते उन वानरों का तुमुल कोलाहल सुनाई देता था।
श्लोक 11 (3.284.11)
गिरिकूटनिभाः केचित्केचिन्महिषसन्निभाः । शरदभ्रप्रतीकाशाः केचिद्धिङ्गुलकाननाः ॥
girikūṭanibhāḥ kecitkecinmahiṣasannibhāḥ | śaradabhrapratīkāśāḥ keciddhiṅgulakānanāḥ
कुछ पर्वत-शिखरों जैसे थे, कुछ भैंसों जैसे, कुछ शरद के बादलों जैसे, और कुछ के मुख ईंगुर जैसे लाल थे।
श्लोक 12 (3.284.12)
उत्पतन्तः पतन्तश्च प्लवमानाश्च वानराः । उद्धुन्वन्तोऽपरे रेणून्समाजग्मुः समन्ततः ॥
utpatantaḥ patantaśca plavamānāśca vānarāḥ | uddhunvanto'pare reṇūnsamājagmuḥ samantataḥ
उछलते, कूदते, छलाँगें भरते और कुछ धूल उड़ाते हुए वानर चारों ओर से आ जुटे।
श्लोक 13 (3.284.13)
सवानरमहासैन्यः पूर्णसागरसन्निभः । निवेशमकरोत्तत्रसुग्रीवानुमते तदा ॥
savānaramahāsainyaḥ pūrṇasāgarasannibhaḥ | niveśamakarottatrasugrīvānumate tadā
भरे हुए सागर जैसी उस विशाल वानर-सेना ने सुग्रीव की अनुमति से वहाँ पड़ाव डाला।
श्लोक 14 (3.284.14)
ततस्तेषु हरीन्द्रेषु समावृत्तेषु सर्वशः । तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते ॥
tatasteṣu harīndreṣu samāvṛtteṣu sarvaśaḥ | tithau praśaste nakṣatre muhūrte cābhipūjite
तब जब सब वानर-सरदार पूरी तरह एकत्र हो गए, तो शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र और प्रशस्त मुहूर्त में,
श्लोक 15 (3.284.15)
तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्वर्तयन्निव । प्रययौ राघवः श्रीमान्सुग्रीवसहितस्तदा ॥
tena vyūḍhena sainyena lokānudvartayanniva | prayayau rāghavaḥ śrīmānsugrīvasahitastadā
तेजस्वी राघव सुग्रीव के साथ उस व्यूहबद्ध सेना को लेकर, मानो लोकों को उलट-पुलट करते हुए, चल पड़े।
श्लोक 16 (3.284.16)
मुखमासीत्तु सैन्यस्य हनूमान्मारुतात्मजः । जघनं पालयामास सौमित्रिरकुतोभयः ॥
mukhamāsīttu sainyasya hanūmānmārutātmajaḥ | jaghanaṃ pālayāmāsa saumitrirakutobhayaḥ
सेना के आगे पवनपुत्र हनुमान थे; पीछे की रक्षा निर्भय सौमित्र (लक्ष्मण) कर रहे थे।
श्लोक 17 (3.284.17)
बद्धगोधाङ्गुलित्राणौ राघवौ तत्रजग्मतुः । वृतौ हरिमहामात्रैश्चन्द्रसूर्यौ ग्रहैरिव ॥
baddhagodhāṅgulitrāṇau rāghavau tatrajagmatuḥ | vṛtau harimahāmātraiścandrasūryau grahairiva
गोह के चमड़े के अंगुलित्राण बाँधे दोनों राघव वानर-प्रधानों से घिरे हुए आगे बढ़े, जैसे ग्रहों से घिरे चन्द्रमा और सूर्य।
श्लोक 18 (3.284.18)
प्रबभौ हरिसैन्यं तत्सालतालशिलायुधम् । सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदयं प्रति ॥
prababhau harisainyaṃ tatsālatālaśilāyudham | sumahacchālibhavanaṃ yathā sūryodayaṃ prati
साल, ताड़ और शिलाओं को शस्त्र बनाए वह वानर-सेना सूर्योदय के समय पके धान के विशाल खेत की तरह चमक उठी।
