आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 281
वाली-वध और त्रिजटा द्वारा सीता को सान्त्वना
मार्कण्डेय राम की कथा आगे सुनाते हैं। पम्पा सरोवर पर लक्ष्मण के समझाने से राम सँभलते हैं, ऋष्यमूक पहुँचकर हनुमान के माध्यम से सुग्रीव से मित्रता करते हैं और उसे वानरों का राजा अभिषिक्त करते हैं; सुग्रीव के ललकारने पर तारा अपने पति वाली को व्यर्थ ही रोकती है, और माला से पहचाने गए सुग्रीव से लड़ते वाली को राम बाण से मार देते हैं। लंका में सीता अशोकवाटिका में तपस्विनी की भाँति रहती हैं, जहाँ विकराल राक्षसियाँ उन्हें खा जाने की धमकी देती हैं; सीता रावण को अस्वीकार करती हैं, और राक्षसी त्रिजटा अविन्ध्य का संदेश तथा रावण के विनाश और राम की विजय के सूचक स्वप्न सुनाकर उन्हें ढाढ़स बँधाती है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.281.1)
ततोऽविदूरे नलिनीं प्रभूतकमलोत्पलाम् । सीताहरणदुःखार्तः पम्पां रामः समासदत् ॥
tato'vidūre nalinīṃ prabhūtakamalotpalām | sītāharaṇaduḥkhārtaḥ pampāṃ rāmaḥ samāsadat
तब सीता-हरण के दुःख से पीड़ित राम पास ही स्थित पम्पा सरोवर पर पहुँचे, जो कमलों और उत्पलों से भरा हुआ था।
श्लोक 2 (3.281.2)
मारुतेन सुशीतेन सुखेनामृतगन्धिना । सेव्यमानो वने तस्मिञ्जगाम मनसा प्रियाम् ॥
mārutena suśītena sukhenāmṛtagandhinā | sevyamāno vane tasmiñjagāma manasā priyām
उस वन में अमृत-सी सुगन्ध वाली शीतल, सुखद वायु उनकी सेवा कर रही थी, और उनका मन अपनी प्रिया के पास चला गया।
श्लोक 3 (3.281.3)
विललाप सराजेन्द्रस्तत्रकान्तामनुस्मरन् । कामबाणाभिसंतप्तं सौमित्रिस्तमथाब्रवीत् ॥
vilalāpa sarājendrastatrakāntāmanusmaran | kāmabāṇābhisaṃtaptaṃ saumitristamathābravīt
वहाँ वे राजाधिराज अपनी प्रियतमा को स्मरण करते हुए विलाप करने लगे। तब कामदेव के बाणों से संतप्त उन राम से सुमित्रानन्दन लक्ष्मण बोले।
लक्ष्मण उवाच
श्लोक 4 (3.281.4)
न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद । आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषंवृद्धसेविनम् ॥
na tvāmevaṃvidho bhāvaḥ spraṣṭumarhati mānada | ātmavantamiva vyādhiḥ puruṣaṃvṛddhasevinam
"हे मान देने वाले! ऐसी मनोदशा आपको छूनी नहीं चाहिए, जैसे वृद्धजनों की सेवा करने वाले संयमी पुरुष को रोग नहीं छूता।
श्लोक 5 (3.281.5)
प्रवृत्तिरुपलब्धा ते वैदेह्या रावणस्य च । तां त्वं पुरुषकारेण बुद्ध्या चैवोपपादय ॥
pravṛttirupalabdhā te vaidehyā rāvaṇasya ca | tāṃ tvaṃ puruṣakāreṇa buddhyā caivopapādaya
आपको वैदेही और रावण का समाचार मिल चुका है। अब अपने पुरुषार्थ और बुद्धि से उसे सफल कीजिए।
श्लोक 6 (3.281.6)
अभिगच्छाव सुग्रीवं शैलस्थं हरिपुङ्गवम् । मयि शिष्ये च भृत्ये च सहाये च समाश्वस ॥
abhigacchāva sugrīvaṃ śailasthaṃ haripuṅgavam | mayi śiṣye ca bhṛtye ca sahāye ca samāśvasa
चलिए, पर्वत पर रहने वाले वानरश्रेष्ठ सुग्रीव के पास चलें। धैर्य रखिए — मैं आपका शिष्य, सेवक और सहायक हूँ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 7 (3.281.7)
एवं बहुविधैर्वाक्यैर्लक्ष्मणेन स राघवः । उक्तः प्रकृतिमापेदे कार्ये चानन्तरोऽभवत् ॥
evaṃ bahuvidhairvākyairlakṣmaṇena sa rāghavaḥ | uktaḥ prakṛtimāpede kārye cānantaro'bhavat
लक्ष्मण के ऐसे अनेक प्रकार के वचनों से समझाए जाने पर राघव अपनी स्वाभाविक स्थिति में लौट आए और कार्य में तत्पर हो गए।
श्लोक 8 (3.281.8)
निषेव्य वारि पम्पायास्तर्पयित्वा पितॄनपि । प्रतस्थतुरुभौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥
