आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 282
अशोकवाटिका में रावण का सीता को प्रलोभन
मार्कण्डेय बताते हैं कि सुसज्जित होकर भी भयंकर दिखने वाला रावण अशोकवाटिका में राक्षसियों के बीच रोती बैठी सीता के पास आता है। वह अपनी स्त्रियों, पिशाचों, राक्षसों और यक्षों की सेनाओं, विश्रवा मुनि का पुत्र होने और पाँचवाँ लोकपाल होने की डींग हाँकता है, और सीता से मन्दोदरी की भाँति अपनी रानी बनने को कहता है। बीच में तिनका रखकर सीता उसे धर्म का उल्लंघन करने वाला और अपने भाई कुबेर को लज्जित करने वाला कहकर फटकारती हैं; रावण कहता है कि वह उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें नहीं छुएगा, मनुष्य राम के प्रति उनकी निष्ठा का उपहास करता है और अन्तर्धान हो जाता है, और सीता त्रिजटा की देखरेख में वहीं रहती हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.282.1)
ततस्तां भर्तृशोकार्तां दीनां मलिनवाससम् । मणिशेषाभ्यलंकारां रुदतीं च पतिव्रताम् ॥
tatastāṃ bhartṛśokārtāṃ dīnāṃ malinavāsasam | maṇiśeṣābhyalaṃkārāṃ rudatīṃ ca pativratām
तब पति-शोक से पीड़ित, दीन, मैले वस्त्रों वाली, केवल मणियों को ही आभूषण के रूप में शेष रखे, रोती हुई उस पतिव्रता को —
श्लोक 2 (3.282.2)
राक्षसीभिरुपास्यन्तीं समासीनां शिलातले । रावणःकामबाणार्तो ददर्शोपससर्प च ॥
rākṣasībhirupāsyantīṃ samāsīnāṃ śilātale | rāvaṇaḥkāmabāṇārto dadarśopasasarpa ca
जो राक्षसियों से घिरी एक शिला पर बैठी थी, कामबाणों से पीड़ित रावण ने देखा और वह उसके पास गया।
श्लोक 3 (3.282.3)
देवदानवगन्धर्वयक्षकिंपुरुषैर्युधि । अजितोशोकवनिकां ययौ कन्दर्पपीडितः ॥
devadānavagandharvayakṣakiṃpuruṣairyudhi | ajitośokavanikāṃ yayau kandarpapīḍitaḥ
युद्ध में देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और किम्पुरुषों से भी कभी न जीता गया वह रावण कामदेव से पीड़ित होकर अशोकवाटिका में गया।
श्लोक 4 (3.282.4)
दिव्याम्बरधरः श्रीमान्सुमृष्टमणिकुण्डलः । विचित्रमाल्यमुकुटो वसन्त इव मूर्तिमान् ॥
divyāmbaradharaḥ śrīmānsumṛṣṭamaṇikuṇḍalaḥ | vicitramālyamukuṭo vasanta iva mūrtimān
दिव्य वस्त्र धारण किए, चमकते मणि-कुण्डलों तथा रंग-बिरंगी मालाओं और मुकुट से सजा वह श्रीमान् मानो साक्षात् मूर्तिमान वसन्त था।
श्लोक 5 (3.282.5)
न कल्पवृक्षसदृशोयत्नादपि विभूषितः । श्मशानचैत्यद्रुमवद्भूषितोऽपि भयंकरः ॥
na kalpavṛkṣasadṛśoyatnādapi vibhūṣitaḥ | śmaśānacaityadrumavadbhūṣito'pi bhayaṃkaraḥ
यत्नपूर्वक सजने पर भी वह कल्पवृक्ष जैसा नहीं था; सजा-धजा होकर भी वह श्मशान के चैत्य-वृक्ष की भाँति भयंकर लगता था।
श्लोक 6 (3.282.6)
स तस्यास्तनुमध्यायाः समीपे रजनीचरः । ददृशे रोहिणीमेत्य शनैश्चर इव ग्रहः ॥
sa tasyāstanumadhyāyāḥ samīpe rajanīcaraḥ | dadṛśe rohiṇīmetya śanaiścara iva grahaḥ
उस पतली कमर वाली के समीप वह निशाचर ऐसा दिखा जैसे रोहिणी के पास पहुँचा हुआ शनि ग्रह।
श्लोक 7 (3.282.7)
