Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 283

हनुमान द्वारा सीता का समाचार

मार्कण्डेय राम की कथा आगे सुनाते हैं। शरद ऋतु आने पर राम लक्ष्मण को सुग्रीव को फटकारने किष्किन्धा भेजते हैं; सुग्रीव बताते हैं कि खोजी दल पहले ही भेजे जा चुके हैं और एक मास में लौटेंगे। तीन दिशाओं के दल खाली हाथ लौटते हैं, पर हनुमान और अङ्गद के नेतृत्व वाला दक्षिणी दल देर से लौटकर मधुवन में भोग करता है। हनुमान राम को मय दैत्य की गुफा, लंका का पता बताने वाले गिद्ध सम्पाति, अपनी समुद्र-छलाँग, सीता से भेंट, उनकी दी हुई मणि, कौए वाली पहचान की कथा और लंका-दहन का वृत्तान्त सुनाते हैं।

अध्याय 282अध्याय-सूचीअध्याय 284

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.283.1)

राघवः सहसौमित्रिः सुग्रीवेणाभिपालितः । वसन्माल्यवतः पृष्ठे ददर्श विमलं नभः ॥

rāghavaḥ sahasaumitriḥ sugrīveṇābhipālitaḥ | vasanmālyavataḥ pṛṣṭhe dadarśa vimalaṃ nabhaḥ

लक्ष्मण के साथ, सुग्रीव के संरक्षण में माल्यवान् पर्वत की ढलान पर रहते हुए राघव ने एक दिन आकाश को निर्मल हुआ देखा।

श्लोक 2 (3.283.2)

सदृष्ट्वाविमले व्योम्नि निर्मलं शशलक्षणम् । ग्रहनक्षत्रताराभिरनुयान्तममित्रहा ॥

sadṛṣṭvāvimale vyomni nirmalaṃ śaśalakṣaṇam | grahanakṣatratārābhiranuyāntamamitrahā

शत्रुओं का नाश करने वाले राम ने उस निर्मल आकाश में ग्रहों, नक्षत्रों और तारों के साथ चलते हुए, शश-चिह्न वाले निर्मल चन्द्रमा को देखा।

श्लोक 3 (3.283.3)

कुमुदोत्पलपद्मानां गन्धमादाय वायुना । महीधरस्थः शीतेन सहसाप्रतिबोधितः ॥

kumudotpalapadmānāṃ gandhamādāya vāyunā | mahīdharasthaḥ śītena sahasāpratibodhitaḥ

पर्वत पर ठहरे हुए राम को कुमुद, नीलकमल और कमलों की सुगन्ध लिए आती शीतल वायु ने सहसा जगा दिया।

श्लोक 4 (3.283.4)

प्रभाते लक्ष्मणं वीरमभ्यभाषत दुर्मनाः । सीतां संस्मृत्य धर्मात्मा रुद्धां राक्षसवेश्मनि ॥

prabhāte lakṣmaṇaṃ vīramabhyabhāṣata durmanāḥ | sītāṃ saṃsmṛtya dharmātmā ruddhāṃ rākṣasaveśmani

प्रभात होने पर राक्षस के घर में बन्दी सीता का स्मरण करके उदास धर्मात्मा राम ने वीर लक्ष्मण से कहा—

राम उवाच

श्लोक 5 (3.283.5)

गच्छ लक्ष्मण जानीहि किष्किंधायां कपीश्वरम् । प्रमत्तं ग्राम्यधर्मेषु कृतघ्नं स्वार्थपण्डितम् ॥

gaccha lakṣmaṇa jānīhi kiṣkiṃdhāyāṃ kapīśvaram | pramattaṃ grāmyadharmeṣu kṛtaghnaṃ svārthapaṇḍitam

"लक्ष्मण, जाओ और किष्किन्धा में उस वानरराज की सुध लो, जो विषय-भोगों में प्रमत्त है, कृतघ्न है और केवल अपना स्वार्थ साधने में चतुर है;

श्लोक 6 (3.283.6)

योऽसौ कुलाधमो मूढो मया राज्येऽभिषेचितः । सर्ववानरगोपुच्छा यमृक्षाश्च भजन्ति वै ॥

yo'sau kulādhamo mūḍho mayā rājye'bhiṣecitaḥ | sarvavānaragopucchā yamṛkṣāśca bhajanti vai

वह अपने कुल का अधम, मूर्ख, जिसका मैंने राज्य पर अभिषेक किया और जिसकी सेवा सब वानर, गोपुच्छ (लंगूर) और रीछ करते हैं;

श्लोक 7 (3.283.7)

यदर्थं निहतो बाली मया रघुकुलोद्वह । त्वया सहमहाबाहो किष्किन्धोपवने तदा ॥

yadarthaṃ nihato bālī mayā raghukulodvaha | tvayā sahamahābāho kiṣkindhopavane tadā

हे रघुकुल को आनन्द देने वाले महाबाहु, जिसके लिए मैंने तब तुम्हारे साथ किष्किन्धा के उपवन में वाली का वध किया था।

श्लोक 8 (3.283.8)