niṣevya vāri pampāyāstarpayitvā pitṝnapi | pratasthaturubhau vīrau bhrātarau rāmalakṣmaṇau
पम्पा का जल ग्रहण कर और पितरों का तर्पण करके दोनों वीर भाई राम और लक्ष्मण आगे चल पड़े।
श्लोक 9 (3.281.9)
तावृश्यमूकमभ्येत्य बहुमूलफलद्रुमम् । गिर्यग्रे वानरान्पञ्च वीरौ ददृशतुस्तदा ॥
tāvṛśyamūkamabhyetya bahumūlaphaladrumam | giryagre vānarānpañca vīrau dadṛśatustadā
कन्द-मूल और फलों वाले बहुत-से वृक्षों से भरे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचकर उन दोनों वीरों ने तब पर्वत के शिखर पर पाँच वानरों को देखा।
श्लोक 10 (3.281.10)
सुग्रीवः प्रेषयामास सचिवं वानरं तयोः । बुद्धिमन्तं हनूमन्तं हिमवन्तमिव स्थितम् ॥
sugrīvaḥ preṣayāmāsa sacivaṃ vānaraṃ tayoḥ | buddhimantaṃ hanūmantaṃ himavantamiva sthitam
सुग्रीव ने अपने मन्त्री, हिमालय के समान अडिग और बुद्धिमान वानर हनुमान को उनके पास भेजा।
श्लोक 11 (3.281.11)
तेन संभाष्य पूर्वं तौ सुग्रीवमभिजग्मतुः । सख्यं वानरराजेन चक्रे रामस्तदा नृप ॥
tena saṃbhāṣya pūrvaṃ tau sugrīvamabhijagmatuḥ | sakhyaṃ vānararājena cakre rāmastadā nṛpa
पहले हनुमान से बातचीत करके वे दोनों सुग्रीव के पास गए, और हे राजन्, तब राम ने वानरराज से मित्रता की।
श्लोक 12 (3.281.12)
ततः सीतां हृतां श्रुत्वा सुग्रीवो वालिना कृतम् । दुःखमाख्यातवान्सर्वं रामायामिततेजसे ॥
tataḥ sītāṃ hṛtāṃ śrutvā sugrīvo vālinā kṛtam | duḥkhamākhyātavānsarvaṃ rāmāyāmitatejase
तब सीता के हरण की बात सुनकर सुग्रीव ने अपार तेजस्वी राम को वाली द्वारा दिया गया अपना सारा दुःख कह सुनाया।
श्लोक 13 (3.281.13)
तद्वासो दर्शयामास तस्य कार्ये निवेदिते । वानराणां तु यत्सीता ह्रियमाणा व्यपासृजत् ॥
tadvāso darśayāmāsa tasya kārye nivedite | vānarāṇāṃ tu yatsītā hriyamāṇā vyapāsṛjat
जब राम ने अपना प्रयोजन बताया, तब सुग्रीव ने उन्हें वह वस्त्र दिखाया जो हरण के समय सीता ने वानरों के बीच गिरा दिया था।
श्लोक 14 (3.281.14)
तत्प्रत्ययकरं लब्ध्वा सुग्रीवं प्लवगाधिपम् । पृथिव्यां वानरैश्वर्ये स्वयंरामोऽभ्यषेचयत् ॥
tatpratyayakaraṃ labdhvā sugrīvaṃ plavagādhipam | pṛthivyāṃ vānaraiśvarye svayaṃrāmo'bhyaṣecayat
उस विश्वास दिलाने वाले चिह्न को पाकर राम ने स्वयं वानरों के स्वामी सुग्रीव का पृथ्वी के वानर-राज्य पर अभिषेक किया।
श्लोक 15 (3.281.15)
प्रतिजज्ञे चकाकुत्स्थः समरे वालिनो वधम् । सुग्रीवश्चापि वैदेह्याः पुनरानयनं नृप ॥
pratijajñe cakākutsthaḥ samare vālino vadham | sugrīvaścāpi vaidehyāḥ punarānayanaṃ nṛpa
काकुत्स्थ राम ने युद्ध में वाली के वध की प्रतिज्ञा की, और हे राजन्, सुग्रीव ने वैदेही को वापस लाने की प्रतिज्ञा की।
श्लोक 16 (3.281.16)
इत्येवं समयं कृत्वाविश्वास्य च परस्परम् । अभ्येत्य सर्वे किष्किन्धां तस्थुर्युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥
ityevaṃ samayaṃ kṛtvāviśvāsya ca parasparam | abhyetya sarve kiṣkindhāṃ tasthuryuddhābhikāṅkṣiṇaḥ
इस प्रकार समझौता करके और परस्पर विश्वास स्थापित करके वे सब किष्किन्धा पहुँचे और युद्ध की इच्छा से वहाँ डट गए।
श्लोक 17 (3.281.17)
सुग्रीवः प्राप्यकिष्किन्धां ननादौघनिभस्वनः । नास्य तन्ममृषे वाली तारा तं प्रत्यषेधयत् ॥
sugrīvaḥ prāpyakiṣkindhāṃ nanādaughanibhasvanaḥ | nāsya tanmamṛṣe vālī tārā taṃ pratyaṣedhayat
किष्किन्धा पहुँचकर सुग्रीव ने उमड़ती बाढ़ के समान गर्जना की। वाली उसे सह न सका, पर तारा ने उसे रोका।
तारोवाच
श्लोक 18 (3.281.18)
