आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 280
जटायु का पतन और कबन्ध-वध
गृध्रराज जटायु, जो दशरथ के मित्र थे, रावण पर आक्रमण करते हैं, पर रावण उनके पंख काट डालता है और सीता को लेकर लंका उड़ जाता है; मार्ग में सीता अपने आभूषण गिराती जाती हैं और पर्वत पर बैठे पाँच वानरों के बीच एक वस्त्र गिरा देती हैं। राम लौटकर लक्ष्मण को उलाहना देते हैं, मरणासन्न जटायु को पाते हैं, जो संकेत से बताते हैं कि रावण दक्षिण की ओर गया, और उनका अन्त्य-संस्कार करते हैं। दण्डकारण्य में दोनों भाई सिरविहीन राक्षस कबन्ध को मारते हैं, जिसके शरीर से गन्धर्व विश्वावसु निकलकर उन्हें पम्पा सरोवर के पास सुग्रीव के पास जाने को कहता है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.280.1)
सखा दशरथस्यासीज्जटायुररुणात्मजः । गृध्रराजो महावीरः संपातिर्यस्य सोदरः ॥
sakhā daśarathasyāsījjaṭāyuraruṇātmajaḥ | gṛdhrarājo mahāvīraḥ saṃpātiryasya sodaraḥ
अरुण के पुत्र, महावीर गृध्रराज जटायु दशरथ के मित्र थे; सम्पाति उनके सगे भाई थे।
श्लोक 2 (3.280.2)
स ददर्श तदा सीतां रावणाङ्कगतां स्नुषाम् । सक्रोधोऽभ्यद्रवत्पक्षी रावणं राक्षसेश्वरम् ॥
sa dadarśa tadā sītāṃ rāvaṇāṅkagatāṃ snuṣām | sakrodho'bhyadravatpakṣī rāvaṇaṃ rākṣaseśvaram
उन्होंने अपनी पुत्रवधू के समान सीता को रावण की गोद में देखा, और वह पक्षी क्रोध में भरकर राक्षसराज रावण पर झपटे।
श्लोक 3 (3.280.3)
अथैनमब्रवीद्गृध्रो मुञ्चमुञ्चेति मैथिलीम् । ध्रियमाणे मयि कथं हरिष्यसि निशाचर ॥
athainamabravīdgṛdhro muñcamuñceti maithilīm | dhriyamāṇe mayi kathaṃ hariṣyasi niśācara
गृध्र ने उससे कहा — "छोड़ दे, मैथिली को छोड़ दे! मेरे जीते जी, हे निशाचर, तू उसे कैसे हर ले जाएगा?
श्लोक 4 (3.280.4)
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे वधूम् । उक्त्वैवं राक्षसेन्द्रं तं चकर्त नखरैर्भृशम् ॥
na hi me mokṣyase jīvanyadi notsṛjase vadhūm | uktvaivaṃ rākṣasendraṃ taṃ cakarta nakharairbhṛśam
यदि तू इस वधू को नहीं छोड़ता, तो मुझसे जीवित नहीं छूटेगा।" ऐसा कहकर उन्होंने राक्षसराज को अपने नखों से बुरी तरह नोच डाला।
श्लोक 5 (3.280.5)
पक्षतुण्डप्रहारैश्च शतशो जर्जरीकृतम् । चक्षार रुधिरं भूरि गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥
pakṣatuṇḍaprahāraiśca śataśo jarjarīkṛtam | cakṣāra rudhiraṃ bhūri giriḥ prasravaṇairiva
पंखों और चोंच के सैकड़ों प्रहारों से जर्जर हुआ रावण इतना रक्त बहाने लगा, जैसे पर्वत अपने झरनों से जल बहाता है।
श्लोक 6 (3.280.6)
स वध्यमानो गृध्रेण रामप्रियहितैषिणा । खड्गमादाय चिच्छेद भुजौ तस्य पतत्रिणः ॥
sa vadhyamāno gṛdhreṇa rāmapriyahitaiṣiṇā | khaḍgamādāya ciccheda bhujau tasya patatriṇaḥ
राम के प्रिय और हित को चाहने वाले गृध्र की मार खाते हुए रावण ने खड्ग उठाकर उस पक्षी के दोनों पंख काट डाले।