कृतघ्नं तमहं मन्ये वानरापशदं भुवि । यो मामेवंगतो मूढो न जानीतेऽद्य लक्ष्मण ॥

kṛtaghnaṃ tamahaṃ manye vānarāpaśadaṃ bhuvi | yo māmevaṃgato mūḍho na jānīte'dya lakṣmaṇa

लक्ष्मण, मैं उसे पृथ्वी पर सबसे कृतघ्न और नीच वानर मानता हूँ, जो मूर्ख आज मुझे इस दशा में पड़ा देखकर भी मेरी सुध नहीं लेता।

श्लोक 9 (3.283.9)

असौ मन्ये न जानीते समयप्रतिपालनम् । कृतोपकारं मां नूनमवमत्याल्पया धिया ॥

asau manye na jānīte samayapratipālanam | kṛtopakāraṃ māṃ nūnamavamatyālpayā dhiyā

मुझे लगता है कि वह प्रतिज्ञा निभाना नहीं जानता; निश्चय ही अपनी तुच्छ बुद्धि से वह मुझ उपकारी का अनादर कर रहा है।

श्लोक 10 (3.283.10)

यदितावदनुद्युक्तः शेते कामसुखात्मकः । नेतव्यो वालिमार्गेण सर्वभूतगतिं त्वया ॥

yaditāvadanudyuktaḥ śete kāmasukhātmakaḥ | netavyo vālimārgeṇa sarvabhūtagatiṃ tvayā

यदि वह उद्यम छोड़कर काम-सुख में डूबा पड़ा है, तो तुम्हें उसे वाली के मार्ग से वहाँ पहुँचा देना है, जहाँ सब प्राणी जाते हैं।

श्लोक 11 (3.283.11)

अथापि घटतेऽस्माकमर्थे वानरपुङ्गवः । तमादायैव काकुत्स्थ त्वरावान्भव माचिरम् ॥

athāpi ghaṭate'smākamarthe vānarapuṅgavaḥ | tamādāyaiva kākutstha tvarāvānbhava māciram

किन्तु यदि वह वानरश्रेष्ठ हमारे काम में लगा है, तो हे काकुत्स्थ, उसे साथ लेकर ही आना। शीघ्रता करो, देर मत करो।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 12 (3.283.12)

इत्युक्तो लक्ष्मणो भ्रात्रा गुरुवाक्यहिते रतः । प्रतस्थे रुचिरं गृह्य समार्गणगुणं धनुः ॥

ityukto lakṣmaṇo bhrātrā guruvākyahite rataḥ | pratasthe ruciraṃ gṛhya samārgaṇaguṇaṃ dhanuḥ

भाई के ऐसा कहने पर बड़े भाई की आज्ञा और हित में लगे लक्ष्मण अपना सुन्दर धनुष, डोरी और बाणों सहित, उठाकर चल पड़े।

श्लोक 13 (3.283.13)

किष्किन्धाद्वारमासाद्यप्रविवेशानिवारितः । सक्रोध इतितं मत्वाराजा प्रत्युद्ययौ हरिः ॥

kiṣkindhādvāramāsādyapraviveśānivāritaḥ | sakrodha ititaṃ matvārājā pratyudyayau hariḥ

किष्किन्धा के द्वार पर पहुँचकर वे बिना रोक-टोक भीतर चले गए। "ये क्रुद्ध हैं" ऐसा सोचकर वानरराज उनकी अगवानी को निकले।

श्लोक 14 (3.283.14)

तं सदारोविनीतात्मा सुग्रीवः प्लवगाधिपः । पूजया प्रतिजग्राह प्रीयमाणस्तदर्हया ॥

taṃ sadārovinītātmā sugrīvaḥ plavagādhipaḥ | pūjayā pratijagrāha prīyamāṇastadarhayā

विनम्र स्वभाव वाले वानरराज सुग्रीव ने पत्नी के साथ आकर प्रसन्नता से उचित सत्कार करते हुए उनका स्वागत किया।

श्लोक 15 (3.283.15)

तमब्रवीद्रामवचः सौमित्रिरकुतोभयः । स तत्सर्वमशेषेण श्रुत्वा प्रह्वः कृताञ्जलिः ॥

tamabravīdrāmavacaḥ saumitrirakutobhayaḥ | sa tatsarvamaśeṣeṇa śrutvā prahvaḥ kṛtāñjaliḥ

किसी से न डरने वाले सौमित्र ने उसे राम का सन्देश सुनाया। वह सब पूरा सुनकर सुग्रीव विनत हुए और हाथ जोड़े,

श्लोक 16 (3.283.16)

सभृत्यदारो राजेन्द्रसुग्रीवो वानराधिपः । इदमाह वचः प्रीतो लक्ष्मणं नरकुञ्जरम् ॥

sabhṛtyadāro rājendrasugrīvo vānarādhipaḥ | idamāha vacaḥ prīto lakṣmaṇaṃ narakuñjaram

और हे राजेन्द्र, अपने सेवकों और पत्नियों के साथ वानरराज सुग्रीव ने प्रसन्न होकर नरश्रेष्ठ लक्ष्मण से यह कहा—

सुग्रीव उवाच

श्लोक 17 (3.283.17)