यथानदतिसुग्रीवो बलवानेष वानरः । मन्ये चाश्रयवान्प्राप्तो न त्वं निष्क्रान्तुमर्हसि ॥
yathānadatisugrīvo balavāneṣa vānaraḥ | manye cāśrayavānprāpto na tvaṃ niṣkrāntumarhasi
"जिस प्रकार सुग्रीव गरज रहा है, उससे लगता है यह वानर बलवान है। मुझे लगता है वह किसी का सहारा पाकर आया है। आपको बाहर नहीं निकलना चाहिए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 19 (3.281.19)
हेममाली ततो वाली तारां ताराधिपाननाम् । प्रोवाच वचनं वाग्मी तां वानरपतिः पतिः ॥
hemamālī tato vālī tārāṃ tārādhipānanām | provāca vacanaṃ vāgmī tāṃ vānarapatiḥ patiḥ
तब स्वर्णमाला धारण करने वाले, वाक्पटु वानरराज वाली ने अपनी चन्द्रमुखी पत्नी तारा से यह कहा।
वाल्युवाच
श्लोक 20 (3.281.20)
सर्वभूतरुतज्ञा त्वं पश्य बुद्ध्या समन्विता । केन चाश्रयवान्प्राप्तो ममैष भ्रातृगन्धिकः ॥
sarvabhūtarutajñā tvaṃ paśya buddhyā samanvitā | kena cāśrayavānprāpto mamaiṣa bhrātṛgandhikaḥ
"तुम सभी प्राणियों की बोली समझती हो; अपनी बुद्धि से देखो — यह नाम-मात्र का मेरा भाई किसका सहारा पाकर आया है?"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 21 (3.281.21)
चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु तारा ताराधिपप्रभा । पतिमित्यब्रवीत्प्राज्ञा शृणु सर्वं कपीश्वर ॥
cintayitvā muhūrtaṃ tu tārā tārādhipaprabhā | patimityabravītprājñā śṛṇu sarvaṃ kapīśvara
चन्द्रमा जैसी कान्ति वाली बुद्धिमती तारा ने क्षणभर सोचकर अपने पति से कहा — "हे कपीश्वर, सब कुछ सुनिए।
तारोवाच
श्लोक 22 (3.281.22)
हृतदारो महासत्वोरामो दशरथात्मजः । तुल्यारिमित्रतां प्राप्तः सुग्रीवेण धनुर्धरः ॥
hṛtadāro mahāsatvorāmo daśarathātmajaḥ | tulyārimitratāṃ prāptaḥ sugrīveṇa dhanurdharaḥ
दशरथ के पुत्र, महाबली धनुर्धर राम, जिनकी पत्नी का हरण हुआ है, सुग्रीव के साथ ऐसी मित्रता में बँध गए हैं कि दोनों के शत्रु और मित्र एक ही हैं।
श्लोक 23 (3.281.23)
भ्राता चास्य महाबाहुः सौमित्रिरपराजितः । लक्ष्मणो नाम मेधावी स्थितः कार्यार्थसिद्धये ॥
bhrātā cāsya mahābāhuḥ saumitriraparājitaḥ | lakṣmaṇo nāma medhāvī sthitaḥ kāryārthasiddhaye
उनका भाई, महाबाहु, अपराजित और बुद्धिमान सुमित्रापुत्र लक्ष्मण भी कार्य-सिद्धि के लिए साथ खड़ा है।
श्लोक 24 (3.281.24)
मैन्दश्च द्विविदश्चापि हनूमांश्चानिलात्मजः । जाम्बवानृक्षराजश्च सुग्रीवसचिवाः स्थिताः ॥
maindaśca dvividaścāpi hanūmāṃścānilātmajaḥ | jāmbavānṛkṣarājaśca sugrīvasacivāḥ sthitāḥ
मैन्द और द्विविद, पवनपुत्र हनुमान और ऋक्षराज जाम्बवान — ये सुग्रीव के मन्त्री होकर उसके साथ खड़े हैं।
श्लोक 25 (3.281.25)
सर्व एते महात्मानो बुद्धिमन्तो महाबलाः । अलं तव विनाशाय रामवीर्यव्यपाश्रयाः ॥
sarva ete mahātmāno buddhimanto mahābalāḥ | alaṃ tava vināśāya rāmavīryavyapāśrayāḥ
ये सभी महात्मा, बुद्धिमान और महाबली हैं, और राम के पराक्रम का सहारा पाकर आपका विनाश करने में समर्थ हैं।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 26 (3.281.26)
तस्यास्तदाक्षिप्य वचो हितमुक्तं कपीश्वरः । पर्यशङ्कत तामीर्षुः सुग्रीवगतमानसाम् ॥
tasyāstadākṣipya vaco hitamuktaṃ kapīśvaraḥ | paryaśaṅkata tāmīrṣuḥ sugrīvagatamānasām
वानरराज ने उसके उन हितकारी वचनों को ठुकरा दिया और ईर्ष्यावश उस पर संदेह किया कि उसका मन सुग्रीव में लगा है।
श्लोक 27 (3.281.27)
तारां परुषमुक्त्वा तु निर्जगाम गुहामुखात् । स्थितं माल्यवतोऽभ्याशे सुग्रीवं सोभ्यभाषत ॥