श्लोक 19 (3.284.19)
नलनीलाङ्गदक्राथमैन्दद्विविदपालिता । ययौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धये ॥
nalanīlāṅgadakrāthamaindadvividapālitā | yayau sumahatī senā rāghavasyārthasiddhaye
नल, नील, अङ्गद, क्राथ, मैन्द और द्विविद द्वारा संरक्षित वह विशाल सेना राघव का प्रयोजन सिद्ध करने आगे बढ़ी।
श्लोक 20 (3.284.20)
विविधेषु प्रशस्तेषु बहुमूलफलेषु च । प्रभूतमधुमांसेषु वारिमत्सु शिवेषु च ॥
vividheṣu praśasteṣu bahumūlaphaleṣu ca | prabhūtamadhumāṃseṣu vārimatsu śiveṣu ca
अनेक प्रकार के उत्तम स्थानों में, जहाँ कन्द-मूल और फल बहुत थे, मधु और मांस भरपूर था, जल था और सुख था,
श्लोक 21 (3.284.21)
निवसन्ती निराबाधा तथैवगिरिसानुषु । उपायाद्धरिसेना सा क्षारोदमथ सागरम् ॥
nivasantī nirābādhā tathaivagirisānuṣu | upāyāddharisenā sā kṣārodamatha sāgaram
और इसी प्रकार पर्वतों की ढलानों पर भी बिना बाधा ठहरती हुई वह वानर-सेना अन्त में खारे जल वाले समुद्र तक पहुँची।
श्लोक 22 (3.284.22)
द्वितीयसागरनिभं तद्बलंबहुलध्वजम् । वेलावनं समासाद्य निवासमकरोत्तदा ॥
dvitīyasāgaranibhaṃ tadbalaṃbahuladhvajam | velāvanaṃ samāsādya nivāsamakarottadā
दूसरे सागर जैसी, अनेक ध्वजाओं वाली वह सेना तट के वन में पहुँचकर ठहर गई।
श्लोक 23 (3.284.23)
ततो दाशरथिः श्रीमान्सुग्रीवं प्रत्यभाषत । मध्ये वानरमुख्यानां प्राप्तकालमिदं वचः ॥
tato dāśarathiḥ śrīmānsugrīvaṃ pratyabhāṣata | madhye vānaramukhyānāṃ prāptakālamidaṃ vacaḥ
तब तेजस्वी दाशरथि राम ने प्रमुख वानरों के बीच सुग्रीव से यह समयोचित बात कही—
राम उवाच
श्लोक 24 (3.284.24)
उपायः कोनु भवतां मतः सागरलङ्घने । इयं हि महती सेना सागरश्चातिदुस्तरः ॥
upāyaḥ konu bhavatāṃ mataḥ sāgaralaṅghane | iyaṃ hi mahatī senā sāgaraścātidustaraḥ
"आप लोगों के विचार में समुद्र को पार करने का क्या उपाय है? यह सेना बहुत बड़ी है और समुद्र अत्यन्त दुस्तर है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 25 (3.284.25)
तत्रान्ये व्याहरन्ति स्म वानराः पटुमानिनः । समर्था लङ्घने सिन्धोर्न तत्कृत्स्नस्य वानराः ॥
tatrānye vyāharanti sma vānarāḥ paṭumāninaḥ | samarthā laṅghane sindhorna tatkṛtsnasya vānarāḥ
तब अपने को चतुर मानने वाले कुछ दूसरे वानर बोले कि वानर समुद्र लाँघने में समर्थ हैं, पर पूरी सेना का लाँघना सम्भव नहीं।
श्लोक 26 (3.284.26)
केचिन्नौभिर्व्यवस्यन्ति केचिच्च विविधैः प्लवैः । नेति रामस्तु तान्सर्वान्सान्त्वयन्प्रत्यभाषत ॥
kecinnaubhirvyavasyanti kecicca vividhaiḥ plavaiḥ | neti rāmastu tānsarvānsāntvayanpratyabhāṣata
कुछ ने नावों का, कुछ ने तरह-तरह के बेड़ों का उपाय सुझाया। पर राम ने उन सबको शान्त करते हुए "नहीं" कहा और बोले—