नास्मि लक्ष्मण दुर्मेधा नाकृतज्ञो न निर्घृणः । श्रूयतां यः प्रयत्नो मे सीतापर्येषणे कृतः ॥

nāsmi lakṣmaṇa durmedhā nākṛtajño na nirghṛṇaḥ | śrūyatāṃ yaḥ prayatno me sītāparyeṣaṇe kṛtaḥ

"लक्ष्मण, मैं न दुर्बुद्धि हूँ, न अकृतज्ञ और न निर्दय। सुनिए, सीता की खोज के लिए मैंने क्या प्रयत्न किया है।

श्लोक 18 (3.283.18)

दिशः प्रस्थापिताः सर्वेविनीता हरयो मया । सर्वेषां च कृतः कालो मासेऽभ्यागमने पुनः ॥

diśaḥ prasthāpitāḥ sarvevinītā harayo mayā | sarveṣāṃ ca kṛtaḥ kālo māse'bhyāgamane punaḥ

मैंने सुशिक्षित वानरों को सब दिशाओं में भेज दिया है और सबके लौटने के लिए एक मास का समय तय कर दिया है।

श्लोक 19 (3.283.19)

यैरियं सवना साद्रिः सपुरा सागराम्बरा । विचेतव्या मही वीर सग्रामनगराकरा ॥

yairiyaṃ savanā sādriḥ sapurā sāgarāmbarā | vicetavyā mahī vīra sagrāmanagarākarā

हे वीर, वे वनों, पर्वतों, नगरों, गाँवों, बस्तियों और खानों सहित, सागर को वस्त्र की तरह ओढ़े इस पूरी पृथ्वी को खोजेंगे।

श्लोक 20 (3.283.20)

स मासः पञ्चरात्रेण पूर्णो भवितुमर्हति । ततः श्रोष्यसि रामेण सहितः सुमहत्प्रियम् ॥

sa māsaḥ pañcarātreṇa pūrṇo bhavitumarhati | tataḥ śroṣyasi rāmeṇa sahitaḥ sumahatpriyam

वह मास पाँच रातों में पूरा हो जाएगा; तब आप राम के साथ अत्यन्त प्रिय समाचार सुनेंगे।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 21 (3.283.21)

इत्युक्तो लक्ष्मणस्तेन वानरेन्द्रेण धीमता । त्यक्त्वारोषमदीनात्मा सुग्रीवं प्रत्यपूजयत् ॥

ityukto lakṣmaṇastena vānarendreṇa dhīmatā | tyaktvāroṣamadīnātmā sugrīvaṃ pratyapūjayat

बुद्धिमान वानरराज के ऐसा कहने पर उदार-चित्त लक्ष्मण ने क्रोध छोड़ दिया और सुग्रीव का सम्मान किया।

श्लोक 22 (3.283.22)

सरामं सहसुग्रीवो माल्यवत्पृष्ठमास्थितम् । अभिगम्योदयं तस्य कार्यस्य प्रत्यवेदयत् ॥

sarāmaṃ sahasugrīvo mālyavatpṛṣṭhamāsthitam | abhigamyodayaṃ tasya kāryasya pratyavedayat

वे सुग्रीव को साथ लेकर माल्यवान् की ढलान पर ठहरे राम के पास गए और कार्य की प्रगति का समाचार दिया।

श्लोक 23 (3.283.23)

इत्येवंवानरेन्द्रास्ते समाजग्मुः सहस्रशः । दिशस्तिस्रो विचित्याथ न तु ये दक्षिणां गताः ॥

ityevaṃvānarendrāste samājagmuḥ sahasraśaḥ | diśastisro vicityātha na tu ye dakṣiṇāṃ gatāḥ

इस प्रकार वे वानर-सरदार तीन दिशाओं को खोजकर हज़ारों की संख्या में लौट आए; पर जो दक्षिण की ओर गए थे, वे नहीं लौटे।

श्लोक 24 (3.283.24)

आचख्युस्तत्र रामाय महीं सागरमेखलाम् । विचितां न तु वैदेह्या दर्शनं रावणस्य वा ॥

ācakhyustatra rāmāya mahīṃ sāgaramekhalām | vicitāṃ na tu vaidehyā darśanaṃ rāvaṇasya vā

उन्होंने वहाँ राम को बताया कि सागर से घिरी पृथ्वी खोज ली गई है, पर न वैदेही का कहीं पता चला, न रावण का।

श्लोक 25 (3.283.25)

गतास्तु दक्षिणामाशां ये वै वानरपुङ्गवाः । आशावांस्तेषु काकुत्स्थः प्राणानार्तोऽभ्यधारयत् ॥

gatāstu dakṣiṇāmāśāṃ ye vai vānarapuṅgavāḥ | āśāvāṃsteṣu kākutsthaḥ prāṇānārto'bhyadhārayat

परन्तु दक्षिण दिशा में गए श्रेष्ठ वानरों पर आशा लगाए हुए काकुत्स्थ राम दुःखी होते हुए भी प्राण धारण किए रहे।

श्लोक 26 (3.283.26)