श्लोक 7 (3.280.7)
निहत्य गृध्रराजं स भिन्नाभ्रशिखरोपमम् । ऊर्ध्वमाचक्रमे सीतां गृहीत्वाऽङ्केन राक्षसः ॥
nihatya gṛdhrarājaṃ sa bhinnābhraśikharopamam | ūrdhvamācakrame sītāṃ gṛhītvā'ṅkena rākṣasaḥ
बिखरे हुए मेघ-शिखर के समान उस गृध्रराज को मार गिराकर वह राक्षस सीता को गोद में लिए आकाश में ऊपर उठ गया।
श्लोक 8 (3.280.8)
यत्र यत्र तु वैदेही पश्यत्याश्रममण्डलम् । सरो वा सरितो वाऽपि तत्र मुञ्चति भूषणम् ॥
yatra yatra tu vaidehī paśyatyāśramamaṇḍalam | saro vā sarito vā'pi tatra muñcati bhūṣaṇam
जहाँ-जहाँ वैदेही को आश्रमों का समूह, कोई सरोवर या नदी दिखाई देती, वहाँ-वहाँ वे कोई आभूषण गिरा देतीं।
श्लोक 9 (3.280.9)
सा ददर्श गिरिप्रस्थे पञ्च वानरपुङ्गवान् । तत्र वासो महद्दिव्यमुत्ससर्ज मनस्विनी ॥
sā dadarśa giriprasthe pañca vānarapuṅgavān | tatra vāso mahaddivyamutsasarja manasvinī
उन्होंने पर्वत की चोटी पर पाँच श्रेष्ठ वानरों को देखा, और उस मनस्विनी ने वहाँ अपना एक बड़ा सुन्दर वस्त्र गिरा दिया।
श्लोक 10 (3.280.10)
तत्तेषां वानरेन्द्राणां पपात पवनोद्धतम् । मध्ये सुपीतं पञ्चानां विद्युन्मेघान्तरे यथा ॥
tatteṣāṃ vānarendrāṇāṃ papāta pavanoddhatam | madhye supītaṃ pañcānāṃ vidyunmeghāntare yathā
हवा में उड़ता हुआ वह चटकीला पीला वस्त्र उन पाँचों वानरश्रेष्ठों के बीच ऐसे गिरा, जैसे बादलों के बीच बिजली।
श्लोक 11 (3.280.11)
अचिरेणातिचक्राम खेचरः खे चरन्निव । ददर्शाथ पुरीं रम्यां बहुद्वारां मनोरमाम् ॥
acireṇāticakrāma khecaraḥ khe caranniva | dadarśātha purīṃ ramyāṃ bahudvārāṃ manoramām
आकाशचारी रावण आकाश में उड़ते पक्षी की भाँति शीघ्र ही पार निकल गया, और फिर उसने अनेक द्वारों वाली एक रमणीय, मनोहर नगरी देखी,
श्लोक 12 (3.280.12)
प्राकारवप्रसंबाधां निर्मितां विश्वकर्मणा । प्रविवेश पुरीं लङ्कां ससीतो राक्षसेश्वरः ॥
prākāravaprasaṃbādhāṃ nirmitāṃ viśvakarmaṇā | praviveśa purīṃ laṅkāṃ sasīto rākṣaseśvaraḥ
जो परकोटों और बाहरी प्राचीरों से घिरी थी और जिसे विश्वकर्मा ने बनाया था; उस लंका नगरी में राक्षसराज ने सीता के साथ प्रवेश किया।
श्लोक 13 (3.280.13)
एवं हृतायां वैदेह्यां रामो हत्वा महामृगम् । निवृत्तो ददृशे दूराद्भ्रातरं लक्ष्मणं तदा ॥
evaṃ hṛtāyāṃ vaidehyāṃ rāmo hatvā mahāmṛgam | nivṛtto dadṛśe dūrādbhrātaraṃ lakṣmaṇaṃ tadā
इस प्रकार जब वैदेही का हरण हो रहा था, तब उस महामृग को मारकर लौटते हुए राम ने दूर से अपने भाई लक्ष्मण को देखा।
श्लोक 14 (3.280.14)
कथमुत्सृज्य वैदेहीं वने राक्षससेविते । इति तं भ्रातरं दृष्ट्वा प्राप्तोऽसीति व्यगर्हयत् ॥
kathamutsṛjya vaidehīṃ vane rākṣasasevite | iti taṃ bhrātaraṃ dṛṣṭvā prāpto'sīti vyagarhayat
भाई को देखकर उन्होंने उन्हें उलाहना दिया — "राक्षसों से भरे वन में वैदेही को छोड़कर तुम कैसे चले आए?"