राम उवाच
श्लोक 27 (3.284.27)
शतयोजनविस्तारं न शक्ताः सर्ववानराः । क्रान्तुं तोयनिधिं वीरानैषा वो नैष्ठिकी मतिः ॥
śatayojanavistāraṃ na śaktāḥ sarvavānarāḥ | krāntuṃ toyanidhiṃ vīrānaiṣā vo naiṣṭhikī matiḥ
"हे वीरो, सब वानर सौ योजन चौड़े समुद्र को पार नहीं कर सकते; यह आपका अन्तिम निश्चय नहीं हो सकता।
श्लोक 28 (3.284.28)
नावो न सन्ति सेनाया बह्व्यस्तारयितुं तथा । वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत् ॥
nāvo na santi senāyā bahvyastārayituṃ tathā | vaṇijāmupaghātaṃ ca kathamasmadvidhaścaret
सेना को पार ले जाने लायक बहुत-सी नावें भी नहीं हैं; और मेरे जैसा व्यक्ति व्यापारियों की हानि कैसे करे?
श्लोक 29 (3.284.29)
विस्तीर्णं चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेण वै परः । प्लवोडुपप्रतारश्चनैवात्रमम रोचते ॥
vistīrṇaṃ caiva naḥ sainyaṃ hanyācchidreṇa vai paraḥ | plavoḍupapratāraścanaivātramama rocate
हमारी सेना भी दूर तक फैली है; शत्रु किसी दुर्बल स्थान से उस पर प्रहार कर सकता है। बेड़ों और छोटी नौकाओं से पार जाना भी मुझे ठीक नहीं लगता।
श्लोक 30 (3.284.30)
अहं त्विमं जलनिधिं समारप्स्याम्युपायतः । प्रतिशेष्याम्युपवसन्दर्शयिष्यति मां ततः ॥
ahaṃ tvimaṃ jalanidhiṃ samārapsyāmyupāyataḥ | pratiśeṣyāmyupavasandarśayiṣyati māṃ tataḥ
बल्कि मैं उचित उपाय से इस समुद्र की आराधना करूँगा; उपवास करते हुए इसके सामने लेटूँगा, तब यह मुझे दर्शन देगा।
श्लोक 31 (3.284.31)
न चेद्दर्शयिता मार्गं धक्ष्याम्येनमहं ततः । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलैः ॥
na ceddarśayitā mārgaṃ dhakṣyāmyenamahaṃ tataḥ | mahāstrairapratihatairatyagnipavanojjvalaiḥ
यदि यह मार्ग नहीं दिखाएगा, तो मैं अग्नि और वायु से भी अधिक प्रज्वलित, अमोघ महास्त्रों से इसे जला डालूँगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 32 (3.284.32)
इत्युक्त्वा सहसौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघवः । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत्कुशसंस्तरे ॥
ityuktvā sahasaumitrirupaspṛśyātha rāghavaḥ | pratiśiśye jalanidhiṃ vidhivatkuśasaṃstare
यह कहकर लक्ष्मण सहित राघव ने आचमन किया और फिर विधिपूर्वक कुश के बिछौने पर समुद्र के सामने लेट गए।
श्लोक 33 (3.284.33)
सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शयामास राघवम् । देवो नदनदीभर्ता श्रीमान्यादोगणैर्वृतः ॥
sāgarastu tataḥ svapne darśayāmāsa rāghavam | devo nadanadībhartā śrīmānyādogaṇairvṛtaḥ
तब समुद्र ने स्वप्न में राघव को दर्शन दिए: नदों और नदियों के स्वामी, तेजस्वी देवता, जल-जन्तुओं के समूहों से घिरे हुए।