द्विमासोपरमे काले व्यतीते प्लवगास्ततः । सुग्रीवमभिगम्येदं त्वरिता वाक्यमब्रुवन् ॥

dvimāsoparame kāle vyatīte plavagāstataḥ | sugrīvamabhigamyedaṃ tvaritā vākyamabruvan

दो मास का समय बीत जाने पर कुछ वानर शीघ्रता से सुग्रीव के पास आए और बोले—

वानरा ऊचुः

श्लोक 27 (3.283.27)

रक्षितंवालिना यत्तत्स्फीतं मधुवनं महत् । त्वया च प्लवगश्रेष्ठ तद्भुङ्क्ते पवनात्मजः ॥

rakṣitaṃvālinā yattatsphītaṃ madhuvanaṃ mahat | tvayā ca plavagaśreṣṭha tadbhuṅkte pavanātmajaḥ

"हे वानरश्रेष्ठ, जिस विशाल और समृद्ध मधुवन की रक्षा पहले वाली ने और फिर आपने की, उसका भोग पवनपुत्र हनुमान कर रहे हैं;

श्लोक 28 (3.283.28)

वालिपुत्रोऽङ्गदश्चैव ये चान्ये प्लवगर्षभाः । विचेतुं दक्षिणामाशां राजन्प्रस्थापितास्त्वया ॥

vāliputro'ṅgadaścaiva ye cānye plavagarṣabhāḥ | vicetuṃ dakṣiṇāmāśāṃ rājanprasthāpitāstvayā

साथ ही वालिपुत्र अङ्गद और वे दूसरे श्रेष्ठ वानर भी, जिन्हें हे राजन्, आपने दक्षिण दिशा खोजने भेजा था।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 29 (3.283.29)

तेषामपनयं श्रुत्वा मेने सकृतकृत्यताम् । कृतार्थानां हि भृत्यानामेतद्भवति चेष्टितम् ॥

teṣāmapanayaṃ śrutvā mene sakṛtakṛtyatām | kṛtārthānāṃ hi bhṛtyānāmetadbhavati ceṣṭitam

उनकी यह उच्छृङ्खलता सुनकर सुग्रीव समझ गए कि उन्होंने अपना कार्य पूरा कर लिया है; क्योंकि सफल हुए सेवक ऐसा ही आचरण करते हैं।

श्लोक 30 (3.283.30)

स तद्रामाय मेधावी शशंस प्लवगर्षभः । रामश्चाप्यनुमानेन मेने दृष्टां तु मैथिलीम् ॥

sa tadrāmāya medhāvī śaśaṃsa plavagarṣabhaḥ | rāmaścāpyanumānena mene dṛṣṭāṃ tu maithilīm

उस बुद्धिमान वानरश्रेष्ठ ने यह बात राम को बताई, और राम ने भी अनुमान से मान लिया कि मैथिली का पता मिल गया है।

श्लोक 31 (3.283.31)

हनुमत्प्रमुखाश्चापि विश्रान्तास्ते प्लवङ्गमाः । अभिजग्मुर्हरीन्द्रं तं रामलक्ष्मणसन्निधौ ॥

hanumatpramukhāścāpi viśrāntāste plavaṅgamāḥ | abhijagmurharīndraṃ taṃ rāmalakṣmaṇasannidhau

फिर हनुमान आदि वे वानर विश्राम करके राम और लक्ष्मण के सामने वानरराज के पास आए।

श्लोक 32 (3.283.32)

गतिं च मुखवर्णं च दृष्ट्वारामो हनूमतः । अगमत्प्रत्ययं भूयो दृष्टा सीतेति भारत ॥

gatiṃ ca mukhavarṇaṃ ca dṛṣṭvārāmo hanūmataḥ | agamatpratyayaṃ bhūyo dṛṣṭā sīteti bhārata

हे भारत, हनुमान की चाल और मुख का रंग देखकर राम को और भी पक्का विश्वास हो गया कि सीता मिल गई हैं।

श्लोक 33 (3.283.33)

हनूमत्प्रमुखास्ते तु वानराः पूर्णमानसाः । प्रणेमुर्विधिवद्रामं सुग्रीवं लक्ष्मणं तथा ॥

hanūmatpramukhāste tu vānarāḥ pūrṇamānasāḥ | praṇemurvidhivadrāmaṃ sugrīvaṃ lakṣmaṇaṃ tathā

प्रसन्न मन वाले हनुमान आदि वानरों ने विधिपूर्वक राम, सुग्रीव और लक्ष्मण को प्रणाम किया।

श्लोक 34 (3.283.34)

तानुवाचानतान्रामः प्रगृह्य सशरं धनुः । अपि मां जीवयिष्यध्वमपि वः कृतकृत्यता ॥

tānuvācānatānrāmaḥ pragṛhya saśaraṃ dhanuḥ | api māṃ jīvayiṣyadhvamapi vaḥ kṛtakṛtyatā

बाण चढ़ा धनुष उठाकर राम ने उन झुके हुए वानरों से कहा— "क्या तुम मुझे जीवन दोगे? क्या तुम्हारा कार्य सफल हुआ?