श्लोक 15 (3.280.15)
मृगरूपधरेणाथ रक्षसा सोऽपकर्षणम् । भ्रातुरागमनं चैवाचिन्तयन्पर्यतप्यत ॥
mṛgarūpadhareṇātha rakṣasā so'pakarṣaṇam | bhrāturāgamanaṃ caivācintayanparyatapyata
मृगरूपधारी राक्षस द्वारा स्वयं को दूर खींच ले जाने और भाई के चले आने की बात सोचकर वे संतप्त हो उठे।
श्लोक 16 (3.280.16)
गर्हयन्नेव रामस्तु त्वरितस्तं समासदत् । अपि जीवति वैदेही नेति पश्यामि लक्ष्मण ॥
garhayanneva rāmastu tvaritastaṃ samāsadat | api jīvati vaidehī neti paśyāmi lakṣmaṇa
उलाहना देते-देते ही राम शीघ्रता से उनके पास पहुँचे — "लक्ष्मण, क्या वैदेही जीवित है? मुझे तो लगता है, नहीं।"
श्लोक 17 (3.280.17)
तस्य तत्सर्वमाचख्यौ सीताया लक्ष्मणो वचः । यदुक्तवत्यसदृशं वैदेही पश्चिमं वचः ॥
tasya tatsarvamācakhyau sītāyā lakṣmaṇo vacaḥ | yaduktavatyasadṛśaṃ vaidehī paścimaṃ vacaḥ
लक्ष्मण ने उन्हें सब कुछ बता दिया — सीता के वे अनुचित अन्तिम वचन भी, जो वैदेही ने उनसे कहे थे।
श्लोक 18 (3.280.18)
दह्यमानेन तु हृदा रामोऽभ्यपतदाश्रमम् । स ददर्श तदा गृध्रं निहतं पर्वतोपमम् ॥
dahyamānena tu hṛdā rāmo'bhyapatadāśramam | sa dadarśa tadā gṛdhraṃ nihataṃ parvatopamam
जलते हृदय से राम आश्रम की ओर दौड़े। तब उन्होंने पर्वत के समान विशाल एक गृध्र को घायल पड़ा देखा।
श्लोक 19 (3.280.19)
राक्षसं शङ्कमानस्तं विकृष्य बलवद्धनुः । अभ्यधावत काकुत्स्थस्ततस्तं सह लक्ष्मणः ॥
rākṣasaṃ śaṅkamānastaṃ vikṛṣya balavaddhanuḥ | abhyadhāvata kākutsthastatastaṃ saha lakṣmaṇaḥ
उसे राक्षस समझकर ककुत्स्थवंशी राम अपना प्रबल धनुष खींचकर लक्ष्मण के साथ उस पर झपटे।
श्लोक 20 (3.280.20)
स तावुवाच तेजस्वी सहितौ रामलक्ष्मणौ । गृध्रराजोस्मि भद्रं वां सखा दशरथस्य वै ॥
sa tāvuvāca tejasvī sahitau rāmalakṣmaṇau | gṛdhrarājosmi bhadraṃ vāṃ sakhā daśarathasya vai
उस तेजस्वी ने साथ आए राम और लक्ष्मण से कहा — "तुम दोनों का कल्याण हो; मैं गृध्रराज हूँ, दशरथ का मित्र।"
श्लोक 21 (3.280.21)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संगृह्य धनुषी शुभे । कोयं पितरमस्माकं नाम्नाऽऽहेत्यूचतुश्च तौ ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā saṃgṛhya dhanuṣī śubhe | koyaṃ pitaramasmākaṃ nāmnā''hetyūcatuśca tau
उसकी बात सुनकर दोनों ने अपने सुन्दर धनुष रोक लिए और बोले — "यह कौन है जो हमारे पिता का नाम लेकर बात कर रहा है?"