tārāṃ paruṣamuktvā tu nirjagāma guhāmukhāt | sthitaṃ mālyavato'bhyāśe sugrīvaṃ sobhyabhāṣata
तारा से कठोर वचन कहकर वह गुफा के द्वार से बाहर निकला और माल्यवान् पर्वत के पास खड़े सुग्रीव से बोला।
वाल्युवाच
श्लोक 28 (3.281.28)
असकृत्त्वं मया क्लीव निर्जितो जीवितप्रियः । मुक्तो गच्छसि दुर्बुद्धे कथंकारं रणे पुनः ॥
asakṛttvaṃ mayā klīva nirjito jīvitapriyaḥ | mukto gacchasi durbuddhe kathaṃkāraṃ raṇe punaḥ
"अरे कायर! मैंने तुझे बार-बार हराया है, और प्राणों से चिपके हुए तुझको छोड़ दिया गया। अरे दुर्बुद्धि, फिर तू किस प्रकार युद्ध में लौट आया है?"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 29 (3.281.29)
इत्युक्तः प्राहसुग्रीवो भ्रातरं हेतुमद्वचः । प्राप्तकालममित्रघ्नं रामं सम्बोधयन्निव ॥
ityuktaḥ prāhasugrīvo bhrātaraṃ hetumadvacaḥ | prāptakālamamitraghnaṃ rāmaṃ sambodhayanniva
ऐसा कहे जाने पर सुग्रीव ने अपने भाई से समयोचित और तर्कपूर्ण वचन कहे, मानो शत्रुनाशक राम को सचेत कर रहा हो।
सुग्रीव उवाच
श्लोक 30 (3.281.30)
हृतराज्यस्य मे राजन्हृतदारस्य च त्वया । किं मे जीवितसामर्थ्यमिति विद्धि समागतम् ॥
hṛtarājyasya me rājanhṛtadārasya ca tvayā | kiṃ me jīvitasāmarthyamiti viddhi samāgatam
"हे राजन्! तुमने मेरा राज्य भी छीन लिया और मेरी पत्नी भी — फिर मेरे जीवन का क्या सामर्थ्य रहा? समझ लो, इसीलिए मैं आया हूँ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 31 (3.281.31)
एवमुक्त्वाबहुविधं ततस्तौ सन्निपेततुः । समरे वालिसुग्रीवौ सालतालशिलायुधौ ॥
evamuktvābahuvidhaṃ tatastau sannipetatuḥ | samare vālisugrīvau sālatālaśilāyudhau
इस प्रकार अनेक बातें कहकर वाली और सुग्रीव दोनों साल और ताड़ के वृक्षों तथा शिलाओं को अस्त्र बनाकर युद्ध में एक-दूसरे पर टूट पड़े।
श्लोक 32 (3.281.32)
उभौ जघ्नतुरन्योन्यमुभौ भूमौ निपेततुः । उभौ ववल्गतुश्चित्रं मुष्टिभिश्च निजघ्नतुः ॥
ubhau jaghnaturanyonyamubhau bhūmau nipetatuḥ | ubhau vavalgatuścitraṃ muṣṭibhiśca nijaghnatuḥ
दोनों ने एक-दूसरे पर प्रहार किया, दोनों भूमि पर गिरे; दोनों अद्भुत ढंग से उछले-कूदे और घूँसों से एक-दूसरे को मारा।
श्लोक 33 (3.281.33)
उभौ रुधिरसंसिक्तौ नखदन्तपरिक्षतौ । शुशुभाते तदा वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥
ubhau rudhirasaṃsiktau nakhadantaparikṣatau | śuśubhāte tadā vīrau puṣpitāviva kiṃśukau
दोनों रक्त से लथपथ और नखों तथा दाँतों से क्षत-विक्षत थे; तब वे दोनों वीर फूले हुए दो पलाश-वृक्षों के समान शोभा पा रहे थे।
श्लोक 34 (3.281.34)
न विशेषस्तयोर्युद्धे यदा कश्चन दृश्यते । सुग्रीवस्य तदा मालां हनुमान्कण्ठ आसजत् ॥
na viśeṣastayoryuddhe yadā kaścana dṛśyate | sugrīvasya tadā mālāṃ hanumānkaṇṭha āsajat
जब युद्ध में दोनों में कोई भी भेद दिखाई नहीं दिया, तब हनुमान ने सुग्रीव के गले में एक माला डाल दी।
श्लोक 35 (3.281.35)
स मालया तदा वीरः शुशुभे कण्ठसक्तया । श्रीमानिव महाशैलो मलयो मेघमालया ॥
sa mālayā tadā vīraḥ śuśubhe kaṇṭhasaktayā | śrīmāniva mahāśailo malayo meghamālayā
गले में पड़ी उस माला से वह वीर ऐसा शोभित हुआ जैसे मेघमाला से घिरा श्रीसम्पन्न महापर्वत मलय।
श्लोक 36 (3.281.36)
कृतचिह्नं तु सुग्रीवं रामो दृष्ट्वा महाधनुः । विचकर्ष धनुःश्रेष्ठं वालिमुद्दिश्य लक्षयन् ॥
kṛtacihnaṃ tu sugrīvaṃ rāmo dṛṣṭvā mahādhanuḥ | vicakarṣa dhanuḥśreṣṭhaṃ vālimuddiśya lakṣayan
चिह्न से पहचाने गए सुग्रीव को देखकर महाधनुर्धर राम ने वाली को लक्ष्य करके अपना श्रेष्ठ धनुष खींचा।