राम उवाच

श्लोक 35 (3.283.35)

अपि राज्यमयोध्यायां कारयिष्याम्यहं पुनः । निहत्यसमरे शत्रूनाहृत्यजनकात्मजाम् ॥

api rājyamayodhyāyāṃ kārayiṣyāmyahaṃ punaḥ | nihatyasamare śatrūnāhṛtyajanakātmajām

क्या मैं युद्ध में शत्रुओं को मारकर और जनकनन्दिनी को वापस लाकर फिर से अयोध्या में राज्य करूँगा?

श्लोक 36 (3.283.36)

अमोक्षयित्वावैदेहीमहत्वा च रणे रिपून् । हृतदारोऽवधूतश्चनाहं जीवितुमुत्सहे ॥

amokṣayitvāvaidehīmahatvā ca raṇe ripūn | hṛtadāro'vadhūtaścanāhaṃ jīvitumutsahe

वैदेही को छुड़ाए बिना और रण में शत्रुओं को मारे बिना, पत्नी के हरण और इस अपमान के साथ मैं जीना नहीं चाहता।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 37 (3.283.37)

इत्युक्तवचनं रामं प्रत्युवाचानिलात्मजः । प्रियमाख्यामि ते राम दृष्टा सा जानकी मया ॥

ityuktavacanaṃ rāmaṃ pratyuvācānilātmajaḥ | priyamākhyāmi te rāma dṛṣṭā sā jānakī mayā

ऐसा कहने वाले राम को पवनपुत्र ने उत्तर दिया— "हे राम, मैं आपको प्रिय समाचार सुनाता हूँ: मैंने जानकी को देख लिया है।

हनूमानुवाच

श्लोक 38 (3.283.38)

विचित्य दक्षिणामाशां सपर्वतवनाकराम् । श्रान्ताः काले व्यतीते स्म दृष्टवन्तो महागुहां ॥

vicitya dakṣiṇāmāśāṃ saparvatavanākarām | śrāntāḥ kāle vyatīte sma dṛṣṭavanto mahāguhāṃ

पर्वतों, वनों और खानों सहित दक्षिण दिशा को खोजते-खोजते हम थक गए थे, और जब नियत समय बीत गया तब हमें एक विशाल गुफा दिखाई दी।

श्लोक 39 (3.283.39)

प्रविशामो वयं तां तु बहुयोजनमायताम् । अन्धकारां सुविपिनां गहनां कीटसेविताम् ॥

praviśāmo vayaṃ tāṃ tu bahuyojanamāyatām | andhakārāṃ suvipināṃ gahanāṃ kīṭasevitām

हम उसके भीतर गए। वह कई योजन लम्बी, अन्धकार से भरी, घने वृक्षों वाली, गहरी और कीड़ों से भरी हुई थी।

श्लोक 40 (3.283.40)

गत्वा सुमहदध्वानमादित्यस्य प्रभां ततः । दृष्टवन्तः स्म तत्रैवभवनं दिव्यमन्तरा ॥

gatvā sumahadadhvānamādityasya prabhāṃ tataḥ | dṛṣṭavantaḥ sma tatraivabhavanaṃ divyamantarā

बहुत लम्बा मार्ग तय करने के बाद हमें सूर्य का प्रकाश दिखा, और वहीं भीतर हमने एक दिव्य भवन देखा।

श्लोक 41 (3.283.41)

मयस्य किल दैत्यस्य तदा सद्वेश्म राघव । तत्रप्रभावती नाम तपोऽतप्यत तापसी ॥

mayasya kila daityasya tadā sadveśma rāghava | tatraprabhāvatī nāma tapo'tapyata tāpasī

हे राघव, कहते हैं कि वह दैत्य मय का सुन्दर भवन था। वहाँ प्रभावती नाम की एक तपस्विनी तप कर रही थी।

श्लोक 42 (3.283.42)

तया दत्तानि भोज्यानिपानानिविविधानि च । भुक्त्वा लब्धबलाः सन्तस्तयोक्तेन पथा ततः ॥

tayā dattāni bhojyānipānānivividhāni ca | bhuktvā labdhabalāḥ santastayoktena pathā tataḥ

उसने हमें अनेक प्रकार के भोजन और पेय दिए। उन्हें खाकर, बल पाकर, हम उसके बताए मार्ग से आगे बढ़े।

श्लोक 43 (3.283.43)

निर्याय तस्मादुद्देशात्पश्यामो लवणाम्भसः । समीपे सह्यमलयौ दर्दुरं च महागिरिम् ॥

niryāya tasmāduddeśātpaśyāmo lavaṇāmbhasaḥ | samīpe sahyamalayau darduraṃ ca mahāgirim

उस प्रदेश से निकलकर हमने खारे समुद्र के पास सह्य और मलय पर्वत तथा महान पर्वत दर्दुर को देखा।

श्लोक 44 (3.283.44)

ततो मलयमारुह्य पश्यन्तो वरुणालयम् । विषण्णा व्यथिताः खिन्ना निराशा जीविते भृशम् ॥

tato malayamāruhya paśyanto varuṇālayam | viṣaṇṇā vyathitāḥ khinnā nirāśā jīvite bhṛśam

फिर मलय पर्वत पर चढ़कर वरुण के निवास समुद्र को देखते हुए हम उदास, व्यथित और थके हुए थे, जीवन से पूरी तरह निराश,