श्लोक 22 (3.280.22)
ततो ददृशतुस्तौ तं छिन्नपक्षद्वयं खगम् । तयोः शशंस गृध्रस्तु सीतार्थे रावणाद्वधम् ॥
tato dadṛśatustau taṃ chinnapakṣadvayaṃ khagam | tayoḥ śaśaṃsa gṛdhrastu sītārthe rāvaṇādvadham
तब उन्होंने देखा कि उस पक्षी के दोनों पंख कटे हुए हैं, और गृध्र ने उन्हें बताया कि सीता के कारण रावण ने उसकी यह दशा की है।
श्लोक 23 (3.280.23)
अपृच्छद्राघवो गृध्रं रावणः कां दिशं गतः । तस्य गृध्रः शिरःकम्पैराचचक्षे ममार च ॥
apṛcchadrāghavo gṛdhraṃ rāvaṇaḥ kāṃ diśaṃ gataḥ | tasya gṛdhraḥ śiraḥkampairācacakṣe mamāra ca
राघव ने गृध्र से पूछा कि रावण किस दिशा में गया है। गृध्र ने सिर हिलाकर संकेत किया और प्राण त्याग दिए।
श्लोक 24 (3.280.24)
दक्षिणामिति काकुत्स्थो विदित्वाऽस्य तदिङ्गितम् । संस्कारं लम्भयामास सखायं पूजयन्पितुः ॥
dakṣiṇāmiti kākutstho viditvā'sya tadiṅgitam | saṃskāraṃ lambhayāmāsa sakhāyaṃ pūjayanpituḥ
उसके संकेत से दक्षिण दिशा समझकर ककुत्स्थवंशी राम ने पिता के मित्र का सम्मान करते हुए उनका अन्त्य-संस्कार किया।
श्लोक 25 (3.280.25)
ततो दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं व्यपविद्धबृसीकटम् । विध्वस्तकलशं शून्यं गोमायुशतसंकुलम् ॥
tato dṛṣṭvā''śramapadaṃ vyapaviddhabṛsīkaṭam | vidhvastakalaśaṃ śūnyaṃ gomāyuśatasaṃkulam
फिर आश्रम को देखकर — जिसकी चटाइयाँ बिखरी पड़ी थीं, कलश टूटे पड़े थे, जो सूना था और सैकड़ों गीदड़ों से भरा था —
श्लोक 26 (3.280.26)
दुःखशोकसमाविष्टौ वैदेहीहरणार्दितौ । जग्मतुर्दण्डकारण्यं दक्षिणेन परंतपौ ॥
duḥkhaśokasamāviṣṭau vaidehīharaṇārditau | jagmaturdaṇḍakāraṇyaṃ dakṣiṇena paraṃtapau
दुःख और शोक से भरे, वैदेही के हरण से पीड़ित वे दोनों शत्रुओं को तपाने वाले भाई दक्षिण की ओर दण्डकारण्य में चले गए।
श्लोक 27 (3.280.27)
वने महति तस्मिंस्तु रामः सौमित्रिणा सह । ददर्श मृगयूथानि द्रवमाणानि सर्वशः ॥
vane mahati tasmiṃstu rāmaḥ saumitriṇā saha | dadarśa mṛgayūthāni dravamāṇāni sarvaśaḥ
उस विशाल वन में सुमित्रानन्दन लक्ष्मण के साथ राम ने हिरनों के झुंडों को चारों ओर भागते देखा,
श्लोक 28 (3.280.28)
शब्दं च घोरं सत्वानां दावाग्नेरिव वर्धतः । अपश्येतां मुहूर्ताच्च कबन्धं घोरदर्शनम् ॥
śabdaṃ ca ghoraṃ satvānāṃ dāvāgneriva vardhataḥ | apaśyetāṃ muhūrtācca kabandhaṃ ghoradarśanam
और प्राणियों का ऐसा भयानक कोलाहल सुना जैसा फैलते दावानल का होता है; और क्षण भर में उन दोनों ने भयंकर दिखने वाले कबन्ध को देखा —