स तामामन्त्र्य सुश्रोणीं पुष्पकेतुशराहतः । इदमित्यब्रवीद्वाक्यं त्रस्तां रौहीमिवाबलाम् ॥
sa tāmāmantrya suśroṇīṃ puṣpaketuśarāhataḥ | idamityabravīdvākyaṃ trastāṃ rauhīmivābalām
पुष्पध्वज कामदेव के बाणों से आहत होकर उसने हरिणी-सी डरी हुई उस सुन्दर नितम्बों वाली अबला को सम्बोधित कर यह वचन कहा।
रावण उवाच
श्लोक 8 (3.282.8)
सीते पर्याप्तमेतावत्कृतोभर्तुरनुग्रहः । प्रसादं कुरु तन्वङ्गि क्रियतां परिकर्म ते ॥
sīte paryāptametāvatkṛtobharturanugrahaḥ | prasādaṃ kuru tanvaṅgi kriyatāṃ parikarma te
"सीते, बस, बहुत हुआ; तुमने अपने पति पर पर्याप्त कृपा कर ली। हे तन्वंगी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ; तुम्हारा शृंगार किया जाए।
श्लोक 9 (3.282.9)
भजस्वमां वरारोहे महार्हाभरणाम्बरा । भवमे सर्वनारीणामुत्तमा वरवर्णिनी ॥
bhajasvamāṃ varārohe mahārhābharaṇāmbarā | bhavame sarvanārīṇāmuttamā varavarṇinī
हे सुन्दरी, मुझे स्वीकार करो; बहुमूल्य आभूषण और वस्त्र धारण करके मेरी सब स्त्रियों में श्रेष्ठ, उत्तम वर्ण वाली बनो।
श्लोक 10 (3.282.10)
सन्ति मे देवकन्याश्च गन्धर्वाणां च योषितः । सन्ति दानवकन्याश्च दैत्यानां चापि योषितः । तासामद्यविशालाक्षि सर्वासां मे भवोत्तमा ॥
santi me devakanyāśca gandharvāṇāṃ ca yoṣitaḥ | santi dānavakanyāśca daityānāṃ cāpi yoṣitaḥ | tāsāmadyaviśālākṣi sarvāsāṃ me bhavottamā
मेरे पास देवकन्याएँ हैं और गन्धर्वों की स्त्रियाँ भी; दानवकन्याएँ हैं और दैत्यों की स्त्रियाँ भी। हे विशालाक्षी, आज तुम उन सबमें मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ बनो।
श्लोक 11 (3.282.11)
चतुर्दश पिशाचीनां कोट्यो मे वचने स्थिताः । द्विस्तावत्पुरुषादानां रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥
caturdaśa piśācīnāṃ koṭyo me vacane sthitāḥ | dvistāvatpuruṣādānāṃ rakṣasāṃ bhīmakarmaṇām
चौदह करोड़ पिशाचियाँ मेरी आज्ञा में रहती हैं, और उससे दुगुने भयंकर कर्म करने वाले नरभक्षी राक्षस।
श्लोक 12 (3.282.12)
ततो मे त्रिगुणा यक्षा ये मद्वचनकारिणः । केचिदेव धनाध्यक्षं भ्रातरं मे समाश्रिताः ॥
tato me triguṇā yakṣā ye madvacanakāriṇaḥ | kecideva dhanādhyakṣaṃ bhrātaraṃ me samāśritāḥ
उनसे तिगुने यक्ष मेरी आज्ञा का पालन करते हैं; केवल कुछ ही मेरे भाई धनाध्यक्ष कुबेर के आश्रित हैं।
श्लोक 13 (3.282.13)
गन्धर्वाप्सरसो भद्रे मामापानगतं सदा । उपतिष्ठन्ति वामोरु यथैव भ्रातरं मम ॥
gandharvāpsaraso bhadre māmāpānagataṃ sadā | upatiṣṭhanti vāmoru yathaiva bhrātaraṃ mama
हे भद्रे, हे सुन्दरी, जब मैं पानगोष्ठी में बैठता हूँ तो गन्धर्व और अप्सराएँ सदा मेरी वैसे ही सेवा करते हैं जैसे मेरे भाई की।
श्लोक 14 (3.282.14)
पुत्रोऽहमपि विप्रर्षेः साक्षाद्विश्रवसो मुनेः । पञ्चमो लोकपालानामिति मे प्रथितं यशः ॥
putro'hamapi viprarṣeḥ sākṣādviśravaso muneḥ | pañcamo lokapālānāmiti me prathitaṃ yaśaḥ
मैं भी ब्रह्मर्षि, साक्षात् मुनि विश्रवा का पुत्र हूँ; और लोकपालों में पाँचवाँ होने का मेरा यश प्रसिद्ध है।