श्लोक 37 (3.281.37)
विष्फारस्तस्य धनुषो यन्त्रस्येव तदा बभौ । वितत्रास तदा वाली शरेणाभिहतो हृदि ॥
viṣphārastasya dhanuṣo yantrasyeva tadā babhau | vitatrāsa tadā vālī śareṇābhihato hṛdi
उस धनुष की टंकार तब किसी यन्त्र की ध्वनि-सी गूँजी, और बाण से हृदय में आहत होकर वाली काँप उठा।
श्लोक 38 (3.281.38)
स भिन्नहृदयो वाली वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् । ददर्शावस्थितं रामं ततः सौमित्रिणा सह ॥
sa bhinnahṛdayo vālī vaktrācchoṇitamudvaman | dadarśāvasthitaṃ rāmaṃ tataḥ saumitriṇā saha
हृदय बिंध जाने पर मुख से रक्त उगलते हुए वाली ने तब सुमित्रानन्दन लक्ष्मण के साथ खड़े राम को देखा।
श्लोक 39 (3.281.39)
गर्हयित्वास काकुत्स्थं पपात भुवि मूर्च्छितः । तारा ददर्श तं भूमौ तारापतिमिव च्युतम् ॥
garhayitvāsa kākutsthaṃ papāta bhuvi mūrcchitaḥ | tārā dadarśa taṃ bhūmau tārāpatimiva cyutam
काकुत्स्थ राम की निन्दा करके वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। तारा ने उसे भूमि पर ऐसे पड़ा देखा मानो आकाश से गिरा हुआ चन्द्रमा हो।
श्लोक 40 (3.281.40)
हते वालिनि सुग्रीवः किष्किन्धां प्रत्यपद्यत । तां च तारापतिमुखीं तारां निपतितेश्वराम् ॥
hate vālini sugrīvaḥ kiṣkindhāṃ pratyapadyata | tāṃ ca tārāpatimukhīṃ tārāṃ nipatiteśvarām
वाली के मारे जाने पर सुग्रीव ने किष्किन्धा को प्राप्त किया, और उस चन्द्रमुखी तारा को भी, जिसका स्वामी मारा जा चुका था।
श्लोक 41 (3.281.41)
रामस्तु चतुरो मासान्पृष्ठे माल्यवतः शुभे । निवासमकरोद्धीमान्सुग्रीवेणाभ्युपस्थितः ॥
rāmastu caturo māsānpṛṣṭhe mālyavataḥ śubhe | nivāsamakaroddhīmānsugrīveṇābhyupasthitaḥ
बुद्धिमान राम ने सुग्रीव की सेवा पाते हुए माल्यवान् पर्वत की सुन्दर पीठ पर चार महीने निवास किया।
श्लोक 42 (3.281.42)
रावणोऽपिपुरीं गत्वालङ्कां कामबलात्कृतः । सीतां निवेशयामास भवने नन्दनोपमे ॥
rāvaṇo'pipurīṃ gatvālaṅkāṃ kāmabalātkṛtaḥ | sītāṃ niveśayāmāsa bhavane nandanopame
उधर कामवश हुए रावण ने अपनी नगरी लंका जाकर सीता को नन्दनवन जैसे सुन्दर भवन में ठहराया,
श्लोक 43 (3.281.43)
अशोकवनिकाभ्यासे तापसाश्रमसन्निभे । भर्तृस्मरणतन्वङ्गी तापसीवेषधारिणी ॥
aśokavanikābhyāse tāpasāśramasannibhe | bhartṛsmaraṇatanvaṅgī tāpasīveṣadhāriṇī
अशोकवाटिका के पास, जो तपस्वियों के आश्रम जैसी थी। पति की याद में दुबली हुई, तपस्विनी का वेश धारण किए,
श्लोक 44 (3.281.44)
उपवासतपःशीला ततः सा पृथुलेक्षणा । उवास दुःखवसतिं फलमूलकृताशना ॥
upavāsatapaḥśīlā tataḥ sā pṛthulekṣaṇā | uvāsa duḥkhavasatiṃ phalamūlakṛtāśanā
उपवास और तप में लगी वह विशाल नेत्रों वाली सीता फल-मूल खाकर दुःखपूर्वक वहाँ रहने लगी।
श्लोक 45 (3.281.45)
दिदेश राक्षसीस्तत्ररक्षणे राक्षसाधिपः । प्रासासिशूलपरशुमुद्गरालातधारिणीः ॥
dideśa rākṣasīstatrarakṣaṇe rākṣasādhipaḥ | prāsāsiśūlaparaśumudgarālātadhāriṇīḥ
राक्षसराज ने वहाँ उसकी रखवाली के लिए राक्षसियाँ नियुक्त कीं, जो भाले, तलवारें, शूल, फरसे, मुद्गर और जलती लकड़ियाँ लिए रहती थीं —
श्लोक 46 (3.281.46)
द्व्यक्षीं त्र्यक्षीं ललाटाक्षीं दीर्घजिह्वामजिह्विकाम् । त्रिस्तनीमेकपादां च त्रिजटामेकलोचनाम् ॥
dvyakṣīṃ tryakṣīṃ lalāṭākṣīṃ dīrghajihvāmajihvikām | tristanīmekapādāṃ ca trijaṭāmekalocanām
दो आँखों वाली, तीन आँखों वाली, ललाट में आँख वाली, लम्बी जीभ वाली, बिना जीभ वाली, तीन स्तनों वाली, एक पैर वाली, तीन जटाओं वाली (त्रिजटा) और एक आँख वाली।
श्लोक 47 (3.281.47)