श्लोक 34 (3.284.34)
कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वचः । इदमित्याह रत्नानामाकरैः शतशो वृतः ॥
kausalyāmātarityevamābhāṣya madhuraṃ vacaḥ | idamityāha ratnānāmākaraiḥ śataśo vṛtaḥ
सैकड़ों रत्न-खानों से घिरे उन्होंने "हे कौसल्यानन्दन" कहकर मधुर वाणी में सम्बोधित किया और यह कहा—
श्लोक 35 (3.284.35)
ब्रूहि किं तेकरोम्यत्रसाहाय्यं पुरुषर्षभ । ऐक्ष्वाको ह्यस्मि ते ज्ञाती राम सत्यपराक्रमः । एवमुक्तः समुद्रेण रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥
brūhi kiṃ tekaromyatrasāhāyyaṃ puruṣarṣabha | aikṣvāko hyasmi te jñātī rāma satyaparākramaḥ | evamuktaḥ samudreṇa rāmo vākyamathābravīt
"हे पुरुषश्रेष्ठ, बताइए, मैं यहाँ आपकी क्या सहायता करूँ? हे सत्यपराक्रमी राम, मैं इक्ष्वाकुवंश से जुड़ा आपका सम्बन्धी हूँ।" समुद्र के ऐसा कहने पर राम ने यह वचन कहा—
राम उवाच
श्लोक 36 (3.284.36)
मार्गमिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते । येन गत्वादशग्रीवं हन्याम कुलपांसनम् । राक्षसंसानुबन्धं तं मम भार्यापहारिणम् ॥
mārgamicchāmi sainyasya dattaṃ nadanadīpate | yena gatvādaśagrīvaṃ hanyāma kulapāṃsanam | rākṣasaṃsānubandhaṃ taṃ mama bhāryāpahāriṇam
"हे नदों और नदियों के स्वामी, मैं चाहता हूँ कि मेरी सेना को मार्ग दिया जाए, जिससे हम जाकर अपने कुल के कलंक दशग्रीव को, मेरी पत्नी का हरण करने वाले उस राक्षस को, उसके बन्धु-बान्धवों सहित मार सकें।
श्लोक 37 (3.284.37)
यद्येवं याचतो मार्गं न प्रदास्यति मे भवान् । शरैस्त्वां शोषयिष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥
yadyevaṃ yācato mārgaṃ na pradāsyati me bhavān | śaraistvāṃ śoṣayiṣyāmi divyāstrapratimantritaiḥ
यदि इस प्रकार माँगने पर भी आप मुझे मार्ग नहीं देंगे, तो मैं दिव्यास्त्रों से अभिमन्त्रित बाणों से आपको सुखा दूँगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 38 (3.284.38)
इत्येवंब्रुवतः श्रुत्वारामस्य वरुणालयः । उवाचव्यथितोवाक्यमितिबद्धाञ्जलिःस्थितः ॥
ityevaṃbruvataḥ śrutvārāmasya varuṇālayaḥ | uvācavyathitovākyamitibaddhāñjaliḥsthitaḥ
राम को ऐसा कहते सुनकर वरुणालय समुद्र व्यथित होकर हाथ जोड़े खड़ा हो गया और यह वचन बोला—
सागर उवाच
श्लोक 39 (3.284.39)
नेच्छामि प्रतिघातं ते नास्मि विघ्नकरस्तव । शृणु चेदं वचोराम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर ॥
necchāmi pratighātaṃ te nāsmi vighnakarastava | śṛṇu cedaṃ vacorāma śrutvā kartavyamācara
"मैं आपका विरोध नहीं करना चाहता, न मैं आपके मार्ग में बाधा डालने वाला हूँ। पर हे राम, यह बात सुनिए, और सुनकर जो उचित हो वह कीजिए।