श्लोक 45 (3.283.45)

अनेकशतविस्तीर्णं योजनानां महोदधिम् । तिमिनक्रझषावासं चिन्तयन्तः सुदुःखिताः ॥

anekaśatavistīrṇaṃ yojanānāṃ mahodadhim | timinakrajhaṣāvāsaṃ cintayantaḥ suduḥkhitāḥ

और सैकड़ों योजन फैले, तिमि, मगरमच्छों और मछलियों के निवास उस महासागर के विषय में सोचते हुए अत्यन्त दुःखी थे।

श्लोक 46 (3.283.46)

तत्रानशनसंकल्पं कृत्वाऽऽसीना वयं तदा । ततः कथान्ते गृध्रस्य जटायोरभवत्कथा ॥

tatrānaśanasaṃkalpaṃ kṛtvā''sīnā vayaṃ tadā | tataḥ kathānte gṛdhrasya jaṭāyorabhavatkathā

वहाँ हम आमरण अनशन का संकल्प करके बैठ गए। फिर बातों-बातों में गिद्ध जटायु की चर्चा छिड़ गई।

श्लोक 47 (3.283.47)

ततः पर्वतशृङ्गाभं घोररूपं भयावहम् । पक्षिणं दृष्टवन्तः स्म वैनतेयमिवापरम् ॥

tataḥ parvataśṛṅgābhaṃ ghorarūpaṃ bhayāvaham | pakṣiṇaṃ dṛṣṭavantaḥ sma vainateyamivāparam

तभी हमने पर्वत-शिखर जैसा, भयंकर रूप वाला, डरावना एक पक्षी देखा, मानो दूसरा वैनतेय (गरुड़) हो।

श्लोक 48 (3.283.48)

सोऽस्मानतर्कयद्भोक्तुमथाभ्येत्य वचोऽब्रवीत् । भोः क एष मम भ्रातुर्जटायोः कुरुते कथाम् ॥

so'smānatarkayadbhoktumathābhyetya vaco'bravīt | bhoḥ ka eṣa mama bhrāturjaṭāyoḥ kurute kathām

वह हमें खाने की सोच रहा था; पर फिर पास आकर बोला— "अरे, यह कौन मेरे भाई जटायु की बात कर रहा है?

श्लोक 49 (3.283.49)

संपातिर्नाम तस्याहं ज्येष्ठो भ्राता खगाधिपः । अन्योन्यस्पर्धया रूढावावामादित्यसत्पदम् ॥

saṃpātirnāma tasyāhaṃ jyeṣṭho bhrātā khagādhipaḥ | anyonyaspardhayā rūḍhāvāvāmādityasatpadam

मैं उसका बड़ा भाई हूँ, सम्पाति नाम का पक्षिराज। आपस की होड़ में हम दोनों सूर्य के ऊँचे धाम तक उड़ गए थे।

श्लोक 50 (3.283.50)

ततो दग्धाविमौ पक्षौ न दग्धौ तु जटायुषः । तस्मान्मे चिरदृष्टः स भ्राता गृध्रपतिः प्रियः ॥

tato dagdhāvimau pakṣau na dagdhau tu jaṭāyuṣaḥ | tasmānme ciradṛṣṭaḥ sa bhrātā gṛdhrapatiḥ priyaḥ

तब मेरे ये पंख जल गए, पर जटायु के नहीं जले। इसी कारण मैंने अपने प्रिय भाई गिद्धराज को बहुत समय से नहीं देखा।

श्लोक 51 (3.283.51)

निर्दग्धपक्षः पतितो ह्यहमस्मिन्महागिरौ । द्रष्टुं वीरं न शक्नोमि भ्रातरं वै जटायुषम् ॥

nirdagdhapakṣaḥ patito hyahamasminmahāgirau | draṣṭuṃ vīraṃ na śaknomi bhrātaraṃ vai jaṭāyuṣam

पंख जल जाने से मैं इस महान पर्वत पर गिर पड़ा, और अपने वीर भाई जटायु को देखने नहीं जा सकता।"

श्लोक 52 (3.283.52)

तस्यैवं वदतोऽस्माभिर्हतो भ्राता निवेदितः । व्यसनं भवतश्चेदं संक्षेपाद्वै निवेदितम् ॥

tasyaivaṃ vadato'smābhirhato bhrātā niveditaḥ | vyasanaṃ bhavataścedaṃ saṃkṣepādvai niveditam

उसके ऐसा कहने पर हमने उसे बताया कि उसका भाई मारा जा चुका है, और संक्षेप में आपकी यह विपत्ति भी कह सुनाई।

श्लोक 53 (3.283.53)

स सम्पातिस्तदा राजञ्श्रुत्वासुमहदप्रियम् । विषण्णचेताः पप्रच्छ पुनरस्मानरिंदम ॥

sa sampātistadā rājañśrutvāsumahadapriyam | viṣaṇṇacetāḥ papraccha punarasmānariṃdama

हे राजन्, हे शत्रुदमन, यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर सम्पाति का मन उदास हो गया और उसने हमसे फिर पूछा—