एताश्चान्याश्च दीप्ताक्ष्यः करभोत्कटमूर्धजाः । परिवार्यासते सीतां दिवारात्रमतन्द्रिताः ॥
etāścānyāśca dīptākṣyaḥ karabhotkaṭamūrdhajāḥ | parivāryāsate sītāṃ divārātramatandritāḥ
ये तथा और भी दहकती आँखों वाली, ऊँट के बालों जैसे खड़े केशों वाली राक्षसियाँ दिन-रात बिना आलस्य के सीता को घेरे बैठी रहतीं।
श्लोक 48 (3.281.48)
तास्तु तामायतापाङ्गीं पिशाच्यो दारुणस्वराः । तर्जयन्ति सदा रौद्राः परुषव्यञ्जनस्वराः ॥
tāstu tāmāyatāpāṅgīṃ piśācyo dāruṇasvarāḥ | tarjayanti sadā raudrāḥ paruṣavyañjanasvarāḥ
भयानक स्वर वाली, कठोर और कर्कश वाणी वाली वे क्रूर पिशाचिनियाँ उस विशाल नेत्रों वाली को सदा धमकाती रहतीं —
राक्षस्य ऊचुः
श्लोक 49 (3.281.49)
खादाम पाटयामैनां तिलशः प्रविभज्यताम् । येयं भर्तारमस्माकमवमत्येह जीवति ॥
khādāma pāṭayāmaināṃ tilaśaḥ pravibhajyatām | yeyaṃ bhartāramasmākamavamatyeha jīvati
"इसे खा जाएँ! इसे फाड़ डालें! इसके तिल-तिल जितने टुकड़े कर दिए जाएँ — यह जो हमारे स्वामी का अपमान करके यहाँ जी रही है!"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 50 (3.281.50)
इत्येवं परिभर्त्सन्तीस्त्रासयानाः पुनः पुनः । भर्तृशोकसमाविष्टा निःश्वस्येदमुवाच ताः ॥
ityevaṃ paribhartsantīstrāsayānāḥ punaḥ punaḥ | bhartṛśokasamāviṣṭā niḥśvasyedamuvāca tāḥ
जब वे इस प्रकार उसे बार-बार धमकातीं और डरातीं, तब पति के शोक में डूबी सीता ने लम्बी साँस लेकर उनसे कहा —
सीतोवाच
श्लोक 51 (3.281.51)
आर्याः खादत मां शीघ्रं न मे लोभोस्ति जीविते । विना तं पुण्डरीकाक्षं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ॥
āryāḥ khādata māṃ śīghraṃ na me lobhosti jīvite | vinā taṃ puṇḍarīkākṣaṃ nīlakuñcitamūrdhajam
"आर्याओ, मुझे शीघ्र खा जाओ। उन कमलनयन, नीले घुँघराले केशों वाले के बिना मुझे जीवन का कोई लोभ नहीं है।
श्लोक 52 (3.281.52)
अद्यैवाहं निराहारा जीवितप्रियवर्जिता । शोषयिष्यामि गात्राणि बल्ली तलगता यथा ॥
adyaivāhaṃ nirāhārā jīvitapriyavarjitā | śoṣayiṣyāmi gātrāṇi ballī talagatā yathā
आज से ही मैं निराहार रहकर, प्राणों से प्रिय पति से बिछुड़ी हुई, धरती पर गिरी लता की भाँति अपने अंगों को सुखा डालूँगी।
श्लोक 53 (3.281.53)
न त्वन्यमभिगच्छेयं पुमांसं राघवादृते । इति जानीत सत्यं मेक्रियतां यदनन्तरम् ॥
na tvanyamabhigaccheyaṃ pumāṃsaṃ rāghavādṛte | iti jānīta satyaṃ mekriyatāṃ yadanantaram
पर राघव के सिवा मैं किसी अन्य पुरुष के पास कभी नहीं जाऊँगी। इसे सत्य जानो, और इसके बाद जो करना हो, करो।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 54 (3.281.54)
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा राक्षस्यस्ताः खरस्वनाः । आख्यातुं राक्षसेन्द्राय जग्मुस्तत्सर्वमादितः ॥
tasyāstadvacanaṃ śrutvā rākṣasyastāḥ kharasvanāḥ | ākhyātuṃ rākṣasendrāya jagmustatsarvamāditaḥ
उसकी यह बात सुनकर कर्कश स्वर वाली वे राक्षसियाँ यह सब आरम्भ से राक्षसराज को बताने चली गईं।
श्लोक 55 (3.281.55)
गतासु तासु सर्वासु त्रिजटा नाम राक्षसी । सान्त्वयामास वैदेहीं धर्मज्ञा प्रियवादिनी ॥
gatāsu tāsu sarvāsu trijaṭā nāma rākṣasī | sāntvayāmāsa vaidehīṃ dharmajñā priyavādinī
उन सबके चले जाने पर त्रिजटा नाम की राक्षसी ने, जो धर्म को जानने वाली और मधुरभाषिणी थी, वैदेही को सान्त्वना दी।
त्रिजटोवाच
श्लोक 56 (3.281.56)
सीते वक्ष्यामि ते किंचिद्विश्वासं कुरु मे सखि । भयं त्वं त्यज वामोरु शृणु चेदं वचो मम ॥