श्लोक 40 (3.284.40)
यदि दास्यामि ते मार्गं सैन्यस्य व्रजतोऽऽज्ञया । अन्येऽप्याज्ञापयिष्यन्ति मामेवं धनुषोबलात् ॥
yadi dāsyāmi te mārgaṃ sainyasya vrajato''jñayā | anye'pyājñāpayiṣyanti māmevaṃ dhanuṣobalāt
यदि आपकी आज्ञा से मैं आपकी जाती हुई सेना को मार्ग दे दूँ, तो दूसरे भी धनुष के बल पर मुझे इसी प्रकार आज्ञा देने लगेंगे।
श्लोक 41 (3.284.41)
अस्तित्वत्रनलो नाम वानरः शिल्पिसंमतः । त्वष्टुः काकुत्स्थ तनयो बलवान्विश्वकर्मणः ॥
astitvatranalo nāma vānaraḥ śilpisaṃmataḥ | tvaṣṭuḥ kākutstha tanayo balavānviśvakarmaṇaḥ
किन्तु हे काकुत्स्थ, यहाँ नल नाम का एक वानर है, जो शिल्पियों में आदरणीय और त्वष्टा विश्वकर्मा का बलवान पुत्र है।
श्लोक 42 (3.284.42)
स यत्काष्ठं तृणं वाऽपिशिलां वा क्षेप्स्यते मयि । सर्वं तद्धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति ॥
sa yatkāṣṭhaṃ tṛṇaṃ vā'piśilāṃ vā kṣepsyate mayi | sarvaṃ taddhārayiṣyāmi sa te seturbhaviṣyati
वह मुझमें जो भी लकड़ी, तिनका या शिला डालेगा, मैं उस सबको थामे रखूँगा; वही आपका सेतु बन जाएगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 43 (3.284.43)
इत्युक्त्वाऽन्तर्हिते तस्मिन्रामो नलमुवाच ह । कुरु सेतुं समुद्रे त्वंशक्तो ह्यसि मतो मम ॥
ityuktvā'ntarhite tasminrāmo nalamuvāca ha | kuru setuṃ samudre tvaṃśakto hyasi mato mama
यह कहकर समुद्र के अन्तर्धान हो जाने पर राम ने नल से कहा: "तुम समुद्र पर सेतु बनाओ; मेरे विचार में तुम इसमें समर्थ हो।"
श्लोक 44 (3.284.44)
तेनोपायेन काकुत्स्थः सेतुबन्धमकारयत् । दशयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ॥
tenopāyena kākutsthaḥ setubandhamakārayat | daśayojanavistāramāyataṃ śatayojanam
उसी उपाय से काकुत्स्थ राम ने दस योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा सेतु बँधवाया।
श्लोक 45 (3.284.45)
नलसेतुरिति ख्यातो योऽद्यापि प्रथितो भुवि । रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य धार्यते गिरिसंनिभः ॥
nalaseturiti khyāto yo'dyāpi prathito bhuvi | rāmasyājñāṃ puraskṛtya dhāryate girisaṃnibhaḥ
वह "नलसेतु" के नाम से विख्यात है और आज भी पृथ्वी पर प्रसिद्ध है; राम की आज्ञा का मान रखते हुए पर्वत जैसा वह सेतु आज भी थामा हुआ है।
श्लोक 46 (3.284.46)
तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद्विभीषणः । भ्राता वै राक्षसेन्द्रस्य चतुर्भिः सचिवैः सह ॥
tatrasthaṃ sa tu dharmātmā samāgacchadvibhīṣaṇaḥ | bhrātā vai rākṣasendrasya caturbhiḥ sacivaiḥ saha
जब राम वहाँ ठहरे थे, तब राक्षसराज के भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ उनके पास आए।
श्लोक 47 (3.284.47)