श्लोक 29 (3.280.29)
मेघपर्वतसंकाशं सालस्कन्धं महाभुजम् । उरोगतविशालाक्षं महोदरमहामुखम् ॥
meghaparvatasaṃkāśaṃ sālaskandhaṃ mahābhujam | urogataviśālākṣaṃ mahodaramahāmukham
जो मेघ और पर्वत के समान था, जिसके कंधे साल के तनों जैसे और भुजाएँ विशाल थीं, बड़ी-बड़ी आँखें छाती में थीं और विशाल पेट में ही विशाल मुख था।
श्लोक 30 (3.280.30)
यदृच्छयाथ तद्रक्षः करे जग्राह लक्ष्मणम् । विषादमगमत्सद्यः सौमित्रिरथ भारत ॥
yadṛcchayātha tadrakṣaḥ kare jagrāha lakṣmaṇam | viṣādamagamatsadyaḥ saumitriratha bhārata
संयोग से उस राक्षस ने लक्ष्मण को हाथ में पकड़ लिया, और हे भारत, सुमित्रानन्दन तुरंत विषाद में डूब गए।
श्लोक 31 (3.280.31)
स राममभिसंप्रेक्ष्य कृष्यते येन तन्मुखम् । विषण्णश्चाब्रवीद्रामं पश्यावस्थामिमां मम ॥
sa rāmamabhisaṃprekṣya kṛṣyate yena tanmukham | viṣaṇṇaścābravīdrāmaṃ paśyāvasthāmimāṃ mama
उस मुख की ओर खींचे जाते हुए उन्होंने राम की ओर देखा और विषण्ण होकर कहा — "मेरी यह दशा देखिए!
लक्ष्मण उवाच
श्लोक 32 (3.280.32)
हरणं चैव वैदेह्या मम चायमुपप्लवः । राज्यभ्रंशश्च भवतस्तातस्य मरणं तथा ॥
haraṇaṃ caiva vaidehyā mama cāyamupaplavaḥ | rājyabhraṃśaśca bhavatastātasya maraṇaṃ tathā
वैदेही का हरण, और अब मेरी यह विपत्ति, आपका राज्य से वंचित होना और पिताजी की मृत्यु!
श्लोक 33 (3.280.33)
नाहं त्वां सह वैदेह्या समेतं कोसलागतम् । द्रक्ष्यामि प्रथिते राज्ये पितृपैतामहे स्थितम् ॥
nāhaṃ tvāṃ saha vaidehyā sametaṃ kosalāgatam | drakṣyāmi prathite rājye pitṛpaitāmahe sthitam
मैं आपको वैदेही के साथ कोसल लौटकर पिता-पितामहों के प्रसिद्ध राज्य पर प्रतिष्ठित होते नहीं देख पाऊँगा।
श्लोक 34 (3.280.34)
द्रक्ष्यन्त्यार्यस्य धन्या ये कुशलाजशमीदलैः । अभिषिक्तस्य वदनं सोमं शान्तघनं यथा ॥
drakṣyantyāryasya dhanyā ye kuśalājaśamīdalaiḥ | abhiṣiktasya vadanaṃ somaṃ śāntaghanaṃ yathā
धन्य हैं वे जो कुश, लाजा और शमी-पत्रों से अभिषिक्त आर्य का मुख देखेंगे, जो बादल छँट जाने पर चन्द्रमा जैसा दमकेगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 35 (3.280.35)
एवं बहुविधं धीमान्विललाप स लक्ष्मणः । तमुवाचाथ काकुत्स्थः संभ्रमेष्वप्यसंभ्रमः ॥
evaṃ bahuvidhaṃ dhīmānvilalāpa sa lakṣmaṇaḥ | tamuvācātha kākutsthaḥ saṃbhrameṣvapyasaṃbhramaḥ
इस प्रकार बुद्धिमान लक्ष्मण ने अनेक प्रकार से विलाप किया। तब संकट में भी न घबराने वाले ककुत्स्थवंशी राम ने उनसे कहा —