sīte vakṣyāmi te kiṃcidviśvāsaṃ kuru me sakhi | bhayaṃ tvaṃ tyaja vāmoru śṛṇu cedaṃ vaco mama
"सीते, मैं तुमसे कुछ कहूँगी; सखी, मुझ पर विश्वास करो। हे सुन्दरी, भय त्याग दो और मेरी यह बात सुनो।
श्लोक 57 (3.281.57)
अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः । स रामस्य हितान्वेषी त्वदर्थे मामचूचुदत् ॥
avindhyo nāma medhāvī vṛddho rākṣasapuṅgavaḥ | sa rāmasya hitānveṣī tvadarthe māmacūcudat
अविन्ध्य नाम के एक बुद्धिमान, वृद्ध और श्रेष्ठ राक्षस हैं। वे राम के हितैषी हैं, और उन्होंने तुम्हारे लिए मुझे यह कहने को प्रेरित किया है —
श्लोक 58 (3.281.58)
सीता मद्वचनाद्वाच्या समाश्वास्य प्रसाद्य च । भर्ता तेकुशली रामोलक्ष्मणानुगतो बली ॥
sītā madvacanādvācyā samāśvāsya prasādya ca | bhartā tekuśalī rāmolakṣmaṇānugato balī
उन्होंने कहा — सीता को ढाढ़स बँधाकर और प्रसन्न करके मेरी ओर से कहना: तुम्हारे पति बलवान राम सकुशल हैं और लक्ष्मण उनके साथ हैं।
श्लोक 59 (3.281.59)
सख्यं वानरराजेन शक्रप्रतिमतेजसा । कृतवान्राघवः श्रीमांस्त्वदर्थे च समुद्यतः ॥
sakhyaṃ vānararājena śakrapratimatejasā | kṛtavānrāghavaḥ śrīmāṃstvadarthe ca samudyataḥ
श्रीमान राघव ने इन्द्र के समान तेजस्वी वानरराज से मित्रता कर ली है और वे तुम्हारे लिए उद्यत हैं।
श्लोक 60 (3.281.60)
मा च ते भूद्भयं भीरु रावणाल्लोकगर्हितात् । नलकूबरशापेन रक्षिता ह्यसि नन्दिनि ॥
mā ca te bhūdbhayaṃ bhīru rāvaṇāllokagarhitāt | nalakūbaraśāpena rakṣitā hyasi nandini
हे भीरु, लोकनिन्दित रावण से तुम्हें भय नहीं होना चाहिए; हे नन्दिनी, नलकूबर के शाप से तुम सुरक्षित हो।
श्लोक 61 (3.281.61)
शप्तो ह्येष पुरा पापो वधूं रम्भां परामृशन् । न शक्नोत्यवशां नारीमुपैतुमजितेन्द्रियः ॥
śapto hyeṣa purā pāpo vadhūṃ rambhāṃ parāmṛśan | na śaknotyavaśāṃ nārīmupaitumajitendriyaḥ
क्योंकि इस पापी को पहले अपनी पुत्रवधू रम्भा का स्पर्श करने पर शाप मिला था; यह अजितेन्द्रिय किसी स्त्री के पास उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता।
श्लोक 62 (3.281.62)
क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सुग्रीवेणाभिरक्षितः । सौमित्रिसहितो धीमांस्त्वां चेतो मोक्षयिष्यति ॥
kṣiprameṣyati te bhartā sugrīveṇābhirakṣitaḥ | saumitrisahito dhīmāṃstvāṃ ceto mokṣayiṣyati
तुम्हारे पति सुग्रीव से रक्षित होकर शीघ्र आएँगे; सुमित्रानन्दन के साथ वे बुद्धिमान राम तुम्हें यहाँ से छुड़ा ले जाएँगे।
श्लोक 63 (3.281.63)
स्वप्ना हि सुमहाघोरा दृष्टा मेऽनिष्टदर्शनाः । विनाशायास्य दुर्बुद्धेः पौलस्त्यस्य कुलस्य च ॥
svapnā hi sumahāghorā dṛṣṭā me'niṣṭadarśanāḥ | vināśāyāsya durbuddheḥ paulastyasya kulasya ca
मैंने अत्यन्त भयानक और अशुभ स्वप्न देखे हैं, जो इस दुर्बुद्धि के और पुलस्त्य-वंश के विनाश की सूचना देते हैं।
श्लोक 64 (3.281.64)
दारुणो ह्येष दुष्टात्मा क्षुद्रकर्मा निशाचरः । स्वभावाच्छीलदोषेण सर्वेषां भयवर्धनः ॥
dāruṇo hyeṣa duṣṭātmā kṣudrakarmā niśācaraḥ | svabhāvācchīladoṣeṇa sarveṣāṃ bhayavardhanaḥ
यह निशाचर क्रूर, दुष्टात्मा और नीच कर्म करने वाला है; अपने स्वभाव और दुश्चरित्र के कारण यह सबका भय बढ़ाता है।
श्लोक 65 (3.281.65)
स्पर्धते सर्वदेवैर्यः कालोपहतचेतनः । मया विनाशलिङ्गानि स्वप्ने दृष्टानि तस्य वै ॥
spardhate sarvadevairyaḥ kālopahatacetanaḥ | mayā vināśaliṅgāni svapne dṛṣṭāni tasya vai
काल ने जिसकी बुद्धि हर ली है, वह सब देवताओं से होड़ करता है। मैंने स्वप्न में उसके विनाश के लक्षण देखे हैं।