श्लोक 15 (3.282.15)
दिव्यानि भक्ष्यभोज्यानि पानानि विविधानि च । यथैव त्रिदशेशस्यतथैव मम भामिनि ॥
divyāni bhakṣyabhojyāni pānāni vividhāni ca | yathaiva tridaśeśasyatathaiva mama bhāmini
हे भामिनी, जैसे देवराज इन्द्र के पास दिव्य भक्ष्य-भोज्य और अनेक प्रकार के पेय हैं, वैसे ही मेरे पास भी हैं।
श्लोक 16 (3.282.16)
क्षीयतां दुष्कृतं कर्म वनवासकृतं तव । भार्या मे भवसुश्रोणि यथा मन्दोदरीतथा ॥
kṣīyatāṃ duṣkṛtaṃ karma vanavāsakṛtaṃ tava | bhāryā me bhavasuśroṇi yathā mandodarītathā
वनवास से तुम्हें जो कष्ट मिला है, वह समाप्त हो। हे सुन्दरी, मन्दोदरी की भाँति तुम भी मेरी पत्नी बनो।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 17 (3.282.17)
इत्युक्ता तेन वैदेही परिवृत्य शुभानना । तृणमन्तरतः कृत्वातमुवाच निशाचरम् ॥
ityuktā tena vaidehī parivṛtya śubhānanā | tṛṇamantarataḥ kṛtvātamuvāca niśācaram
उसके ऐसा कहने पर सुन्दर मुख वाली वैदेही ने मुँह फेर लिया और बीच में एक तिनका रखकर उस निशाचर से कहा।
श्लोक 18 (3.282.18)
अशिवेनातिवामोरूरजस्रं नेत्रवारिणा । स्तनावपतितौ बाला संहतावभिवर्षती ॥
aśivenātivāmorūrajasraṃ netravāriṇā | stanāvapatitau bālā saṃhatāvabhivarṣatī
वह सुन्दर जंघाओं वाली बाला अशुभ आँसुओं से अपने सुडौल, उन्नत स्तनों को निरन्तर भिगो रही थी;
श्लोक 19 (3.282.19)
व्यवस्थाप्यकथंचित्सा विषादादतिमोहिता । उवाच वाक्यं तं क्षुद्रं वैदेही पतिदेवता ॥
vyavasthāpyakathaṃcitsā viṣādādatimohitā | uvāca vākyaṃ taṃ kṣudraṃ vaidehī patidevatā
और विषाद से अत्यन्त व्याकुल होने पर भी किसी प्रकार स्वयं को सँभालकर, पति को ही देवता मानने वाली वैदेही ने उस नीच से यह वचन कहा।
सीतोवाच
श्लोक 20 (3.282.20)
असकृद्वदतो वाक्यमीदृशं राक्षसेश्वर । विषादयुक्तमेतत्ते मया श्रुतमभाग्यया । तद्भद्रमुख भद्रं ते मानसं विनिवर्त्यताम् ॥
asakṛdvadato vākyamīdṛśaṃ rākṣaseśvara | viṣādayuktametatte mayā śrutamabhāgyayā | tadbhadramukha bhadraṃ te mānasaṃ vinivartyatām
"हे राक्षसराज, मुझ अभागिनी ने तुम्हारे मुख से बार-बार ऐसे दुःखदायी वचन सुने हैं। हे भद्रमुख, तुम्हारा कल्याण हो — अपना मन मुझसे हटा लो।
श्लोक 21 (3.282.21)
परदाराऽस्म्यलभ्या च सततं च पतिव्रता । न चैवौपयिकी भार्या मानुषी तव राक्षस ॥
paradārā'smyalabhyā ca satataṃ ca pativratā | na caivaupayikī bhāryā mānuṣī tava rākṣasa
मैं परायी स्त्री हूँ, तुम्हारे लिए अप्राप्य, और सदा पतिव्रता हूँ। और हे राक्षस, कोई मानवी तुम्हारे योग्य पत्नी नहीं है।
श्लोक 22 (3.282.22)
विवशां धर्षयित्वा च कां त्वं प्रीतिमवाप्स्यसि । न च पालयसे धर्मं लोकपालसमः कथम् ॥
vivaśāṃ dharṣayitvā ca kāṃ tvaṃ prītimavāpsyasi | na ca pālayase dharmaṃ lokapālasamaḥ katham
किसी विवश स्त्री पर बल-प्रयोग करके तुम्हें कौन-सा सुख मिलेगा? और लोकपालों के समान होकर भी तुम धर्म का पालन क्यों नहीं करते?