प्रतिजग्राह रामस्तं स्वागतेन महामनाः । सुग्रीवस्य तु शङ्काऽभूत्प्रणिधिः स्यादिति स्मह ॥
pratijagrāha rāmastaṃ svāgatena mahāmanāḥ | sugrīvasya tu śaṅkā'bhūtpraṇidhiḥ syāditi smaha
उदार-हृदय राम ने स्वागत करके उन्हें अपनाया; पर सुग्रीव को सन्देह हुआ कि कहीं वे गुप्तचर न हों।
श्लोक 48 (3.284.48)
राघवः सत्यचेष्टाभिः सम्यक्च चरितेङ्गितैः । यदा तत्त्वेन तुष्टोऽभूत्तत एनमपूजयत् ॥
rāghavaḥ satyaceṣṭābhiḥ samyakca cariteṅgitaiḥ | yadā tattvena tuṣṭo'bhūttata enamapūjayat
जब राघव उनके सच्चे आचरण, व्यवहार और भाव-भंगिमाओं को भली-भाँति परखकर वास्तव में सन्तुष्ट हो गए, तब उन्होंने उनका सम्मान किया।
श्लोक 49 (3.284.49)
सर्वराक्षसराज्येचाप्यभ्यषिञ्चद्विभीषणम् । चक्रे च मन्त्रसचिवं सुहृदंलक्ष्मणस्य च ॥
sarvarākṣasarājyecāpyabhyaṣiñcadvibhīṣaṇam | cakre ca mantrasacivaṃ suhṛdaṃlakṣmaṇasya ca
उन्होंने विभीषण का समस्त राक्षसों के राज्य पर अभिषेक कर दिया, और उन्हें अपना मन्त्री तथा लक्ष्मण का मित्र बनाया।
श्लोक 50 (3.284.50)
विभीषणमते चैव सोऽत्यक्रामन्महार्णवम् । ससैन्यः सेतुना तेन मार्गेणैव नराधिपः ॥
vibhīṣaṇamate caiva so'tyakrāmanmahārṇavam | sasainyaḥ setunā tena mārgeṇaiva narādhipaḥ
और विभीषण की सलाह से नरनाथ राम ने सेना सहित उसी सेतु के मार्ग से महासागर को पार किया।
श्लोक 51 (3.284.51)
ततो गत्वासमासाद्य लङ्कोद्यानान्यनेकशः । भेदयामास कपिभिर्महान्ति च बहूनि च ॥
tato gatvāsamāsādya laṅkodyānānyanekaśaḥ | bhedayāmāsa kapibhirmahānti ca bahūni ca
फिर आगे बढ़कर लंका के अनेक उद्यानों तक पहुँचकर उन्होंने वानरों से उन बड़े-बड़े और बहुत-से उद्यानों को उजड़वा दिया।
श्लोक 52 (3.284.52)
तत्रास्तां रावणामात्यौ राक्षसौ शुकसारणौ । चरौ वानररूपेण तौ जग्राह विभीषणः ॥
tatrāstāṃ rāvaṇāmātyau rākṣasau śukasāraṇau | carau vānararūpeṇa tau jagrāha vibhīṣaṇaḥ
वहाँ रावण के दो मन्त्री, शुक और सारण नाम के राक्षस, वानरों का रूप धरकर गुप्तचरी कर रहे थे; विभीषण ने उन्हें पकड़ लिया।
श्लोक 53 (3.284.53)
प्रतिपन्नौ यदा रूपं राक्षसं तौ निशाचरौ । दर्शयित्वा ततः सैन्यं रामः पश्चादवासृजत् ॥
pratipannau yadā rūpaṃ rākṣasaṃ tau niśācarau | darśayitvā tataḥ sainyaṃ rāmaḥ paścādavāsṛjat
जब उन दोनों निशाचरों ने फिर से अपना राक्षस-रूप धारण कर लिया, तब राम ने उन्हें सेना दिखाकर छोड़ दिया।
श्लोक 54 (3.284.54)
निवेश्योपवने सैन्यं स शूरः प्राज्यवानरम् । प्रेषयामास दौत्येन रावणस्य ततोऽङ्गदम् ॥
niveśyopavane sainyaṃ sa śūraḥ prājyavānaram | preṣayāmāsa dautyena rāvaṇasya tato'ṅgadam
वानरों से भरी अपनी सेना को उपवन में ठहराकर उस वीर ने फिर अङ्गद को दूत बनाकर रावण के पास भेजा।