राम उवाच
श्लोक 36 (3.280.36)
मा विषीद नरव्याघ्र नैष कश्चिन्मयि स्थिते । शक्तो धर्षयितुं वीर सुमित्रानन्दवर्धन । छिन्ध्यस्य दक्षिणं बाहुं छिन्नः सव्यो मया भुजः ॥
mā viṣīda naravyāghra naiṣa kaścinmayi sthite | śakto dharṣayituṃ vīra sumitrānandavardhana | chindhyasya dakṣiṇaṃ bāhuṃ chinnaḥ savyo mayā bhujaḥ
"हे नरव्याघ्र, विषाद मत करो! मेरे रहते कोई तुम्हें दबा नहीं सकता, हे वीर, हे सुमित्रा का आनन्द बढ़ाने वाले। तुम इसकी दाहिनी भुजा काट दो; बाईं भुजा मैंने काट दी है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 37 (3.280.37)
इत्येवं वदता तस्य भुजो रामेण पातितः । खड्गेन भृशतीक्ष्णेन निकृत्तस्तिलकाण्डवत् ॥
ityevaṃ vadatā tasya bhujo rāmeṇa pātitaḥ | khaḍgena bhṛśatīkṣṇena nikṛttastilakāṇḍavat
यह कहते-कहते ही राम ने अत्यन्त तीखे खड्ग से उसकी भुजा तिल के डंठल की भाँति काटकर गिरा दी।
श्लोक 38 (3.280.38)
ततोऽस्य दक्षिणं बाहुं खड्गेनाजघ्निवान्बली । सौमित्रिरपि संप्रेक्ष्य भ्रातरं राघवं स्थितम् ॥
tato'sya dakṣiṇaṃ bāhuṃ khaḍgenājaghnivānbalī | saumitrirapi saṃprekṣya bhrātaraṃ rāghavaṃ sthitam
तब बलवान सुमित्रानन्दन ने भी अपने भाई राघव को डटा हुआ देखकर खड्ग से उसकी दाहिनी भुजा पर प्रहार किया,
श्लोक 39 (3.280.39)
पुनर्जघान पार्श्वे वै तद्रक्षो लक्ष्मणो भृशम् । गतासुरपतद्भूमौ कबन्धः सुमहांस्ततः ॥
punarjaghāna pārśve vai tadrakṣo lakṣmaṇo bhṛśam | gatāsurapatadbhūmau kabandhaḥ sumahāṃstataḥ
और लक्ष्मण ने फिर उस राक्षस की पसलियों पर ज़ोर से वार किया। तब वह विशालकाय कबन्ध प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 40 (3.280.40)
तस्य देहाद्विनिःसृत्य पुरुषो दिव्यदर्शनः । ददृशे दिवमास्थाय दिवि सूर्य इव ज्वलन् ॥
tasya dehādviniḥsṛtya puruṣo divyadarśanaḥ | dadṛśe divamāsthāya divi sūrya iva jvalan
उसके शरीर से एक दिव्य रूप वाला पुरुष निकला, जो आकाश में स्थित होकर आकाश के सूर्य के समान दमकता दिखाई दिया।
श्लोक 41 (3.280.41)
पप्रच्छ रामस्तं वाग्मी कस्त्वं प्रब्रूहि पृच्छतः । कामया किमिदं चित्रमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ॥
papraccha rāmastaṃ vāgmī kastvaṃ prabrūhi pṛcchataḥ | kāmayā kimidaṃ citramāścaryaṃ pratibhāti me
वाणी में कुशल राम ने उससे पूछा — "तुम कौन हो? मैं जानने की इच्छा से पूछ रहा हूँ, बताओ। यह क्या विचित्र बात है? मुझे तो यह आश्चर्य जान पड़ता है।"