श्लोक 54 (3.283.54)

कः सरामः कथं सीता जटायुश्च कथं हतः । इच्छामि सर्वमेवैतच्छ्रोतुं प्लवगसत्तमाः ॥

kaḥ sarāmaḥ kathaṃ sītā jaṭāyuśca kathaṃ hataḥ | icchāmi sarvamevaitacchrotuṃ plavagasattamāḥ

"यह राम कौन हैं? सीता का क्या हुआ, और जटायु कैसे मारा गया? हे श्रेष्ठ वानरो, मैं यह सब सुनना चाहता हूँ।"

श्लोक 55 (3.283.55)

तस्याहं सर्वमेवैतद्भवतो व्यसनागमम् । प्रायोपवेशने चैवहेतुं विस्तरशोऽब्रुवम् ॥

tasyāhaṃ sarvamevaitadbhavato vyasanāgamam | prāyopaveśane caivahetuṃ vistaraśo'bruvam

मैंने उसे विस्तार से सब कुछ बताया: आप पर यह विपत्ति कैसे आई, और हम आमरण अनशन क्यों कर रहे थे।

श्लोक 56 (3.283.56)

सोऽस्मानाश्वासयामास वाक्येनानेन पक्षिराट् । रावणो विदितो मह्यं लङ्का चास्य महापुरी ॥

so'smānāśvāsayāmāsa vākyenānena pakṣirāṭ | rāvaṇo vidito mahyaṃ laṅkā cāsya mahāpurī

पक्षिराज ने इन शब्दों से हमें ढाढ़स बँधाया: "रावण को मैं जानता हूँ, और उसकी महानगरी लंका को भी।

श्लोक 57 (3.283.57)

दृष्टापारे समुद्रस्य त्रिकूटगिरिकन्दरे । भवित्री तत्र वैदेही न मेऽस्त्यत्रविचारणा ॥

dṛṣṭāpāre samudrasya trikūṭagirikandare | bhavitrī tatra vaidehī na me'styatravicāraṇā

मैंने उसे समुद्र के उस पार त्रिकूट पर्वत की घाटी में देखा है। वैदेही वहीं होंगी, इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।"

श्लोक 58 (3.283.58)

इतितस्य वचः श्रुत्वा वयमुत्थाय सत्वराः । सागरक्रमणे मन्त्रं मन्त्रयामः परंतप ॥

ititasya vacaḥ śrutvā vayamutthāya satvarāḥ | sāgarakramaṇe mantraṃ mantrayāmaḥ paraṃtapa

हे परन्तप, उसकी बात सुनकर हम तुरन्त उठ खड़े हुए और समुद्र पार करने के विषय में आपस में मन्त्रणा करने लगे।

श्लोक 59 (3.283.59)

नाध्यवास्यद्यदा कश्चित्सागरस्य विलङ्घनम् । ततः पितरमाविश्य पुप्लुवेऽहंमहार्णवम् । शतयोजनविस्तीर्णं निहत्य जलराक्षसीम् ॥

nādhyavāsyadyadā kaścitsāgarasya vilaṅghanam | tataḥ pitaramāviśya pupluve'haṃmahārṇavam | śatayojanavistīrṇaṃ nihatya jalarākṣasīm

जब कोई भी समुद्र लाँघने का साहस न कर सका, तब मैंने अपने पिता वायु में प्रवेश करके, जल की एक राक्षसी को मारकर, सौ योजन चौड़े महासागर को लाँघ लिया।

श्लोक 60 (3.283.60)

तत्र सीता मया दृष्टा रावणान्तःपुरे सती । उपवासतपःशीला भर्तृदर्शनलालसा । जटिला मलदिग्धाङ्गी कृशा दीना तपस्विनी ॥

tatra sītā mayā dṛṣṭā rāvaṇāntaḥpure satī | upavāsatapaḥśīlā bhartṛdarśanalālasā | jaṭilā maladigdhāṅgī kṛśā dīnā tapasvinī

वहाँ रावण के अन्तःपुर में मैंने सती सीता को देखा। वे उपवास और तप में लगी थीं, पति के दर्शन को तरस रही थीं; उनके केश जटा बन गए थे, अंग मैल से सने थे, और वे दुबली, दीन और दुःखी थीं।

श्लोक 61 (3.283.61)

निमित्तैस्तामहं सीतामुपलभ्य पृथग्विधैः । उपसृत्याब्रवं चार्यामभिगम्य रहोगताम् ॥

nimittaistāmahaṃ sītāmupalabhya pṛthagvidhaiḥ | upasṛtyābravaṃ cāryāmabhigamya rahogatām

अनेक प्रकार के लक्षणों से उन्हें सीता पहचानकर, जब वे एकान्त में थीं तब मैं उन आर्या के पास गया और बोला—

श्लोक 62 (3.283.62)

सीते रामस्य दूतोऽहंवानरोमारुतात्मजः । त्वद्दर्शनमभिप्रेप्सुरिह प्राप्तो विहायसा ॥

sīte rāmasya dūto'haṃvānaromārutātmajaḥ | tvaddarśanamabhiprepsuriha prāpto vihāyasā