श्लोक 66 (3.281.66)
तैलाभिषिक्तो विकचो मज्जन्पङ्के दशाननः । असकृत्खरयुक्ते तु रथे नृत्यन्निव स्थितः ॥
tailābhiṣikto vikaco majjanpaṅke daśānanaḥ | asakṛtkharayukte tu rathe nṛtyanniva sthitaḥ
दशमुख रावण तेल से नहाया, मुण्डित सिर, कीचड़ में धँसता हुआ; और बार-बार गधों से जुते रथ पर मानो नाचता हुआ खड़ा था।
श्लोक 67 (3.281.67)
कुम्भकर्णादयश्चेमे नग्नाः पतितमूर्धजाः । गच्छन्ति दक्षिणामाशां रक्तमाल्यानुलेपनाः ॥
kumbhakarṇādayaśceme nagnāḥ patitamūrdhajāḥ | gacchanti dakṣiṇāmāśāṃ raktamālyānulepanāḥ
कुम्भकर्ण आदि ये सब नग्न, झड़े केशों वाले, लाल मालाएँ और लाल अंगराग धारण किए दक्षिण दिशा की ओर जा रहे थे।
श्लोक 68 (3.281.68)
श्वेतातपत्रः सोष्णीषः शुक्लमाल्यानुलेपनः । श्वेतपर्वतमारूढ एक एव विभीषणः ॥
śvetātapatraḥ soṣṇīṣaḥ śuklamālyānulepanaḥ | śvetaparvatamārūḍha eka eva vibhīṣaṇaḥ
केवल विभीषण ही श्वेत छत्र और पगड़ी धारण किए, श्वेत माला और अंगराग से सजे, एक श्वेत पर्वत पर चढ़े हुए थे।
श्लोक 69 (3.281.69)
सचिवाश्चास्य चत्वारः शुक्लमाल्यानुलेपनाः । श्वेतपर्वतमारूढा मोक्ष्यन्तेऽस्मान्महाभयात् ॥
sacivāścāsya catvāraḥ śuklamālyānulepanāḥ | śvetaparvatamārūḍhā mokṣyante'smānmahābhayāt
उनके चारों मन्त्री भी श्वेत मालाएँ और अंगराग धारण किए श्वेत पर्वत पर चढ़े थे; वे हमें इस महान् भय से छुड़ाएँगे।
श्लोक 70 (3.281.70)
रामस्यास्त्रेण पृथिवी परिक्षिप्ता ससागरा । यशसा पृथिवीं कृत्स्नां पूरयिष्यति ते पतिः ॥
rāmasyāstreṇa pṛthivī parikṣiptā sasāgarā | yaśasā pṛthivīṃ kṛtsnāṃ pūrayiṣyati te patiḥ
समुद्रों सहित पृथ्वी राम के अस्त्र से व्याप्त थी; तुम्हारे पति अपने यश से सारी पृथ्वी को भर देंगे।
श्लोक 71 (3.281.71)
हस्तिसक्थिसमारूढो भुञ्जानो मधुपायसम् । लक्ष्मणश्च मया दृष्टो दिधक्षुः सर्वतो दिशम् ॥
hastisakthisamārūḍho bhuñjāno madhupāyasam | lakṣmaṇaśca mayā dṛṣṭo didhakṣuḥ sarvato diśam
और मैंने लक्ष्मण को हाथी की जाँघ पर आरूढ़, मधु और खीर खाते हुए, मानो सब दिशाओं को भस्म कर देने को उत्सुक देखा।
श्लोक 72 (3.281.72)
रुदती रुधिरार्द्राङ्गी व्याघ्रेण परिरक्षिता । असकृत्त्वं मया दृष्टा गच्छन्ती दिशमुत्तराम् ॥
rudatī rudhirārdrāṅgī vyāghreṇa parirakṣitā | asakṛttvaṃ mayā dṛṣṭā gacchantī diśamuttarām
और मैंने तुम्हें बार-बार रोते हुए, रक्त से भीगे अंगों वाली, एक व्याघ्र द्वारा रक्षित, उत्तर दिशा की ओर जाते देखा।
श्लोक 73 (3.281.73)
हर्षमेष्यसि वैदेहि क्षिप्रं भर्त्रा समन्विता । राघवेण सहभ्रात्रा सीते त्वमचिरादिव ॥
harṣameṣyasi vaidehi kṣipraṃ bhartrā samanvitā | rāghaveṇa sahabhrātrā sīte tvamacirādiva
हे वैदेही, तुम शीघ्र ही पति से मिलकर हर्ष पाओगी; हे सीते, थोड़े ही समय में तुम भाई सहित राघव के साथ होगी।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 74 (3.281.74)
इत्येतन्मृगशावाक्षी तच्छ्रुत्वा त्रिजटावचः । बभूवाशावती बाला पुनर्भर्तृसमागमे ॥
ityetanmṛgaśāvākṣī tacchrutvā trijaṭāvacaḥ | babhūvāśāvatī bālā punarbhartṛsamāgame
त्रिजटा की यह बात सुनकर मृगछौने जैसी आँखों वाली वह बाला फिर से पति-मिलन की आशा से भर उठी।
श्लोक 75 (3.281.75)
तावदभ्यागता रौद्र्यः पिशाच्यस्ताःसुदारुणाः । ददृशुस्तां त्रिजटया सहासीनां यथापुरम् ॥
tāvadabhyāgatā raudryaḥ piśācyastāḥsudāruṇāḥ | dadṛśustāṃ trijaṭayā sahāsīnāṃ yathāpuram
तभी वे भयंकर, अत्यन्त दारुण पिशाचिनियाँ लौट आईं, और उन्होंने उसे पहले की भाँति त्रिजटा के साथ बैठी देखा।