श्लोक 23 (3.282.23)
भ्रातरं राजराजं तं महेश्वरसखं प्रभुम् । धनेश्वरं व्यपदिशन्कथं त्विह न लज्जसे ॥
bhrātaraṃ rājarājaṃ taṃ maheśvarasakhaṃ prabhum | dhaneśvaraṃ vyapadiśankathaṃ tviha na lajjase
महेश्वर के सखा, समर्थ राजाधिराज धनेश्वर कुबेर को अपना भाई बताते हुए तुम्हें यहाँ लज्जा कैसे नहीं आती?"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 24 (3.282.24)
इत्युक्त्वा प्रारुदत्सीता कम्पयन्ती पयोधरौ । शिरोधरां च तन्वङ्गी मुखं प्रच्छाद्यवाससा ॥
ityuktvā prārudatsītā kampayantī payodharau | śirodharāṃ ca tanvaṅgī mukhaṃ pracchādyavāsasā
ऐसा कहकर तन्वंगी सीता रो पड़ी; उसके स्तन काँप रहे थे, और उसने अपनी गर्दन और मुख को वस्त्र से ढक लिया।
श्लोक 25 (3.282.25)
तस्या रुदत्या भामिन्या दीर्घा वेणी सुसंयता । ददृशे स्वसिता स्निग्धा काली व्यालीव मूर्धनि ॥
tasyā rudatyā bhāminyā dīrghā veṇī susaṃyatā | dadṛśe svasitā snigdhā kālī vyālīva mūrdhani
रोती हुई उस सुन्दरी की लम्बी, सलीके से गुँथी हुई, गहरी काली और चिकनी वेणी उसके सिर पर काली नागिन-सी दिखाई देती थी।
श्लोक 26 (3.282.26)
श्रुत्वा तद्रावणो वाक्यं सीतयोक्तं सुनिष्ठुरम् । प्रत्याख्यातोऽपिदुर्मेधाः पुनरेवाब्रवीद्वचः ॥
śrutvā tadrāvaṇo vākyaṃ sītayoktaṃ suniṣṭhuram | pratyākhyāto'pidurmedhāḥ punarevābravīdvacaḥ
सीता के कहे वे अत्यन्त कठोर वचन सुनकर, ठुकराए जाने पर भी दुर्बुद्धि रावण फिर बोला।
रावण उवाच
श्लोक 27 (3.282.27)
काममङ्गानि मे सीते दुनोतु मकरध्वजः । नत्वामकामां सुश्रोणीं समेष्ये चारुहासिनीं ॥
kāmamaṅgāni me sīte dunotu makaradhvajaḥ | natvāmakāmāṃ suśroṇīṃ sameṣye cāruhāsinīṃ
"हे सीते, मकरध्वज कामदेव भले ही मेरे अंगों को जलाता रहे, पर सुन्दर नितम्बों और मधुर मुस्कान वाली तुमसे मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध संग नहीं करूँगा।
श्लोक 28 (3.282.28)
किंनु शक्यं मया कर्तुं यत्त्वमद्यापिमानुषम् । आहारभूतमस्माकं राममेवानुरुध्यसे ॥
kiṃnu śakyaṃ mayā kartuṃ yattvamadyāpimānuṣam | āhārabhūtamasmākaṃ rāmamevānurudhyase
पर मैं क्या कर सकता हूँ, जब तुम अब भी उस मनुष्य राम से ही बँधी हुई हो, जो हम जैसों का आहार है?"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 29 (3.282.29)
इत्युक्त्वा तामनिन्द्याङ्गीं स राक्षसमहेश्वरः । तत्रैवान्तर्हितो भूत्वा जगामाभिमतां दिशम् ॥
ityuktvā tāmanindyāṅgīṃ sa rākṣasamaheśvaraḥ | tatraivāntarhito bhūtvā jagāmābhimatāṃ diśam
उस अनिन्द्य सुन्दरी से ऐसा कहकर राक्षसों का वह महान् स्वामी वहीं अन्तर्धान हो गया और अपनी इच्छित दिशा को चला गया।
श्लोक 30 (3.282.30)
राक्षसीभिः परिवृतावैदेही शोककर्शिता । सेव्यमाना त्रिजटया तत्रैव न्यवसत्तदा ॥
rākṣasībhiḥ parivṛtāvaidehī śokakarśitā | sevyamānā trijaṭayā tatraiva nyavasattadā
शोक से दुर्बल हुई वैदेही राक्षसियों से घिरी हुई, त्रिजटा की सेवा पाती हुई वहीं रहती रही।