"सीते, मैं राम का दूत, पवनपुत्र वानर हूँ। आपके दर्शन की इच्छा से आकाश-मार्ग से यहाँ आया हूँ।

श्लोक 63 (3.283.63)

राजपुत्रौ कुशलिनौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । सर्वशाखामृगेन्द्रेण सुग्रीवेणाभिपालितौ ॥

rājaputrau kuśalinau bhrātarau rāmalakṣmaṇau | sarvaśākhāmṛgendreṇa sugrīveṇābhipālitau

दोनों राजकुमार भाई राम और लक्ष्मण कुशल से हैं, और समस्त वानरों के स्वामी सुग्रीव उनकी रक्षा कर रहे हैं।

श्लोक 64 (3.283.64)

कुशलंत्वाब्रवीद्रामःसीते सौमित्रिणा सह । सखिभावाच्च सुग्रीवः कुशलं त्वाऽनुपृच्छति ॥

kuśalaṃtvābravīdrāmaḥsīte saumitriṇā saha | sakhibhāvācca sugrīvaḥ kuśalaṃ tvā'nupṛcchati

सीते, लक्ष्मण सहित राम ने आपका कुशल पूछा है, और मित्रभाव से सुग्रीव भी आपका कुशल पूछते हैं।

श्लोक 65 (3.283.65)

क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सर्वशाखामृगैः सह । प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ॥

kṣiprameṣyati te bhartā sarvaśākhāmṛgaiḥ saha | pratyayaṃ kuru me devi vānaro'smi na rākṣasaḥ

आपके पति शीघ्र ही सब वानरों के साथ आएँगे। देवी, मुझ पर विश्वास कीजिए; मैं वानर हूँ, राक्षस नहीं।"

श्लोक 66 (3.283.66)

मुहूर्तमिवच ध्यात्वा सीता मां प्रत्युवाच ह । अवैमि त्वांहनूमन्तमविन्ध्यवचनादहम् ॥

muhūrtamivaca dhyātvā sītā māṃ pratyuvāca ha | avaimi tvāṃhanūmantamavindhyavacanādaham

सीता ने क्षण भर सोचकर मुझे उत्तर दिया: "अविन्ध्य के बताने से मैं जानती हूँ कि तुम हनुमान हो।

श्लोक 67 (3.283.67)

अविन्ध्यो हि महाबाहो राक्षसो वृद्धसंमतः । कथितस्तेन सुग्रीवस्त्वद्विधैः सचिवैर्वृतः ॥

avindhyo hi mahābāho rākṣaso vṛddhasaṃmataḥ | kathitastena sugrīvastvadvidhaiḥ sacivairvṛtaḥ

क्योंकि हे महाबाहु, अविन्ध्य वृद्धों का सम्मानित राक्षस है; उसी ने मुझे बताया था कि सुग्रीव तुम्हारे जैसे मन्त्रियों से घिरे हैं।"

श्लोक 68 (3.283.68)

गम्यतामिति चोक्त्वा मां सीता प्रादादिमं मणिम् । धारिता येन वैदेही कालमेतमनिन्दिता ॥

gamyatāmiti coktvā māṃ sītā prādādimaṃ maṇim | dhāritā yena vaidehī kālametamaninditā

"जाओ" कहकर सीता ने मुझे यह मणि दी, जिसके सहारे अनिन्दिता वैदेही ने अब तक अपने प्राण धारण किए हैं।

श्लोक 69 (3.283.69)

प्रत्ययार्थं कथां चेमां कथयामास जानकी । क्षिप्तामिषीकां काकाय चित्रकूटे महागिरौ ॥

pratyayārthaṃ kathāṃ cemāṃ kathayāmāsa jānakī | kṣiptāmiṣīkāṃ kākāya citrakūṭe mahāgirau

और विश्वास दिलाने के लिए जानकी ने यह कथा सुनाई: चित्रकूट महापर्वत पर उस कौए पर सींक का बाण चलाया गया था

श्लोक 70 (3.283.70)

भवता पुरुषव्याघ्र प्रत्यभिज्ञानकारणात् । एकाक्षिविकलः काकः सुदुष्टात्मा कृतश्चवै ॥

bhavatā puruṣavyāghra pratyabhijñānakāraṇāt | ekākṣivikalaḥ kākaḥ suduṣṭātmā kṛtaścavai

आपके द्वारा, हे पुरुषसिंह। यह कथा उन्होंने पहचान के प्रमाण के रूप में कही; और वह दुष्ट कौआ एक आँख से हीन कर दिया गया था।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 71 (3.283.71)

ग्राहयित्वाऽहमात्मानं ततो दग्ध्वाच तां पुरीम् । संप्राप्त इतितं रामः प्रियवादिनमार्चयत् ॥

grāhayitvā'hamātmānaṃ tato dagdhvāca tāṃ purīm | saṃprāpta ititaṃ rāmaḥ priyavādinamārcayat

"फिर मैंने अपने को पकड़वाया, और उस नगरी को जलाकर लौट आया हूँ।" यह प्रिय समाचार देने वाले हनुमान का राम ने सम्मान किया।

अध्याय 282अध्याय-सूचीअध्याय 284