श्लोक 42 (3.280.42)
तस्याचचक्षे गन्धर्वो विश्वावसुरहं नृप । प्राप्तो ब्राह्मणशापेन योनिं राक्षससेविताम् ॥
tasyācacakṣe gandharvo viśvāvasurahaṃ nṛpa | prāpto brāhmaṇaśāpena yoniṃ rākṣasasevitām
गन्धर्व ने उन्हें बताया — "हे राजन्, मैं विश्वावसु हूँ। एक ब्राह्मण के शाप से मुझे राक्षसों की योनि प्राप्त हुई थी।
विश्वावसुरुवाच
श्लोक 43 (3.280.43)
रावणेन हृता सीता लङ्कायां संनिवेशिता । सुग्रीवमभिगच्छस्व स ते साह्यं करिष्यति ॥
rāvaṇena hṛtā sītā laṅkāyāṃ saṃniveśitā | sugrīvamabhigacchasva sa te sāhyaṃ kariṣyati
सीता को रावण हर ले गया है और उसने उन्हें लंका में रखा है। तुम सुग्रीव के पास जाओ; वह तुम्हारी सहायता करेगा।
श्लोक 44 (3.280.44)
एषा पम्पा शिवजला हंसकारण्डवायुता । ऋश्यमूकस्य शैलस्य संनिकर्षे तटाकिनी ॥
eṣā pampā śivajalā haṃsakāraṇḍavāyutā | ṛśyamūkasya śailasya saṃnikarṣe taṭākinī
यह पम्पा सरोवर है, जिसका जल मंगलकारी है और जो हंसों तथा कारण्डव पक्षियों से भरा है; यह ऋष्यमूक पर्वत के निकट है।
श्लोक 45 (3.280.45)
वसते तत्र सुग्रीवश्चतुर्भिः सचिवैः सह । भ्राता वानरराजस्य वालिनो हेममालिनः ॥
vasate tatra sugrīvaścaturbhiḥ sacivaiḥ saha | bhrātā vānararājasya vālino hemamālinaḥ
वहाँ सुग्रीव अपने चार मन्त्रियों के साथ रहता है; वह सोने की माला धारण करने वाले वानरराज वाली का भाई है।
श्लोक 46 (3.280.46)
तेन त्वं सह संगम्य दुःखमूलं निवेदय । समानशीलो भवतः साहाय्यं स करिष्यति ॥
tena tvaṃ saha saṃgamya duḥkhamūlaṃ nivedaya | samānaśīlo bhavataḥ sāhāyyaṃ sa kariṣyati
उससे मिलकर अपने दुःख का मूल कारण बताओ। उसकी दशा भी तुम्हारे जैसी ही है; वह तुम्हारी सहायता करेगा।
श्लोक 47 (3.280.47)
एतावच्छक्यमस्माभिर्वक्तुं द्रष्टासि जानकीम् । ध्रुवं वानरराजस्य विदितो रावणालयः ॥
etāvacchakyamasmābhirvaktuṃ draṣṭāsi jānakīm | dhruvaṃ vānararājasya vidito rāvaṇālayaḥ
इतना ही हम कह सकते हैं — तुम जानकी को देखोगे। वानरराज को रावण का निवास निश्चय ही ज्ञात है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 48 (3.280.48)
इत्युक्त्वाऽन्तर्हितो दिव्यः पुरुषः स महाप्रभः । विस्मयं जग्मतुश्चोभौ प्रवीरौ रामलक्ष्मणौ ॥
ityuktvā'ntarhito divyaḥ puruṣaḥ sa mahāprabhaḥ | vismayaṃ jagmatuścobhau pravīrau rāmalakṣmaṇau
यह कहकर वह महातेजस्वी दिव्य पुरुष अन्तर्धान हो गया, और दोनों वीर राम और लक्ष्मण विस्मय में पड़ गए।